Class 12 History Notes Chapter 2 (Chapter 2) – Bharatiya Itihas ke Kuch Vishay-III Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम कक्षा 12 इतिहास के अध्याय 2 'किसान, ज़मींदार और राज्य' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय 16वीं और 17वीं शताब्दी के मुगलकालीन भारत के कृषि समाज और राज्य के साथ उसके संबंधों पर केंद्रित है। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मुगल अर्थव्यवस्था, समाज और प्रशासन की गहरी समझ प्रदान करता है।
अध्याय 2: किसान, ज़मींदार और राज्य (कृषि समाज और मुगल साम्राज्य)
1. परिचय:
- यह अध्याय 16वीं और 17वीं शताब्दी के कृषि समाज और मुगल साम्राज्य के बीच संबंधों का विश्लेषण करता है।
- यह ग्रामीण समाज के विभिन्न घटकों - किसान, ज़मींदार, राज्य - और उनके बीच के अंतर्संबंधों को समझने में मदद करता है।
- इस काल की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित थी।
2. मुख्य स्रोत:
- आइन-ए-अकबरी: अबुल फ़ज़ल द्वारा रचित यह ग्रंथ अकबर के शासनकाल का विस्तृत विवरण देता है। यह मुगल साम्राज्य के प्रशासन, कृषि व्यवस्था, भू-राजस्व, प्रांतों के आंकड़े (सूबे), सेना, शाही घराने और संस्कृति पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। यह कृषि संबंधी आँकड़ों का खजाना है, जैसे फसलों की कीमतें, राजस्व दरें, भूमि का वर्गीकरण आदि।
- मुगलकालीन इतिवृत्त (क्रॉनिकल्स): जैसे अकबरनामा (अबुल फ़ज़ल), बादशाहनामा (अब्दुल हमीद लाहौरी) आदि, जो शाही दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।
- राजस्व रिकॉर्ड और फरमान: विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त भू-राजस्व के दस्तावेज, शाही फरमान, पट्टे (पट्टा), क़बूलियत (समझौता पत्र) आदि।
- दक्कन के दस्तावेज: महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान से प्राप्त दस्तावेज किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच के संबंधों को दर्शाते हैं। ये स्थानीय स्तर पर ग्रामीण जीवन की जानकारी देते हैं।
- यात्रा वृत्तांत: विदेशी यात्रियों जैसे फ़्रांसिसी बर्नियर, टैवर्नियर, इतालवी मनुची आदि के वृत्तांत भी महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं, हालांकि उन्हें सावधानी से पढ़ना चाहिए क्योंकि वे अक्सर तुलनात्मक और आलोचनात्मक होते थे।
3. किसान और कृषि उत्पादन:
- किसान की श्रेणियाँ:
- खुद-काश्त: वे किसान जो उसी गाँव में रहते थे जहाँ उनकी अपनी ज़मीन थी। वे अपनी ज़मीन के मालिक थे और स्वयं खेती करते थे। इनकी स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर होती थी।
- पाही-काश्त: वे किसान जो दूसरे गाँवों में जाकर ठेके पर खेती करते थे। आर्थिक दबाव, करों से बचने या बेहतर अवसरों की तलाश में वे ऐसा करते थे।
- कृषि योग्य भूमि और जनसंख्या: 16वीं-17वीं शताब्दी में भारत की जनसंख्या लगभग 10-15 करोड़ थी। कृषि योग्य भूमि का एक बड़ा हिस्सा था, लेकिन कृषि का विस्तार लगातार हो रहा था।
- सिंचाई और प्रौद्योगिकी:
- अधिकांश कृषि वर्षा आधारित थी, लेकिन सिंचाई के साधनों का भी उपयोग होता था।
- कुएँ: सिंचाई का सबसे आम साधन।
- रहट (फ़ारसी चक्र): कुओं से पानी निकालने के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था।
- तालाब और नहरें: राज्य द्वारा निर्मित या रखरखाव किया जाता था। उदाहरण: शाह नहर (शाहजहाँ द्वारा पंजाब में निर्मित)।
- फसलें:
- खरीफ (पतझड़): चावल, ज्वार, बाजरा, दालें आदि।
- रबी (बसंत): गेहूँ, जौ, चना, सरसों आदि।
- नकदी फसलें (जिन्स-ए-कामिल): कपास, गन्ना, तिलहन, नील (कपड़ा रंगने के लिए), अफीम। मुगल राज्य नकदी फसलों को बढ़ावा देता था क्योंकि इनसे अधिक राजस्व मिलता था और ये व्यापार में सहायक थीं।
- नई फसलें (17वीं सदी में): तंबाकू, मक्का, टमाटर, आलू, मिर्च आदि पुर्तगालियों के माध्यम से भारत आए।
- कृषि विस्तार: जंगल और बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाने के लिए राज्य किसानों को प्रोत्साहन देता था, जैसे कर में छूट या ऋण (तकावी)।
4. ग्रामीण समुदाय:
- संरचना: ग्रामीण समाज में किसान, कारीगर (लोहार, कुम्हार, बढ़ई, नाई, धोबी आदि) और सेवा प्रदाता शामिल थे। ये सभी गाँव की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे और अक्सर एक-दूसरे पर निर्भर होते थे (जैसे जजमानी व्यवस्था)।
- जाति और ग्रामीण समाज:
- जाति व्यवस्था ग्रामीण समाज का एक अभिन्न अंग थी। किसानों को उनकी जाति के आधार पर वर्गीकृत किया जाता था।
- निचली जातियों को अक्सर बेगार (बिना मज़दूरी के काम) के लिए मजबूर किया जाता था और उन्हें सामाजिक रूप से भेदभाव का सामना करना पड़ता था।
- कुछ जातियाँ (जैसे जाट, गुर्जर, अहीर) कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी करती थीं और कभी-कभी सैन्य सेवा में भी शामिल होती थीं।
- ग्राम पंचायत और मुखिया:
- ग्राम पंचायत: गाँव के बुजुर्गों की एक सभा, जिसमें आमतौर पर गाँव के महत्वपूर्ण और उच्च जाति के लोग शामिल होते थे। यह गाँव के हितों का प्रतिनिधित्व करती थी।
- मुखिया (मुकद्दम या मंडल): पंचायत का प्रमुख, जिसका चुनाव गाँव के बुजुर्गों द्वारा होता था और उसे ज़मींदार या राज्य द्वारा अनुमोदित किया जाता था।
- कार्य:
- गाँव के राजस्व का हिसाब रखना और राज्य को जमा करना।
- गाँव के नियम-कानून बनाना और लागू करना।
- विवादों का निपटारा करना और न्याय प्रदान करना।
- जातिगत सीमाओं को बनाए रखना और सामाजिक आचार संहिता लागू करना।
- गाँव के सामान्य खर्चों के लिए धन जुटाना (जैसे नहर या बाँध बनाना, मंदिर/मस्जिद का रखरखाव)।
- महिलाएँ कृषि समाज में:
- महिलाएँ कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं (बुवाई, निराई, कटाई, थ्रेसिंग)। वे पुरुषों के साथ खेतों में काम करती थीं।
- वे घर के काम के अलावा सूत कातने, बर्तन बनाने, मिट्टी से काम करने जैसे काम भी करती थीं।
- कुछ समाजों में महिलाओं को संपत्ति का अधिकार था (जैसे मीरासी) या वे विधवा होने पर पैतृक संपत्ति की हकदार होती थीं।
- हालांकि, सामाजिक रूप से उन पर कई प्रतिबंध थे, जैसे विधवा पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी (कुछ आदिवासी और निचली जातियों को छोड़कर)।
- उच्च वर्ग की महिलाओं को पर्दा प्रथा का पालन करना पड़ता था।
5. ज़मींदार:
- परिचय: ज़मींदार वे लोग थे जिनके पास अपनी ज़मीन पर मालिकाना हक था और वे राज्य के लिए भू-राजस्व इकट्ठा करते थे। वे ग्रामीण समाज में एक शक्तिशाली और प्रभावशाली वर्ग थे।
- शक्ति के स्रोत:
- आर्थिक शक्ति: अपनी ज़मीन पर खेती करवाना (मज़दूरों से या किराए पर), बाज़ारों (हाट) से राजस्व इकट्ठा करना।
- सामाजिक शक्ति: अपनी जातिगत श्रेष्ठता और स्थानीय प्रभुत्व।
- सैन्य शक्ति: उनके पास अक्सर अपने किले और सशस्त्र टुकड़ियाँ (घुड़सवार, पैदल सैनिक) होती थीं, जिन्हें 'ज़मींदारी सेना' कहा जाता था।
- राजस्व संग्रह: राज्य के लिए राजस्व इकट्ठा करने के बदले उन्हें कमीशन मिलता था (आमतौर पर राजस्व का 10-25%)।
- राज्य से संबंध:
- राज्य ज़मींदारों को राजस्व संग्रह के लिए मान्यता देता था और उनकी स्थानीय शक्ति का उपयोग करता था।
- ज़मींदार कभी-कभी राज्य के विरुद्ध विद्रोह भी करते थे, खासकर जब राज्य की शक्ति कमज़ोर होती थी या राजस्व की मांग बहुत अधिक होती थी।
- राज्य और ज़मींदारों के बीच सहयोग और संघर्ष दोनों के उदाहरण मिलते हैं।
- ज़मींदारी का हस्तांतरण: ज़मींदारी को खरीदा और बेचा जा सकता था, जिससे यह एक वाणिज्यिक संपत्ति बन गई थी।
- विद्रोह: ज़मींदारों ने कभी-कभी किसानों के साथ मिलकर या किसानों के विरुद्ध राज्य के खिलाफ विद्रोह किया।
6. मुगल राज्य और भू-राजस्व व्यवस्था:
- भू-राजस्व: मुगल साम्राज्य की आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व था, जो साम्राज्य की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण था।
- राजस्व निर्धारण और संग्रह:
- ज़ब्त प्रणाली (दहसाला): अकबर द्वारा टोडरमल की सहायता से विकसित की गई। इसमें पिछले 10 वर्षों की औसत उपज और स्थानीय कीमतों के आधार पर भू-राजस्व निर्धारित किया जाता था। भूमि की माप की जाती थी और उसे उत्पादकता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता था। राजस्व नकद में लिया जाता था।
- नस्क: एक अनुमानित प्रणाली, जिसमें पिछले अनुभवों के आधार पर राजस्व का अनुमान लगाया जाता था। यह कम विकसित क्षेत्रों में प्रचलित थी।
- बटाई/गल्ला-बख्शी: उपज का एक निश्चित हिस्सा (जैसे 1/3 या 1/2) राज्य को दिया जाता था। यह अनाज के रूप में या नकद में हो सकता था।
- भूमि का वर्गीकरण (आइन-ए-अकबरी के अनुसार):
- पोलज: वह भूमि जिस पर हर साल खेती होती थी। यह सबसे उपजाऊ मानी जाती थी।
- परौती: वह भूमि जिस पर कुछ समय के लिए खेती रोक दी जाती थी ताकि वह अपनी उर्वरता वापस पा सके (एक या दो साल)।
- चाचर: वह भूमि जिस पर 3-4 साल तक खेती नहीं होती थी।
- बंजर: वह भूमि जिस पर 5 साल या उससे अधिक समय तक खेती नहीं होती थी।
- राजस्व अधिकारी:
- अमिल-गुज़ार: राजस्व संग्रह का प्रभारी, जो किसानों से सीधे संपर्क में रहता था।
- क़ानूनगो: स्थानीय राजस्व रिकॉर्ड रखता था और राजस्व दरों की जानकारी देता था।
- पटवारी: गाँव स्तर पर राजस्व रिकॉर्ड रखता था और किसानों के खातों का हिसाब रखता था।
- चौधरी: परगना स्तर पर राजस्व संग्रह में मदद करता था।
- राजस्व की मांग: राज्य की राजस्व मांग बहुत अधिक होती थी (आमतौर पर उपज का 1/3 से 1/2), जिससे किसानों पर भारी बोझ पड़ता था। कभी-कभी वे ऋण लेने पर मजबूर होते थे (साहूकारों या ज़मींदारों से)।
- राजस्व का मौद्रिकरण: राज्य आमतौर पर राजस्व नकद में मांगता था, जिससे किसानों को अपनी फसलें बाज़ार में बेचनी पड़ती थीं। इससे कृषि का व्यवसायीकरण बढ़ा।
7. जंगल और जनजातियाँ ('जंगली'):
- 'जंगली' का अर्थ: मुगल स्रोतों में 'जंगली' शब्द उन लोगों के लिए इस्तेमाल होता था जो जंगलों में रहते थे और जिनका जीवन शिकार, संग्रह और स्थानांतरित कृषि पर आधारित था। यह शब्द केवल भौगोलिक निवास को नहीं, बल्कि एक विशेष जीवन शैली को भी दर्शाता था।
- आजीविका:
- शिकार और संग्रह (शहद, फल, लकड़ी, गोंद, लाख)।
- स्थानांतरित कृषि (झूम खेती), जिसमें जंगल के एक हिस्से को जलाकर खेती की जाती थी और फिर दूसरी जगह चले जाते थे।
- पशुपालन।
- राज्य से संबंध:
- राज्य को जंगलों से हाथी (सेना के लिए), लकड़ी, शहद, लाख आदि प्राप्त होते थे।
- राज्य अक्सर जंगलों को साफ करके कृषि भूमि में बदलने के लिए प्रोत्साहन देता था, जिससे राजस्व बढ़ सके।
- जनजातीय लोग अक्सर राज्य के लिए सैनिक के रूप में भी काम करते थे (जैसे भील, गोंड)।
- कभी-कभी जनजातियाँ राज्य के खिलाफ विद्रोह करती थीं, खासकर जब उनके संसाधनों पर अतिक्रमण होता था।
- जंगलों का महत्व: जंगल केवल निर्वाह का साधन नहीं थे, बल्कि वे एक सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान भी थे।
8. मुद्रा प्रणाली और व्यापार:
- मुद्रा: मुगल साम्राज्य में चांदी का रुपया मुख्य मुद्रा थी, जो पूरे साम्राज्य में मानकीकृत थी। तांबे के दाम और सोने के मुहर भी प्रचलन में थे।
- कृषि का व्यवसायीकरण: नकदी फसलों की खेती और राजस्व के नकद भुगतान की आवश्यकता ने कृषि के व्यवसायीकरण को बढ़ावा दिया। किसान अपनी उपज बेचने के लिए बाज़ारों पर निर्भर हो गए।
- व्यापार: ग्रामीण क्षेत्रों से अनाज, नकदी फसलें और अन्य उत्पाद शहरों और बंदरगाहों तक पहुँचते थे।
- व्यापारी और साहूकार:
- सर्राफ: मुद्रा विनिमय (एक मुद्रा को दूसरी में बदलना) और बैंकिंग का काम करते थे। वे ऋण भी देते थे।
- हुंडी: विनिमय पत्र, जो दूर के व्यापार को सुविधाजनक बनाते थे। व्यापारी एक स्थान पर पैसा जमा करके दूसरे स्थान पर निकाल सकते थे।
- विश्व व्यापार: भारत का विश्व व्यापार में महत्वपूर्ण स्थान था, खासकर वस्त्र और मसालों के निर्यात में। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ा, क्योंकि नकदी फसलों की मांग बढ़ी।
निष्कर्ष:
16वीं-17वीं शताब्दी का मुगलकालीन कृषि समाज एक जटिल और गतिशील समाज था, जिसमें किसान, ज़मींदार और राज्य के बीच विविध संबंध थे। राज्य की राजस्व व्यवस्था ने कृषि उत्पादन, ग्रामीण समाज की संरचना और व्यापारिक गतिविधियों को गहराई से प्रभावित किया। यह अध्याय हमें उस काल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने की व्यापक समझ प्रदान करता है, जो सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):
-
आइन-ए-अकबरी का लेखक कौन था?
a) अबुल फ़ैज़ी
b) अबुल फ़ज़ल
c) बदायूँनी
d) टोडरमल -
मुगल काल में "खुद-काश्त" किसान कौन थे?
a) वे किसान जो दूसरे गाँवों में जाकर खेती करते थे।
b) वे किसान जो उसी गाँव में रहते थे जहाँ उनकी ज़मीन थी।
c) वे किसान जो ज़मींदारों के लिए बेगार करते थे।
d) वे किसान जो केवल नकदी फसलें उगाते थे। -
मुगल साम्राज्य में भू-राजस्व का मुख्य स्रोत क्या था?
a) व्यापार कर
b) नमक कर
c) भू-राजस्व
d) जजिया कर -
अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था "ज़ब्त प्रणाली" को अन्य किस नाम से जाना जाता था?
a) बटाई प्रणाली
b) नस्क प्रणाली
c) दहसाला प्रणाली
d) गल्ला-बख्शी प्रणाली -
मुगल काल में गाँव के मुखिया को क्या कहा जाता था?
a) अमिल-गुज़ार
b) क़ानूनगो
c) पटवारी
d) मुकद्दम या मंडल -
आइन-ए-अकबरी के अनुसार, वह भूमि जिस पर हर साल खेती होती थी, उसे क्या कहते थे?
a) परौती
b) चाचर
c) बंजर
d) पोलज -
निम्नलिखित में से कौन-सी एक नकदी फसल (जिन्स-ए-कामिल) नहीं थी जिसे मुगल काल में बढ़ावा दिया गया था?
a) कपास
b) गन्ना
c) नील
d) ज्वार -
"सर्राफ" मुगल काल में किस कार्य से संबंधित थे?
a) भू-राजस्व संग्रह
b) सैन्य प्रशासन
c) मुद्रा विनिमय और बैंकिंग
d) न्याय प्रशासन -
मुगल काल में "रहट" का उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाता था?
a) युद्ध में हथियार के रूप में
b) सिंचाई के लिए पानी निकालने हेतु
c) अनाज पीसने के लिए
d) वस्त्र बुनाई के लिए -
17वीं शताब्दी में भारत में आने वाली नई फसलें कौन-सी थीं?
a) गेहूँ और जौ
b) चावल और बाजरा
c) मक्का और टमाटर
d) कपास और गन्ना
उत्तरमाला:
- b) अबुल फ़ज़ल
- b) वे किसान जो उसी गाँव में रहते थे जहाँ उनकी ज़मीन थी।
- c) भू-राजस्व
- c) दहसाला प्रणाली
- d) मुकद्दम या मंडल
- d) पोलज
- d) ज्वार
- c) मुद्रा विनिमय और बैंकिंग
- b) सिंचाई के लिए पानी निकालने हेतु
- c) मक्का और टमाटर