Class 12 History Notes Chapter 1 (ईंटें; मनके तथा अस्थियाँ: हडप्पा सभ्यता) – Bharatiya Itihas ke Kuch Vishay-I Book

नमस्ते विद्यार्थियों!
आज हम आपकी कक्षा 12 की इतिहास की पुस्तक 'भारतीय इतिहास के कुछ विषय-I' के अध्याय 1 "ईंटें; मनके तथा अस्थियाँ: हडप्पा सभ्यता" का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। मैं आपको इस सभ्यता से जुड़े सभी प्रमुख तथ्यों और अवधारणाओं को विस्तार से समझाऊँगा।
अध्याय 1: ईंटें; मनके तथा अस्थियाँ: हडप्पा सभ्यता (विस्तृत नोट्स)
1. परिचय एवं नामकरण:
- हड़प्पा सभ्यता: सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है। यह अपने समय की सबसे बड़ी और सबसे विकसित सभ्यताओं में से एक थी।
- नामकरण: इस सभ्यता का नाम 'हड़प्पा' नामक स्थल पर पड़ा, जिसकी खोज सबसे पहले हुई थी। सिंधु घाटी सभ्यता नाम इसके सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे फैले होने के कारण दिया गया।
- काल निर्धारण: विकसित हड़प्पा संस्कृति का काल लगभग 2600 ई.पू. से 1900 ई.पू. के बीच माना जाता है। इससे पहले और बाद में भी इस क्षेत्र में संस्कृतियाँ मौजूद थीं, जिन्हें क्रमशः आरंभिक हड़प्पा और उत्तर हड़प्पा कहा जाता है।
2. हड़प्पा सभ्यता की खोज:
- प्रारंभिक संदर्भ: 19वीं सदी में, ब्रिटिश इंजीनियरों ने पंजाब में रेलवे लाइन बिछाते समय अनजाने में हड़प्पा के टीलों से ईंटें निकालीं, लेकिन वे इसके महत्व को नहीं समझ पाए।
- कनिंघम का भ्रम: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पहले महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम ने 19वीं शताब्दी में हड़प्पा का दौरा किया। उन्होंने कुछ मुहरें भी पाईं, लेकिन वे इन्हें गंगा घाटी में विकसित भारतीय सभ्यता से जोड़ने में विफल रहे और इन्हें एक प्रारंभिक ऐतिहासिक काल की वस्तु मान बैठे।
- जॉन मार्शल की घोषणा: 1924 में, ASI के महानिदेशक जॉन मार्शल ने पूरे विश्व के सामने सिंधु घाटी में एक नई सभ्यता की खोज की घोषणा की।
- प्रमुख खोजकर्ता:
- राय बहादुर दयाराम साहनी: 1921 में हड़प्पा स्थल की खोज की।
- राखालदास बनर्जी: 1922 में मोहनजोदड़ो स्थल की खोज की।
- नई तकनीकें: आर.ई.एम. व्हीलर ने 1944 में ASI के महानिदेशक के रूप में ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज उत्खनन के बजाय टीले के स्तरीकरण का पालन करने की पद्धति विकसित की, जो अधिक वैज्ञानिक थी।
3. भौगोलिक विस्तार:
- यह सभ्यता वर्तमान पाकिस्तान, अफगानिस्तान और भारत के कुछ हिस्सों (जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश) तक फैली हुई थी।
- प्रमुख स्थल:
- पाकिस्तान में: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हुदड़ो, कोटदीजी, गनवेरीवाला।
- भारत में: लोथल, कालीबंगन, राखीगढ़ी, धोलावीरा, बनावली, रंगपुर, सुरकोटदा, आलमगीरपुर।
- अफगानिस्तान में: शॉर्टुघई (व्यापारिक चौकी)।
- यह एक त्रिभुजाकार क्षेत्र में फैली हुई थी।
4. निर्वाह के तरीके (Subsistence Strategies):
- कृषि:
- हड़प्पावासी विभिन्न प्रकार के पौधों और पशु उत्पादों का सेवन करते थे।
- प्रमुख फसलें: गेहूं, जौ, दालें, सफेद चना, तिल। बाजरा गुजरात के स्थलों से मिला है, और चावल के दाने अपेक्षाकृत कम मिले हैं।
- कृषि प्रौद्योगिकी:
- जुताई के लिए बैलों का प्रयोग होता था।
- कालीबंगन (राजस्थान) से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं।
- बनावली (हरियाणा) से मिट्टी के हल के प्रतिरूप मिले हैं।
- सिंचाई के लिए नहरों का प्रयोग होता था, जिसके साक्ष्य अफगानिस्तान के शॉर्टुघई से मिले हैं। धोलावीरा (गुजरात) में जल संचयन के लिए जलाशय मिले हैं।
- पशुपालन: भेड़, बकरी, भैंस और सूअर पाले जाते थे।
- शिकार: जंगली प्रजातियों (जैसे हिरण, घड़ियाल) का भी शिकार किया जाता था। मछली और पक्षियों के अवशेष भी मिले हैं।
5. मोहनजोदड़ो: एक नियोजित शहरी केंद्र:
- यह हड़प्पा सभ्यता का सबसे प्रसिद्ध स्थल है।
- बस्तियों का विभाजन: हड़प्पा शहरों की सबसे विशिष्ट विशेषता योजनाबद्ध विकास था। बस्तियाँ दो भागों में विभाजित थीं:
- दुर्ग (Citadel): यह आकार में छोटा लेकिन ऊँचाई पर बना था। यहाँ सार्वजनिक महत्व की संरचनाएँ थीं, जैसे विशाल स्नानागार और मालगोदाम। दुर्ग को कच्ची ईंटों के चबूतरे पर बनाया गया था और दीवारों से घेरा गया था।
- निचला शहर (Lower Town): यह आकार में बड़ा लेकिन नीचाई पर स्थित था। यहाँ आवासीय भवन थे। निचला शहर भी दीवारों से घिरा हुआ था।
- नियोजन की विशेषताएँ:
- सड़कें और गलियाँ: सड़कें और गलियाँ एक ग्रिड पद्धति में बनाई गई थीं, जो एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
- जल निकास प्रणाली (Drainage System): यह हड़प्पा शहरों की सबसे प्रभावशाली विशेषता थी। घरों से निकलने वाला पानी सड़कों की नालियों से जुड़ता था। ये नालियाँ ढकी हुई होती थीं और इनमें मैनहोल भी बने होते थे।
- स्थापत्य: ईंटों का मानकीकरण किया गया था (लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई का अनुपात 4:2:1 होता था)। कच्ची और पक्की दोनों प्रकार की ईंटों का उपयोग किया जाता था।
- घरों की विशेषताएँ:
- अधिकांश घर एक आंगन के चारों ओर केंद्रित होते थे।
- गोपनीयता पर जोर दिया जाता था (मुख्य द्वार से सीधे घर के आंतरिक भाग या आंगन का दृश्य नहीं दिखता था, और भूतल पर खिड़कियाँ नहीं होती थीं)।
- प्रत्येक घर में एक स्नानागार होता था, जिसकी नालियाँ सड़क की नालियों से जुड़ी होती थीं।
- कई घरों में कुएँ होते थे, जिनका उपयोग राहगीर भी कर सकते थे। मोहनजोदड़ो में लगभग 700 कुएँ मिले हैं।
- विशाल स्नानागार (Great Bath): दुर्ग में स्थित यह एक आयताकार जलाशय था, जो ईंटों से बना था और जिप्सम के गारे से जलरोधी किया गया था। इसके दोनों ओर सीढ़ियाँ थीं। इसके चारों ओर गलियारे और छोटे कमरे थे, संभवतः अनुष्ठानिक स्नान के लिए उपयोग किया जाता था।
- मालगोदाम (Warehouse): यह एक विशाल संरचना थी, जिसकी निचली ईंटों की संरचनाएँ ही बची हैं।
6. सामाजिक भिन्नताएँ (Social Differences):
- पुरातत्वविद् सामाजिक भिन्नताओं का अध्ययन करने के लिए मुख्य रूप से दो विधियों का उपयोग करते हैं:
- शवाधान (Burials): हड़प्पा स्थलों पर मृतकों को आमतौर पर गर्तों में दफनाया जाता था। कुछ कब्रों में मृदभांड और आभूषण मिले हैं, जो संभवतः मृत्यु के बाद के जीवन में विश्वास को दर्शाते हैं। पुरुषों और महिलाओं दोनों के शवाधानों में आभूषण मिले हैं।
- विलासिता की वस्तुओं की खोज (Looking for Luxuries):
- पुरातत्वविद् वस्तुओं को 'उपयोगितावादी' (रोजमर्रा के उपयोग की) और 'विलासिता' (दुर्लभ, महंगी, गैर-स्थानीय सामग्री से बनी) में वर्गीकृत करते हैं।
- उदाहरण: फायेंस (रेत और सिलिका से बना एक महंगा पदार्थ) से बने छोटे बर्तन, जो मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे बड़े शहरी केंद्रों में अधिक पाए गए हैं, जबकि कालीबंगन जैसे छोटे स्थलों पर कम।
7. शिल्प उत्पादन के केंद्र (Centres of Craft Production):
- चन्हुदड़ो: यह लगभग 7 हेक्टेयर का एक छोटा स्थल था, जो पूरी तरह से शिल्प उत्पादन (मनके बनाना, शंख की कटाई, धातु कर्म, मुहर निर्माण, बाट बनाना) को समर्पित था।
- मनके बनाने की सामग्री: कार्नेलियन (सुंदर लाल रंग), जैस्पर, स्फटिक, क्वार्ट्ज, स्टीएटाइट, तांबा, कांसा, सोना, शंख, फायेंस और पकी मिट्टी।
- मनके बनाने की तकनीक: पत्थर के पिंडों को आकार देना, घिसाई, पॉलिश करना और छेद करना।
- शिल्प उत्पादन के अन्य केंद्र: लोथल, धोलावीरा, नागेश्वर, बालाकोट।
8. कच्चे माल की प्राप्ति (Procuring Raw Materials):
- स्थानीय स्रोत: मिट्टी, लकड़ी।
- दूरस्थ स्रोत:
- पत्थर: नागेश्वर और बालाकोट (शंख), राजस्थान (तांबा - खेतड़ी क्षेत्र), अफगानिस्तान (लाजवर्द मणि - शॉर्टुघई), गुजरात (कार्नेलियन - लोथल)।
- धातु: राजस्थान (तांबा - खेतड़ी क्षेत्र), दक्षिण भारत (सोना)।
- अभियान और व्यापार:
- हड़प्पावासी कच्चे माल प्राप्त करने के लिए सुदूर क्षेत्रों में अभियान भेजते थे।
- खेतड़ी क्षेत्र (राजस्थान): यहाँ से तांबा प्राप्त किया जाता था। पुरातात्वविदों ने यहाँ की संस्कृतियों को 'गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति' नाम दिया है, जिसमें हड़प्पा मृदभांड के साथ-साथ तांबे की वस्तुओं का एक विशिष्ट गैर-हड़प्पा संग्रह मिला है।
- ओमान: हड़प्पावासियों के ओमान से भी तांबे के व्यापारिक संबंध थे। रासायनिक विश्लेषण से पता चला है कि ओमानी तांबे और हड़प्पा के कलाकृतियों में निकल के अंश समान थे।
- मेसोपोटामिया के साथ संपर्क:
- मेसोपोटामिया के ग्रंथों में 'दिलमुन' (संभवतः बहरीन), 'मेलुहा' (संभवतः हड़प्पा क्षेत्र) और 'मगन' (संभवतः ओमान) जैसे क्षेत्रों से आने वाले जहाजों का उल्लेख है।
- मेसोपोटामियाई मुहरों पर हड़प्पा मुहरों जैसे प्रतीक और जहाज के चित्र मिले हैं, जो व्यापारिक संबंधों को दर्शाते हैं।
9. मुहरें, बाट तथा लेखन (Seals, Weights, and Script):
- मुहरें (Seals):
- अधिकांश मुहरें स्टीएटाइट (सेलखड़ी) नामक पत्थर से बनी थीं।
- इन पर जानवरों के चित्र (जैसे बैल, भैंसा, बाघ, बकरी, हाथी, गेंडा) और एक लिपि खुदी होती थी।
- मुहरों का उपयोग लंबी दूरी के संचार को सुविधाजनक बनाने के लिए किया जाता था, संभवतः सामानों के थैलों को चिह्नित करने के लिए।
- लिपि (Script):
- हड़प्पा लिपि चित्रात्मक थी और अभी तक अपठित है।
- इसमें लगभग 375 से 400 चिह्न हैं।
- यह दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी (कुछ अपवादों को छोड़कर)।
- यह वर्णमाला नहीं थी, बल्कि इसमें बहुत सारे संकेत थे।
- बाट (Weights):
- बाट आमतौर पर चर्ट नामक पत्थर से बनाए जाते थे और घनाकार होते थे।
- इन पर कोई निशान नहीं होता था।
- निचली इकाइयाँ द्विआधारी (1, 2, 4, 8, 16, 32... 12,800 तक) होती थीं, जबकि ऊपरी इकाइयाँ दशमलवीय प्रणाली का पालन करती थीं।
- इनका उपयोग आभूषणों और मनकों को तोलने के लिए किया जाता था।
10. प्राचीन सत्ता (Ancient Authority):
- हड़प्पा समाज में सत्ता के स्वरूप को लेकर पुरातत्वविदों में मतभेद हैं:
- पहला मत: कोई शासक नहीं था, और सभी को समान दर्जा प्राप्त था।
- दूसरा मत: कोई एक शासक नहीं था, बल्कि कई शासक थे (जैसे हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि के अलग-अलग शासक)।
- तीसरा मत: एक ही शासक था, जैसा कि मोहनजोदड़ो में मिले 'पुरोहित राजा' की मूर्ति से संकेत मिलता है। यह शासक संभवतः धार्मिक और प्रशासनिक कार्यों को नियंत्रित करता था।
- हालांकि, हड़प्पा सभ्यता की जटिल योजना, मानकीकृत ईंटें, बाट और शिल्प उत्पादन के साक्ष्य एक मजबूत केंद्रीय सत्ता की ओर इशारा करते हैं।
11. सभ्यता का अंत (End of the Civilization):
- लगभग 1800 ई.पू. तक हड़प्पा स्थलों का पतन शुरू हो गया।
- पतन के कारण (विभिन्न सिद्धांत):
- जलवायु परिवर्तन: अत्यधिक शुष्कता या नदियों का सूखना।
- वनों की कटाई: ईंटें पकाने और धातु कर्म के लिए बड़े पैमाने पर लकड़ी का उपयोग।
- बाढ़: मोहनजोदड़ो जैसे स्थलों पर बार-बार बाढ़ आने के संकेत।
- नदियों का मार्ग बदलना: सिंधु नदी के मार्ग बदलने से कुछ शहर जलविहीन हो गए।
- भूकंप: टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल के कारण भूकंप।
- आर्य आक्रमण (विवादित): आर.ई.एम. व्हीलर ने मोहनजोदड़ो में मिले नरकंकालों के आधार पर आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत दिया, लेकिन यह व्यापक रूप से स्वीकार्य नहीं है।
- पतन के संकेत:
- बस्तियों का परित्याग।
- नई बस्तियों का ग्रामीण स्वरूप।
- शहरी नियोजन, लेखन, बाट और मुहरों का गायब होना।
- दूर के व्यापारिक संबंधों का टूटना।
- उत्तर हड़प्पा संस्कृतियाँ: पतन के बाद भी कुछ क्षेत्रों में छोटी ग्रामीण बस्तियाँ बनी रहीं, जिन्हें 'उत्तर हड़प्पा' या 'अनुवर्ती संस्कृतियाँ' कहा जाता है।
12. पुरातत्व की समस्याएँ (Problems of Archaeological Interpretation):
- धार्मिक प्रथाओं का पुनर्निर्माण:
- पुरातत्वविदों को हड़प्पावासियों की धार्मिक मान्यताओं को समझने में कठिनाई होती है, क्योंकि कोई मंदिर या स्पष्ट धार्मिक संरचनाएँ नहीं मिली हैं।
- मातृदेवी: कुछ स्त्री मृण्मूर्तियाँ मिली हैं, जिन्हें मातृदेवी से जोड़ा गया है।
- आद्य-शिव (Proto-Shiva): एक मुहर पर एक आकृति मिली है, जिसे जॉन मार्शल ने 'पशुपति' या आद्य-शिव कहा, जो एक योगी की मुद्रा में बैठा है और जानवरों से घिरा है।
- वृक्ष पूजा: कुछ मुहरों पर पीपल जैसे पौधों के चित्र मिले हैं।
- अग्नि वेदी: कालीबंगन और लोथल जैसे स्थलों से अग्नि वेदियों के साक्ष्य मिले हैं।
- लिंग और योनि: कुछ पत्थर की वस्तुएँ मिली हैं, जिन्हें लिंग और योनि की पूजा से जोड़ा गया है।
- व्याख्या की कठिनाई: पुरातत्वविदों को अक्सर अपरिचित वस्तुओं और प्रतीकों की व्याख्या करने में कठिनाई होती है, जिससे विभिन्न सिद्धांतों और विवादों को जन्म मिलता है।
महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
हड़प्पा सभ्यता की खोज किस वर्ष हुई थी?
a) 1901
b) 1921
c) 1935
d) 1942 -
मोहनजोदड़ो की खोज किसने की थी?
a) राय बहादुर दयाराम साहनी
b) राखालदास बनर्जी
c) जॉन मार्शल
d) आर.ई.एम. व्हीलर -
हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल कौन सा है?
a) हड़प्पा
b) मोहनजोदड़ो
c) लोथल
d) राखीगढ़ी -
हड़प्पा सभ्यता में जुते हुए खेत के साक्ष्य कहाँ से मिले हैं?
a) मोहनजोदड़ो
b) हड़प्पा
c) कालीबंगन
d) लोथल -
हड़प्पा सभ्यता की जल निकास प्रणाली की मुख्य विशेषता क्या थी?
a) खुली नालियाँ
b) ढकी हुई नालियाँ
c) केवल घरों के अंदर नालियाँ
d) कोई जल निकास प्रणाली नहीं -
हड़प्पा लिपि के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सत्य है?
a) यह एक वर्णमाला थी।
b) इसे सफलतापूर्वक पढ़ा जा चुका है।
c) यह दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी।
d) इसमें केवल 50-100 चिह्न थे। -
हड़प्पावासी तांबे का आयात किस स्थान से करते थे?
a) दक्षिण भारत
b) ओमान
c) मेसोपोटामिया
d) अफगानिस्तान -
मोहनजोदड़ो में मिला 'विशाल स्नानागार' किस संरचना का हिस्सा था?
a) निचला शहर
b) दुर्ग
c) आवासीय क्षेत्र
d) शिल्प कार्यशाला -
हड़प्पा सभ्यता के पतन का एक संभावित कारण क्या नहीं माना जाता है?
a) जलवायु परिवर्तन
b) नदियों का मार्ग बदलना
c) शहरीकरण का अभाव
d) वनों की कटाई -
हड़प्पा सभ्यता की मुहरें आमतौर पर किस सामग्री से बनी होती थीं?
a) लोहा
b) सोना
c) स्टीएटाइट (सेलखड़ी)
d) संगमरमर
उत्तरमाला:
- b) 1921
- b) राखालदास बनर्जी
- b) मोहनजोदड़ो (हालांकि राखीगढ़ी को भी कुछ स्रोतों में बड़ा माना जाता है, NCERT के अनुसार मोहनजोदड़ो सबसे प्रसिद्ध और बड़ा नियोजित शहर है)
- c) कालीबंगन
- b) ढकी हुई नालियाँ
- c) यह दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी।
- b) ओमान
- b) दुर्ग
- c) शहरीकरण का अभाव (हड़प्पा सभ्यता एक शहरी सभ्यता थी)
- c) स्टीएटाइट (सेलखड़ी)
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और प्रश्न आपको हड़प्पा सभ्यता को गहराई से समझने और आपकी सरकारी परीक्षा की तैयारी में सहायक होंगे। किसी भी अन्य प्रश्न के लिए आप पूछ सकते हैं। शुभकामनाएँ!