Class 12 Political Science Notes Chapter 5 (कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना) – Samkalin Vishwa Rajniti Book

Samkalin Vishwa Rajniti
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम समकालीन भारतीय राजनीति के एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय, 'कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना' पर विस्तृत चर्चा करेंगे। यह अध्याय भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव के दौर को दर्शाता है, जहाँ एक ओर कांग्रेस की दशकों पुरानी प्रभुत्वशाली स्थिति को चुनौती मिली, वहीं दूसरी ओर इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने स्वयं को पुनः स्थापित किया। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए यह अध्याय बहुत महत्वपूर्ण है, अतः प्रत्येक बिंदु पर ध्यान दें।


अध्याय 5: कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

1. नेहरू के बाद: उत्तराधिकार की चुनौती

  • नेहरू का निधन (27 मई, 1964): भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ। उनके निधन से यह आशंका उत्पन्न हुई कि क्या भारत में लोकतांत्रिक उत्तराधिकार संभव हो पाएगा, क्योंकि नेहरू ने 17 वर्षों तक देश का नेतृत्व किया था और उनका कद बहुत बड़ा था।
  • लाल बहादुर शास्त्री का उदय (1964-1966):
    • कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज और सिंडिकेट (कांग्रेस के प्रभावशाली नेताओं का समूह) के समर्थन से लाल बहादुर शास्त्री को नेहरू का उत्तराधिकारी चुना गया। यह भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण था, जब सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से हुआ।
    • चुनौतियाँ: शास्त्री के सामने देश में खाद्य संकट, सूखा और आर्थिक समस्याएँ थीं।
    • पाकिस्तान से युद्ध (1965): उनके कार्यकाल में पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया। शास्त्री ने दृढ़ता से युद्ध का सामना किया और भारत को जीत दिलाई।
    • "जय जवान, जय किसान" का नारा: उन्होंने इस नारे के माध्यम से सैनिकों और किसानों के महत्व को रेखांकित किया, जो आज भी प्रासंगिक है।
    • ताशकंद समझौता और निधन (1966): 10 जनवरी, 1966 को पाकिस्तान के साथ शांति समझौते (ताशकंद समझौता) पर हस्ताक्षर करने के बाद रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया।
  • इंदिरा गांधी का उदय (1966):
    • शास्त्री के निधन के बाद एक बार फिर उत्तराधिकार का प्रश्न खड़ा हुआ। इस बार मोरारजी देसाई और इंदिरा गांधी के बीच प्रधानमंत्री पद के लिए प्रतिस्पर्धा हुई।
    • कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं (सिंडिकेट) ने इंदिरा गांधी को समर्थन दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि वे अनुभवहीन हैं और उन्हें आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।
    • इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई को हराकर प्रधानमंत्री का पद संभाला।

2. चौथे आम चुनाव (1967) और गैर-कांग्रेसवाद

  • पृष्ठभूमि:
    • आर्थिक संकट: 1960 के दशक में देश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। मानसून की असफलता, व्यापक सूखा, कृषि उत्पादन में गिरावट, खाद्य पदार्थों की कमी, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, निर्यात में कमी और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी जैसी समस्याएँ थीं।
    • मुद्रा अवमूल्यन: सरकार को रुपये का अवमूल्यन करना पड़ा, जिससे विदेशी वस्तुओं की कीमतें बढ़ गईं।
    • जन असंतोष: बेरोजगारी, मूल्य वृद्धि और गरीबी के कारण देश भर में हड़तालें, बंद और विरोध प्रदर्शन हुए।
  • गैर-कांग्रेसवाद:
    • समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने 'गैर-कांग्रेसवाद' का नारा दिया।
    • उनका तर्क था कि कांग्रेस का शासन अलोकतांत्रिक और जनविरोधी हो गया है, और देश को गरीबी, असमानता और राजनीतिक भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए सभी गैर-कांग्रेसी दलों को एक साथ आना चाहिए।
    • विपक्षी दलों ने एकजुट होकर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा।
  • 1967 के चुनाव परिणाम: "राजनीतिक भूकम्प"
    • यह चुनाव भारतीय राजनीति में एक मील का पत्थर साबित हुआ। कांग्रेस को लोकसभा और विधानसभा, दोनों में भारी नुकसान हुआ।
    • लोकसभा में: कांग्रेस को पहली बार इतना कम बहुमत मिला (283 सीटें)। उसके कई वरिष्ठ नेता चुनाव हार गए।
    • राज्यों में: कांग्रेस नौ राज्यों (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मद्रास (तमिलनाडु), केरल) में सरकार नहीं बना पाई। मद्रास में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) को पूर्ण बहुमत मिला।
    • गठबंधन सरकारें (संविद सरकारें): कई राज्यों में विभिन्न गैर-कांग्रेसी दलों ने मिलकर संयुक्त विधायक दल (संविद) की सरकारें बनाईं।
  • दलबदल:
    • 1967 के बाद दलबदल (एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाना) की घटनाएँ बहुत बढ़ गईं।
    • "आया राम, गया राम" का मुहावरा हरियाणा के विधायक गया लाल से जुड़ा है, जिन्होंने 15 दिन के भीतर तीन बार पार्टी बदली। यह उस दौर की राजनीतिक अस्थिरता को दर्शाता है।

3. कांग्रेस में विभाजन (1969)

  • इंदिरा की चुनौतियाँ: 1967 के चुनाव के बाद इंदिरा गांधी को दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ा - सिंडिकेट के प्रभाव से मुक्त होना और अपनी सरकार को मजबूत करना।
  • सिंडिकेट: कांग्रेस के भीतर वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं का एक समूह, जिसमें के. कामराज, एस. निजलिंगप्पा, एस.के. पाटिल, एन. संजीव रेड्डी और अतुल्य घोष जैसे नेता शामिल थे। उन्होंने इंदिरा को प्रधानमंत्री बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और अब उन पर नियंत्रण रखना चाहते थे।
  • इंदिरा के कदम:
    • इंदिरा ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए लोकप्रिय नीतियाँ अपनाईं। उन्होंने "10 सूत्री कार्यक्रम" लागू किया, जिसमें बैंकों का राष्ट्रीयकरण, राजा-महाराजाओं को मिलने वाले विशेषाधिकारों (प्रिवी पर्स) की समाप्ति जैसे मुद्दे शामिल थे।
    • सिंडिकेट को ये नीतियाँ पसंद नहीं थीं, क्योंकि वे इन्हें वामपंथी और कांग्रेस की पारंपरिक नीतियों के खिलाफ मानते थे।
  • राष्ट्रपति चुनाव (1969):
    • तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के निधन के बाद राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुए।
    • सिंडिकेट ने लोकसभा अध्यक्ष एन. संजीव रेड्डी को कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया।
    • इंदिरा गांधी ने इसके विरोध में तत्कालीन उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि को स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में समर्थन दिया।
    • इंदिरा ने कांग्रेस सांसदों और विधायकों से "अंतरात्मा की आवाज" पर वोट देने की अपील की।
    • वी.वी. गिरि ने यह चुनाव जीत लिया, जिससे सिंडिकेट को गहरा झटका लगा।
  • कांग्रेस का विभाजन:
    • राष्ट्रपति चुनाव के बाद कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई:
      • कांग्रेस (संगठन) / कांग्रेस (ओ): इसमें सिंडिकेट के नेता शामिल थे। इसे 'पुरानी कांग्रेस' भी कहा गया।
      • कांग्रेस (रिक्विजिशनिस्ट) / कांग्रेस (आर): इसमें इंदिरा गांधी के समर्थक शामिल थे। इसे 'नई कांग्रेस' या 'इंदिरा कांग्रेस' भी कहा गया।

4. इंदिरा गांधी की पुनर्स्थापना (1971 के चुनाव)

  • इंदिरा की रणनीति:
    • इंदिरा गांधी ने खुद को गरीबों और वंचितों के मसीहा के रूप में प्रस्तुत किया।
    • उन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स की समाप्ति जैसे कदमों को अपनी समाजवादी प्रतिबद्धता के रूप में प्रचारित किया।
    • उन्होंने 'गरीबी हटाओ' का लोकप्रिय नारा दिया।
  • विपक्षी गठबंधन (महागठबंधन):
    • सभी प्रमुख गैर-कांग्रेसी और गैर-वामपंथी दलों (कांग्रेस (ओ), जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी) ने मिलकर "ग्रैंड अलायंस" (महागठबंधन) बनाया।
    • उनका मुख्य नारा था "इंदिरा हटाओ"।
  • 1971 के लोकसभा चुनाव:
    • इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी (कांग्रेस (आर)) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के साथ गठबंधन किया।
    • चुनाव प्रचार में इंदिरा ने 'गरीबी हटाओ' के नारे पर जोर दिया, जबकि विपक्ष 'इंदिरा हटाओ' पर केंद्रित रहा।
    • परिणाम: कांग्रेस (आर) और CPI गठबंधन को भारी बहुमत मिला। कांग्रेस (आर) को अकेले 352 सीटें मिलीं, और गठबंधन को कुल 375 सीटें मिलीं।
    • यह इंदिरा गांधी की एक बड़ी जीत थी और इसने कांग्रेस प्रणाली को पुनः स्थापित किया।
  • बांग्लादेश संकट (1971):
    • चुनाव के तुरंत बाद पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में संकट गहरा गया। पाकिस्तान की सेना ने बंगाली आबादी पर अत्याचार शुरू किए, जिससे लाखों शरणार्थी भारत आ गए।
    • भारत ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का समर्थन किया और दिसंबर 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में शामिल हुआ।
    • भारत ने निर्णायक जीत हासिल की और बांग्लादेश का निर्माण हुआ।
    • इस जीत ने इंदिरा गांधी की लोकप्रियता को चरम पर पहुँचा दिया और उन्हें एक मजबूत और सक्षम नेता के रूप में स्थापित किया।

5. कांग्रेस प्रणाली की पुनर्स्थापना के कारण

  • इंदिरा का करिश्माई नेतृत्व: इंदिरा गांधी ने स्वयं को एक मजबूत और निर्णायक नेता के रूप में स्थापित किया, जो देश की समस्याओं का समाधान कर सकती थीं।
  • लोकप्रिय नीतियाँ: बैंकों का राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स की समाप्ति जैसे कदमों ने उन्हें गरीबों और आम जनता के बीच लोकप्रिय बनाया।
  • 'गरीबी हटाओ' का नारा: यह नारा सीधे जनता की आकांक्षाओं से जुड़ा था और इसने उन्हें भारी जनसमर्थन दिलाया।
  • बांग्लादेश युद्ध में जीत: इस जीत ने इंदिरा की नेतृत्व क्षमता और भारत की सैन्य शक्ति को साबित किया, जिससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई।
  • विपक्षी दलों की नकारात्मक राजनीति: विपक्ष का 'इंदिरा हटाओ' का नारा जनता को आकर्षित नहीं कर सका, क्योंकि उनके पास कोई सकारात्मक कार्यक्रम नहीं था। वे केवल इंदिरा के विरोध पर केंद्रित थे।
  • कांग्रेस की विचारधारा में बदलाव: इंदिरा ने कांग्रेस को एक अधिक समाजवादी और गरीबों के प्रति समर्पित पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे उसे नया जीवन मिला।

सरकारी परीक्षा हेतु 10 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):

  1. लाल बहादुर शास्त्री ने "जय जवान, जय किसान" का नारा किस वर्ष के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान दिया था?
    a) 1962
    b) 1965
    c) 1971
    d) 1999

  2. "गैर-कांग्रेसवाद" का नारा किस समाजवादी नेता ने दिया था?
    a) जयप्रकाश नारायण
    b) राममनोहर लोहिया
    c) आचार्य नरेंद्र देव
    d) एम.एन. रॉय

  3. 1967 के आम चुनावों के परिणामों को किस नाम से जाना जाता है?
    a) लोकतांत्रिक क्रांति
    b) राजनीतिक भूकम्प
    c) सत्ता का हस्तांतरण
    d) सामाजिक परिवर्तन

  4. "आया राम, गया राम" का मुहावरा भारतीय राजनीति में किस घटना से संबंधित है?
    a) गठबंधन सरकारों का निर्माण
    b) दलबदल
    c) आपातकाल की घोषणा
    d) राष्ट्रपति शासन

  5. कांग्रेस पार्टी में औपचारिक विभाजन (कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर)) किस वर्ष हुआ था?
    a) 1967
    b) 1969
    c) 1971
    d) 1975

  6. 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में इंदिरा गांधी द्वारा समर्थित स्वतंत्र उम्मीदवार कौन थे, जिन्होंने जीत हासिल की?
    a) एन. संजीव रेड्डी
    b) वी.वी. गिरि
    c) जाकिर हुसैन
    d) फखरुद्दीन अली अहमद

  7. 1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी ने कौन सा लोकप्रिय नारा दिया था?
    a) लोकतंत्र बचाओ
    b) गरीबी हटाओ
    c) जय जवान, जय किसान
    d) संपूर्ण क्रांति

  8. 1971 के लोकसभा चुनावों में विपक्षी दलों के महागठबंधन का मुख्य नारा क्या था?
    a) लोकतंत्र बहाल करो
    b) गरीबी हटाओ
    c) इंदिरा हटाओ
    d) देश बचाओ

  9. किस युद्ध में भारत की जीत के बाद इंदिरा गांधी की लोकप्रियता अपने चरम पर पहुँच गई थी?
    a) 1962 का भारत-चीन युद्ध
    b) 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध
    c) 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध
    d) कारगिल युद्ध

  10. सिंडिकेट कांग्रेस के भीतर किस प्रकार के नेताओं का समूह था?
    a) युवा और प्रगतिशील नेता
    b) अनुभवी और प्रभावशाली वरिष्ठ नेता
    c) वामपंथी विचारधारा के नेता
    d) क्षेत्रीय दलों के नेता


उत्तरमाला:

  1. b) 1965
  2. b) राममनोहर लोहिया
  3. b) राजनीतिक भूकम्प
  4. b) दलबदल
  5. b) 1969
  6. b) वी.वी. गिरि
  7. b) गरीबी हटाओ
  8. c) इंदिरा हटाओ
  9. c) 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध
  10. b) अनुभवी और प्रभावशाली वरिष्ठ नेता

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को समझने और सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें।

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