Class 12 Political Science Notes Chapter 3 (नियोजित विकास की राजनीति) – Samkalin Vishwa Rajniti Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम कक्षा 12 की राजनीति विज्ञान की पुस्तक 'समकालीन विश्व राजनीति' के अध्याय 3 'नियोजित विकास की राजनीति' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय स्वतंत्र भारत के शुरुआती दौर में विकास के विभिन्न दृष्टिकोणों, नीतियों और उनके परिणामों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर उन छात्रों के लिए जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।
अध्याय 3: नियोजित विकास की राजनीति
1. परिचय: विकास की धारणाएँ
- स्वतंत्रता के बाद की चुनौती: भारत को गरीबी, असमानता और अविकसितता जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इन समस्याओं से निपटने के लिए 'विकास' को एक महत्वपूर्ण साधन माना गया।
- विकास के अर्थ पर मतभेद: 'विकास' शब्द का अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि नहीं था, बल्कि इसमें सामाजिक न्याय और समानता जैसे पहलू भी शामिल थे।
- दो प्रमुख मॉडल:
- उदारवादी-पूंजीवादी मॉडल: पश्चिमी देशों (जैसे अमेरिका) द्वारा अपनाया गया। इसमें निजी क्षेत्र को बढ़ावा और राज्य के हस्तक्षेप को कम करना शामिल था।
- समाजवादी मॉडल: सोवियत संघ द्वारा अपनाया गया। इसमें राज्य के स्वामित्व, केंद्रीकृत योजना और सार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई।
- भारत का मार्ग: भारत ने इन दोनों मॉडलों के बीच का रास्ता चुना, जिसे 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' कहा गया। इसमें निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों को सह-अस्तित्व में रखा गया।
2. बम्बई योजना (Bombay Plan)
- समय: 1944
- पृष्ठभूमि: स्वतंत्रता से पहले ही, उद्योगपतियों का एक समूह देश के आर्थिक विकास के लिए एक साझा योजना पर सहमत हुआ।
- प्रमुख बिंदु:
- भारत के कुछ प्रमुख उद्योगपतियों (जैसे जे.आर.डी. टाटा, घनश्याम दास बिड़ला, पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास) ने मिलकर यह योजना तैयार की थी।
- इसका उद्देश्य भारत में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देना और आर्थिक विकास को गति देना था।
- इसने सुझाव दिया कि सरकार औद्योगिक और अन्य आर्थिक निवेश के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए।
- यह योजना इस बात का संकेत थी कि भारत के बड़े उद्योगपति भी देश के आर्थिक विकास में राज्य की भूमिका चाहते थे।
3. योजना आयोग (Planning Commission)
- स्थापना: मार्च 1950 में भारत सरकार के एक प्रस्ताव द्वारा।
- कार्य: देश के संसाधनों का आकलन करना, पंचवर्षीय योजनाएँ बनाना और उन्हें लागू करना।
- अध्यक्ष: प्रधानमंत्री (पदेन अध्यक्ष)।
- उपाध्यक्ष: योजना आयोग का वास्तविक कार्यकारी प्रमुख।
- समाप्ति: 2014 में इसे समाप्त कर दिया गया और इसके स्थान पर नीति आयोग (NITI Aayog) की स्थापना की गई (1 जनवरी 2015)। नीति आयोग एक 'थिंक टैंक' के रूप में कार्य करता है।
4. पंचवर्षीय योजनाएँ (Five-Year Plans)
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अवधारणा: सोवियत संघ से प्रेरित।
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उद्देश्य: एक निश्चित समय-सीमा (5 वर्ष) में विशिष्ट आर्थिक और सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करना।
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पहली पंचवर्षीय योजना (1951-1956):
- मुख्य फोकस: कृषि क्षेत्र, सिंचाई और ऊर्जा परियोजनाओं (जैसे भाखड़ा-नांगल बांध)।
- प्रमुख अर्थशास्त्री: के.एन. राज (इन्होंने तर्क दिया कि भारत को शुरुआती दो दशकों में धीमी गति से विकास करना चाहिए ताकि अगली योजना में तेजी लाई जा सके)।
- लक्ष्य: देश को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालना।
- भूमि सुधार: भूमि के पुनर्वितरण पर जोर दिया गया, लेकिन इसे पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका।
- परियोजनाएँ: भाखड़ा-नांगल बांध जैसी बड़ी सिंचाई परियोजनाएँ शुरू की गईं।
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दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-1961):
- मुख्य फोकस: भारी उद्योगों का विकास और तीव्र औद्योगिकीकरण।
- प्रमुख अर्थशास्त्री: पी.सी. महालनोबिस (इनके नेतृत्व में अर्थशास्त्रियों और योजनाकारों की एक टीम ने इस योजना को तैयार किया)।
- लक्ष्य: आत्मनिर्भरता प्राप्त करना और अर्थव्यवस्था की संरचना में तीव्र परिवर्तन लाना।
- नीतिगत बदलाव: आयात पर भारी शुल्क लगाकर घरेलू उद्योगों को संरक्षण दिया गया।
- समस्याएँ:
- उद्योगों पर जोर देने से कृषि क्षेत्र की अनदेखी हुई।
- भारत को विदेशी मुद्रा संकट का सामना करना पड़ा।
- कई आलोचकों ने तर्क दिया कि यह योजना गरीबों के बजाय धनी लोगों को लाभ पहुँचा रही थी।
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तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-1966):
- मुख्य फोकस: कृषि और उद्योग दोनों को संतुलित करना, आत्मनिर्भरता प्राप्त करना।
- असफलता: 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और सूखे के कारण यह योजना सफल नहीं हो पाई।
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योजना अवकाश (Plan Holiday) (1966-1969):
- तीसरी योजना की असफलता और युद्धों के कारण उत्पन्न आर्थिक संकट के कारण पंचवर्षीय योजनाएँ रोक दी गईं और तीन वार्षिक योजनाएँ लागू की गईं।
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5. विकास के मॉडल में विरोधाभास और विवाद
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कृषि बनाम उद्योग:
- विवाद: क्या भारत को कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए या तीव्र औद्योगिकीकरण पर?
- गांधीवादी दृष्टिकोण: ग्रामीण औद्योगिकीकरण, कुटीर उद्योगों और आत्मनिर्भर गाँवों का समर्थन।
- नेहरूवादी दृष्टिकोण: भारी उद्योगों और बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण का समर्थन।
- चौधरी चरण सिंह: ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि योजनाकारों ने ग्रामीण भारत की कीमत पर शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों को लाभ पहुँचाया।
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निजी बनाम सार्वजनिक क्षेत्र:
- मिश्रित अर्थव्यवस्था: भारत ने दोनों क्षेत्रों को साथ लेकर चलने का फैसला किया।
- आलोचना:
- निजी क्षेत्र के समर्थकों ने कहा कि सरकार ने निजी पहल और पूंजी को पर्याप्त जगह नहीं दी।
- सार्वजनिक क्षेत्र के समर्थकों ने कहा कि सरकार ने गरीब लोगों के लिए पर्याप्त नहीं किया और निजी क्षेत्र को बहुत अधिक रियायतें दीं।
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पर्यावरण और विस्थापन:
- बड़ी परियोजनाएँ: बांधों, कारखानों और खनन परियोजनाओं के कारण बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन हुआ और पर्यावरण को नुकसान पहुँचा।
- ओडिशा का लौह अयस्क विवाद (POSCO):
- ओडिशा में लौह अयस्क के विशाल भंडार थे, जिस पर अंतरराष्ट्रीय इस्पात निर्माता कंपनी POSCO ने निवेश की इच्छा जताई।
- स्थानीय आदिवासी और पर्यावरणविदों ने इसका विरोध किया, क्योंकि इससे उनके जीवन और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता।
- यह विवाद विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच के तनाव को दर्शाता है।
6. खाद्य संकट (1960 का दशक)
- कारण: 1960 के दशक में भारत को गंभीर खाद्य संकट का सामना करना पड़ा, विशेषकर बिहार में अकाल पड़ा।
- स्थिति: खाद्यान्न की कमी, कीमतें बढ़ीं, कुपोषण और भुखमरी फैली।
- विदेशी सहायता: भारत को अमेरिका से PL-480 योजना के तहत गेहूं का आयात करना पड़ा।
- राजनीतिक प्रभाव: विदेशी निर्भरता ने भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाए।
7. हरित क्रांति (Green Revolution)
- पृष्ठभूमि: खाद्य संकट से निपटने और आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए।
- समय: 1960 के दशक के मध्य में।
- मुख्य कारक:
- उच्च उपज वाली किस्मों (HYV) के बीजों का उपयोग।
- रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग।
- सिंचाई सुविधाओं का विस्तार।
- सरकार द्वारा किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और ऋण सुविधाएँ प्रदान करना।
- लाभार्थी क्षेत्र: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे समृद्ध कृषि क्षेत्र।
- सकारात्मक प्रभाव:
- भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना।
- किसानों की आय में वृद्धि हुई।
- ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़े।
- नकारात्मक प्रभाव:
- क्षेत्रीय असमानता: केवल कुछ ही क्षेत्रों को लाभ हुआ, जिससे धनी और गरीब राज्यों के बीच अंतर बढ़ा।
- सामाजिक असमानता: धनी किसानों को अधिक लाभ हुआ, जबकि छोटे और गरीब किसान पीछे रह गए।
- पर्यावरण पर प्रभाव: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी और भूजल प्रदूषित हुआ।
- राजनीतिक प्रभाव: धनी किसानों के एक वर्ग का उदय हुआ, जो बाद में राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हो गए।
8. विकास के परिणाम
- भूमि सुधार की विफलता: भूमि के पुनर्वितरण के प्रयास सफल नहीं हुए, जिससे भूमिहीन किसानों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ।
- आय असमानता: विकास के बावजूद, आय और संपत्ति की असमानता बढ़ी।
- लोकतांत्रिक राजनीति का प्रभाव: विकास की प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बहस और विरोध का सामना करना पड़ा, जिससे नीतियों में बदलाव आए।
- गरीबी उन्मूलन: शुरुआती योजनाओं में गरीबी उन्मूलन का लक्ष्य पूरी तरह से प्राप्त नहीं हो सका।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
योजना आयोग की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
a) 1947
b) 1950
c) 1951
d) 1956 -
भारत की पहली पंचवर्षीय योजना का मुख्य जोर किस क्षेत्र पर था?
a) भारी उद्योग
b) कृषि
c) सेवा क्षेत्र
d) सूचना प्रौद्योगिकी -
'बम्बई योजना' को किस वर्ष तैयार किया गया था?
a) 1942
b) 1944
c) 1947
d) 1950 -
दूसरी पंचवर्षीय योजना के योजनाकार कौन थे?
a) के.एन. राज
b) जवाहरलाल नेहरू
c) पी.सी. महालनोबिस
d) एम. विश्वेश्वरैया -
हरित क्रांति का मुख्य उद्देश्य क्या था?
a) औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देना
b) खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना
c) गरीबी उन्मूलन
d) शिक्षा का प्रसार -
हरित क्रांति से किन राज्यों को सर्वाधिक लाभ हुआ?
a) बिहार और ओडिशा
b) गुजरात और महाराष्ट्र
c) पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश
d) केरल और तमिलनाडु -
योजना आयोग को कब समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर नीति आयोग का गठन किया गया?
a) 2010
b) 2012
c) 2014
d) 2015 -
1960 के दशक में भारत को किस गंभीर संकट का सामना करना पड़ा, जिसके कारण अमेरिका से गेहूं आयात करना पड़ा?
a) औद्योगिक संकट
b) वित्तीय संकट
c) खाद्य संकट
d) ऊर्जा संकट -
भारत ने विकास के लिए किस मॉडल को अपनाया?
a) पूंजीवादी मॉडल
b) समाजवादी मॉडल
c) मिश्रित अर्थव्यवस्था मॉडल
d) साम्यवादी मॉडल -
ओडिशा में लौह अयस्क के विशाल भंडार के कारण किस अंतरराष्ट्रीय इस्पात कंपनी के साथ विवाद हुआ था?
a) आर्सेलर मित्तल
b) टाटा स्टील
c) POSCO
d) जिंदल स्टील
उत्तरमाला:
- b) 1950
- b) कृषि
- b) 1944
- c) पी.सी. महालनोबिस
- b) खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना
- c) पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश
- d) 2015 (नीति आयोग का गठन 1 जनवरी 2015 को हुआ, योजना आयोग 2014 में समाप्त)
- c) खाद्य संकट
- c) मिश्रित अर्थव्यवस्था मॉडल
- c) POSCO
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। इस अध्याय को गहराई से समझने के लिए पाठ्यपुस्तक का भी नियमित अध्ययन करते रहें। शुभकामनाएँ!