Class 12 Political Science Notes Chapter 5 (Chapter 5) – Swatantra Bharat me Rajniti-II Book

Swatantra Bharat me Rajniti-II
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम आपकी 'स्वतंत्र भारत में राजनीति-II' पुस्तक के अध्याय 5, 'लोकतांत्रिक पुनरुत्थान और भारतीय राजनीति में नए रुझान' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय भारतीय राजनीति में 1990 के दशक में आए महत्वपूर्ण बदलावों और उनके दूरगामी प्रभावों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए।


अध्याय 5: लोकतांत्रिक पुनरुत्थान और भारतीय राजनीति में नए रुझान

1990 का दशक भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस दशक में कई ऐसे बदलाव हुए जिन्होंने भारतीय राजनीति की दिशा और स्वरूप को हमेशा के लिए बदल दिया। एक-दलीय प्रभुत्व का अंत हुआ, गठबंधन की राजनीति का उदय हुआ, आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई और सामाजिक न्याय तथा पहचान की राजनीति ने जोर पकड़ा।

1. मंडल मुद्दा और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का उदय

  • पृष्ठभूमि: स्वतंत्रता के बाद से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) के लिए आरक्षण की मांग उठती रही थी। संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण का प्रावधान किया था, लेकिन अन्य पिछड़े वर्गों के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था।
  • काका कालेलकर आयोग (1953): भारत सरकार ने 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में पहला पिछड़ा वर्ग आयोग नियुक्त किया। इस आयोग ने 1955 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें कई सिफारिशें की गईं, लेकिन इन्हें लागू नहीं किया गया।
  • मंडल आयोग (1979): जनता पार्टी सरकार ने 1979 में बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल (बी.पी. मंडल) की अध्यक्षता में दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग नियुक्त किया। इस आयोग को भारत में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करने और उनके उत्थान के लिए उपाय सुझाने का काम सौंपा गया था।
  • मंडल आयोग की सिफारिशें (1980): आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें 3,743 जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में चिह्नित किया गया। आयोग ने सिफारिश की कि केंद्र सरकार की नौकरियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में OBCs को 27% आरक्षण दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही, SC और ST के लिए पहले से मौजूद 22.5% आरक्षण को मिलाकर, कुल आरक्षण 49.5% हो जाता।
  • मंडल आयोग की सिफारिशों का लागू होना (1990): लगभग दस वर्षों तक मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू नहीं किया गया। अगस्त 1990 में, प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने मंडल आयोग की एक प्रमुख सिफारिश को लागू करने का निर्णय लिया, जिसके तहत केंद्र सरकार की नौकरियों में OBCs को 27% आरक्षण प्रदान किया गया।
  • विरोध और समर्थन: इस निर्णय से देश भर में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। उत्तर भारत के कई शहरों में छात्रों और युवाओं ने हिंसक विरोध प्रदर्शन किए। कुछ लोगों ने इसे योग्यता के खिलाफ और जातिवाद को बढ़ावा देने वाला बताया, जबकि OBC समुदायों और उनके समर्थक दलों ने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। इस दौर को "मंडल बनाम कमंडल" की बहस के रूप में भी जाना जाता है, जहाँ मंडल सामाजिक न्याय का प्रतीक था और कमंडल हिंदुत्व की राजनीति का।
  • सर्वोच्च न्यायालय का फैसला (इंदिरा साहनी वाद, 1992): मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के सरकार के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। 1992 में, सर्वोच्च न्यायालय ने इंदिरा साहनी और अन्य बनाम भारत संघ (जिसे मंडल केस भी कहा जाता है) के ऐतिहासिक फैसले में 27% आरक्षण को वैध ठहराया। हालांकि, न्यायालय ने यह भी कहा कि आरक्षण की कुल सीमा 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए और OBC आरक्षण में "क्रीमी लेयर" (आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग) को बाहर रखा जाना चाहिए।
  • राजनीतिक प्रभाव: मंडल आयोग के फैसले ने भारतीय राजनीति में OBCs को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति के रूप में उभारा। कई क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ, जो OBC हितों का प्रतिनिधित्व करते थे, और राष्ट्रीय दलों को भी अपनी नीतियों में OBCs को अधिक महत्व देना पड़ा।

2. अयोध्या विवाद और हिंदुत्व की राजनीति

  • राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद: अयोध्या में स्थित बाबरी मस्जिद को लेकर एक लंबे समय से विवाद था। हिंदू समुदाय का मानना था कि यह स्थल भगवान राम का जन्मस्थान है और मस्जिद का निर्माण एक प्राचीन राम मंदिर को तोड़कर किया गया था। मुस्लिम समुदाय इस मस्जिद को अपनी संपत्ति मानता था।
  • ताला खोलना (1986): 1986 में, फैजाबाद जिला न्यायालय ने विवादित स्थल का ताला खोलने और हिंदुओं को पूजा करने की अनुमति देने का आदेश दिया। इस घटना ने दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ा दिया।
  • रथयात्रा (1990): भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) जैसे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों ने "राम जन्मभूमि आंदोलन" को तेज किया। अक्टूबर 1990 में, भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक एक विशाल "रथयात्रा" निकाली। इस यात्रा का उद्देश्य राम मंदिर निर्माण के लिए जनसमर्थन जुटाना था।
  • बाबरी मस्जिद विध्वंस (6 दिसंबर 1992): 6 दिसंबर 1992 को, अयोध्या में लाखों की संख्या में कारसेवक (स्वयंसेवक) इकट्ठा हुए। एक हिंसक भीड़ ने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया।
  • परिणाम: बाबरी मस्जिद के विध्वंस से देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे, विशेषकर मुंबई में। इस घटना ने भारतीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता की बहस को गहरा कर दिया और भाजपा को एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करने में मदद की। भाजपा ने हिंदुत्व को अपनी विचारधारा का मुख्य आधार बनाया।
  • गुजरात दंगे (2002): फरवरी-मार्च 2002 में, गुजरात के गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग लगने की घटना के बाद राज्य में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे हुए, जिसमें हजारों लोग मारे गए, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम थे।

3. नई आर्थिक नीति (1991)

  • आर्थिक संकट: 1991 में, भारत एक गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त हो चुका था, महंगाई बढ़ रही थी और सरकार पर भारी कर्ज था।
  • सुधारों की शुरुआत: इस संकट से निपटने के लिए, तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने, वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में, व्यापक आर्थिक सुधारों की शुरुआत की।
  • उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण (LPG): इस नई आर्थिक नीति के तीन मुख्य स्तंभ थे:
    • उदारीकरण (Liberalisation): अर्थव्यवस्था को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना, उद्योगों को लाइसेंस राज से मुक्ति दिलाना, व्यापार बाधाओं को कम करना।
    • निजीकरण (Privatisation): सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को निजी हाथों में बेचना या उनकी हिस्सेदारी कम करना।
    • वैश्वीकरण (Globalisation): भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ना, विदेशी निवेश को आकर्षित करना और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना।
  • प्रभाव: इन सुधारों के परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी आई, विदेशी निवेश बढ़ा और भारत विश्व अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। हालांकि, इन नीतियों के आलोचकों ने तर्क दिया कि इनसे असमानता बढ़ी और गरीबों को पर्याप्त लाभ नहीं मिला।

4. गठबंधन का युग

  • एक-दलीय प्रभुत्व का अंत: 1989 के लोकसभा चुनावों के बाद, भारतीय राजनीति में कांग्रेस पार्टी के एक-दलीय प्रभुत्व का युग समाप्त हो गया। किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।
  • गठबंधन सरकारों का उदय:
    • राष्ट्रीय मोर्चा सरकार (1989): 1989 में, जनता दल और कुछ क्षेत्रीय दलों ने मिलकर राष्ट्रीय मोर्चा का गठन किया। इस सरकार को भाजपा और वाम मोर्चे ने बाहर से समर्थन दिया। वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बने।
    • संयुक्त मोर्चा सरकारें (1996): 1996 के चुनावों में भी किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सरकार नहीं बना पाई। इसके बाद, कई गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपा दलों ने मिलकर संयुक्त मोर्चा का गठन किया, जिसे कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया। एच.डी. देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल इस दौरान प्रधानमंत्री बने।
    • राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) (1998): 1998 में, भाजपा के नेतृत्व में कई क्षेत्रीय दलों ने मिलकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का गठन किया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में NDA ने सरकार बनाई और 1999 के चुनावों में भी जीत हासिल की, जिससे पहली बार एक गैर-कांग्रेसी गठबंधन ने अपना पूरा कार्यकाल पूरा किया।
    • संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) (2004): 2004 के चुनावों में, कांग्रेस के नेतृत्व में कई क्षेत्रीय दलों ने मिलकर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) का गठन किया। डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में UPA ने 2004 और 2009 में सरकार बनाई।
  • सहमतियों का नया दौर: गठबंधन की राजनीति ने विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच एक नई तरह की सहमति को जन्म दिया। प्रमुख राजनीतिक दल अब कुछ मूलभूत मुद्दों पर सहमत होने लगे, जैसे नई आर्थिक नीति, OBC आरक्षण, और क्षेत्रीय दलों का महत्व।

5. लोकतांत्रिक पुनरुत्थान के आयाम

  • दलित और आदिवासी सशक्तिकरण: मंडल आयोग के बाद OBCs के साथ-साथ दलित और आदिवासी समुदायों की राजनीतिक भागीदारी में भी वृद्धि हुई। कई दलित और आदिवासी केंद्रित दलों का उदय हुआ।
  • महिलाओं की भागीदारी: पंचायती राज संस्थाओं (स्थानीय स्वशासन) में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण ने जमीनी स्तर पर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाया।
  • नागरिक समाज का उदय: सूचना का अधिकार (RTI) जैसे आंदोलनों और कानूनों ने नागरिक समाज संगठनों (NGOs) की भूमिका को बढ़ाया और सरकार में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को मजबूत किया। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में लागू हुआ।
  • क्षेत्रीय पहचान का महत्व: क्षेत्रीय दलों के उदय ने भारतीय संघवाद में राज्यों और क्षेत्रीय पहचानों के महत्व को रेखांकित किया।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

  1. मंडल आयोग का गठन किस वर्ष किया गया था?
    a) 1977
    b) 1979
    c) 1980
    d) 1982

  2. मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने वाले प्रधानमंत्री कौन थे?
    a) राजीव गांधी
    b) पी.वी. नरसिम्हा राव
    c) वी.पी. सिंह
    d) अटल बिहारी वाजपेयी

  3. इंदिरा साहनी वाद (मंडल केस) किस वर्ष हुआ था और इसका संबंध किससे था?
    a) 1989, आर्थिक सुधार
    b) 1990, अयोध्या विवाद
    c) 1992, ओबीसी आरक्षण
    d) 1995, पंचायती राज

  4. बाबरी मस्जिद का विध्वंस किस तिथि को हुआ था?
    a) 26 जनवरी 1992
    b) 15 अगस्त 1992
    c) 6 दिसंबर 1992
    d) 14 नवंबर 1992

  5. भारत में नई आर्थिक नीति (LPG) किस वर्ष लागू की गई थी?
    a) 1989
    b) 1990
    c) 1991
    d) 1992

  6. 1991 में नई आर्थिक नीति लागू करते समय भारत के वित्त मंत्री कौन थे?
    a) पी. चिदंबरम
    b) यशवंत सिन्हा
    c) डॉ. मनमोहन सिंह
    d) प्रणब मुखर्जी

  7. भारतीय जनता पार्टी की रथयात्रा का नेतृत्व किसने किया था, जो अयोध्या आंदोलन से संबंधित थी?
    a) अटल बिहारी वाजपेयी
    b) मुरली मनोहर जोशी
    c) लालकृष्ण आडवाणी
    d) उमा भारती

  8. 1989 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में किस गठबंधन की सरकार बनी थी?
    a) संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA)
    b) राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA)
    c) राष्ट्रीय मोर्चा
    d) संयुक्त मोर्चा

  9. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का नेतृत्व कौन सा दल करता है?
    a) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
    b) भारतीय जनता पार्टी
    c) जनता दल (यूनाइटेड)
    d) समाजवादी पार्टी

  10. 'क्रीमी लेयर' का सिद्धांत किस आयोग/वाद से संबंधित है?
    a) काका कालेलकर आयोग
    b) मंडल आयोग और इंदिरा साहनी वाद
    c) शाह आयोग
    d) लिब्रहान आयोग


उत्तरमाला:

  1. b) 1979
  2. c) वी.पी. सिंह
  3. c) 1992, ओबीसी आरक्षण
  4. c) 6 दिसंबर 1992
  5. c) 1991
  6. c) डॉ. मनमोहन सिंह
  7. c) लालकृष्ण आडवाणी
  8. c) राष्ट्रीय मोर्चा
  9. b) भारतीय जनता पार्टी
  10. b) मंडल आयोग और इंदिरा साहनी वाद

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। इस अध्याय के प्रत्येक पहलू को ध्यान से समझें और महत्वपूर्ण तिथियों व घटनाओं को याद रखें।

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