Class 12 History Notes Chapter 4 (हथकरघा एव हस्तशिल्प का पुनरुद्धार) – Bharatiya Itihas ke Kuch Vishay-I Book

प्रिय विद्यार्थी,
आपके अनुरोध पर, मैं आपको 'हथकरघा एवं हस्तशिल्प का पुनरुद्धार' विषय पर विस्तृत नोट्स और 10 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) प्रदान कर रहा हूँ।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 'भारतीय इतिहास के कुछ विषय - भाग I' नामक NCERT पुस्तक में अध्याय 4 का शीर्षक 'विचारक, विश्वास और इमारतें: सांस्कृतिक विकास' है, न कि 'हथकरघा एवं हस्तशिल्प का पुनरुद्धार'। हालाँकि, 'हथकरघा एवं हस्तशिल्प का पुनरुद्धार' भारतीय अर्थव्यवस्था, संस्कृति और इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है, विशेषकर स्वतंत्रता के बाद के संदर्भ में। इसलिए, मैं आपको इस महत्वपूर्ण विषय पर विस्तृत जानकारी प्रदान कर रहा हूँ, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।
अध्याय: हथकरघा एवं हस्तशिल्प का पुनरुद्धार
परिचय:
भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान में हथकरघा (हाथ से बुने हुए वस्त्र) और हस्तशिल्प (हाथ से बनी कलाकृतियाँ) का एक अद्वितीय स्थान है। ये केवल उत्पाद नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं, कौशल और कलात्मकता के प्रतीक हैं। स्वतंत्रता के बाद, इन क्षेत्रों के पुनरुद्धार को ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, रोजगार सृजित करने और भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्राथमिकता माना गया।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और औपनिवेशिक प्रभाव:
- प्राचीन और मध्यकालीन महत्व: भारत सदियों से अपने उत्कृष्ट वस्त्रों और हस्तशिल्प के लिए विश्व प्रसिद्ध रहा है। सिल्क, मलमल, ब्रोकेड, कढ़ाई और विभिन्न शिल्पकलाएँ वैश्विक बाजारों में अत्यधिक मांग में थीं। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख आधार था।
- औपनिवेशिक काल में गिरावट: ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौरान, भारतीय हथकरघा और हस्तशिल्प उद्योगों को भारी नुकसान हुआ।
- ब्रिटिश नीतियों: ब्रिटिश सरकार ने भारतीय उद्योगों को हतोत्साहित किया और ब्रिटेन में बने मशीनीकृत उत्पादों को बढ़ावा दिया।
- कच्चे माल का निर्यात: भारत से कच्चा माल (जैसे कपास) ब्रिटेन भेजा जाता था और वहाँ से तैयार माल भारत के बाजारों में बेचा जाता था।
- प्रतिस्पर्धा: मशीनीकृत उत्पादों की कम लागत के कारण भारतीय हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पादों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
- कारीगरों का पलायन: कई कारीगरों को अपना पुश्तैनी काम छोड़कर कृषि या अन्य व्यवसायों में जाना पड़ा।
- स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव: 20वीं सदी की शुरुआत में स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय उत्पादों, विशेषकर हथकरघा वस्त्रों को बढ़ावा दिया, जिससे इस क्षेत्र को कुछ हद तक सहारा मिला। महात्मा गांधी ने खादी को आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय पहचान के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया।
2. स्वतंत्रता के बाद पुनरुद्धार की आवश्यकता और उद्देश्य:
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारत सरकार ने हथकरघा और हस्तशिल्प के पुनरुद्धार को एक महत्वपूर्ण कार्य के रूप में देखा, जिसके कई उद्देश्य थे:
- रोजगार सृजन: ये क्षेत्र बड़ी संख्या में लोगों, विशेषकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, को रोजगार प्रदान करते हैं, जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: ये उद्योग ग्रामीण आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं और गरीबी उन्मूलन में सहायक हैं।
- सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण: ये भारत की अद्वितीय कलात्मक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षक हैं।
- निर्यात क्षमता: भारतीय हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पादों की अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में उच्च मांग है, जिससे विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है।
- आत्मनिर्भरता और स्थानीय उत्पादन: स्थानीय संसाधनों और कौशल का उपयोग करके आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना।
3. पुनरुद्धार के प्रयास और सरकारी नीतियाँ:
भारत सरकार ने इन क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने के लिए कई संस्थागत और नीतिगत पहलें की हैं:
- संस्थागत सहायता:
- अखिल भारतीय हथकरघा बोर्ड (All India Handloom Board): 1952 में स्थापित, इसका उद्देश्य हथकरघा क्षेत्र के विकास और संवर्धन के लिए सलाह देना और नीतियां बनाना है।
- अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड (All India Handicrafts Board): 1952 में स्थापित (बाद में 2000 के दशक में भंग), इसका उद्देश्य हस्तशिल्प क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देना था।
- वस्त्र मंत्रालय (Ministry of Textiles): भारत सरकार का वस्त्र मंत्रालय इन दोनों क्षेत्रों के लिए नोडल मंत्रालय है, जो नीतियां बनाता और लागू करता है।
- हथकरघा विकास आयुक्त कार्यालय (Office of the Development Commissioner for Handlooms) और हस्तशिल्प विकास आयुक्त कार्यालय (Office of the Development Commissioner for Handicrafts): ये कार्यालय विभिन्न योजनाओं को लागू करते हैं और बुनकरों/शिल्पकारों को सहायता प्रदान करते हैं।
- नीतिगत पहलें और योजनाएँ:
- वित्तीय सहायता: बुनकरों और शिल्पकारों को कच्चे माल की खरीद, उपकरण उन्नयन और विपणन के लिए ऋण, सब्सिडी और अनुदान प्रदान करना।
- प्रौद्योगिकी उन्नयन और कौशल विकास: आधुनिक तकनीकों और डिजाइनों में प्रशिक्षण प्रदान करना, साथ ही पारंपरिक कौशल को मजबूत करना।
- बाजार पहुंच और विपणन:
- प्रदर्शनियाँ और मेले: राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शनियों और मेलों का आयोजन करके उत्पादों को बाजार तक पहुंचाना।
- ई-कॉमर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म: ऑनलाइन बिक्री प्लेटफॉर्म के माध्यम से उत्पादों को व्यापक ग्राहक आधार तक पहुंचाना।
- निर्यात प्रोत्साहन: निर्यातकों को सहायता और प्रोत्साहन प्रदान करना।
- इंडिया हैंडलूम ब्रांड (India Handloom Brand): गुणवत्ता और प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए 2015 में लॉन्च किया गया।
- भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication - GI) टैग: विशिष्ट क्षेत्रों के पारंपरिक उत्पादों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना (जैसे बनारसी साड़ी, कांजीवरम सिल्क)।
- कल्याणकारी योजनाएँ:
- बुनकर मुद्रा योजना: बुनकरों को रियायती दर पर ऋण प्रदान करना।
- हथकरघा बुनकर व्यापक कल्याण योजना: स्वास्थ्य बीमा, जीवन बीमा और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ प्रदान करना।
- शिक्षा सहायता: बुनकरों के बच्चों को शिक्षा के लिए सहायता।
- क्लस्टर विकास: विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में बुनकरों/शिल्पकारों के समूहों को एकीकृत सहायता प्रदान करना, जिससे उत्पादन और विपणन में दक्षता आए।
- डिजाइन और उत्पाद विकास: राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (NIFT) और अन्य संस्थानों के माध्यम से नए डिजाइन और उत्पादों के विकास को बढ़ावा देना।
- समर्थ योजना (Samarth Scheme): वस्त्र क्षेत्र में कौशल विकास और क्षमता निर्माण के लिए एक व्यापक योजना।
- राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (National Handloom Development Programme): हथकरघा क्षेत्र के समग्र विकास के लिए एक अम्ब्रेला योजना।
- हस्तशिल्प समग्र विकास योजना (Handicrafts Comprehensive Development Scheme): हस्तशिल्प क्षेत्र के लिए इसी तरह की व्यापक योजना।
4. चुनौतियाँ:
पुनरुद्धार के प्रयासों के बावजूद, इन क्षेत्रों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:
- कच्चे माल की उपलब्धता और लागत: उच्च गुणवत्ता वाले कच्चे माल की अनियमित आपूर्ति और बढ़ती कीमतें।
- आधुनिक डिजाइन और नवाचार का अभाव: बदलते उपभोक्ता रुझानों के अनुसार नए डिजाइन और उत्पादों को अपनाने में धीमी गति।
- बाजार प्रतिस्पर्धा: मशीनीकृत और बड़े पैमाने पर उत्पादित वस्तुओं से कड़ी प्रतिस्पर्धा।
- कम पारिश्रमिक: बिचौलियों की भूमिका और बाजार की अस्थिरता के कारण बुनकरों/शिल्पकारों को अक्सर उनके काम का उचित मूल्य नहीं मिलता।
- युवा पीढ़ी का विमुख होना: कम आय और कठिन परिश्रम के कारण युवा पीढ़ी इस पारंपरिक पेशे को अपनाने से कतराती है।
- संगठन का अभाव: छोटे और बिखरे हुए कारीगरों का संगठित न होना, जिससे उन्हें सामूहिक रूप से लाभ उठाने में कठिनाई होती है।
- प्रौद्योगिकी तक पहुंच: आधुनिक उपकरणों और तकनीकों तक सीमित पहुंच।
5. भविष्य की दिशा:
इन क्षेत्रों के सतत विकास के लिए निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है:
- डिजिटल एकीकरण: ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया के माध्यम से वैश्विक बाजार तक पहुंच बढ़ाना।
- सतत और नैतिक उत्पादन: पर्यावरण-अनुकूल प्रथाओं और निष्पक्ष व्यापार सिद्धांतों को बढ़ावा देना।
- नवाचार और डिजाइन: पारंपरिक कला को समकालीन डिजाइनों के साथ एकीकृत करना।
- ब्रांडिंग और मार्केटिंग: भारतीय हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पादों के लिए एक मजबूत वैश्विक ब्रांड बनाना।
- कौशल विकास और उद्यमिता: कारीगरों को केवल उत्पादक नहीं, बल्कि उद्यमी बनने के लिए सशक्त बनाना।
निष्कर्ष:
हथकरघा और हस्तशिल्प भारत की आत्मा हैं। इनका पुनरुद्धार केवल आर्थिक विकास का मामला नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान, ग्रामीण सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक है। सरकार, गैर-सरकारी संगठनों और स्वयं कारीगरों के संयुक्त प्रयासों से ही इन अमूल्य कला रूपों को संरक्षित और विकसित किया जा सकता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
निर्देश: सही विकल्प का चयन करें।
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भारत में अखिल भारतीय हथकरघा बोर्ड की स्थापना किस वर्ष की गई थी?
a) 1947
b) 1950
c) 1952
d) 1960 -
महात्मा गांधी ने किस वस्त्र को आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय पहचान के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया था?
a) सिल्क
b) खादी
c) मलमल
d) ब्रोकेड -
निम्नलिखित में से कौन सा मंत्रालय भारत में हथकरघा और हस्तशिल्प क्षेत्रों के लिए नोडल मंत्रालय है?
a) वित्त मंत्रालय
b) वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय
c) वस्त्र मंत्रालय
d) ग्रामीण विकास मंत्रालय -
भौगोलिक संकेतक (GI) टैग का मुख्य उद्देश्य क्या है?
a) उत्पादों की कीमत बढ़ाना
b) विशिष्ट क्षेत्रों के पारंपरिक उत्पादों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना
c) केवल मशीनीकृत उत्पादों को बढ़ावा देना
d) उत्पादों का निर्यात प्रतिबंधित करना -
बुनकरों को रियायती दर पर ऋण प्रदान करने के लिए भारत सरकार द्वारा शुरू की गई एक प्रमुख योजना कौन सी है?
a) प्रधानमंत्री जन धन योजना
b) मेक इन इंडिया
c) बुनकर मुद्रा योजना
d) स्टैंड-अप इंडिया -
औपनिवेशिक काल में भारतीय हथकरघा उद्योग के पतन का एक प्रमुख कारण क्या था?
a) भारतीय कारीगरों की दक्षता में कमी
b) ब्रिटिश मशीनीकृत उत्पादों से प्रतिस्पर्धा
c) कच्चे माल की अत्यधिक उपलब्धता
d) सरकार द्वारा अत्यधिक सब्सिडी -
'इंडिया हैंडलूम ब्रांड' किस वर्ष लॉन्च किया गया था?
a) 2005
b) 2010
c) 2015
d) 2020 -
वस्त्र क्षेत्र में कौशल विकास और क्षमता निर्माण के लिए भारत सरकार की एक व्यापक योजना कौन सी है?
a) समर्थ योजना
b) उजाला योजना
c) सौभाग्य योजना
d) स्वच्छ भारत अभियान -
हथकरघा और हस्तशिल्प के पुनरुद्धार का एक प्रमुख उद्देश्य क्या नहीं है?
a) रोजगार सृजन
b) सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
c) ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना
d) मशीनीकृत उत्पादन को प्रोत्साहित करना -
निम्नलिखित में से कौन सा भारतीय हस्तशिल्प उत्पाद GI टैग के लिए एक उदाहरण है?
a) बनारसी साड़ी
b) प्लास्टिक के खिलौने
c) आयातित इलेक्ट्रॉनिक्स
d) विदेशी कपड़े
उत्तर कुंजी:
- c) 1952
- b) खादी
- c) वस्त्र मंत्रालय
- b) विशिष्ट क्षेत्रों के पारंपरिक उत्पादों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना
- c) बुनकर मुद्रा योजना
- b) ब्रिटिश मशीनीकृत उत्पादों से प्रतिस्पर्धा
- c) 2015
- a) समर्थ योजना
- d) मशीनीकृत उत्पादन को प्रोत्साहित करना
- a) बनारसी साड़ी
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी तैयारी में सहायक होंगे। यदि आपके कोई अन्य प्रश्न हैं, तो कृपया पूछें।