Class 12 Physics Notes Chapter 3 (विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति) – Bhautiki-II Book

Bhautiki-II
प्रिय विद्यार्थियों, आज हम भौतिकी के अत्यंत महत्वपूर्ण और रोचक अध्याय 'विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। यह अध्याय हमें बताता है कि प्रकाश और पदार्थ दोनों ही कण और तरंग, दोनों रूपों में व्यवहार कर सकते हैं।


अध्याय 3: विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति (Dual Nature of Radiation and Matter)

इस अध्याय में हम प्रकाश के कण स्वरूप और द्रव्य के तरंग स्वरूप का अध्ययन करेंगे।

1. इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन (Electron Emission)

धातु की सतह से इलेक्ट्रॉनों के बाहर निकलने की प्रक्रिया को इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन कहते हैं। इलेक्ट्रॉनों को धातु की सतह से बाहर निकालने के लिए एक निश्चित न्यूनतम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

  • कार्य फलन ($\phi_0$ या W) (Work Function): वह न्यूनतम ऊर्जा जो किसी धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने के लिए आवश्यक होती है, उस धातु का कार्य फलन कहलाती है। यह धातु की प्रकृति और उसकी सतह की स्थिति पर निर्भर करता है। इसका SI मात्रक जूल (J) है, लेकिन व्यवहार में इसे इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) में व्यक्त किया जाता है।

    • 1 eV = $1.602 \times 10^{-19}$ जूल।
  • इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन के प्रकार (Types of Electron Emission):

    1. तापायनिक उत्सर्जन (Thermionic Emission): धातु को गर्म करने पर इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन।
    2. क्षेत्र उत्सर्जन (Field Emission): धातु पर प्रबल विद्युत क्षेत्र (लगभग $10^8$ V/m) लगाने पर इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन।
    3. प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन (Photoelectric Emission): धातु की सतह पर उपयुक्त आवृत्ति का प्रकाश डालने पर इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन।
    4. द्वितीयक उत्सर्जन (Secondary Emission): तीव्र गति वाले इलेक्ट्रॉनों द्वारा धातु की सतह से अन्य इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन।

2. प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photoelectric Effect)

जब उपयुक्त आवृत्ति (या उससे अधिक) का प्रकाश किसी धातु की सतह पर पड़ता है, तो धातु से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होता है। इस परिघटना को प्रकाश-विद्युत प्रभाव कहते हैं, और उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों को प्रकाश-इलेक्ट्रॉन (Photoelectrons) तथा उत्पन्न धारा को प्रकाश-विद्युत धारा (Photoelectric Current) कहते हैं।

  • हर्ट्ज़ का प्रेक्षण (Hertz's Observation, 1887): हर्ट्ज़ ने प्रयोगों के दौरान देखा कि जब पराबैंगनी प्रकाश स्पार्क गैप के इलेक्ट्रोडों पर पड़ता है, तो स्पार्किंग अधिक आसानी से होती है। यह प्रकाश-विद्युत प्रभाव का पहला अवलोकन था।
  • हॉलवाच और लेनार्ड का प्रेक्षण (Hallwachs and Lenard's Observation, 1888-1902):
    • हॉलवाच ने देखा कि जब एक ऋणावेशित जिंक प्लेट पर पराबैंगनी प्रकाश डाला जाता है, तो वह अपना ऋणावेश खो देती है। यदि प्लेट अनावेशित हो, तो वह धनावेशित हो जाती है। यदि प्लेट धनावेशित हो, तो पराबैंगनी प्रकाश का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इससे यह निष्कर्ष निकला कि ऋणावेशित कण (इलेक्ट्रॉन) उत्सर्जित हो रहे हैं।
    • लेनार्ड ने भी इसी तरह के प्रयोग किए और पाया कि उत्सर्जित कण ऋणावेशित होते हैं और उनकी ऊर्जा प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करती है।

3. प्रकाश-विद्युत प्रभाव का प्रायोगिक अध्ययन (Experimental Study of Photoelectric Effect)

एक निर्वातित क्वार्ट्ज नली में उत्सर्जक प्लेट (C) और संग्राहक प्लेट (A) होती हैं। एक मोनोक्रोमैटिक प्रकाश स्रोत से प्रकाश उत्सर्जक प्लेट पर डाला जाता है।

  • प्रकाश-विद्युत धारा पर प्रकाश की तीव्रता का प्रभाव (Effect of Intensity of Light on Photoelectric Current):

    • एक दी गई आवृत्ति और संग्राहक विभव के लिए, प्रकाश-विद्युत धारा आपतित प्रकाश की तीव्रता के सीधे आनुपातिक होती है।
    • इसका अर्थ है कि प्रति सेकंड उत्सर्जित प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों की संख्या आपतित प्रकाश की तीव्रता के आनुपातिक होती है।
  • प्रकाश-विद्युत धारा पर विभव का प्रभाव (Effect of Potential on Photoelectric Current):

    • एक दी गई आवृत्ति और तीव्रता के लिए, संग्राहक प्लेट (A) के विभव को धनात्मक करने पर प्रकाश-विद्युत धारा बढ़ती है और एक निश्चित विभव पर संतृप्त हो जाती है। इसे संतृप्त धारा (Saturation Current) कहते हैं, जब सभी उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन संग्राहक तक पहुँच जाते हैं।
    • जब संग्राहक प्लेट (A) को ऋणात्मक विभव दिया जाता है, तो धारा घटती है। एक निश्चित ऋणात्मक विभव पर प्रकाश-विद्युत धारा शून्य हो जाती है। इस ऋणात्मक विभव को निरोधी विभव (Stopping Potential or Cut-off Potential, $V_0$) कहते हैं।
    • निरोधी विभव वह न्यूनतम ऋणात्मक विभव है जो सबसे अधिक ऊर्जा वाले प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों को भी संग्राहक तक पहुँचने से रोकता है।
    • प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा ($K_{max}$) निरोधी विभव से संबंधित होती है: $K_{max} = eV_0$
  • निरोधी विभव पर आपतित प्रकाश की आवृत्ति का प्रभाव (Effect of Frequency of Incident Radiation on Stopping Potential):

    • एक दी गई तीव्रता के लिए, जैसे-जैसे आपतित प्रकाश की आवृत्ति बढ़ती है, निरोधी विभव का मान भी बढ़ता है।
    • इसका अर्थ है कि उत्सर्जित प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा आपतित प्रकाश की आवृत्ति के साथ बढ़ती है।
    • प्रत्येक धातु के लिए एक निश्चित न्यूनतम आवृत्ति होती है, जिसे देहली आवृत्ति (Threshold Frequency, $\nu_0$) कहते हैं, जिससे कम आवृत्ति के प्रकाश के लिए कोई प्रकाश-इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होता, चाहे प्रकाश की तीव्रता कितनी भी अधिक क्यों न हो।

4. प्रकाश-विद्युत प्रभाव के नियम (Laws of Photoelectric Effect):

  1. किसी दी गई धातु और आपतित प्रकाश की आवृत्ति के लिए, प्रकाश-विद्युत धारा आपतित प्रकाश की तीव्रता के सीधे आनुपातिक होती है।
  2. प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा आपतित प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करती है।
  3. प्रत्येक धातु के लिए एक निश्चित देहली आवृत्ति होती है। यदि आपतित प्रकाश की आवृत्ति देहली आवृत्ति से कम है, तो कोई प्रकाश-इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होगा, चाहे प्रकाश की तीव्रता कितनी भी अधिक क्यों न हो।
  4. प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन एक तात्कालिक प्रक्रिया है। प्रकाश के धातु पर पड़ने और इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जन के बीच कोई समय अंतराल नहीं होता (लगभग $10^{-9}$ सेकंड से भी कम)।

5. प्रकाश-विद्युत प्रभाव की तरंग सिद्धांत द्वारा व्याख्या की विफलता (Failure of Wave Theory to Explain Photoelectric Effect):

प्रकाश के तरंग सिद्धांत के अनुसार:

  • इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर करना चाहिए, आवृत्ति पर नहीं। (गलत)
  • अधिक तीव्रता वाले प्रकाश को अधिक ऊर्जा देनी चाहिए, जिससे इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा बढ़नी चाहिए। (गलत)
  • कम तीव्रता वाले प्रकाश के लिए, इलेक्ट्रॉनों को पर्याप्त ऊर्जा संचित करने में कुछ समय लगना चाहिए, जिससे उत्सर्जन में देरी होनी चाहिए। (गलत)
  • देहली आवृत्ति की अवधारणा को तरंग सिद्धांत समझा नहीं पाता। (गलत)

6. आइंस्टीन का प्रकाश-विद्युत समीकरण (Einstein's Photoelectric Equation, 1905)

आइंस्टीन ने प्लैंक के क्वांटम सिद्धांत का उपयोग करके प्रकाश-विद्युत प्रभाव की सफलतापूर्वक व्याख्या की। उन्होंने प्रस्तावित किया कि प्रकाश ऊर्जा के छोटे पैकेटों या क्वांटा से बना होता है, जिन्हें फोटॉन (Photons) कहते हैं।

  • प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा $E = h\nu$ होती है, जहाँ $h$ प्लैंक नियतांक ($6.626 \times 10^{-34}$ Js) है और $\nu$ प्रकाश की आवृत्ति है।
  • जब एक फोटॉन धातु की सतह पर गिरता है, तो वह अपनी पूरी ऊर्जा एक इलेक्ट्रॉन को दे देता है।
  • इस ऊर्जा का कुछ हिस्सा इलेक्ट्रॉन को धातु से बाहर निकालने (कार्य फलन $\phi_0$) में खर्च होता है, और शेष ऊर्जा उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा ($K_{max}$) के रूप में प्रकट होती है।

ऊर्जा संरक्षण के नियम से:
$h\nu = \phi_0 + K_{max}$
या
$K_{max} = h\nu - \phi_0$

यह आइंस्टीन का प्रकाश-विद्युत समीकरण है।
जहाँ,

  • $h\nu$ = आपतित फोटॉन की ऊर्जा
  • $\phi_0$ = धातु का कार्य फलन
  • $K_{max}$ = उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा

कार्य फलन को देहली आवृत्ति के पदों में भी लिखा जा सकता है: $\phi_0 = h\nu_0$, जहाँ $\nu_0$ देहली आवृत्ति है।
तो, $K_{max} = h\nu - h\nu_0 = h(\nu - \nu_0)$

और क्योंकि $K_{max} = eV_0$, जहाँ $V_0$ निरोधी विभव है,
$eV_0 = h\nu - \phi_0$
$V_0 = \frac{h}{e}\nu - \frac{\phi_0}{e}$

यह समीकरण दर्शाता है कि $V_0$ और $\nu$ के बीच का ग्राफ एक सीधी रेखा होगा।

  • आइंस्टीन द्वारा प्रकाश-विद्युत प्रभाव की व्याख्या (Einstein's Explanation):
    • देहली आवृत्ति: यदि $h\nu < \phi_0$, तो इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं होगी, इसलिए कोई उत्सर्जन नहीं होगा।
    • तीव्रता और धारा: अधिक तीव्रता का अर्थ है अधिक फोटॉन। प्रत्येक फोटॉन एक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करता है, इसलिए अधिक फोटॉन का अर्थ है अधिक उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन और अधिक धारा।
    • आवृत्ति और गतिज ऊर्जा: $K_{max} = h\nu - \phi_0$ से स्पष्ट है कि $K_{max}$ आपतित प्रकाश की आवृत्ति के साथ रैखिक रूप से बढ़ता है।
    • तात्कालिक प्रक्रिया: फोटॉन-इलेक्ट्रॉन टक्कर एक तात्कालिक प्रक्रिया है, इसलिए कोई समय अंतराल नहीं होता।

7. फोटॉन के गुण (Properties of Photons):

  1. प्रकाश ऊर्जा के क्वांटा या पैकेटों से बना होता है, जिन्हें फोटॉन कहते हैं।
  2. प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा $E = h\nu = hc/\lambda$ होती है, जहाँ $c$ प्रकाश की चाल है।
  3. फोटॉन का संवेग $p = E/c = h\nu/c = h/\lambda$ होता है।
  4. फोटॉन विद्युत उदासीन होते हैं और विद्युत या चुंबकीय क्षेत्रों से विक्षेपित नहीं होते।
  5. फोटॉन का विराम द्रव्यमान (Rest mass) शून्य होता है।
  6. फोटॉन प्रकाश की चाल ($c$) से चलते हैं।
  7. फोटॉन-कण टक्कर में कुल ऊर्जा और कुल संवेग संरक्षित रहते हैं। हालाँकि, फोटॉनों की संख्या संरक्षित नहीं रह सकती क्योंकि फोटॉन अवशोषित या उत्पन्न हो सकते हैं।

8. द्रव्य की द्वैत प्रकृति (Dual Nature of Matter)

डी-ब्रॉगली ने 1924 में प्रस्तावित किया कि जिस प्रकार प्रकाश द्वैत प्रकृति (कण और तरंग) प्रदर्शित करता है, उसी प्रकार द्रव्य कण (जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, परमाणु) भी तरंग प्रकृति प्रदर्शित करते हैं। इसे द्रव्य तरंगें (Matter Waves) या डी-ब्रॉगली तरंगें (De Broglie Waves) कहते हैं।

  • डी-ब्रॉगली परिकल्पना (De Broglie Hypothesis): एक कण जिसका संवेग $p$ है, उससे जुड़ी तरंगदैर्घ्य $\lambda$ होती है:
    $\lambda = h/p = h/mv$
    जहाँ $h$ प्लैंक नियतांक है, $m$ कण का द्रव्यमान है, और $v$ कण का वेग है।

  • इलेक्ट्रॉन का डी-ब्रॉगली तरंगदैर्घ्य (De Broglie Wavelength of an Electron):
    यदि एक इलेक्ट्रॉन को $V$ वोल्ट के विभवांतर से त्वरित किया जाता है, तो उसकी गतिज ऊर्जा $K = eV$ होगी।
    हम जानते हैं कि $K = \frac{1}{2}mv^2 = \frac{p^2}{2m}$
    तो, $p = \sqrt{2mK} = \sqrt{2meV}$
    अतः, इलेक्ट्रॉन का डी-ब्रॉगली तरंगदैर्घ्य:
    $\lambda = \frac{h}{\sqrt{2meV}}$
    मान रखने पर ($h = 6.626 \times 10^{-34}$ Js, $m_e = 9.1 \times 10^{-31}$ kg, $e = 1.6 \times 10^{-19}$ C):
    $\lambda = \frac{12.27}{\sqrt{V}}$ Å (एंगस्ट्रॉम)

9. डेविसन-जर्मर प्रयोग (Davisson-Germer Experiment, 1927)

यह प्रयोग डी-ब्रॉगली की परिकल्पना की प्रायोगिक पुष्टि थी। डेविसन और जर्मर ने दिखाया कि इलेक्ट्रॉनों का विवर्तन (Diffraction) होता है, जो उनकी तरंग प्रकृति को सिद्ध करता है।

  • प्रायोगिक व्यवस्था (Experimental Arrangement):

    • एक इलेक्ट्रॉन गन (फिलामेंट और एनोड) से इलेक्ट्रॉनों का एक बीम उत्पन्न किया जाता है और एक निश्चित विभव से त्वरित किया जाता है।
    • यह इलेक्ट्रॉन बीम एक निकेल क्रिस्टल पर आपतित होता है।
    • एक संसूचक (Detector) का उपयोग विभिन्न कोणों पर प्रकीर्णित इलेक्ट्रॉनों की तीव्रता को मापने के लिए किया जाता है।
  • प्रेक्षण (Observation):

    • उन्होंने पाया कि विभिन्न त्वरक विभवों और प्रकीर्णन कोणों के लिए, प्रकीर्णित इलेक्ट्रॉनों की तीव्रता में भिन्नता आती है।
    • विशेष रूप से, 54 V के त्वरक विभव पर, $\theta = 50^\circ$ के प्रकीर्णन कोण पर इलेक्ट्रॉनों की तीव्रता में एक स्पष्ट अधिकतम (peak) पाया गया।
  • निष्कर्ष (Conclusion):

    • यह तीव्रता में अधिकतम इलेक्ट्रॉनों के रचनात्मक व्यतिकरण (constructive interference) के कारण था, ठीक वैसे ही जैसे X-किरणों के विवर्तन में होता है।
    • ब्रैग के नियम ($2d \sin\theta = n\lambda$) का उपयोग करके, निकेल क्रिस्टल के लिए $d = 0.91$ Å और $\phi = 50^\circ$ पर, उन्होंने इलेक्ट्रॉन तरंगदैर्घ्य $\lambda = 1.65$ Å प्राप्त किया।
    • डी-ब्रॉगली समीकरण से 54 V के लिए इलेक्ट्रॉन का तरंगदैर्घ्य $\lambda = \frac{12.27}{\sqrt{54}} \approx 1.67$ Å प्राप्त होता है।
    • चूंकि प्रायोगिक और सैद्धांतिक मान बहुत करीब थे, इसने इलेक्ट्रॉनों की तरंग प्रकृति की पुष्टि की।

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs)

  1. किसी धातु का कार्य फलन क्या दर्शाता है?
    a) इलेक्ट्रॉन को धातु की सतह से बाहर निकालने के लिए आवश्यक अधिकतम ऊर्जा।
    b) इलेक्ट्रॉन को धातु की सतह से बाहर निकालने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा।
    c) धातु में इलेक्ट्रॉन की औसत गतिज ऊर्जा।
    d) धातु में इलेक्ट्रॉन की स्थितिज ऊर्जा।

  2. प्रकाश-विद्युत प्रभाव में, उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा किस पर निर्भर करती है?
    a) आपतित प्रकाश की तीव्रता पर।
    b) आपतित प्रकाश की आवृत्ति पर।
    c) प्रकाश स्रोत से धातु की दूरी पर।
    d) उत्सर्जक धातु के क्षेत्रफल पर।

  3. निरोधी विभव ($V_0$) और आपतित प्रकाश की आवृत्ति ($\nu$) के बीच का ग्राफ कैसा होता है?
    a) परवलयिक।
    b) अतिपरवलयिक।
    c) सीधी रेखा।
    d) वृत्ताकार।

  4. यदि आपतित प्रकाश की आवृत्ति देहली आवृत्ति से कम है, तो:
    a) प्रकाश-विद्युत धारा बढ़ जाएगी।
    b) प्रकाश-इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होंगे लेकिन उनकी गतिज ऊर्जा कम होगी।
    c) कोई प्रकाश-इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होगा, चाहे तीव्रता कितनी भी अधिक हो।
    d) निरोधी विभव बढ़ जाएगा।

  5. आइंस्टीन के प्रकाश-विद्युत समीकरण के अनुसार, $K_{max} = h\nu - \phi_0$ में $\phi_0$ क्या है?
    a) फोटॉन की ऊर्जा।
    b) इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा।
    c) धातु का कार्य फलन।
    d) निरोधी विभव।

  6. फोटॉन का विराम द्रव्यमान कितना होता है?
    a) प्रकाश के वेग पर निर्भर करता है।
    b) इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान के बराबर।
    c) शून्य।
    d) अनंत।

  7. डी-ब्रॉगली तरंगदैर्घ्य का सूत्र क्या है?
    a) $\lambda = h/m$
    b) $\lambda = h/p$
    c) $\lambda = p/h$
    d) $\lambda = mv/h$

  8. एक इलेक्ट्रॉन को $V$ वोल्ट के विभवांतर से त्वरित करने पर उसका डी-ब्रॉगली तरंगदैर्घ्य किसके आनुपातिक होता है?
    a) $V$
    b) $\sqrt{V}$
    c) $1/V$
    d) $1/\sqrt{V}$

  9. डेविसन-जर्मर प्रयोग ने किसकी पुष्टि की?
    a) प्रकाश की कण प्रकृति की।
    b) प्रकाश की तरंग प्रकृति की।
    c) इलेक्ट्रॉनों की तरंग प्रकृति की।
    d) इलेक्ट्रॉनों की कण प्रकृति की।

  10. यदि किसी धातु का कार्य फलन $2.5$ eV है, तो उसकी देहली आवृत्ति लगभग कितनी होगी? ($h = 6.6 \times 10^{-34}$ Js, $1$ eV $= 1.6 \times 10^{-19}$ J)
    a) $6.0 \times 10^{14}$ Hz
    b) $4.0 \times 10^{14}$ Hz
    c) $2.5 \times 10^{15}$ Hz
    d) $1.0 \times 10^{15}$ Hz


उत्तरमाला (Answer Key):

  1. b) इलेक्ट्रॉन को धातु की सतह से बाहर निकालने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा।
  2. b) आपतित प्रकाश की आवृत्ति पर।
  3. c) सीधी रेखा।
  4. c) कोई प्रकाश-इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होगा, चाहे तीव्रता कितनी भी अधिक हो।
  5. c) धातु का कार्य फलन।
  6. c) शून्य।
  7. b) $\lambda = h/p$
  8. d) $1/\sqrt{V}$
  9. c) इलेक्ट्रॉनों की तरंग प्रकृति की।
  10. a) $6.0 \times 10^{14}$ Hz
    (हल: $\phi_0 = h\nu_0 \implies \nu_0 = \phi_0/h = (2.5 \times 1.6 \times 10^{-19}) / (6.6 \times 10^{-34}) \approx 6.06 \times 10^{14}$ Hz)

मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी तैयारी में सहायक होंगे। इस अध्याय के प्रत्येक बिंदु को गहराई से समझने का प्रयास करें। शुभकामनाएँ!

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