Class 12 History Notes Chapter 5 (Chapter 5) – Bharatiya Itihas ke Kuch Vishay-II Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम कक्षा 12 इतिहास की पुस्तक 'भारतीय इतिहास के कुछ विषय-II' के अध्याय 5 "यात्रियों के नज़रिए: समाज के बारे में उनकी समझ (लगभग दसवीं से सत्रहवीं सदी तक)" का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अध्याय हमें विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों के माध्यम से मध्यकालीन भारतीय समाज, संस्कृति और शासन व्यवस्था को समझने का अवसर देता है।
अध्याय 5: यात्रियों के नज़रिए: समाज के बारे में उनकी समझ (लगभग दसवीं से सत्रहवीं सदी तक)
यह अध्याय हमें उन यात्रियों के वृत्तांतों से परिचित कराता है जिन्होंने लगभग दसवीं से सत्रहवीं शताब्दी के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा की। इन वृत्तांतों के माध्यम से हम तत्कालीन समाज, आर्थिक व्यवस्था, धार्मिक विश्वासों और राजनीतिक संरचनाओं को एक बाहरी दृष्टिकोण से देख पाते हैं।
प्रमुख यात्री और उनके वृत्तांत:
1. अल-बिरूनी (Al-Biruni)
- जन्म और पृष्ठभूमि: 973 ई. में उज़्बेकिस्तान के ख्वारिज़्म में। वह एक बहुभाषी विद्वान था, जिसे सीरियाई, अरबी, फ़ारसी, हिब्रू और संस्कृत का ज्ञान था।
- भारत आगमन: 1017 ई. में महमूद गज़नवी के आक्रमण के बाद वह उसके साथ भारत आया। उसने कई वर्ष पंजाब में बिताए, संस्कृत सीखी और धार्मिक तथा दार्शनिक ग्रंथों का अध्ययन किया।
- पुस्तक: किताब-उल-हिंद (या तहकीक-ए-हिंद)। यह अरबी भाषा में लिखी गई एक विस्तृत पुस्तक है, जो सरल और स्पष्ट है।
- संरचना और विषय-वस्तु: यह पुस्तक 80 अध्यायों में विभाजित है, जिसमें धर्म, दर्शन, त्योहारों, रीति-रिवाजों, सामाजिक जीवन, भार-माप, मूर्तिकला, कानून और माप-तौल जैसे विषयों पर चर्चा की गई है।
- कार्यप्रणाली: अल-बिरूनी ने प्रत्येक अध्याय की शुरुआत एक प्रश्न से की, फिर संस्कृतवादी परंपराओं के आधार पर वर्णन किया और अंत में अन्य संस्कृतियों से तुलना की।
- भारत को समझने में बाधाएँ: उसने तीन प्रमुख बाधाएँ बताईं:
- भाषा: संस्कृत और अरबी-फ़ारसी में अंतर।
- धार्मिक भिन्नताएँ: स्थानीय धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं में अंतर।
- रीति-रिवाजों में भिन्नता: भारतीयों के रीति-रिवाज और व्यवहार।
- आत्म-अवशोषण: भारतीयों का अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ मानना और बाहरी लोगों के प्रति उदासीनता।
- जाति व्यवस्था पर विचार: उसने फ़ारसी समाज में चार सामाजिक वर्गों (घुड़सवार, शासक, पुरोहित, किसान/कारीगर) से तुलना की और बताया कि इस्लाम में सभी को समान माना जाता है। उसने ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था को अपवित्रता की अवधारणा पर आधारित बताया, लेकिन यह भी स्वीकार किया कि समाज में ऐसी व्यवस्थाएँ हमेशा से रही हैं।
2. इब्न बतूता (Ibn Battuta)
- जन्म और पृष्ठभूमि: 1304 ई. में मोरक्को के तानज़ियर में एक इस्लामी कानून (शरीयत) के जानकार परिवार में। उसने युवावस्था में ही शिक्षा प्राप्त की और यात्राओं के प्रति अत्यधिक रुचि रखता था।
- यात्राएँ: उसने मक्का, सीरिया, इराक, फ़ारस, यमन, ओमान, पूर्वी अफ्रीका, भारत और चीन सहित कई देशों की यात्रा की।
- भारत आगमन: 1333 ई. में स्थल मार्ग से सिंध पहुँचा। दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने उसकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर उसे दिल्ली का काज़ी (न्यायाधीश) नियुक्त किया। वह कई वर्षों तक इस पद पर रहा। 1342 ई. में सुल्तान ने उसे चीन में मंगोल शासक के पास दूत बनाकर भेजा।
- पुस्तक: रिहला (Rihla)। यह अरबी भाषा में लिखा गया उसका यात्रा वृत्तांत है। सुल्तान के आदेश पर लेखक इब्न जुज़ैय ने इसे लिखा।
- वर्णन के विषय: शहरों, व्यापार, कृषि, डाक व्यवस्था, सामाजिक जीवन, महिलाएँ, सती प्रथा और दास प्रथा।
- शहरों का वर्णन: उसने भारतीय शहरों को घनी आबादी वाला, समृद्ध और अवसरों से भरा बताया। उसने दिल्ली को एक विशाल, समृद्ध शहर और दौलताबाद को भी दिल्ली जैसा ही बड़ा शहर बताया।
- कृषि और व्यापार: उसने भारतीय भूमि की उपजाऊ क्षमता का उल्लेख किया, जहाँ वर्ष में दो फसलें उगाई जाती थीं। उसने अंतर-एशियाई व्यापार और भारतीय माल की वैश्विक माँग का भी वर्णन किया।
- संचार प्रणाली (डाक व्यवस्था): इब्न बतूता भारतीय डाक प्रणाली से विशेष रूप से प्रभावित था:
- अश्व डाक (उलुक): हर चार मील पर शाही घोड़े तैनात होते थे।
- पैदल डाक (दावा): हर मील पर तीन चौकियाँ होती थीं, और यह अश्व डाक से भी तेज़ थी।
- नारियल और पान: ये दो चीज़ें उसे विशेष रूप से अनोखी लगीं, जिनका उसने विस्तार से वर्णन किया।
- दास प्रथा: उसने दासों के उपयोग का वर्णन किया, जो घरेलू काम और संगीत के लिए रखे जाते थे। सुल्तान द्वारा दासों को उपहार में देने का भी उल्लेख किया।
- महिलाओं की स्थिति: उसने सती प्रथा का वर्णन किया, लेकिन यह भी बताया कि कुछ महिलाएँ सम्मानपूर्वक जीवन जीती थीं।
3. फ्रांस्वा बर्नियर (François Bernier)
- जन्म और पृष्ठभूमि: 1620 ई. में फ्रांस में। वह एक चिकित्सक, दार्शनिक और इतिहासकार था।
- भारत आगमन: 1656 ई. में भारत आया और लगभग 12 वर्षों तक (1656-1668) रहा। वह पहले दारा शिकोह के चिकित्सक के रूप में और बाद में औरंगज़ेब के दरबार से जुड़ा रहा।
- पुस्तक: ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर (मुगल साम्राज्य में यात्राएँ)। यह फ्रेंच भाषा में लिखी गई थी और बाद में इसका अंग्रेजी अनुवाद हुआ।
- मुख्य विचार और तुलनात्मक दृष्टिकोण: बर्नियर ने भारत और यूरोप के बीच तुलना की, विशेषकर मुगल भारत को यूरोप से निम्न दिखाने का प्रयास किया। उसके वृत्तांतों का उद्देश्य यूरोप में अपने दर्शकों को प्रभावित करना था।
- भू-स्वामित्व का प्रश्न और "प्राच्य निरंकुशता" (Oriental Despotism):
- उसने दावा किया कि मुगल साम्राज्य में निजी भू-स्वामित्व का अभाव था और सारी भूमि बादशाह की थी।
- उसका तर्क था कि इससे भू-धारकों को भूमि में निवेश करने की प्रेरणा नहीं मिलती, जिससे कृषि का पतन होता है और किसानों का शोषण होता है।
- यह सिद्धांत "प्राच्य निरंकुशता" के रूप में जाना गया, जिसने पश्चिमी विचारकों पर गहरा प्रभाव डाला। इस सिद्धांत के अनुसार, पूर्वी शासक अपनी प्रजा पर निरंकुश शासन करते थे।
- कारीगरों की स्थिति: उसने कारीगरों की खराब स्थिति का वर्णन किया, जिन्हें राज्य द्वारा शोषण का सामना करना पड़ता था, जिससे उत्पादन में गिरावट आती थी।
- शहर: उसने मुगल शहरों को शिविर नगर (Camp Towns) के रूप में वर्णित किया, जो शाही दरबार के साथ चलते थे और स्थायी नहीं थे।
- सामाजिक असमानता: उसने समाज में अत्यधिक धनी और अत्यधिक गरीब के बीच विशाल अंतर को उजागर किया और एक मध्य वर्ग के अभाव का उल्लेख किया।
- सती प्रथा और महिलाएँ: उसने सती प्रथा का विस्तृत और भावनात्मक वर्णन किया। उसने यह भी उल्लेख किया कि महिलाएँ संपत्ति के अधिकार से वंचित थीं, लेकिन नूरजहाँ और जहाँआरा जैसी कुछ महिलाओं की शक्ति का भी वर्णन किया।
- निष्कर्ष: बर्नियर का विवरण अक्सर आलोचनात्मक और तुलनात्मक था, जो यूरोपीय मानकों के आधार पर भारतीय समाज का मूल्यांकन करता था।
यात्रियों के वृत्तांतों का महत्व:
- ये वृत्तांत हमें मध्यकालीन भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति की बहुआयामी जानकारी प्रदान करते हैं।
- वे हमें तत्कालीन रीति-रिवाजों, विश्वासों और प्रथाओं को समझने में मदद करते हैं।
- हालांकि, इन वृत्तांतों को पढ़ते समय उनके लेखकों के पूर्वाग्रहों और व्यक्तिगत अनुभवों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है।
10 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
किताब-उल-हिंद नामक पुस्तक का लेखक कौन था?
a) इब्न बतूता
b) फ्रांस्वा बर्नियर
c) अल-बिरूनी
d) अब्दुल रज्जाक -
अल-बिरूनी किसके साथ भारत आया था?
a) मुहम्मद बिन तुगलक
b) महमूद गज़नवी
c) अकबर
d) औरंगज़ेब -
इब्न बतूता किस देश का निवासी था?
a) फ्रांस
b) मोरक्को
c) उज़्बेकिस्तान
d) इटली -
इब्न बतूता किसके शासनकाल में भारत आया था?
a) अलाउद्दीन खिलजी
b) फिरोज शाह तुगलक
c) मुहम्मद बिन तुगलक
d) इल्तुतमिश -
रिहला नामक यात्रा वृत्तांत किस भाषा में लिखा गया था?
a) फ़ारसी
b) संस्कृत
c) अरबी
d) फ्रेंच -
भारतीय डाक प्रणाली, विशेषकर अश्व डाक (उलुक) और पैदल डाक (दावा) का विस्तृत वर्णन किस यात्री ने किया था?
a) अल-बिरूनी
b) फ्रांस्वा बर्नियर
c) इब्न बतूता
d) पीटर मुंडी -
"प्राच्य निरंकुशता" (Oriental Despotism) का सिद्धांत किस यूरोपीय यात्री ने प्रतिपादित किया था, जिसमें उसने मुगल शासकों को अपनी प्रजा पर निरंकुश बताया?
a) इब्न बतूता
b) अल-बिरूनी
c) फ्रांस्वा बर्नियर
d) जीन-बैप्टिस्ट टैवर्नियर -
फ्रांस्वा बर्नियर किस देश का निवासी था और उसका मुख्य पेशा क्या था?
a) मोरक्को, न्यायाधीश
b) उज़्बेकिस्तान, खगोलशास्त्री
c) फ्रांस, चिकित्सक और दार्शनिक
d) इटली, व्यापारी -
किस यात्री ने मुगल साम्राज्य में निजी भू-स्वामित्व के अभाव को कृषि के पतन का मुख्य कारण बताया?
a) अल-बिरूनी
b) इब्न बतूता
c) फ्रांस्वा बर्नियर
d) मार्को पोलो -
नारियल और पान जैसी भारतीय विशिष्टताओं से कौन सा यात्री विशेष रूप से मोहित था और उसने इनका विस्तार से वर्णन किया?
a) फ्रांस्वा बर्नियर
b) अल-बिरूनी
c) इब्न बतूता
d) जीन-बैप्टिस्ट टैवर्नियर
उत्तरमाला:
- c) अल-बिरूनी
- b) महमूद गज़नवी
- b) मोरक्को
- c) मुहम्मद बिन तुगलक
- c) अरबी
- c) इब्न बतूता
- c) फ्रांस्वा बर्नियर
- c) फ्रांस, चिकित्सक और दार्शनिक
- c) फ्रांस्वा बर्नियर
- c) इब्न बतूता
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें।