Class 12 Physics Notes Chapter 14 (Chapter 14) – Examplar Problems (Hindi) Book

नमस्ते विद्यार्थियों! आज हम भौतिकी के महत्वपूर्ण अध्याय 'अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अध्याय में हम ठोसों के वर्गीकरण से लेकर विभिन्न अर्धचालक युक्तियों और लॉजिक गेट्स तक के सिद्धांतों को गहराई से समझेंगे।
अध्याय 14: अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ
1. ठोसों का वर्गीकरण (Classification of Solids)
ठोसों को उनकी चालकता के आधार पर मुख्यतः तीन वर्गों में बांटा जा सकता है:
- चालक (Conductors): वे पदार्थ जिनमें विद्युत धारा आसानी से प्रवाहित हो सकती है। इनकी चालकता बहुत अधिक (10² से 10⁸ S/m) होती है। उदाहरण: धातुएँ (ताँबा, चाँदी, एल्युमीनियम)। ऊर्जा बैंड सिद्धांत के अनुसार, चालकों में संयोजकता बैंड (Valence Band) और चालन बैंड (Conduction Band) एक-दूसरे को अतिव्यापित (overlap) करते हैं, जिससे इलेक्ट्रॉन आसानी से चालन बैंड में जा सकते हैं।
- कुचालक (Insulators): वे पदार्थ जिनमें विद्युत धारा प्रवाहित नहीं हो सकती। इनकी चालकता बहुत कम (10⁻¹¹ से 10⁻¹⁹ S/m) होती है। उदाहरण: लकड़ी, प्लास्टिक, रबर। ऊर्जा बैंड सिद्धांत के अनुसार, कुचालकों में संयोजकता बैंड और चालन बैंड के बीच ऊर्जा अंतराल (Energy Gap, Eg) बहुत अधिक (Eg > 3 eV) होता है, जिससे इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में नहीं जा पाते।
- अर्धचालक (Semiconductors): वे पदार्थ जिनकी चालकता चालकों और कुचालकों के बीच होती है (10⁻⁵ से 10⁶ S/m)। उदाहरण: सिलिकॉन (Si), जर्मेनियम (Ge)। ऊर्जा बैंड सिद्धांत के अनुसार, अर्धचालकों में संयोजकता बैंड और चालन बैंड के बीच ऊर्जा अंतराल मध्यम (Eg ≈ 1 eV) होता है। परम शून्य ताप पर ये कुचालक की तरह व्यवहार करते हैं, लेकिन कमरे के ताप पर कुछ इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में चले जाते हैं और ये चालकता प्रदर्शित करते हैं।
2. अर्धचालक (Semiconductors)
- नैज अर्धचालक (Intrinsic Semiconductors):
- ये शुद्ध अर्धचालक होते हैं, जैसे शुद्ध Si या Ge।
- इनमें इलेक्ट्रॉन और होल (hole) की संख्या बराबर होती है (ne = nh)।
- कमरे के ताप पर, कुछ सहसंयोजक बंध टूटते हैं, जिससे इलेक्ट्रॉन मुक्त होते हैं और होल बनते हैं।
- इनकी चालकता कम होती है और ताप बढ़ाने पर बढ़ती है।
- अपद्रवी अर्धचालक (Extrinsic Semiconductors):
- नैज अर्धचालकों की चालकता बढ़ाने के लिए उनमें उपयुक्त अशुद्धियाँ (अपद्रव्य) मिलाई जाती हैं, इस प्रक्रिया को अपमिश्रण (Doping) कहते हैं।
- अपमिश्रण के आधार पर ये दो प्रकार के होते हैं:
- n-प्रकार अर्धचालक (n-type Semiconductor):
- जब शुद्ध अर्धचालक (Si या Ge) में पंचसंयोजी अपद्रव्य (जैसे फॉस्फोरस P, आर्सेनिक As, एंटीमनी Sb) मिलाया जाता है।
- पंचसंयोजी परमाणु का एक इलेक्ट्रॉन अतिरिक्त होता है, जो आसानी से मुक्त हो जाता है। इन्हें दाता अपद्रव्य (Donor Impurity) कहते हैं।
- इनमें इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक आवेश वाहक (majority charge carriers) होते हैं और होल अल्पसंख्यक आवेश वाहक (minority charge carriers) होते हैं।
- दाता ऊर्जा स्तर (Donor Energy Level) चालन बैंड के ठीक नीचे होता है।
- p-प्रकार अर्धचालक (p-type Semiconductor):
- जब शुद्ध अर्धचालक (Si या Ge) में त्रिसंयोजी अपद्रव्य (जैसे बोरॉन B, एल्युमीनियम Al, इंडियम In) मिलाया जाता है।
- त्रिसंयोजी परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन की कमी होती है, जिससे एक होल बनता है। इन्हें ग्राही अपद्रव्य (Acceptor Impurity) कहते हैं।
- इनमें होल बहुसंख्यक आवेश वाहक होते हैं और इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक आवेश वाहक होते हैं।
- ग्राही ऊर्जा स्तर (Acceptor Energy Level) संयोजकता बैंड के ठीक ऊपर होता है।
- n-प्रकार अर्धचालक (n-type Semiconductor):
3. p-n संधि (p-n Junction)
- जब एक p-प्रकार अर्धचालक को एक n-प्रकार अर्धचालक के साथ विशेष विधि से जोड़ा जाता है, तो इस संयोजन को p-n संधि कहते हैं।
- अवक्षय परत (Depletion Layer):
- संधि के पास, n-क्षेत्र से इलेक्ट्रॉन p-क्षेत्र में विसरित होते हैं और p-क्षेत्र से होल n-क्षेत्र में विसरित होते हैं।
- ये विसरित आवेश वाहक एक-दूसरे से मिलकर उदासीन हो जाते हैं।
- इससे संधि के n-क्षेत्र की ओर धनात्मक अचल आयन (दाता आयन) और p-क्षेत्र की ओर ऋणात्मक अचल आयन (ग्राही आयन) की एक परत बन जाती है।
- यह परत आवेश वाहक रहित होती है, जिसे अवक्षय परत कहते हैं।
- इस परत की मोटाई लगभग 10⁻⁶ m होती है।
- विभव प्राचीर (Potential Barrier):
- अवक्षय परत में अचल आयनों के कारण एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न होता है, जो n-क्षेत्र से p-क्षेत्र की ओर होता है।
- यह विद्युत क्षेत्र बहुसंख्यक आवेश वाहकों के विसरण को रोकता है और एक विभव अंतर उत्पन्न करता है, जिसे विभव प्राचीर कहते हैं।
- Si के लिए विभव प्राचीर लगभग 0.7 V और Ge के लिए लगभग 0.3 V होता है।
4. p-n संधि डायोड (p-n Junction Diode)
- यह एक दो-टर्मिनल वाली युक्ति है, जिसमें एक p-n संधि होती है।
- प्रतीक: एक त्रिभुज (p-क्षेत्र, एनोड) और एक सीधी रेखा (n-क्षेत्र, कैथोड)।
- अभिनति (Biasing):
- अग्र अभिनति (Forward Biasing):
- जब p-क्षेत्र को बैटरी के धनात्मक टर्मिनल से और n-क्षेत्र को ऋणात्मक टर्मिनल से जोड़ा जाता है।
- बाह्य वोल्टेज विभव प्राचीर का विरोध करता है, जिससे अवक्षय परत की मोटाई कम हो जाती है।
- बहुसंख्यक आवेश वाहक संधि को पार करते हैं और परिपथ में पर्याप्त धारा प्रवाहित होती है।
- एक निश्चित वोल्टेज (नी वोल्टेज या कट-इन वोल्टेज) के बाद धारा तेजी से बढ़ती है।
- पश्च अभिनति (Reverse Biasing):
- जब p-क्षेत्र को बैटरी के ऋणात्मक टर्मिनल से और n-क्षेत्र को धनात्मक टर्मिनल से जोड़ा जाता है।
- बाह्य वोल्टेज विभव प्राचीर का समर्थन करता है, जिससे अवक्षय परत की मोटाई बढ़ जाती है।
- बहुसंख्यक आवेश वाहक संधि से दूर चले जाते हैं, इसलिए नगण्य धारा (अल्पसंख्यक वाहकों के कारण) प्रवाहित होती है, जिसे पश्च संतृप्ति धारा (Reverse Saturation Current) कहते हैं।
- एक निश्चित उच्च पश्च वोल्टेज पर, डायोड में भंजन (Breakdown) होता है और धारा तेजी से बढ़ती है (जेनर भंजन या एवलांच भंजन)।
- अग्र अभिनति (Forward Biasing):
5. डायोड के अनुप्रयोग (Applications of Diode)
- दिष्टकारी (Rectifier): AC (प्रत्यावर्ती धारा) को DC (दिष्ट धारा) में बदलने की प्रक्रिया को दिष्टकरण कहते हैं, और इस युक्ति को दिष्टकारी कहते हैं।
- अर्ध-तरंग दिष्टकारी (Half-wave Rectifier):
- यह AC इनपुट के केवल आधे चक्र (धनात्मक या ऋणात्मक) को दिष्टकृत करता है।
- दक्षता लगभग 40.6% होती है।
- आउटपुट में उच्च ऊर्मिका (ripple) होती है।
- पूर्ण-तरंग दिष्टकारी (Full-wave Rectifier):
- यह AC इनपुट के दोनों आधे चक्रों को दिष्टकृत करता है।
- दक्षता लगभग 81.2% होती है।
- आउटपुट में कम ऊर्मिका होती है।
- सेन्टर-टैप्ड पूर्ण-तरंग दिष्टकारी और ब्रिज दिष्टकारी इसके उदाहरण हैं।
- अर्ध-तरंग दिष्टकारी (Half-wave Rectifier):
- फिल्टर परिपथ (Filter Circuits): दिष्टकारी के आउटपुट में उपस्थित AC घटकों (ऊर्मिका) को कम करने के लिए संधारित्र (capacitor) या प्रेरक (inductor) का उपयोग किया जाता है। संधारित्र फिल्टर सबसे सामान्य है।
6. विशिष्ट उद्देश्य p-n संधि डायोड (Special Purpose p-n Junction Diodes)
- जेनर डायोड (Zener Diode):
- यह एक विशेष रूप से डोप किया गया p-n संधि डायोड है जो पश्च भंजन क्षेत्र में संचालित होता है।
- इसका उपयोग वोल्टेज नियामक (Voltage Regulator) के रूप में किया जाता है, क्योंकि भंजन क्षेत्र में इसके सिरों पर वोल्टेज लगभग स्थिर रहता है, भले ही धारा बदल जाए।
- प्रतीक सामान्य डायोड जैसा होता है, लेकिन कैथोड पर 'Z' आकृति होती है।
- प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED - Light Emitting Diode):
- यह एक अग्र अभिनत p-n संधि डायोड है जो विद्युत ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में परिवर्तित करता है।
- जब इलेक्ट्रॉन और होल संधि पर पुनर्संयोजित होते हैं, तो ऊर्जा फोटॉन के रूप में उत्सर्जित होती है।
- विभिन्न अर्धचालक पदार्थों के उपयोग से विभिन्न रंगों का प्रकाश उत्पन्न किया जा सकता है।
- उच्च दक्षता, लंबी आयु, त्वरित प्रतिक्रिया।
- फोटोडायोड (Photodiode):
- यह एक पश्च अभिनत p-n संधि डायोड है जो प्रकाश ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है।
- जब संधि पर प्रकाश पड़ता है, तो इलेक्ट्रॉन-होल युग्म उत्पन्न होते हैं, जिससे पश्च धारा बढ़ती है।
- इसका उपयोग प्रकाश संसूचक (light detector) के रूप में किया जाता है।
- सौर सेल (Solar Cell):
- यह एक p-n संधि डायोड है जो बिना किसी बाह्य अभिनति के प्रकाश ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा (वोल्टेज) में परिवर्तित करता है (प्रकाशवोल्टीय प्रभाव)।
- इसका उपयोग सौर ऊर्जा से विद्युत उत्पादन में होता है।
7. संधि ट्रांजिस्टर (Junction Transistor)
- यह एक तीन-टर्मिनल वाली अर्धचालक युक्ति है जो प्रवर्धक (amplifier) या स्विच के रूप में कार्य करती है।
- मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं: npn और pnp।
- संरचना: इसमें तीन क्षेत्र होते हैं:
- उत्सर्जक (Emitter - E): अत्यधिक डोप किया गया, आवेश वाहकों की आपूर्ति करता है।
- आधार (Base - B): पतला और हल्का डोप किया गया।
- संग्राहक (Collector - C): मध्यम डोप किया गया, उत्सर्जक से आने वाले आवेश वाहकों को एकत्र करता है।
- कार्यप्रणाली (संक्षेप में):
- उत्सर्जक-आधार संधि को हमेशा अग्र अभिनत रखा जाता है।
- आधार-संग्राहक संधि को हमेशा पश्च अभिनत रखा जाता है।
- एक छोटे आधार धारा (IB) परिवर्तन से एक बड़ी संग्राहक धारा (IC) में परिवर्तन होता है, जिससे प्रवर्धन संभव होता है।
- विन्यास (Configurations): कॉमन उत्सर्जक (CE), कॉमन आधार (CB), कॉमन संग्राहक (CC)। CE विन्यास सबसे अधिक उपयोग किया जाता है क्योंकि इसमें धारा लाभ (β) और वोल्टेज लाभ दोनों उच्च होते हैं।
- ट्रांजिस्टर एक प्रवर्धक के रूप में: यह एक छोटे इनपुट सिग्नल को एक बड़े आउटपुट सिग्नल में परिवर्तित करता है।
- ट्रांजिस्टर एक स्विच के रूप में: यह कट-ऑफ (बंद) और संतृप्ति (चालू) क्षेत्रों के बीच संचालित होकर स्विच के रूप में कार्य करता है।
8. डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स (Digital Electronics)
- एनालॉग और डिजिटल संकेत (Analog and Digital Signals):
- एनालॉग संकेत: वे संकेत जो समय के साथ लगातार बदलते रहते हैं और मानों की एक अनंत श्रृंखला ले सकते हैं। उदाहरण: ध्वनि, तापमान।
- डिजिटल संकेत: वे संकेत जो केवल दो असतत मान (सामान्यतः 0 और 1) ले सकते हैं। ये बाइनरी कोड में होते हैं। उदाहरण: कंप्यूटर डेटा।
- लॉजिक गेट (Logic Gates):
- ये डिजिटल परिपथ के मूल बिल्डिंग ब्लॉक हैं जो एक या अधिक इनपुट संकेतों पर तार्किक संक्रियाएँ करते हैं और एक आउटपुट संकेत उत्पन्न करते हैं।
- सत्यता सारणी (Truth Table): यह इनपुट के सभी संभावित संयोजनों के लिए आउटपुट को दर्शाती है।
- बूलियन व्यंजक (Boolean Expression): यह लॉजिक गेट की तार्किक संक्रिया को गणितीय रूप से व्यक्त करता है।
- मूल लॉजिक गेट्स:
- OR गेट: आउटपुट 1 होता है यदि कोई भी इनपुट 1 हो। (A+B)
- AND गेट: आउटपुट 1 होता है यदि सभी इनपुट 1 हों। (A.B)
- NOT गेट (इनवर्टर): इनपुट को उल्टा करता है। यदि इनपुट 1 है तो आउटपुट 0, और यदि इनपुट 0 है तो आउटपुट 1। (Ā)
- सार्वभौमिक गेट्स (Universal Gates):
- NAND गेट: AND गेट और NOT गेट का संयोजन। (A.B)
- NOR गेट: OR गेट और NOT गेट का संयोजन। (A+B)
- इन गेट्स का उपयोग करके किसी भी अन्य लॉजिक गेट को बनाया जा सकता है।
- अन्य गेट्स: XOR (Exclusive OR) गेट, XNOR (Exclusive NOR) गेट।
बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs)
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न के लिए सही विकल्प चुनें।
1. परम शून्य ताप पर एक नैज अर्धचालक व्यवहार करता है:
a) चालक की तरह
b) कुचालक की तरह
c) अतिचालक की तरह
d) इनमें से कोई नहीं
2. n-प्रकार अर्धचालक में बहुसंख्यक आवेश वाहक होते हैं:
a) होल
b) इलेक्ट्रॉन
c) प्रोटॉन
d) न्यूट्रॉन
3. p-n संधि डायोड में अवक्षय परत का निर्माण किसके कारण होता है?
a) केवल इलेक्ट्रॉन के विसरण के कारण
b) केवल होल के विसरण के कारण
c) इलेक्ट्रॉन और होल दोनों के विसरण के कारण
d) अचल आयनों की गति के कारण
4. एक अग्र अभिनत p-n संधि डायोड में, विभव प्राचीर:
a) बढ़ता है
b) घटता है
c) अपरिवर्तित रहता है
d) पहले बढ़ता है फिर घटता है
5. दिष्टकारी का उपयोग ____ को ____ में बदलने के लिए किया जाता है।
a) AC को DC
b) DC को AC
c) उच्च वोल्टेज को निम्न वोल्टेज
d) निम्न वोल्टेज को उच्च वोल्टेज
6. जेनर डायोड का मुख्य उपयोग क्या है?
a) धारा प्रवर्धन
b) वोल्टेज नियमन
c) प्रकाश उत्सर्जन
d) प्रकाश संसूचन
7. LED (प्रकाश उत्सर्जक डायोड) किस अभिनति में कार्य करता है?
a) अग्र अभिनति
b) पश्च अभिनति
c) बिना अभिनति के
d) दोनों अग्र और पश्च अभिनति में
8. ट्रांजिस्टर में सबसे पतला और सबसे हल्का डोप किया गया क्षेत्र कौन सा होता है?
a) उत्सर्जक
b) आधार
c) संग्राहक
d) ये सभी समान होते हैं
9. निम्न में से कौन सा गेट सार्वभौमिक गेट (Universal Gate) है?
a) OR गेट
b) AND गेट
c) NOT गेट
d) NAND गेट
10. यदि एक AND गेट के दोनों इनपुट A=1 और B=0 हैं, तो आउटपुट क्या होगा?
a) 0
b) 1
c) अनिर्धारित
d) इनपुट पर निर्भर करता है
उत्तरमाला:
- b) कुचालक की तरह
- b) इलेक्ट्रॉन
- c) इलेक्ट्रॉन और होल दोनों के विसरण के कारण
- b) घटता है
- a) AC को DC
- b) वोल्टेज नियमन
- a) अग्र अभिनति
- b) आधार
- d) NAND गेट
- a) 0
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को समझने और सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और सफलता प्राप्त करें!