Class 12 History Notes Chapter 2 (Chapter 2) – Bharatiya Itihas ke Kuch Vishay-II Book

Bharatiya Itihas ke Kuch Vishay-II
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम कक्षा 12 इतिहास की पुस्तक 'भारतीय इतिहास के कुछ विषय - भाग II' के अध्याय 2 'किसान, जमींदार और राज्य' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय 16वीं और 17वीं शताब्दी के कृषि समाज, मुगल साम्राज्य के भू-राजस्व संबंधों और ग्रामीण जीवन की गहन जानकारी प्रदान करता है, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


अध्याय 2: किसान, जमींदार और राज्य (कृषि समाज और मुगल साम्राज्य)

I. परिचय: 16वीं-17वीं शताब्दी का कृषि समाज

  • आधार: इस काल में भारतीय समाज का मुख्य आधार कृषि था। अधिकांश आबादी गाँवों में रहती थी और कृषि कार्यों में संलग्न थी।
  • आर्थिक जीवन: कृषि उत्पादन ही राज्य की आय का मुख्य स्रोत था और यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी थी।
  • सामाजिक संरचना: ग्रामीण समाज विभिन्न सामाजिक समूहों में बँटा हुआ था, जिसमें किसान, जमींदार, मजदूर और कारीगर शामिल थे।

II. किसान और कृषि उत्पादन

  1. किसानों के प्रकार:
    • खुद-काश्त: वे किसान जो अपनी जमीन पर खेती करते थे और उसी गाँव में रहते थे जहाँ उनकी जमीन थी। ये अपेक्षाकृत अधिक संपन्न थे।
    • पाहि-काश्त: वे किसान जो दूसरे गाँवों में जाकर ठेके पर खेती करते थे। ये या तो अपनी मर्जी से जाते थे (जैसे बेहतर शर्तों की तलाश में) या मजबूरी में (जैसे अकाल या आर्थिक दबाव के कारण)।
  2. भूमि का स्वामित्व और अधिकार:
    • किसानों के पास अपनी जमीन पर मालिकाना हक होता था, जिसे वे बेच सकते थे, गिरवी रख सकते थे या दान कर सकते थे।
    • राज्य का मुख्य लक्ष्य किसानों से भू-राजस्व वसूलना था, न कि उन्हें उनकी जमीन से बेदखल करना।
  3. सिंचाई और तकनीक:
    • सिंचाई: मुख्यतः वर्षा पर निर्भरता थी, लेकिन कुएँ, तालाब और नहरें भी सिंचाई के महत्वपूर्ण स्रोत थे। राज्य सिंचाई सुविधाओं के विस्तार को प्रोत्साहित करता था।
    • तकनीक: हल, बैल और बीज बोने के पारंपरिक तरीके प्रचलित थे। लोहे के फाल वाले हल का उपयोग होता था।
  4. फसलें:
    • खरीफ फसलें: जून-जुलाई में बोई जाती थीं और सितंबर-अक्टूबर में काटी जाती थीं (जैसे चावल, ज्वार, बाजरा)।
    • रबी फसलें: अक्टूबर-नवंबर में बोई जाती थीं और मार्च-अप्रैल में काटी जाती थीं (जैसे गेहूँ, जौ, चना)।
    • नकदी फसलें (जिन्स-ए-कामिल): कपास, गन्ना, नील, अफीम जैसी फसलें जिनका उत्पादन व्यापार और राजस्व के लिए किया जाता था। मुगल राज्य ऐसी फसलों को प्रोत्साहन देता था क्योंकि इनसे अधिक राजस्व मिलता था।
    • नई फसलें: 17वीं सदी में मक्का, टमाटर, आलू, मिर्च जैसे नए फल और सब्जियाँ भारत पहुँचीं।

III. ग्रामीण समाज में वर्ग और जातियाँ

  1. जाति और कृषि उत्पादन:
    • किसानों में भी जातिगत भेदभाव था। निचली जातियों के किसानों को अक्सर बेगार (बिना मजदूरी के काम) करना पड़ता था।
    • जातिगत विभाजन के कारण कृषि कार्यों का भी विभाजन था।
  2. मुसलमान समुदाय में सामाजिक विभाजन:
    • मुसलमानों में भी जातिगत और सामाजिक स्तरीकरण मौजूद था (जैसे अशराफ - उच्च वर्ग, अजलाफ - निम्न वर्ग)।
  3. पंचायतें और मुखिया:
    • पंचायत: गाँव की पंचायत एक निर्वाचित निकाय होती थी, जिसमें गाँव के बुजुर्ग और प्रतिष्ठित लोग शामिल होते थे। इसका मुखिया मुकद्दम या मंडल कहलाता था।
    • मुखिया का चुनाव: मुखिया का चुनाव गाँव के बुजुर्गों की सहमति से होता था और उसे जमींदार व राज्य द्वारा मान्यता मिलती थी।
    • पंचायत के कार्य:
      • गाँव के राजस्व खाते का हिसाब रखना।
      • गाँव के सदस्यों के आचरण पर निगरानी रखना।
      • विवादों का निपटारा करना।
      • राज्य के अधिकारियों से गाँव की रक्षा करना।
      • सामुदायिक कल्याण के कार्य (जैसे सिंचाई सुविधाओं का रखरखाव)।
    • जाति पंचायतें: प्रत्येक जाति की अपनी पंचायत होती थी, जो अपने सदस्यों के व्यवहार को नियंत्रित करती थी और जातिगत नियमों का पालन सुनिश्चित करती थी।

IV. महिलाएँ और कृषि समाज

  • श्रम विभाजन: महिलाएँ कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। वे बुवाई, निराई, कटाई, थ्रेसिंग और बीज तैयार करने जैसे काम करती थीं।
  • लिंग आधारित कार्य: कुछ कार्य विशेष रूप से महिलाओं द्वारा किए जाते थे, जैसे मिट्टी के बर्तन बनाना, सूत कातना।
  • विरासत के अधिकार: महिलाओं को पैतृक संपत्ति में पुरुषों जितना अधिकार नहीं था, लेकिन विधवाओं को संपत्ति बेचने या गिरवी रखने का अधिकार था।
  • सामाजिक स्थिति: ग्रामीण समाज में महिलाओं को कुछ हद तक स्वायत्तता प्राप्त थी, विशेषकर कृषि कार्यों में उनकी भागीदारी के कारण।

V. जमींदार

  • परिभाषा: जमींदार वे लोग थे जिनके पास अपनी भूमि पर मालिकाना हक था और वे राज्य की ओर से किसानों से भू-राजस्व वसूल करते थे।
  • उत्पत्ति: जमींदारों का उदय विभिन्न तरीकों से हुआ - कुछ पुराने कुलीन वर्ग थे, कुछ ने सैन्य शक्ति से भूमि पर कब्जा किया, और कुछ को राज्य ने राजस्व संग्रह के लिए नियुक्त किया।
  • अधिकार और कार्य:
    • राजस्व संग्रह: जमींदारों का मुख्य कार्य किसानों से भू-राजस्व एकत्र करके राज्य तक पहुँचाना था।
    • सैन्य शक्ति: उनके पास अपनी सैन्य टुकड़ियाँ (घुड़सवार, पैदल सेना) होती थीं और वे किले भी रखते थे।
    • न्याय: वे स्थानीय स्तर पर न्याय प्रदान करते थे।
    • आर्थिक शक्ति: वे अपनी जमीन पर खेती करवाते थे (जिसे 'मिलकियत' कहते थे) और बाजार (हाट) स्थापित करते थे, जिससे उनकी आर्थिक शक्ति बढ़ती थी।
  • राज्य से संबंध: जमींदार राज्य और किसानों के बीच मध्यस्थ का काम करते थे। कभी-कभी वे राज्य के खिलाफ किसानों का नेतृत्व भी करते थे।
  • सामाजिक स्थिति: जमींदार समाज में एक प्रभावशाली वर्ग थे, जो अक्सर उच्च जातियों से संबंधित होते थे।

VI. राज्य और कृषि: भू-राजस्व प्रणाली

  • राजस्व का महत्व: भू-राजस्व मुगल साम्राज्य की आय का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत था।
  • भू-राजस्व निर्धारण की प्रक्रिया:
    1. जमा (निर्धारित राशि): प्रत्येक प्रांत में राज्य द्वारा निर्धारित की गई कुल राजस्व राशि।
    2. हासिल (संग्रहित राशि): वास्तव में एकत्र की गई राजस्व राशि।
    3. भूमि का वर्गीकरण: अकबर के शासनकाल में अबुल फजल ने 'आईन-ए-अकबरी' में भूमि को उसकी उर्वरता के आधार पर चार श्रेणियों में बाँटा:
      • पोलज: जिस पर हर साल खेती होती थी।
      • परौती: जिस पर कुछ समय के लिए खेती रोक दी जाती थी ताकि वह अपनी उर्वरता वापस पा सके।
      • चाचर: जिस पर 3-4 साल तक खेती नहीं होती थी।
      • बंजर: जिस पर 5 साल या उससे अधिक समय तक खेती नहीं होती थी।
  • राजस्व प्रणालियाँ:
    • दहसाला प्रणाली (टोडरमल बंदोबस्त): अकबर के वित्त मंत्री राजा टोडरमल द्वारा विकसित। इसमें पिछले 10 वर्षों के औसत उत्पादन और कीमतों के आधार पर राजस्व निर्धारित किया जाता था।
    • नस्क: एक अनुमानित प्रणाली जहाँ पिछले अनुभवों के आधार पर राजस्व का अनुमान लगाया जाता था।
  • राजस्व संग्रह: राजस्व नकद या वस्तु के रूप में लिया जा सकता था, लेकिन राज्य नकद को प्राथमिकता देता था।
  • राज्य का उद्देश्य: राज्य का मुख्य उद्देश्य अधिकतम राजस्व प्राप्त करना था, लेकिन वह किसानों को अत्यधिक शोषण से बचाने का भी प्रयास करता था ताकि कृषि उत्पादन जारी रहे।

VII. जंगल और कबीले

  • वनवासी: जंगलों में रहने वाले लोग (शिकारी-संग्राहक, झूम खेती करने वाले) जिन्हें मुगल स्रोतों में 'जंगली' कहा गया है।
  • झूम खेती (स्थानांतरित कृषि): पेड़ों को काटकर और जलाकर भूमि को साफ किया जाता था, राख का उपयोग उर्वरक के रूप में होता था, और कुछ वर्षों तक खेती करने के बाद उस स्थान को छोड़कर नए स्थान पर चले जाते थे।
  • जंगलवासियों और कृषि समाज के बीच संबंध:
    • व्यापार: वनवासी जंगल उत्पादों (शहद, मोम, लाख, हाथीदाँत) का व्यापार कृषि उत्पादों (अनाज, नमक) से करते थे।
    • श्रम: कुछ वनवासी कृषि क्षेत्रों में मजदूर के रूप में भी काम करते थे।
  • राज्य का प्रभाव: मुगल राज्य ने जंगलों में घुसपैठ की और वनवासियों को कृषि करने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे उनके जीवनशैली में बदलाव आया।

VIII. मुगल साम्राज्य में मुद्रा और व्यापार

  • चांदी का प्रवाह: 16वीं और 17वीं शताब्दी में यूरोप से भारत में चांदी का भारी प्रवाह हुआ, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में चांदी की उपलब्धता बढ़ी और मुद्रा का प्रचलन तेज हुआ।
  • ग्रामीण-शहरी संबंध: कृषि उत्पादन शहरों को खाद्य पदार्थ और कच्चा माल प्रदान करता था, जबकि शहर ग्रामीण क्षेत्रों को निर्मित वस्तुएँ और सेवाएं प्रदान करते थे।
  • बाजार (हाट): गाँवों और कस्बों में नियमित बाजार लगते थे जहाँ वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था।
  • व्यापारी वर्ग: सेठ और महाजन जैसे व्यापारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, ऋण प्रदान करते थे और व्यापार को सुविधाजनक बनाते थे।

IX. अकबरनामा और आईन-ए-अकबरी

  • लेखक: अबुल फजल, अकबर के दरबारी इतिहासकार।
  • अकबरनामा: अकबर के शासनकाल का आधिकारिक इतिहास, तीन भागों में विभाजित:
    1. पहला भाग: आदम से अकबर के शासनकाल के 30वें वर्ष तक का मानव इतिहास।
    2. दूसरा भाग: अकबर के शासनकाल के 46वें वर्ष तक की घटनाओं का विवरण।
    3. तीसरा भाग (आईन-ए-अकबरी): मुगल प्रशासन, कृषि, अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति का विस्तृत विवरण।
  • आईन-ए-अकबरी की विषय-वस्तु:
    • मनज़िल-आबादी: शाही घर, सेना और प्रशासन का विस्तृत विवरण।
    • सिपह-आबादी: सैन्य और नागरिक प्रशासन, शाही अधिकारियों, सैनिकों और उनके कर्तव्यों का विवरण।
    • मुल्क-आबादी: भू-राजस्व प्रणाली, प्रांतों (सूबा) का विवरण, कृषि उत्पादन, कीमतें, मजदूरी, सामाजिक समूह, धार्मिक समूह, त्योहार और रीति-रिवाज। इसमें 12 सूबों का विस्तृत सांख्यिकीय विवरण है।
  • आईन का महत्व:
    • मुगल साम्राज्य के प्रशासन और अर्थव्यवस्था को समझने के लिए एक अद्वितीय स्रोत।
    • कृषि उत्पादन, राजस्व संग्रह और ग्रामीण समाज की विस्तृत जानकारी प्रदान करता है।
    • मुगलकालीन भारत के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन का एक व्यापक चित्र प्रस्तुत करता है।
  • आईन की सीमाएँ:
    • अंकों में त्रुटियाँ: कुछ स्थानों पर आंकड़ों में विसंगतियाँ या त्रुटियाँ हो सकती हैं।
    • अकबर का महिमामंडन: अबुल फजल अकबर के दरबारी थे, इसलिए उनके लेखन में अकबर का महिमामंडन स्वाभाविक है।
    • ग्रामीण गरीबों की उपेक्षा: यह मुख्य रूप से राज्य और अभिजात वर्ग के दृष्टिकोण से लिखा गया है, ग्रामीण गरीबों या निम्न वर्गों के अनुभवों का विस्तृत विवरण नहीं मिलता।
    • कुछ प्रांतों का अभाव: आईन में केवल 12 सूबों का विवरण है, जबकि अकबर के शासनकाल के अंत तक 15 सूबे थे।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

  1. 16वीं-17वीं शताब्दी में भारत की लगभग कितने प्रतिशत आबादी गाँवों में रहती थी?
    a) 50%
    b) 75%
    c) 85%
    d) 95%

  2. 'खुद-काश्त' किसान कौन थे?
    a) जो दूसरे गाँवों में जाकर खेती करते थे।
    b) जो अपनी जमीन पर खेती करते थे और उसी गाँव में रहते थे।
    c) जो जमींदारों के लिए बेगार करते थे।
    d) जो शाही भूमि पर खेती करते थे।

  3. मुगल काल में 'जिन्स-ए-कामिल' शब्द का प्रयोग किसके लिए किया जाता था?
    a) सर्वोत्तम प्रकार के अनाज के लिए
    b) नकदी फसलों के लिए
    c) शाही खजाने के लिए
    d) युद्ध में प्राप्त लूट के लिए

  4. गाँव की पंचायत का मुखिया क्या कहलाता था?
    a) दीवान
    b) कोतवाल
    c) मुकद्दम या मंडल
    d) पटवारी

  5. अकबर के भू-राजस्व निर्धारण में 'दहसाला प्रणाली' किसने लागू की थी?
    a) बीरबल
    b) मानसिंह
    c) अबुल फजल
    d) राजा टोडरमल

  6. 'आईन-ए-अकबरी' का लेखक कौन था?
    a) अब्दुल कादिर बदायूंनी
    b) अबुल फजल
    c) फरिश्ता
    d) अमीर खुसरो

  7. 'आईन-ए-अकबरी' के अनुसार, वह भूमि जिस पर हर साल खेती होती थी, क्या कहलाती थी?
    a) परौती
    b) चाचर
    c) पोलज
    d) बंजर

  8. मुगल काल में 'पाहि-काश्त' किसान कौन थे?
    a) वे किसान जो अपनी जमीन पर खेती करते थे।
    b) वे किसान जो जमींदारों की जमीन पर खेती करते थे।
    c) वे किसान जो दूसरे गाँवों में जाकर ठेके पर खेती करते थे।
    d) वे किसान जो केवल नकदी फसलें उगाते थे।

  9. मुगल साम्राज्य में 'जमा' शब्द का क्या अर्थ था?
    a) वास्तव में एकत्र की गई राजस्व राशि
    b) राज्य द्वारा निर्धारित कुल राजस्व राशि
    c) किसानों द्वारा दिया गया ऋण
    d) जमींदारों द्वारा दिया गया कर

  10. 16वीं-17वीं शताब्दी में यूरोप से भारत में किस धातु का भारी प्रवाह हुआ, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई?
    a) सोना
    b) तांबा
    c) चांदी
    d) लोहा


उत्तरमाला:

  1. c) 85%
  2. b) जो अपनी जमीन पर खेती करते थे और उसी गाँव में रहते थे।
  3. b) नकदी फसलों के लिए
  4. c) मुकद्दम या मंडल
  5. d) राजा टोडरमल
  6. b) अबुल फजल
  7. c) पोलज
  8. c) वे किसान जो दूसरे गाँवों में जाकर ठेके पर खेती करते थे।
  9. b) राज्य द्वारा निर्धारित कुल राजस्व राशि
  10. c) चांदी

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को गहराई से समझने और आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। शुभकामनाएँ!