Class 12 Physics Notes Chapter 7 (संचार व्यवस्था) – Bhautiki-II Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम भौतिकी के एक अत्यंत महत्वपूर्ण और समकालीन अध्याय, 'संचार व्यवस्था' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय न केवल आपकी बोर्ड परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर सरकारी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से भी अत्यधिक प्रासंगिक है। इस अध्याय को गहराई से समझने से आपको आधुनिक तकनीक के मूलभूत सिद्धांतों की स्पष्ट जानकारी मिलेगी।
अध्याय 7: संचार व्यवस्था (Communication Systems)
1. संचार व्यवस्था के मूल अवयव (Basic Elements of Communication System)
किसी भी संचार व्यवस्था के मुख्य रूप से तीन मूल अवयव होते हैं:
- प्रेषित्र (Transmitter): यह सूचना स्रोत से संदेश सिग्नल को प्राप्त करता है, उसे संचार माध्यम में भेजने के लिए उपयुक्त रूप में परिवर्तित करता है (जैसे मॉडुलन), और फिर उसे संचार चैनल में प्रेषित करता है। इसमें ट्रांसड्यूसर, मॉडुलक, प्रवर्धित्र और एंटीना शामिल हो सकते हैं।
- संचार चैनल (Communication Channel): यह वह भौतिक माध्यम है जिसके द्वारा प्रेषित्र से अभिग्राही तक सिग्नल यात्रा करता है। यह तार (जैसे समाक्षीय केबल), मुक्त आकाश (रेडियो तरंगें), ऑप्टिकल फाइबर आदि हो सकता है।
- अभिग्राही (Receiver): यह संचार चैनल से प्रेषित सिग्नल को प्राप्त करता है, उसमें से रव (noise) को हटाता है, उसे प्रवर्धित करता है, और फिर उसे मूल संदेश सिग्नल में परिवर्तित करता है (विमॉडुलन) ताकि उपयोगकर्ता उसे समझ सके। इसमें एंटीना, प्रवर्धित्र, विमॉडुलक और ट्रांसड्यूसर शामिल हो सकते हैं।
2. संचार के मूलभूत पद (Basic Terminology in Communication)
- संदेश सिग्नल (Message Signal) / सूचना (Information): यह वह विद्युत सिग्नल है जिसमें संचारित की जाने वाली जानकारी (जैसे आवाज, संगीत, चित्र, डेटा) होती है। इसे आधार बैंड सिग्नल (Baseband Signal) भी कहते हैं।
- ट्रांसड्यूसर (Transducer): यह ऊर्जा के एक रूप को दूसरे रूप में परिवर्तित करता है। उदाहरण के लिए, माइक्रोफोन ध्वनि ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है, और लाउडस्पीकर विद्युत ऊर्जा को ध्वनि ऊर्जा में बदलता है।
- रव (Noise): यह अवांछित सिग्नल होता है जो संचार प्रक्रिया में व्यवधान उत्पन्न करता है और संदेश सिग्नल की गुणवत्ता को कम करता है। यह बाहरी स्रोतों (वायुमंडलीय रव) या संचार उपकरण के अंदर (तापीय रव) उत्पन्न हो सकता है।
- क्षीणन (Attenuation): संचार माध्यम से गुजरते समय सिग्नल की शक्ति में होने वाली कमी को क्षीणन कहते हैं। यह दूरी बढ़ने के साथ बढ़ता है और माध्यम के गुणों पर निर्भर करता है।
- प्रवर्धित्र (Amplifier): यह एक इलेक्ट्रॉनिक परिपथ है जो सिग्नल की शक्ति (आयाम) को बढ़ाता है ताकि क्षीणन के प्रभाव को कम किया जा सके और सिग्नल की ताकत को बनाए रखा जा सके।
- परास (Range): यह प्रेषित्र से अभिग्राही तक की वह अधिकतम दूरी है जहाँ तक सिग्नल को संतोषजनक रूप से प्राप्त किया जा सकता है।
- बैंड-चौड़ाई (Bandwidth): यह आवृत्तियों की वह परास है जिस पर एक सिग्नल प्रभावी रूप से संचारित होता है या एक संचार माध्यम प्रभावी रूप से कार्य करता है। इसे उच्चतम और निम्नतम आवृत्ति के अंतर के रूप में परिभाषित किया जाता है।
- मॉडुलन (Modulation): यह निम्न आवृत्ति वाले संदेश सिग्नल (सूचना सिग्नल) को उच्च आवृत्ति वाले वाहक तरंग (carrier wave) के किसी एक प्राचल (आयाम, आवृत्ति या कला) के साथ अध्यारोपित करने की प्रक्रिया है ताकि सूचना को लंबी दूरी तक प्रेषित किया जा सके।
- विमॉडुलन (Demodulation): यह मॉडुलित वाहक तरंग से मूल संदेश सिग्नल को पुनः प्राप्त करने की प्रक्रिया है। इसे संसूचन (detection) भी कहते हैं।
- पुनरावर्तक (Repeater): यह प्रेषित्र और अभिग्राही के बीच स्थित एक उपकरण है जो आने वाले सिग्नल को प्राप्त करता है, उसे प्रवर्धित करता है, और फिर उसे पुनः प्रेषित करता है। यह क्षीणन के प्रभाव को कम करके संचार की परास बढ़ाता है। यह डिजिटल सिग्नलों के लिए सिग्नल को पुनर्निर्मित (reconstruct) भी करता है।
3. सिग्नल की बैंड-चौड़ाई (Bandwidth of Signals)
विभिन्न प्रकार के संदेश सिग्नलों को संचारित करने के लिए अलग-अलग बैंड-चौड़ाई की आवश्यकता होती है:
- ध्वनि सिग्नल (Speech Signals): मानव आवाज की आवृत्ति परास लगभग 300 Hz से 3100 Hz होती है। अतः, ध्वनि संचार के लिए आवश्यक बैंड-चौड़ाई लगभग 2800 Hz (3100 Hz - 300 Hz) होती है।
- संगीत (Music): संगीत के लिए 20 kHz तक की बैंड-चौड़ाई की आवश्यकता हो सकती है।
- वीडियो सिग्नल (Video Signals): वीडियो सिग्नल में चित्र की जानकारी होती है और इसके लिए लगभग 4.2 MHz की बैंड-चौड़ाई की आवश्यकता होती है।
- टेलीविजन (TV) सिग्नल: टीवी सिग्नल में ध्वनि (0.02 MHz) और वीडियो (4.2 MHz) दोनों होते हैं, इसलिए इसके लिए लगभग 6 MHz की बैंड-चौड़ाई की आवश्यकता होती है।
4. संचार माध्यम की बैंड-चौड़ाई (Bandwidth of Transmission Medium)
विभिन्न संचार माध्यमों की अपनी-अपनी बैंड-चौड़ाई होती है:
- तार (Wires) / समाक्षीय केबल (Coaxial Cables): इनकी बैंड-चौड़ाई कुछ kHz से लेकर कुछ MHz तक हो सकती है (उदाहरण: समाक्षीय केबल 750 MHz तक)।
- मुक्त आकाश (Free Space): रेडियो तरंगों के लिए मुक्त आकाश का उपयोग किया जाता है, और इसकी बैंड-चौड़ाई GHz (गीगाहर्ट्ज़) की परास में होती है (कुछ 100 kHz से कुछ GHz तक)।
- ऑप्टिकल फाइबर (Optical Fibers): ये प्रकाश तरंगों का उपयोग करते हैं और इनकी बैंड-चौड़ाई THz (टेराहर्ट्ज़) की परास में होती है, जो बहुत अधिक डेटा दर की अनुमति देती है।
5. विद्युतचुंबकीय तरंगों का संचरण (Propagation of Electromagnetic Waves)
प्रेषित्र से अभिग्राही तक विद्युतचुंबकीय तरंगों के संचरण के मुख्य तीन तरीके हैं:
- भू-तरंग संचरण (Ground Wave Propagation):
- इस विधि में रेडियो तरंगें पृथ्वी की सतह के अनुदिश संचरित होती हैं और पृथ्वी की वक्रता का अनुसरण करती हैं।
- आवृत्ति परास: सामान्यतः कुछ kHz से 2 MHz तक।
- तरंगें पृथ्वी की सतह पर धाराएँ प्रेरित करती हैं जिससे उनकी ऊर्जा क्षीण होती है। क्षीणन आवृत्ति बढ़ने के साथ तेजी से बढ़ता है।
- यह विधि उच्च आवृत्तियों के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि उच्च आवृत्तियों पर क्षीणन बहुत अधिक होता है। लंबी दूरी के AM रेडियो प्रसारण (विशेषकर मीडियम वेव) के लिए उपयोग किया जाता है।
- आकाश तरंग संचरण (Sky Wave Propagation):
- इस विधि में रेडियो तरंगें (आवृत्ति परास: 2 MHz से 30 MHz तक) आयनमंडल (Ionosphere) से परावर्तित होकर पृथ्वी पर वापस आती हैं।
- आयनमंडल: पृथ्वी की सतह से लगभग 60 km से 400 km ऊपर वायुमंडल का एक भाग है जिसमें मुक्त इलेक्ट्रॉन और आयन होते हैं। यह सूर्य के पराबैंगनी विकिरण द्वारा बनता है और इसकी आयनीकरण की डिग्री दिन-रात और मौसम के साथ बदलती रहती है।
- आयनमंडल एक परावर्तक के रूप में कार्य करता है, जिससे तरंगें पृथ्वी की वक्रता के पार लंबी दूरी तक यात्रा कर सकती हैं।
- क्रांतिक आवृत्ति (Critical Frequency, $f_c$): यह वह अधिकतम आवृत्ति है जिस पर एक रेडियो तरंग आयनमंडल से लंबवत रूप से परावर्तित हो सकती है और पृथ्वी पर वापस आ सकती है। इससे अधिक आवृत्ति की तरंगें आयनमंडल को भेदकर अंतरिक्ष में चली जाती हैं। $f_c = 9 \sqrt{N_{max}}$, जहाँ $N_{max}$ आयनमंडल में अधिकतम इलेक्ट्रॉन घनत्व है।
- यह विधि शॉर्ट-वेव रेडियो प्रसारण के लिए उपयोग की जाती है।
- व्योम तरंग संचरण (Space Wave Propagation):
- इस विधि में रेडियो तरंगें (आवृत्ति परास: 30 MHz से अधिक, जैसे VHF (Very High Frequency), UHF (Ultra High Frequency), माइक्रोवेव) सीधी रेखा (Line of Sight - LOS) में संचरित होती हैं।
- ये तरंगें आयनमंडल को भेदकर निकल जाती हैं और पृथ्वी की वक्रता का अनुसरण नहीं करतीं।
- प्रेषित्र और अभिग्राही एंटीना दोनों को पर्याप्त ऊँचाई पर स्थापित किया जाना चाहिए ताकि वे एक-दूसरे की सीधी दृष्टि में हों।
- इसका उपयोग टेलीविजन प्रसारण, माइक्रोवेव लिंक, उपग्रह संचार और मोबाइल संचार में किया जाता है।
- LOS संचार की अधिकतम दूरी ($d_M$): यदि प्रेषक एंटीना की ऊँचाई $h_T$ और अभिग्राही एंटीना की ऊँचाई $h_R$ है, तथा पृथ्वी की त्रिज्या $R$ है, तो अधिकतम LOS दूरी निम्न सूत्र द्वारा दी जाती है:
$d = \sqrt{2Rh_T} + \sqrt{2Rh_R}$
यदि केवल एक एंटीना (जैसे टीवी प्रसारण एंटीना) की अधिकतम परास ज्ञात करनी हो, तो अभिग्राही एंटीना की ऊँचाई शून्य मानी जा सकती है, उस स्थिति में:
$d_M = \sqrt{2Rh_T}$
जहाँ $R$ पृथ्वी की त्रिज्या (लगभग $6.4 \times 10^6$ m या 6400 km) है।
6. मॉडुलन और उसकी आवश्यकता (Modulation and its Necessity)
निम्न आवृत्ति वाले संदेश सिग्नलों को सीधे लंबी दूरी तक प्रेषित करना संभव नहीं होता। इसके लिए मॉडुलन की आवश्यकता होती है।
मॉडुलन की आवश्यकता:
- एंटीना के आकार को कम करना: प्रभावी विकिरण के लिए एंटीना की लंबाई तरंगदैर्ध्य ($\lambda$) के कम से कम $\lambda/4$ होनी चाहिए। यदि हम 20 kHz के ऑडियो सिग्नल को सीधे प्रेषित करें, तो $\lambda = c/f = (3 \times 10^8 \text{ m/s})/(20 \times 10^3 \text{ Hz}) = 15 \times 10^3$ m। तो एंटीना की लंबाई $15000/4 = 3750$ m होगी, जो अव्यावहारिक है। उच्च आवृत्ति वाहक तरंग का उपयोग करके तरंगदैर्ध्य कम हो जाती है, जिससे एंटीना का आकार (कुछ मीटर) व्यावहारिक हो जाता है।
- प्रभावी शक्ति विकिरण: निम्न आवृत्ति वाले सिग्नल कम शक्ति का विकिरण करते हैं। उच्च आवृत्ति वाहक तरंगों के साथ मॉडुलन से प्रभावी शक्ति विकिरण संभव होता है।
- विभिन्न सिग्नलों का मिश्रण रोकना: यदि सभी संदेश सिग्नल एक ही आवृत्ति परास में प्रेषित किए जाएँ, तो वे आपस में मिल जाएँगे और उन्हें अलग करना असंभव होगा। मॉडुलन द्वारा प्रत्येक संदेश सिग्नल को एक अलग उच्च आवृत्ति वाहक तरंग पर अध्यारोपित किया जाता है, जिससे विभिन्न चैनलों पर एक साथ प्रसारण संभव होता है (फ्रीक्वेंसी मल्टीप्लेक्सिंग)।
- संचार परास बढ़ाना: मॉडुलित सिग्नल की शक्ति अधिक होती है और वह क्षीणन के बावजूद लंबी दूरी तक यात्रा कर सकता है।
मॉडुलन के प्रकार (Types of Modulation):
मुख्यतः तीन प्रकार के मॉडुलन होते हैं:
- आयाम मॉडुलन (Amplitude Modulation - AM):
- इसमें वाहक तरंग का आयाम संदेश सिग्नल के तात्क्षणिक आयाम के अनुसार परिवर्तित होता है, जबकि वाहक आवृत्ति और कला स्थिर रहती है।
- मॉडुलन सूचकांक ($m_a$): यह मॉडुलन की गहराई को दर्शाता है।
$m_a = A_m / A_c$
जहाँ $A_m$ संदेश सिग्नल का आयाम और $A_c$ वाहक तरंग का आयाम है।
$0 \le m_a \le 1$ (या 0% से 100%)। अति-मॉडुलन ($m_a > 1$) से विरूपण होता है और सूचना का नुकसान होता है। - AM तरंग में तीन आवृत्तियाँ होती हैं: वाहक आवृत्ति ($f_c$), ऊपरी पार्श्व बैंड आवृत्ति ($f_c + f_m$), और निचली पार्श्व बैंड आवृत्ति ($f_c - f_m$)।
- AM तरंग की बैंड-चौड़ाई = $2f_m$ (जहाँ $f_m$ संदेश सिग्नल की अधिकतम आवृत्ति है)।
- AM का उपयोग रेडियो प्रसारण में होता है।
- आवृत्ति मॉडुलन (Frequency Modulation - FM):
- इसमें वाहक तरंग की आवृत्ति संदेश सिग्नल के तात्क्षणिक आयाम के अनुसार परिवर्तित होती है, जबकि वाहक आयाम और कला स्थिर रहती है।
- आवृत्ति विचलन ($\Delta f$): वाहक आवृत्ति में अधिकतम परिवर्तन।
- मॉडुलन सूचकांक ($m_f$): $m_f = \Delta f / f_m$
- FM सिग्नल रव के प्रति अधिक प्रतिरोधी होता है और उच्च गुणवत्ता वाला ऑडियो प्रदान करता है।
- FM तरंग की बैंड-चौड़ाई = $2(\Delta f + f_m)$ (कार्सन का नियम, लगभग)।
- FM का उपयोग उच्च गुणवत्ता वाले रेडियो प्रसारण और टीवी ध्वनि में होता है।
- कला मॉडुलन (Phase Modulation - PM):
- इसमें वाहक तरंग की कला संदेश सिग्नल के तात्क्षणिक आयाम के अनुसार परिवर्तित होती है, जबकि वाहक आयाम और आवृत्ति स्थिर रहती है।
- FM और PM एक-दूसरे से निकटता से संबंधित हैं क्योंकि आवृत्ति कला के परिवर्तन की दर है।
7. मॉडुलक और विमॉडुलक (Modulator and Demodulator)
- AM मॉडुलक: यह एक परिपथ है जो वाहक तरंग के आयाम को संदेश सिग्नल के अनुसार बदलता है। एक साधारण गुणा करने वाला परिपथ या वर्ग नियम मॉडुलक इसका उदाहरण है।
- AM विमॉडुलक (या संसूचक): यह मॉडुलित AM तरंग से मूल संदेश सिग्नल को पुनः प्राप्त करता है। एक साधारण लिफाफा संसूचक (envelope detector) में एक डायोड और एक RC फिल्टर होता है। डायोड मॉडुलित सिग्नल को दिष्टकृत करता है और RC फिल्टर वाहक आवृत्ति को हटाकर संदेश सिग्नल के लिफाफे का पता लगाता है।
- FM मॉडुलक: यह वाहक तरंग की आवृत्ति को संदेश सिग्नल के अनुसार बदलता है।
- FM विमॉडुलक (या संसूचक): यह मॉडुलित FM तरंग से मूल संदेश सिग्नल को पुनः प्राप्त करता है। इसमें आवृत्ति संसूचक या फेज लॉक लूप (PLL) का उपयोग किया जाता है।
8. डिजिटल संचार (Digital Communication)
- एनालॉग सिग्नल (Analog Signal): यह समय के साथ लगातार बदलता रहता है और मानों की एक सतत परास ले सकता है (जैसे ध्वनि तरंग)।
- डिजिटल सिग्नल (Digital Signal): यह केवल दो असतत मान (जैसे 0 और 1) लेता है, जिन्हें बाइनरी अंक कहा जाता है।
- डिजिटल संचार के लाभ:
- रव के प्रति अधिक प्रतिरोधी: डिजिटल सिग्नल रव से कम प्रभावित होते हैं क्योंकि उन्हें केवल दो स्तरों (0 या 1) को पहचानना होता है।
- सिग्नल की गुणवत्ता में कम गिरावट: लंबी दूरी के संचार में पुनरावर्तक डिजिटल सिग्नल को प्रवर्धित करने के बजाय पुनर्निर्मित (regenerate) कर सकते हैं, जिससे गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आती।
- अधिक सुरक्षित और एन्क्रिप्शन में आसान: डिजिटल डेटा को एन्क्रिप्ट करना और डिक्रिप्ट करना आसान होता है, जिससे सुरक्षा बढ़ती है।
- कंप्यूटर के साथ संगत: कंप्यूटर और अन्य डिजिटल उपकरणों के साथ सीधे इंटरफेस कर सकते हैं।
- मल्टीप्लेक्सिंग में आसान: टाइम डिवीजन मल्टीप्लेक्सिंग (TDM) का उपयोग करके कई डिजिटल सिग्नलों को एक साथ प्रेषित किया जा सकता है।
- पल्स कोड मॉडुलन (Pulse Code Modulation - PCM): यह सबसे आम डिजिटल मॉडुलन तकनीक है जो एनालॉग सिग्नल को डिजिटल सिग्नल में परिवर्तित करती है। PCM में तीन मुख्य चरण होते हैं:
- सैंपलिंग (Sampling): एनालॉग सिग्नल को नियमित समय अंतरालों पर मापा जाता है (नमूना लिया जाता है)। नाइक्विस्ट प्रमेय के अनुसार, सैंपलिंग आवृत्ति ($f_s$) संदेश सिग्नल की अधिकतम आवृत्ति ($f_m$) के कम से कम दोगुनी होनी चाहिए ($f_s \ge 2f_m$)।
- क्वांटाइजेशन (Quantization): प्रत्येक नमूने के आयाम को निकटतम पूर्व-निर्धारित असतत स्तर पर पूर्णांकित किया जाता है। यह प्रक्रिया सिग्नल में कुछ त्रुटि (क्वांटाइजेशन रव) उत्पन्न करती है।
- इनकोडिंग (Encoding): प्रत्येक क्वांटाइज्ड नमूना मान को बाइनरी कोड (0 और 1 के अनुक्रम) में परिवर्तित किया जाता है।
9. संचार व्यवस्था के अनुप्रयोग (Applications of Communication Systems)
- रेडियो प्रसारण (Radio Broadcasting): AM और FM रेडियो।
- टेलीविजन प्रसारण (Television Broadcasting): वीडियो और ऑडियो सिग्नल का प्रसारण।
- टेलीफोनी (Telephony): वायर्ड (लैंडलाइन) और वायरलेस (मोबाइल) फोन संचार।
- फैक्स (FAX): दस्तावेजों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रेषित करना।
- ईमेल (Email): इंटरनेट के माध्यम से संदेश भेजना।
- इंटरनेट (Internet): विश्वव्यापी कंप्यूटर नेटवर्क जो डेटा, सूचना और संसाधनों को साझा करने की अनुमति देता है।
- मोबाइल संचार (Mobile Communication): सेलुलर फोन नेटवर्क (2G, 3G, 4G, 5G)।
- उपग्रह संचार (Satellite Communication): भू-स्थिर उपग्रहों का उपयोग करके लंबी दूरी का संचार (टीवी, टेलीफोन, इंटरनेट)।
- ऑप्टिकल फाइबर संचार (Optical Fiber Communication): प्रकाश तरंगों का उपयोग करके उच्च गति और उच्च बैंड-चौड़ाई वाला डेटा संचरण।
- GPS (Global Positioning System): उपग्रहों का उपयोग करके स्थान और समय की जानकारी प्रदान करना।
10. कुछ अन्य महत्वपूर्ण अवधारणाएँ/परिभाषाएँ
- ट्रांसपोंडर (Transponder): उपग्रहों में उपयोग किया जाने वाला एक उपकरण जो पृथ्वी से भेजे गए सिग्नल को प्राप्त करता है, उसे प्रवर्धित करता है, उसकी आवृत्ति बदलता है (ताकि प्रेषित और अभिग्रहित सिग्नल आपस में हस्तक्षेप न करें) और फिर उसे वापस पृथ्वी पर प्रेषित करता है।
- सिग्नल-से-रव अनुपात (Signal-to-Noise Ratio - SNR): यह सिग्नल शक्ति और रव शक्ति का अनुपात होता है। उच्च SNR बेहतर संचार गुणवत्ता का संकेत देता है।
- आधार बैंड (Baseband): संदेश सिग्नल की मूल आवृत्ति परास।
- वाहक तरंग (Carrier Wave): एक उच्च आवृत्ति वाली तरंग जिसका उपयोग संदेश सिग्नल को लंबी दूरी तक ले जाने के लिए किया जाता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs)
निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के लिए सही विकल्प का चयन करें:
-
एक संचार व्यवस्था के मूल अवयव हैं:
(a) प्रेषित्र, चैनल, अभिग्राही
(b) मॉडुलक, विमॉडुलक, प्रवर्धित्र
(c) एंटीना, रव, क्षीणन
(d) ट्रांसड्यूसर, पुनरावर्तक, वाहक तरंग -
मानव आवाज (speech) के लिए आवश्यक बैंड-चौड़ाई लगभग कितनी होती है?
(a) 20 Hz
(b) 2.8 kHz
(c) 4.2 MHz
(d) 6 MHz -
विद्युतचुंबकीय तरंगों के किस संचरण प्रकार में तरंगें आयनमंडल से परावर्तित होती हैं?
(a) भू-तरंग संचरण
(b) आकाश तरंग संचरण
(c) व्योम तरंग संचरण
(d) ऑप्टिकल फाइबर संचार -
यदि प्रेषक एंटीना की ऊँचाई $h_T$ है और पृथ्वी की त्रिज्या $R$ है, तो व्योम तरंग संचार में एक एंटीना द्वारा अधिकतम परास ($d_M$) का सूत्र क्या है?
(a) $d_M = \sqrt{2Rh_T}$
(b) $d_M = 2Rh_T$
(c) $d_M = \sqrt{R/2h_T}$
(d) $d_M = \sqrt{h_T/2R}$ -
मॉडुलन की आवश्यकता क्यों होती है?
(a) एंटीना के आकार को बढ़ाने के लिए
(b) सिग्नल के क्षीणन को बढ़ाने के लिए
(c) विभिन्न सिग्नलों के मिश्रण को रोकने के लिए
(d) केवल संचार परास को कम करने के लिए -
आयाम मॉडुलन (AM) में, मॉडुलन सूचकांक $m_a$ का मान क्या होना चाहिए ताकि विरूपण से बचा जा सके?
(a) $m_a > 1$
(b) $m_a < 0$
(c) $0 \le m_a \le 1$
(d) $m_a = \infty$ -
एक आयाम मॉडुलित (AM) तरंग की बैंड-चौड़ाई क्या होती है, यदि संदेश सिग्नल की अधिकतम आवृत्ति $f_m$ है?
(a) $f_m$
(b) $2f_m$
(c) $f_c + f_m$
(d) $f_c - f_m$ -
पल्स कोड मॉडुलन (PCM) में एनालॉग सिग्नल को डिजिटल सिग्नल में परिवर्तित करने के मुख्य चरण क्या हैं?
(a) मॉडुलन, संसूचन, प्रवर्धन
(b) सैंपलिंग, क्वांटाइजेशन, इनकोडिंग
(c) आवृत्ति विचलन, कला परिवर्तन, आयाम परिवर्तन
(d) क्षीणन, रव, परास -
उपग्रह संचार में किस प्रकार की तरंग संचरण विधि का उपयोग किया जाता है?
(a) भू-तरंग संचरण
(b) आकाश तरंग संचरण
(c) व्योम तरंग संचरण
(d) ऑप्टिकल फाइबर संचार -
प्रभावी शक्ति विकिरण के लिए एंटीना का आकार तरंगदैर्ध्य ($\lambda$) के किस अनुपात में होना चाहिए?
(a) $\lambda/2$
(b) $\lambda/4$
(c) $\lambda$
(d) $2\lambda$
MCQ उत्तर:
- (a)
- (b)
- (b)
- (a)
- (c)
- (c)
- (b)
- (b)
- (c)
- (b)