Class 12 Physics Notes Chapter 17 (Chapter 17) – Examplar Problems (Hindi) Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम भौतिकी के अध्याय 17 'अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अध्याय आधुनिक इलेक्ट्रॉनिकी का आधार है और इससे संबंधित प्रश्न विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं।
अध्याय 17: अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ
1. परिचय: पदार्थ का वर्गीकरण
पदार्थों को उनकी चालकता के आधार पर मुख्यतः तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
- चालक (Conductors): वे पदार्थ जिनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन प्रचुर मात्रा में होते हैं और विद्युत धारा का आसानी से चालन करते हैं। इनकी प्रतिरोधकता बहुत कम (10⁻² से 10⁻⁸ Ωm) होती है। उदाहरण: धातुएँ (तांबा, चांदी, एल्युमीनियम)।
- कुचालक (Insulators): वे पदार्थ जिनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन नगण्य होते हैं और विद्युत धारा का चालन नहीं करते। इनकी प्रतिरोधकता बहुत अधिक (10¹¹ से 10¹⁹ Ωm) होती है। उदाहरण: लकड़ी, प्लास्टिक, कांच, अभ्रक।
- अर्धचालक (Semiconductors): वे पदार्थ जिनकी चालकता चालकों और कुचालकों के बीच होती है। इनकी प्रतिरोधकता 10⁻⁵ से 10⁶ Ωm के क्रम की होती है। 0 K (परम शून्य ताप) पर ये कुचालक की तरह व्यवहार करते हैं, लेकिन कमरे के तापमान पर इनकी चालकता बढ़ जाती है। उदाहरण: सिलिकॉन (Si), जर्मेनियम (Ge), गैलियम आर्सेनाइड (GaAs)।
2. ऊर्जा बैंड
ठोसों में परमाणु एक-दूसरे के निकट होते हैं, जिससे उनके इलेक्ट्रॉन ऊर्जा स्तरों का विस्तार होकर ऊर्जा बैंड बनाते हैं।
- संयोजी बैंड (Valence Band): यह सबसे ऊपरी ऊर्जा बैंड होता है जो सामान्यतः इलेक्ट्रॉनों से भरा होता है। इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉन परमाणु से दृढ़ता से बंधे होते हैं और विद्युत चालन में सीधे भाग नहीं लेते।
- चालन बैंड (Conduction Band): यह संयोजी बैंड के ऊपर का ऊर्जा बैंड होता है। इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉन मुक्त होते हैं और विद्युत क्षेत्र लगाने पर गति करके विद्युत धारा का चालन करते हैं।
- वर्जित ऊर्जा अंतराल (Forbidden Energy Gap, Eg): संयोजी बैंड के शीर्ष और चालन बैंड के तल के बीच का ऊर्जा अंतराल। इस अंतराल में कोई इलेक्ट्रॉन नहीं रह सकता।
- चालकों में: Eg ≈ 0 (संयोजी और चालन बैंड अतिव्याप्त होते हैं)।
- कुचालकों में: Eg > 3 eV (जैसे हीरे के लिए ~6 eV)।
- अर्धचालकों में: Eg < 3 eV (जैसे Si के लिए ~1.1 eV, Ge के लिए ~0.7 eV)।
3. अर्धचालकों का वर्गीकरण
- नैज अर्धचालक (Intrinsic Semiconductors): ये शुद्ध अर्धचालक होते हैं, जैसे शुद्ध सिलिकॉन या जर्मेनियम।
- कमरे के तापमान पर, कुछ सहसंयोजक बंध टूटते हैं, जिससे मुक्त इलेक्ट्रॉन और होल (इलेक्ट्रॉन की रिक्ति) के युग्म बनते हैं।
- इनमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या (ne) होलों की संख्या (nh) के बराबर होती है (ne = nh = ni)।
- इनकी चालकता कम होती है।
- अपद्रव्यी अर्धचालक (Extrinsic Semiconductors): नैज अर्धचालकों में नियंत्रित मात्रा में उपयुक्त अशुद्धि मिलाने पर इनकी चालकता में अत्यधिक वृद्धि होती है। इस प्रक्रिया को मादन (Doping) कहते हैं।
- n-प्रकार अर्धचालक:
- शुद्ध अर्धचालक में पंचसंयोजी अशुद्धि (जैसे आर्सेनिक (As), एंटीमनी (Sb), फास्फोरस (P)) मिलाई जाती है।
- अशुद्धि परमाणु एक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन प्रदान करते हैं, इसलिए इन्हें दाता अशुद्धि (Donor Impurity) कहते हैं।
- बहुसंख्यक आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं, और अल्पसंख्यक आवेश वाहक होल होते हैं (ne >> nh)।
- दाता ऊर्जा स्तर चालन बैंड के ठीक नीचे होता है।
- p-प्रकार अर्धचालक:
- शुद्ध अर्धचालक में त्रिसंयोजी अशुद्धि (जैसे बोरॉन (B), एल्युमीनियम (Al), इंडियम (In)) मिलाई जाती है।
- अशुद्धि परमाणु एक इलेक्ट्रॉन स्वीकार करते हैं (एक होल का निर्माण करते हैं), इसलिए इन्हें ग्राही अशुद्धि (Acceptor Impurity) कहते हैं।
- बहुसंख्यक आवेश वाहक होल होते हैं, और अल्पसंख्यक आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं (nh >> ne)।
- ग्राही ऊर्जा स्तर संयोजी बैंड के ठीक ऊपर होता है।
- n-प्रकार अर्धचालक:
4. p-n संधि (p-n Junction)
जब एक p-प्रकार अर्धचालक को एक n-प्रकार अर्धचालक के साथ विशेष विधि से जोड़ा जाता है, तो उनके मिलन बिंदु पर p-n संधि बनती है।
- अवक्षय परत (Depletion Layer): संधि के निर्माण के समय, p-क्षेत्र से होल और n-क्षेत्र से इलेक्ट्रॉन संधि को पार करके एक-दूसरे में विसरित होते हैं। यह विसरण संधि के पास एक ऐसा क्षेत्र बनाता है जहाँ कोई मुक्त आवेश वाहक (इलेक्ट्रॉन या होल) नहीं होते हैं। इस क्षेत्र को अवक्षय परत कहते हैं। इसमें p-क्षेत्र की ओर ऋणात्मक ग्राही आयन और n-क्षेत्र की ओर धनात्मक दाता आयन होते हैं।
- विभव प्राचीर (Potential Barrier): अवक्षय परत में उपस्थित स्थिर आयनों के कारण एक आंतरिक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न होता है। यह विद्युत क्षेत्र आवेश वाहकों के आगे विसरण को रोकता है और एक विभव प्राचीर बनाता है। Si के लिए यह लगभग 0.7 V और Ge के लिए लगभग 0.3 V होता है।
5. p-n संधि डायोड (p-n Junction Diode)
यह एक दो-टर्मिनल वाली अर्धचालक युक्ति है जिसमें एक p-n संधि होती है।
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अभिनति (Biasing): बाहरी वोल्टेज लगाकर डायोड के चालन को नियंत्रित करना।
- अग्र अभिनति (Forward Biasing): p-क्षेत्र को बैटरी के धनात्मक टर्मिनल से और n-क्षेत्र को ऋणात्मक टर्मिनल से जोड़ा जाता है।
- अवक्षय परत की चौड़ाई घटती है और विभव प्राचीर कम हो जाता है।
- एक निश्चित वोल्टेज (नी वोल्टेज/थ्रेशोल्ड वोल्टेज) के बाद धारा तेजी से प्रवाहित होती है (कम प्रतिरोध)।
- पश्च अभिनति (Reverse Biasing): p-क्षेत्र को बैटरी के ऋणात्मक टर्मिनल से और n-क्षेत्र को धनात्मक टर्मिनल से जोड़ा जाता है।
- अवक्षय परत की चौड़ाई बढ़ती है और विभव प्राचीर बढ़ जाता है।
- बहुत कम धारा (पश्च संतृप्ति धारा) प्रवाहित होती है, जो अल्पसंख्यक आवेश वाहकों के कारण होती है (उच्च प्रतिरोध)।
- भंजन वोल्टेज (Breakdown Voltage): एक निश्चित उच्च पश्च वोल्टेज पर, डायोड में धारा अचानक बहुत तेजी से बढ़ जाती है, जिसे भंजन कहते हैं। यह जेनर भंजन या अवलांश भंजन के कारण होता है।
- अग्र अभिनति (Forward Biasing): p-क्षेत्र को बैटरी के धनात्मक टर्मिनल से और n-क्षेत्र को ऋणात्मक टर्मिनल से जोड़ा जाता है।
-
दिष्टकारी के रूप में डायोड (Diode as a Rectifier): प्रत्यावर्ती धारा (AC) को दिष्ट धारा (DC) में बदलने की प्रक्रिया को दिष्टकरण कहते हैं। डायोड केवल एक दिशा में धारा प्रवाहित होने देता है, इसलिए इसका उपयोग दिष्टकारी के रूप में किया जाता है।
- अर्ध-तरंग दिष्टकारी (Half-Wave Rectifier): AC के केवल एक अर्ध-चक्र को DC में बदलता है। इसकी दक्षता लगभग 40.6% होती है।
- पूर्ण-तरंग दिष्टकारी (Full-Wave Rectifier): AC के दोनों अर्ध-चक्रों को DC में बदलता है।
- केंद्र-टैप पूर्ण-तरंग दिष्टकारी: इसमें दो डायोड का उपयोग होता है।
- ब्रिज पूर्ण-तरंग दिष्टकारी: इसमें चार डायोड का उपयोग होता है।
- इसकी दक्षता लगभग 81.2% होती है।
- उर्मिका कारक (Ripple Factor): दिष्टकारी के आउटपुट में AC घटक की मात्रा का माप। कम उर्मिका कारक बेहतर दिष्टकरण दर्शाता है।
6. विशिष्ट प्रयोजन p-n संधि डायोड
- जेनर डायोड (Zener Diode):
- यह एक विशेष रूप से मादित p-n संधि डायोड है जिसे पश्च अभिनति में भंजन क्षेत्र में संचालित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
- मुख्य उपयोग: वोल्टेज नियामक (Voltage Regulator) के रूप में, क्योंकि भंजन क्षेत्र में जेनर वोल्टेज लगभग स्थिर रहता है, भले ही धारा में परिवर्तन हो।
- प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED - Light Emitting Diode):
- यह अग्र अभिनति में संचालित होता है। जब इलेक्ट्रॉन और होल पुनर्संयोजित होते हैं, तो ऊर्जा प्रकाश के रूप में उत्सर्जित होती है।
- ये गैलियम आर्सेनाइड (GaAs), गैलियम फास्फाइड (GaP), गैलियम आर्सेनाइड फास्फाइड (GaAsP) जैसे यौगिक अर्धचालकों से बने होते हैं।
- कम शक्ति की खपत, लंबी उम्र और तेज प्रतिक्रिया इसकी विशेषताएँ हैं।
- फोटोडायोड (Photodiode):
- यह पश्च अभिनति में संचालित होता है। जब इस पर प्रकाश पड़ता है, तो इलेक्ट्रॉन-होल युग्म उत्पन्न होते हैं, जिससे पश्च धारा बढ़ जाती है।
- उपयोग: प्रकाश संसूचक, ऑप्टिकल संचार, अलार्म सिस्टम में।
- सौर सेल (Solar Cell):
- यह एक p-n संधि पर आधारित युक्ति है जो सौर ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है।
- यह बिना किसी बाहरी अभिनति के काम करता है। जब प्रकाश संधि पर पड़ता है, तो इलेक्ट्रॉन-होल युग्म उत्पन्न होते हैं, जिससे एक वि.वा.बल (e.m.f.) उत्पन्न होता है।
7. संधि ट्रांजिस्टर (Junction Transistor)
यह एक तीन-टर्मिनल वाली अर्धचालक युक्ति है जो प्रवर्धक या स्विच के रूप में कार्य कर सकती है।
- प्रकार:
- n-p-n ट्रांजिस्टर: दो n-प्रकार अर्धचालकों के बीच एक पतली p-प्रकार अर्धचालक परत सैंडविच होती है।
- p-n-p ट्रांजिस्टर: दो p-प्रकार अर्धचालकों के बीच एक पतली n-प्रकार अर्धचालक परत सैंडविच होती है।
- संरचना:
- उत्सर्जक (Emitter, E): यह अत्यधिक मादित होता है और आवेश वाहक (इलेक्ट्रॉन या होल) प्रदान करता है।
- आधार (Base, B): यह बहुत पतला और हल्का मादित होता है। यह उत्सर्जक और संग्राहक के बीच आवेश वाहकों को नियंत्रित करता है।
- संग्राहक (Collector, C): यह मध्यम मादित और सबसे बड़ा होता है। यह उत्सर्जक से आने वाले आवेश वाहकों को एकत्र करता है।
- कार्यप्रणाली (संक्षेप में):
- उत्सर्जक-आधार संधि हमेशा अग्र अभिनत होती है।
- आधार-संग्राहक संधि हमेशा पश्च अभिनत होती है।
- उत्सर्जक से बहुसंख्यक वाहक आधार में प्रवेश करते हैं। आधार पतला होने के कारण उनमें से अधिकांश संग्राहक तक पहुँच जाते हैं, जिससे संग्राहक धारा (Ic) बनती है। आधार धारा (Ib) बहुत कम होती है।
- उत्सर्जक धारा (Ie) = आधार धारा (Ib) + संग्राहक धारा (Ic)
- विन्यास (Configurations):
- उभयनिष्ठ उत्सर्जक (Common Emitter, CE): यह सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला विन्यास है क्योंकि इसमें धारा लाभ, वोल्टेज लाभ और शक्ति लाभ तीनों उच्च होते हैं।
- अन्य विन्यास: उभयनिष्ठ आधार (CB) और उभयनिष्ठ संग्राहक (CC)।
- प्रवर्धक के रूप में ट्रांजिस्टर (Transistor as an Amplifier):
- एक कमजोर इनपुट सिग्नल को एक मजबूत आउटपुट सिग्नल में परिवर्तित करता है।
- धारा लाभ (Current Gain):
- α (अल्फा) = Ic / Ie (उभयनिष्ठ आधार विन्यास के लिए)
- β (बीटा) = Ic / Ib (उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास के लिए)
- β = α / (1 - α) और α = β / (1 + β)
- वोल्टेज लाभ (Voltage Gain): Av = β * (Rc / Ri), जहाँ Rc संग्राहक प्रतिरोध और Ri इनपुट प्रतिरोध है।
- शक्ति लाभ (Power Gain): Ap = Av * β
- स्विच के रूप में ट्रांजिस्टर (Transistor as a Switch):
- जब आधार धारा बहुत कम होती है (कट-ऑफ क्षेत्र), तो ट्रांजिस्टर एक खुले स्विच की तरह कार्य करता है।
- जब आधार धारा बहुत अधिक होती है (संतृप्ति क्षेत्र), तो ट्रांजिस्टर एक बंद स्विच की तरह कार्य करता है।
8. डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी तथा तर्क द्वार (Digital Electronics and Logic Gates)
- एनालॉग संकेत (Analog Signals): वे संकेत जो समय के साथ लगातार बदलते रहते हैं और मानों की एक सतत सीमा ले सकते हैं (जैसे ध्वनि, तापमान)।
- डिजिटल संकेत (Digital Signals): वे संकेत जो केवल दो असतत मान लेते हैं, आमतौर पर '0' (निम्न) और '1' (उच्च)। ये बाइनरी प्रणाली पर आधारित होते हैं।
- द्विआधारी संख्या प्रणाली (Binary Number System): आधार 2 प्रणाली, जिसमें केवल 0 और 1 अंक होते हैं। डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स में इसका उपयोग किया जाता है।
- तर्क द्वार (Logic Gates): डिजिटल परिपथ के मूल निर्माण खंड जो एक या अधिक इनपुट लेते हैं और बूलियन तर्क के अनुसार एक आउटपुट उत्पन्न करते हैं।
- OR द्वार: आउटपुट '1' होता है यदि कोई भी इनपुट '1' हो। (बूलियन व्यंजक: Y = A + B)
- AND द्वार: आउटपुट '1' होता है यदि सभी इनपुट '1' हों। (बूलियन व्यंजक: Y = A . B)
- NOT द्वार (इन्वर्टर): आउटपुट इनपुट का पूरक होता है। (बूलियन व्यंजक: Y = A̅)
- NAND द्वार: AND द्वार का उलटा। आउटपुट '0' होता है यदि सभी इनपुट '1' हों। (बूलियन व्यंजक: Y = A . B̅)
- NOR द्वार: OR द्वार का उलटा। आउटपुट '1' होता है यदि सभी इनपुट '0' हों। (बूलियन व्यंजक: Y = A + B̅)
- सार्वत्रिक तर्क द्वार (Universal Logic Gates): NAND और NOR द्वार सार्वत्रिक द्वार कहलाते हैं क्योंकि इनका उपयोग करके किसी भी अन्य तर्क द्वार (AND, OR, NOT) को बनाया जा सकता है।
- सत्यता सारणी (Truth Table): एक सारणी जो किसी तर्क द्वार के सभी संभावित इनपुट संयोजनों के लिए उसके संगत आउटपुट को दर्शाती है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
यहाँ अध्याय 17 पर आधारित 10 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न दिए गए हैं:
1. परम शून्य ताप (0 K) पर एक नैज अर्धचालक किस रूप में व्यवहार करता है?
(a) चालक
(b) कुचालक
(c) अतिचालक
(d) अतिचालक और चालक दोनों
2. n-प्रकार के अर्धचालक बनाने के लिए शुद्ध सिलिकॉन में कौन सी अशुद्धि मिलाई जाती है?
(a) बोरॉन (B)
(b) एल्युमीनियम (Al)
(c) फास्फोरस (P)
(d) इंडियम (In)
3. p-n संधि डायोड को अग्र अभिनति में जोड़ने पर क्या होता है?
(a) अवक्षय परत की चौड़ाई बढ़ती है।
(b) अवक्षय परत की चौड़ाई घटती है।
(c) विभव प्राचीर बढ़ता है।
(d) धारा का प्रवाह रुक जाता है।
4. पूर्ण-तरंग दिष्टकारी की अधिकतम दक्षता लगभग कितनी होती है?
(a) 40.6%
(b) 50%
(c) 81.2%
(d) 100%
5. जेनर डायोड का मुख्य उपयोग क्या है?
(a) दिष्टकारी के रूप में
(b) प्रवर्धक के रूप में
(c) वोल्टेज नियामक के रूप में
(d) स्विच के रूप में
6. प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED) बनाने के लिए आमतौर पर किस पदार्थ का उपयोग किया जाता है?
(a) शुद्ध सिलिकॉन
(b) शुद्ध जर्मेनियम
(c) गैलियम आर्सेनाइड (GaAs)
(d) कार्बन
7. ट्रांजिस्टर के किस विन्यास में धारा लाभ, वोल्टेज लाभ और शक्ति लाभ तीनों उच्च होते हैं?
(a) उभयनिष्ठ आधार (CB)
(b) उभयनिष्ठ उत्सर्जक (CE)
(c) उभयनिष्ठ संग्राहक (CC)
(d) उपरोक्त सभी में समान
8. यदि किसी ट्रांजिस्टर का α = 0.98 है, तो उसका β मान क्या होगा?
(a) 49
(b) 98
(c) 0.02
(d) 1.02
9. एक NAND द्वार का आउटपुट '0' कब होता है?
(a) जब सभी इनपुट '0' हों।
(b) जब कोई भी इनपुट '1' हो।
(c) जब सभी इनपुट '1' हों।
(d) जब एक इनपुट '0' और दूसरा '1' हो।
10. निम्नलिखित में से कौन सा एक सार्वत्रिक तर्क द्वार है?
(a) AND द्वार
(b) OR द्वार
(c) NOT द्वार
(d) NOR द्वार
MCQs के उत्तर:
- (b) कुचालक
- (c) फास्फोरस (P)
- (b) अवक्षय परत की चौड़ाई घटती है।
- (c) 81.2%
- (c) वोल्टेज नियामक के रूप में
- (c) गैलियम आर्सेनाइड (GaAs)
- (b) उभयनिष्ठ उत्सर्जक (CE)
- (a) 49 (क्योंकि β = α / (1 - α) = 0.98 / (1 - 0.98) = 0.98 / 0.02 = 49)
- (c) जब सभी इनपुट '1' हों।
- (d) NOR द्वार
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को समझने और अपनी सरकारी परीक्षा की तैयारी में बहुत मदद करेंगे। शुभकामनाएँ!