Class 12 Political Science Notes Chapter 6 (लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट) – Samkalin Vishwa Rajniti Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी 'समकालीन विश्व राजनीति' पुस्तक के एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय 'लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट' पर विस्तृत चर्चा करेंगे। यह अध्याय भारतीय राजनीति के एक निर्णायक दौर, विशेषकर 1970 के दशक के मध्य में आई चुनौतियों और आपातकाल की घोषणा से संबंधित है। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इस अध्याय को गहराई से समझना आवश्यक है, क्योंकि इसमें भारतीय लोकतंत्र के लचीलेपन और विभिन्न संस्थाओं के बीच संबंधों की जटिलताओं पर प्रकाश डाला गया है।
आइए, इस अध्याय के प्रमुख बिंदुओं को विस्तार से समझते हैं:
अध्याय 6: लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट
1. आपातकाल की पृष्ठभूमि (1971 के बाद की चुनौतियाँ)
- 1971 के चुनाव और उसके बाद: इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 'गरीबी हटाओ' के नारे के साथ शानदार जीत हासिल की थी। लेकिन, इस जीत के तुरंत बाद देश को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
- आर्थिक संदर्भ:
- बांग्लादेश युद्ध (1971): युद्ध के कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ा। लगभग 80 लाख शरणार्थी भारत आए, जिससे संसाधनों पर दबाव बढ़ा।
- अंतर्राष्ट्रीय तेल संकट (1973): कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई, जिससे भारत में महंगाई चरम पर पहुँच गई।
- खाद्यान्न उत्पादन में कमी: मानसून की विफलता के कारण कृषि उत्पादन गिरा।
- बेरोजगारी: देश में बेरोजगारी तेजी से बढ़ी, खासकर शिक्षित युवाओं में।
- औद्योगिक विकास की धीमी गति: सरकार ने खर्च कम करने के लिए कर्मचारियों के वेतन फ्रीज कर दिए, जिससे असंतोष बढ़ा।
- गैर-कांग्रेसी सरकारों का उदय और विरोध:
- 1967 के बाद कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं, जिससे केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव आया।
- विपक्षी दल एकजुट होने लगे और सरकार की नीतियों का मुखर विरोध करने लगे।
- संसद के बाहर जन-विरोध और आंदोलनों का दौर शुरू हुआ।
- नक्सलवादी आंदोलन: पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी क्षेत्र से शुरू हुआ यह आंदोलन, भूमिहीन किसानों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए सशस्त्र संघर्ष का आह्वान कर रहा था, जिससे कानून-व्यवस्था की चुनौती बढ़ गई।
2. गुजरात और बिहार आंदोलन
- गुजरात आंदोलन (जनवरी 1974):
- गुजरात में छात्रों ने खाद्य तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ आंदोलन शुरू किया।
- जनता पार्टी और विपक्षी दलों ने छात्रों का समर्थन किया।
- मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा और विधानसभा भंग कर दी गई।
- बिहार आंदोलन (मार्च 1974):
- बिहार में छात्रों ने बढ़ती कीमतों, खाद्यान्न की कमी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया।
- छात्रों ने समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) को आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया।
- जेपी ने राजनीति से संन्यास ले लिया था, लेकिन उन्होंने कुछ शर्तों पर नेतृत्व स्वीकार किया:
- आंदोलन अहिंसक रहेगा।
- आंदोलन केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देशव्यापी जन-आंदोलन बनेगा।
- 'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान: जेपी ने 'संपूर्ण क्रांति' का नारा दिया, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में आमूलचूल परिवर्तन की बात कही गई।
- जेपी ने सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों से सरकार के "अवैध और अनैतिक" आदेशों का पालन न करने की अपील की।
- इस आंदोलन ने सरकार के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी।
3. न्यायपालिका से टकराव
- संसद की सर्वोच्चता बनाम न्यायपालिका की स्वतंत्रता:
- कांग्रेस सरकार और न्यायपालिका के बीच कई मुद्दों पर टकराव चल रहा था।
- मुख्य मुद्दे:
- क्या संसद मौलिक अधिकारों में कटौती कर सकती है?
- क्या संसद संपत्ति के अधिकार में कटौती कर सकती है?
- क्या संसद संविधान में संशोधन करके किसी भी हिस्से को बदल सकती है?
- केशवानंद भारती मामला (1973):
- सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि संसद संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) में कोई बदलाव नहीं कर सकती।
- यह निर्णय सरकार के लिए एक झटका था, क्योंकि सरकार संविधान में संशोधन करके अपनी नीतियों को लागू करना चाहती थी।
- मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति (1973):
- सरकार ने तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों (जे.एम. शेलट, के.एस. हेगड़े और ए.एन. ग्रोवर) की वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए ए.एन. रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया।
- इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला माना गया।
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला (12 जून 1975):
- समाजवादी नेता राज नारायण ने 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत को चुनौती दी थी।
- न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुनाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव प्रचार में सरकारी कर्मचारियों का दुरुपयोग किया था, जो चुनाव कानूनों का उल्लंघन था।
- अदालत ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया और उन्हें छह साल के लिए किसी भी निर्वाचित पद पर रहने से रोक दिया।
- इस फैसले से राजनीतिक संकट गहरा गया। विपक्षी दलों ने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की।
4. आपातकाल की घोषणा (25 जून 1975)
- कारण: सरकार ने कहा कि देश में "आंतरिक गड़बड़ी" का खतरा है और लोकतंत्र को बचाने के लिए आपातकाल आवश्यक है।
- तिथि: 25 जून 1975 की मध्यरात्रि।
- राष्ट्रपति: तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की।
- प्रभाव:
- सरकार ने सभी मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया।
- प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, यानी कोई भी समाचार प्रकाशित करने से पहले सरकार की अनुमति लेनी होगी।
- विपक्षी नेताओं को बड़े पैमाने पर गिरफ्तार किया गया।
- कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर व्यापक गिरफ्तारियाँ हुईं।
5. आपातकाल के दौरान क्या हुआ?
- गिरफ्तारियाँ और निवारक नजरबंदी:
- जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी जैसे प्रमुख विपक्षी नेताओं सहित लगभग 1.11 लाख लोगों को गिरफ्तार किया गया।
- 'निवारक नजरबंदी' कानून का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया, जिसके तहत व्यक्तियों को बिना किसी मुकदमे के गिरफ्तार किया जा सकता था।
- प्रेस सेंसरशिप:
- अखबारों को खबर छापने से पहले सरकारी अधिकारियों की मंजूरी लेनी पड़ती थी।
- कई पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया।
- 'इंडियन एक्सप्रेस' और 'स्टेट्समैन' जैसे अखबारों ने खाली जगह छोड़कर विरोध जताया।
- 'सेमिनार' और 'मेनस्ट्रीम' जैसी पत्रिकाओं ने सेंसरशिप के विरोध में प्रकाशन बंद कर दिया।
- संविधान में संशोधन:
- आपातकाल के दौरान 42वाँ संविधान संशोधन (1976) किया गया, जिसे 'लघु संविधान' भी कहा जाता है।
- इस संशोधन ने लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 साल कर दिया।
- न्यायपालिका की शक्तियों को कम किया गया और संसद की सर्वोच्चता स्थापित करने का प्रयास किया गया।
- प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'धर्मनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए।
- सरकार के विवादास्पद कदम:
- संजय गांधी की भूमिका: इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी ने आपातकाल के दौरान अत्यधिक शक्ति का प्रयोग किया, हालांकि वे किसी आधिकारिक पद पर नहीं थे।
- नसबंदी अभियान: जनसंख्या नियंत्रण के लिए जबरन नसबंदी अभियान चलाया गया, जिससे लोगों में भारी आक्रोश पैदा हुआ।
- झुग्गी-झोपड़ियों को हटाना: दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ियों को हटाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाए गए, जिससे हजारों लोग विस्थापित हुए।
- पुलिस और प्रशासन ने अत्यधिक बल का प्रयोग किया।
- विरोध और प्रतिरोध:
- आपातकाल का विरोध करने वाले कई भूमिगत संगठन सक्रिय हुए।
- कुछ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने भी विरोध किया।
- आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) पर प्रतिबंध लगा दिया गया, लेकिन उसके कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर विरोध जारी रखा।
6. आपातकाल के बाद
- चुनाव की घोषणा: 18 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की।
- जनता पार्टी का गठन: आपातकाल के विरोध में सभी प्रमुख विपक्षी दल एकजुट हुए और जनता पार्टी का गठन किया। इसमें कांग्रेस (ओ), जनसंघ, भारतीय लोकदल और समाजवादी पार्टी शामिल थे।
- 1977 के चुनाव परिणाम:
- कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा। उसे केवल 154 सीटें मिलीं।
- जनता पार्टी और उसके सहयोगियों को 330 से अधिक सीटें मिलीं।
- कांग्रेस उत्तर भारत में बुरी तरह हारी, जहाँ उसे एक भी सीट नहीं मिली। इंदिरा गांधी स्वयं रायबरेली से और संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गए।
- यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव था।
- जनता पार्टी सरकार:
- मोरारजी देसाई भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।
- जनता पार्टी में आंतरिक कलह और गुटबाजी के कारण यह सरकार केवल ढाई साल (1977-1979) तक चली।
- चौधरी चरण सिंह मोरारजी देसाई के बाद प्रधानमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार भी ज्यादा समय तक नहीं चल पाई।
- शाह आयोग:
- जनता पार्टी सरकार ने आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों की जाँच के लिए न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में एक जाँच आयोग (शाह आयोग) का गठन किया।
- आयोग ने पाया कि आपातकाल की घोषणा का कोई वास्तविक औचित्य नहीं था और कई मनमानी कार्रवाइयाँ की गईं।
7. आपातकाल से सबक
- भारतीय लोकतंत्र की मजबूती: आपातकाल ने दिखाया कि भारत से लोकतंत्र को हटाना कितना मुश्किल है। जनता ने चुनावों के माध्यम से अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया।
- मौलिक अधिकारों का महत्व: आपातकाल ने नागरिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के महत्व को उजागर किया।
- संस्थाओं के बीच संतुलन: इसने संविधान में निहित शक्तियों के संतुलन (कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका) के महत्व को रेखांकित किया।
- आंतरिक आपातकाल का दुरुपयोग: 'आंतरिक गड़बड़ी' के आधार पर आपातकाल लगाने की अस्पष्टता को समाप्त करने के लिए संविधान में संशोधन किए गए (44वाँ संशोधन, 1978)। अब 'सशस्त्र विद्रोह' के आधार पर ही आपातकाल लगाया जा सकता है।
8. लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट: एक विश्लेषण
- आपातकाल के पक्ष में तर्क:
- सरकार का तर्क था कि देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही थी, आंदोलन राष्ट्रीय विकास में बाधा डाल रहे थे।
- विपक्षी दल सरकार को अस्थिर करने का प्रयास कर रहे थे।
- अराजकता और विघटनकारी शक्तियों को रोकने के लिए आपातकाल आवश्यक था।
- आपातकाल के विपक्ष में तर्क:
- आपातकाल की घोषणा अनावश्यक थी, क्योंकि देश में 'आंतरिक गड़बड़ी' का कोई गंभीर खतरा नहीं था।
- यह सत्ता के दुरुपयोग और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम था।
- इसने मौलिक अधिकारों का हनन किया और प्रेस की स्वतंत्रता को कुचला।
- संस्थाओं को कमजोर किया गया।
यह अध्याय हमें सिखाता है कि लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए सतर्कता, नागरिक स्वतंत्रता का सम्मान और संवैधानिक संस्थाओं के बीच संतुलन कितना महत्वपूर्ण है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
भारत में आपातकाल की घोषणा किस वर्ष की गई थी?
अ) 1971
ब) 1973
स) 1975
द) 1977 -
आपातकाल की घोषणा के समय भारत के प्रधानमंत्री कौन थे?
अ) मोरारजी देसाई
ब) इंदिरा गांधी
स) लाल बहादुर शास्त्री
द) राजीव गांधी -
आपातकाल की घोषणा के समय भारत के राष्ट्रपति कौन थे?
अ) वी.वी. गिरि
ब) नीलम संजीव रेड्डी
स) फखरुद्दीन अली अहमद
द) ज्ञानी जैल सिंह -
किस उच्च न्यायालय ने 1975 में इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित किया था?
अ) दिल्ली उच्च न्यायालय
ब) इलाहाबाद उच्च न्यायालय
स) कलकत्ता उच्च न्यायालय
द) मुंबई उच्च न्यायालय -
बिहार आंदोलन का नेतृत्व किसने किया था और 'संपूर्ण क्रांति' का नारा किसने दिया था?
अ) मोरारजी देसाई
ब) जयप्रकाश नारायण
स) राममनोहर लोहिया
द) अटल बिहारी वाजपेयी -
केशवानंद भारती मामले का संबंध किससे है?
अ) मौलिक अधिकारों में संशोधन
ब) संपत्ति का अधिकार
स) संविधान का मूल ढाँचा
द) उपरोक्त सभी -
आपातकाल के दौरान कौन सा संविधान संशोधन किया गया था, जिसे 'लघु संविधान' भी कहा जाता है?
अ) 40वाँ संशोधन
ब) 42वाँ संशोधन
स) 44वाँ संशोधन
द) 45वाँ संशोधन -
1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद, भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री कौन बने?
अ) चौधरी चरण सिंह
ब) मोरारजी देसाई
स) जगजीवन राम
द) अटल बिहारी वाजपेयी -
आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों की जाँच के लिए किस आयोग का गठन किया गया था?
अ) मंडल आयोग
ब) शाह आयोग
स) कोठारी आयोग
द) सरकारिया आयोग -
44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा 'आंतरिक गड़बड़ी' शब्द को किस शब्द से प्रतिस्थापित किया गया था, जिसके आधार पर आपातकाल लगाया जा सकता है?
अ) युद्ध
ब) सशस्त्र विद्रोह
स) बाहरी आक्रमण
द) आर्थिक संकट
उत्तरमाला:
- स) 1975
- ब) इंदिरा गांधी
- स) फखरुद्दीन अली अहमद
- ब) इलाहाबाद उच्च न्यायालय
- ब) जयप्रकाश नारायण
- स) संविधान का मूल ढाँचा
- ब) 42वाँ संशोधन
- ब) मोरारजी देसाई
- ब) शाह आयोग
- ब) सशस्त्र विद्रोह
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस महत्वपूर्ण अध्याय को समझने और अपनी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। किसी भी अन्य प्रश्न के लिए आप पूछ सकते हैं।