Class 12 History Notes Chapter 4 (Chapter 4) – Bharatiya Itihas ke Kuch Vishay-III Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी इतिहास की पाठ्यपुस्तक 'भारतीय इतिहास के कुछ विषय-III' के अध्याय 4 'विचारक, विश्वास और इमारतें: सांस्कृतिक विकास (लगभग 600 ई. पू. से 600 ई. तक)' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग एक हज़ार वर्षों की अवधि के दौरान हुए महत्त्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों को समझने में सहायक है। यह जानकारी आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
अध्याय 4: विचारक, विश्वास और इमारतें: सांस्कृतिक विकास (लगभग 600 ई. पू. से 600 ई. तक)
यह अध्याय लगभग 600 ई. पू. से 600 ई. तक की अवधि में भारतीय उपमहाद्वीप में हुए धार्मिक और सांस्कृतिक विकास पर केंद्रित है। इस काल में बौद्ध धर्म, जैन धर्म और ब्राह्मणवादी परंपराओं में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए।
1. साँची की एक झलक
- अवस्थिति: भोपाल (मध्य प्रदेश) के पास।
- खोज: 1818 ई. में।
- संरक्षण: भोपाल की बेगमों (शाहजहाँ बेगम और सुल्तान जहाँ बेगम) ने इसके संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने इसके रखरखाव के लिए धन दिया और संग्रहालय व अतिथिगृह बनवाया।
- महत्व: यह बौद्ध धर्म के सबसे महत्त्वपूर्ण स्थलों में से एक है, जहाँ स्तूप, मठ और मंदिर हैं। यहाँ की कलाकृतियाँ और अभिलेख हमें इस काल के धार्मिक विश्वासों और कलात्मक शैलियों की जानकारी देते हैं।
- विशेषता: साँची का स्तूप आज भी अपनी मूल अवस्था में है, जबकि अमरावती का स्तूप नष्ट हो गया था।
2. यज्ञ और वाद-विवाद: नए प्रश्न और विचार
- प्रारंभिक यज्ञ परंपराएँ (लगभग 1500-1000 ई. पू.):
- ऋग्वेद में अग्नि, इंद्र और सोम जैसे देवताओं का उल्लेख है।
- यज्ञ सामूहिक रूप से किए जाते थे, खासकर सरदार और राजाओं द्वारा।
- यज्ञों के लिए पुरोहितों पर निर्भरता थी।
- नए प्रश्न और उपनिषद (लगभग 600 ई. पू. के बाद):
- लोग जीवन के अर्थ, पुनर्जन्म, कर्म के सिद्धांत, आत्मा और ब्रह्म जैसे विषयों पर चिंतन करने लगे।
- उपनिषदों में इन विषयों पर दार्शनिक विचार प्रस्तुत किए गए।
- कई विचारक, जैसे महावीर और बुद्ध, ने यज्ञों की प्रधानता पर सवाल उठाए और एक नए दर्शन का मार्ग प्रशस्त किया।
- वाद-विवाद और चर्चाएँ:
- इस काल में विभिन्न दार्शनिकों के बीच वाद-विवाद की परंपरा विकसित हुई।
- ये वाद-विवाद कुटागारशालाओं (नुकीली छत वाली झोपड़ियाँ) या उपवनों में होते थे।
- विचारक अपने तर्कों से दूसरों को प्रभावित करने का प्रयास करते थे।
3. जैन धर्म
- महावीर और जैन परंपरा:
- जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर वर्धमान महावीर का जन्म लगभग 599 ई. पू. में वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ था।
- उन्होंने 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर तपस्या की और 'जिन' (इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला) कहलाए।
- उनकी शिक्षाएँ छठी शताब्दी ई. पू. में प्रचलित हुईं।
- जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत:
- अहिंसा: किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाना। यह जैन धर्म का मूल सिद्धांत है।
- सत्य: हमेशा सच बोलना।
- अस्तेय: चोरी न करना।
- अपरिग्रह: धन का संचय न करना।
- ब्रह्मचर्य: इंद्रियों पर नियंत्रण रखना (यह सिद्धांत महावीर ने जोड़ा)।
- त्रिरत्न: सम्यक् दर्शन (सही विश्वास), सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान), सम्यक् आचरण (सही आचरण)।
- कर्म का सिद्धांत: जैन धर्म में कर्म को पुनर्जन्म का आधार माना जाता है। कर्म के चक्र से मुक्ति निर्वाण प्राप्त करने से होती है।
- जैन धर्म का विस्तार:
- जैन भिक्षु और भिक्षुणियाँ इन सिद्धांतों का पालन करते थे।
- व्यापारी, कारीगर और किसान जैसे लोग जैन धर्म के अनुयायी बने।
- जैन धर्म धीरे-धीरे उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक फैला।
- जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत और तमिल में साहित्य की रचना की।
- श्वेतांबर और दिगंबर: जैन धर्म दो प्रमुख संप्रदायों में विभाजित हुआ – श्वेतांबर (श्वेत वस्त्र धारण करने वाले) और दिगंबर (वस्त्र त्यागने वाले)।
4. बौद्ध धर्म
- बुद्ध और बौद्ध परंपरा:
- सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) का जन्म लगभग 563 ई. पू. में लुंबिनी (नेपाल) में शाक्य गणराज्य के प्रमुख के रूप में हुआ था।
- उन्होंने चार दृश्यों (एक वृद्ध व्यक्ति, एक बीमार व्यक्ति, एक मृत व्यक्ति और एक संन्यासी) को देखकर संसार की नश्वरता को समझा।
- 29 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर ज्ञान की खोज में निकले।
- बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और वे 'बुद्ध' कहलाए।
- सारनाथ में उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया, जिसे 'धर्मचक्र प्रवर्तन' कहा जाता है।
- बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांत (चार आर्य सत्य):
- दुःख: संसार दुःखों से भरा है।
- दुःख समुदाय: दुःख का कारण तृष्णा (इच्छा) है।
- दुःख निरोध: तृष्णा का त्याग कर दुःख का निरोध संभव है।
- दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा: दुःख निरोध का मार्ग अष्टांगिक मार्ग है।
- अष्टांगिक मार्ग: सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
- अन्य सिद्धांत:
- अनात्मवाद: आत्मा की अवधारणा को अस्वीकार करना।
- क्षणिकवाद: संसार की हर वस्तु क्षणभंगुर है।
- कर्म का सिद्धांत: कर्मों के आधार पर पुनर्जन्म होता है।
- निर्वाण: इच्छाओं के अंत से प्राप्त होने वाली मोक्ष की स्थिति।
- संघ:
- बुद्ध ने भिक्षुओं और भिक्षुणियों के एक संघ की स्थापना की।
- संघ में प्रवेश के लिए सभी जातियों और वर्गों के लोगों का स्वागत था।
- भिक्षु और भिक्षुणियाँ सादा जीवन जीते थे, भिक्षा पर निर्भर रहते थे और धर्म का प्रचार करते थे।
- संघ के नियम 'विनय पिटक' में संकलित हैं।
- बौद्ध धर्म का विस्तार:
- बुद्ध के जीवनकाल में ही यह धर्म तेजी से फैला।
- अशोक जैसे सम्राटों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया और इसके प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- यह मध्य एशिया, चीन, कोरिया, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला।
- हीनयान और महायान:
- चौथी बौद्ध संगीति के बाद बौद्ध धर्म दो प्रमुख संप्रदायों में विभाजित हुआ।
- हीनयान (थेरवाद): बुद्ध को एक महान मानव मानते थे और उनके मूल उपदेशों का पालन करते थे। मूर्ति पूजा का विरोध करते थे।
- महायान: बुद्ध को देवता मानते थे और उनकी मूर्तियों की पूजा करते थे। बोधिसत्वों की अवधारणा में विश्वास करते थे (जो निर्वाण प्राप्त करने के बाद भी दूसरों की सहायता के लिए रुकते हैं)।
5. स्तूप, चैत्य और विहार
- स्तूप:
- ये अर्धगोलाकार संरचनाएँ हैं जिनमें बुद्ध या अन्य महत्त्वपूर्ण बौद्ध भिक्षुओं के अवशेष (हड्डियाँ, राख) रखे जाते थे।
- स्तूपों को पवित्र स्थल माना जाता था और यहाँ पूजा-अर्चना की जाती थी।
- संरचना: अंड (अर्धगोलाकार टीला), हर्मिका (अंड के ऊपर बालकनी जैसी संरचना), यष्टि (हर्मिका से निकला खंभा), छत्र (यष्टि पर छतरियाँ), वेदिका (स्तूप के चारों ओर घेरा), तोरण द्वार (प्रवेश द्वार)।
- उदाहरण: साँची, भरहुत, अमरावती।
- चैत्य:
- ये पूजा स्थल होते थे, अक्सर चट्टानों को काटकर बनाए जाते थे।
- इनमें एक छोटा स्तूप भी होता था जिसकी पूजा की जाती थी।
- उदाहरण: कार्ले का चैत्य।
- विहार:
- ये बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों के रहने के स्थान (मठ) होते थे।
- इन्हें भी अक्सर चट्टानों को काटकर या ईंटों से बनाया जाता था।
- उदाहरण: अजंता के विहार।
- अमरावती स्तूप:
- यह आंध्र प्रदेश में स्थित एक विशाल स्तूप था, जो लगभग 200 ई. पू. में बना।
- इसकी खोज 1797 ई. में हुई, लेकिन इसके महत्त्व को नहीं समझा गया।
- इसके अवशेषों को विभिन्न ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा अलग-अलग स्थानों पर ले जाया गया, जिससे यह नष्ट हो गया। यह संरक्षण के महत्त्व को दर्शाता है।
6. मूर्तिकला और प्रतीकवाद
- प्रारंभिक बौद्ध कला (लगभग 200 ई. पू. से 100 ई.):
- बुद्ध को सीधे मानव रूप में नहीं दर्शाया जाता था।
- उनके जीवन की घटनाओं को प्रतीकों के माध्यम से दर्शाया जाता था:
- खाली आसन: बुद्ध का ध्यान।
- धर्मचक्र: सारनाथ में पहला उपदेश।
- स्तूप: महापरिनिर्वाण।
- वृक्ष: ज्ञान प्राप्ति।
- जातक कथाएँ: बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ, जो साँची और भरहुत के स्तूपों पर उकेरी गई हैं।
- महायान बौद्ध धर्म का प्रभाव (लगभग 100 ई. के बाद):
- महायान के उदय के साथ बुद्ध को मानव रूप में मूर्तियों के रूप में दर्शाया जाने लगा।
- गांधार कला: यूनानी-रोमन प्रभाव से बुद्ध की मूर्तियाँ (घुंघराले बाल, यूनानी वस्त्र)।
- मथुरा कला: स्वदेशी शैली में बुद्ध की मूर्तियाँ (मोटा शरीर, भारतीय वेशभूषा)।
- बोधिसत्वों की मूर्तियों का भी निर्माण हुआ।
- साँची की कला:
- साँची के तोरण द्वारों पर जातक कथाएँ, पशु, पेड़ और यक्षिणी (वनस्पति और उर्वरता की देवी) जैसी आकृतियाँ उकेरी गई हैं।
- यक्षिणी की आकृति को बाद में बौद्ध कला में भी स्थान मिला।
7. हिंदू धर्म का उदय
- वैष्णववाद और शैववाद:
- इस काल में वैष्णववाद (विष्णु की पूजा) और शैववाद (शिव की पूजा) प्रमुख धार्मिक परंपराओं के रूप में उभरे।
- विष्णु: ब्रह्मांड के संरक्षक देवता माने जाते थे। उनके दस अवतारों (दशावतार) की अवधारणा विकसित हुई, जैसे कृष्ण, राम, बुद्ध, वराह, मत्स्य, कूर्म आदि।
- शिव: लिंग के रूप में या मानव रूप में पूजे जाते थे।
- मंदिरों का निर्माण:
- पांचवीं शताब्दी ई. के आसपास मंदिरों का निर्माण शुरू हुआ।
- प्रारंभिक मंदिर: एक छोटा चौकोर गर्भगृह (जहाँ मुख्य देवता की मूर्ति रखी जाती थी), एक मंडप (प्रवेश द्वार)।
- बाद के मंदिर: बड़े और भव्य होते गए, जिनमें शिखर (ऊंची मीनार), विशाल मंडप और विस्तृत नक्काशी होती थी।
- उदाहरण: देवगढ़ (उत्तर प्रदेश) का दशावतार मंदिर।
- पौराणिक कथाएँ:
- पुराणों में विभिन्न देवी-देवताओं की कहानियाँ और उपासना के तरीके संकलित किए गए।
- ये पुराण संस्कृत में लिखे गए थे और इन्हें शूद्र व स्त्रियाँ भी सुन सकती थीं।
8. सामान्य जन के विश्वास
- यक्ष-यक्षिणी पूजा:
- यक्ष और यक्षिणियाँ प्रकृति से जुड़े देवता थे, जिन्हें वृक्षों, जल स्रोतों और धन का संरक्षक माना जाता था।
- उनकी पूजा ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक थी।
- इनकी मूर्तियाँ बौद्ध और जैन कला में भी मिलती हैं।
- नाग पूजा:
- नागों (साँपों) को भी पवित्र माना जाता था और उनकी पूजा की जाती थी।
- वृक्ष पूजा:
- कुछ वृक्षों को पवित्र मानकर उनकी पूजा की जाती थी।
अभ्यास प्रश्न (MCQs)
यहाँ इस अध्याय पर आधारित 10 बहुविकल्पीय प्रश्न दिए गए हैं, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे:
-
साँची के स्तूप की खोज किस वर्ष हुई थी?
(A) 1800 ई.
(B) 1818 ई.
(C) 1850 ई.
(D) 1900 ई. -
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर कौन थे?
(A) ऋषभदेव
(B) पार्श्वनाथ
(C) वर्धमान महावीर
(D) अजितनाथ -
बौद्ध धर्म के अनुसार, दुःख का मूल कारण क्या है?
(A) अज्ञान
(B) तृष्णा (इच्छा)
(C) कर्म
(D) मोह -
बुद्ध ने अपना पहला उपदेश कहाँ दिया था?
(A) बोधगया
(B) लुंबिनी
(C) सारनाथ
(D) कुशीनगर -
बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों के रहने के स्थान को क्या कहा जाता था?
(A) स्तूप
(B) चैत्य
(C) विहार
(D) मंडप -
अमरावती का स्तूप किस राज्य में स्थित था?
(A) मध्य प्रदेश
(B) उत्तर प्रदेश
(C) आंध्र प्रदेश
(D) बिहार -
प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को मानव रूप में दर्शाने के बजाय किन प्रतीकों का प्रयोग किया जाता था?
(A) खाली आसन
(B) धर्मचक्र
(C) स्तूप
(D) उपरोक्त सभी -
वह कौन सा बौद्ध संप्रदाय है जो बुद्ध को एक देवता के रूप में पूजता था और बोधिसत्वों में विश्वास रखता था?
(A) हीनयान
(B) थेरवाद
(C) महायान
(D) दिगंबर -
हिंदू मंदिरों में वह स्थान जहाँ मुख्य देवता की मूर्ति रखी जाती थी, क्या कहलाता था?
(A) मंडप
(B) शिखर
(C) गर्भगृह
(D) तोरण -
विष्णु के दस अवतारों की अवधारणा का संबंध किस धार्मिक परंपरा से है?
(A) शैववाद
(B) वैष्णववाद
(C) बौद्ध धर्म
(D) जैन धर्म
उत्तरमाला:
- (B)
- (C)
- (B)
- (C)
- (C)
- (C)
- (D)
- (C)
- (C)
- (B)
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी तैयारी के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें।