Class 12 Political Science Notes Chapter 7 (जन आंदोलनों का उदय) – Samkalin Vishwa Rajniti Book

Samkalin Vishwa Rajniti
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम समकालीन विश्व राजनीति की पुस्तक के अध्याय 7 'जन आंदोलनों का उदय' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय भारतीय राजनीति में विभिन्न सामाजिक समूहों द्वारा अपनी मांगों को लेकर चलाए गए महत्वपूर्ण आंदोलनों पर प्रकाश डालता है। इन आंदोलनों ने न केवल समाज को प्रभावित किया, बल्कि सरकार की नीतियों और लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गहरा असर डाला। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें कई ऐतिहासिक तथ्य, प्रमुख व्यक्तित्व और वैचारिक बहसें शामिल हैं।

आइए, इस अध्याय के प्रमुख बिंदुओं को विस्तार से समझते हैं:


अध्याय 7: जन आंदोलनों का उदय

परिचय:
1970 के दशक के बाद भारतीय राजनीति में कई नए सामाजिक समूह उभरे, जिन्होंने अपनी विशिष्ट मांगों को लेकर आंदोलन चलाए। ये आंदोलन अक्सर राजनीतिक दलों से स्वतंत्र थे और इनका उद्देश्य सरकार की नीतियों को प्रभावित करना, सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना और विकास के वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करना था। इन आंदोलनों ने भारतीय लोकतंत्र को और अधिक जीवंत बनाया।


1. दलित पैंथर्स (Dalit Panthers)

  • गठन: 1972 में महाराष्ट्र में दलित युवाओं द्वारा गठित।
  • पृष्ठभूमि:
    • आजादी के बाद भी दलितों के प्रति भेदभाव और हिंसा जारी थी।
    • महाराष्ट्र में दलित साहित्य (दलित लिटरेचर) का उदय, जिसने दलितों के अनुभवों और पीड़ा को मुखर किया।
    • दलितों को मिलने वाले संवैधानिक अधिकारों (जैसे आरक्षण) का प्रभावी ढंग से लागू न होना।
  • उद्देश्य और मांगें:
    • जातिगत भेदभाव और हिंसा का विरोध।
    • दलितों के अधिकारों की रक्षा।
    • भूमिहीन गरीब किसानों, शहरी औद्योगिक मजदूरों और दलितों के लिए सामाजिक-आर्थिक समानता।
    • दलितों पर होने वाले अत्याचारों को रोकना।
  • कार्यप्रणाली:
    • सक्रिय विरोध प्रदर्शन, रैलियां।
    • दलित साहित्य के माध्यम से जागरूकता फैलाना।
    • दलितों को संगठित करना।
  • प्रभाव:
    • महाराष्ट्र में दलित राजनीति को एक नई दिशा दी।
    • दलितों के मुद्दों को राष्ट्रीय पटल पर लाया।
    • बाद में दलित पैंथर्स का विभाजन हुआ और कई सदस्य राजनीतिक दलों में शामिल हो गए।
    • दलितों के आत्मसम्मान और पहचान की भावना को मजबूत किया।

2. भारतीय किसान यूनियन (Bharatiya Kisan Union - BKU)

  • गठन: 1980 के दशक में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के किसानों द्वारा गठित।
  • नेतृत्व: महेंद्र सिंह टिकैत।
  • पृष्ठभूमि:
    • किसानों की आर्थिक स्थिति में गिरावट, कृषि उत्पादों की कम कीमतें।
    • सरकारी नीतियों का किसानों के प्रति उदासीन रवैया।
    • हरित क्रांति से कुछ क्षेत्रों में समृद्धि आई, लेकिन छोटे और सीमांत किसानों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ।
  • उद्देश्य और मांगें:
    • गन्ने और गेहूं की सरकारी खरीद कीमतों में वृद्धि।
    • कृषि उत्पादों के अंतर-राज्यीय आवागमन पर लगी पाबंदियों को समाप्त करना।
    • बिजली की दरों में कमी और मुफ्त बिजली।
    • किसानों के लिए पेंशन योजना।
    • किसानों का कर्ज माफ करना।
  • कार्यप्रणाली:
    • विशाल रैलियां, धरना प्रदर्शन, घेराव (सरकारी कार्यालयों का)।
    • सड़क और रेल मार्ग अवरुद्ध करना (रास्ता रोको, रेल रोको)।
    • सरकारी दफ्तरों का घेराव कर कई दिनों तक वहीं डटे रहना।
    • जातिगत एकजुटता (खाप पंचायतें) और सामुदायिक संसाधनों का उपयोग।
  • विशेषताएं:
    • गैर-दलीय आंदोलन, किसी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं।
    • मुख्य रूप से आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित।
    • समृद्ध किसानों का संगठन (पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट, हरियाणा के जाट, पंजाब के सिख)।
    • नई आर्थिक नीति (1991) का विरोध, क्योंकि इससे किसानों को मिलने वाली सब्सिडी में कटौती की आशंका थी।
  • प्रभाव:
    • सरकार को किसानों की मांगों पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया।
    • किसानों के मुद्दों को राष्ट्रीय एजेंडे पर लाया।
    • अन्य किसान संगठनों को भी प्रेरित किया।

3. शराब-विरोधी आंदोलन (Anti-Arrack Movement)

  • स्थान: आंध्र प्रदेश का नेल्लोर जिला।
  • शुरुआत: 1992।
  • पृष्ठभूमि:
    • पुरुषों द्वारा शराब (ताड़ी/अराक) का अत्यधिक सेवन।
    • घरेलू हिंसा में वृद्धि, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार।
    • परिवारों की आर्थिक बर्बादी, गरीबी में वृद्धि।
    • महिलाओं में साक्षरता कार्यक्रम के दौरान जागरूकता का उदय।
  • उद्देश्य और मांगें:
    • शराब की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध।
    • घरेलू हिंसा को रोकना।
    • महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार।
  • कार्यप्रणाली:
    • महिलाओं द्वारा स्वयं संगठित होकर शराब की दुकानों पर ताले लगाना।
    • शराब की नीलामी को रोकना।
    • पुरुषों को शराब छोड़ने के लिए प्रेरित करना।
    • शराब माफिया और सरकार के खिलाफ संघर्ष।
  • प्रभाव:
    • राज्य सरकार को शराबबंदी लागू करने के लिए मजबूर किया (हालांकि यह पूर्णतः सफल नहीं रहा)।
    • महिला आंदोलन को एक नई दिशा दी, महिलाओं के मुद्दों को सार्वजनिक पटल पर लाया।
    • महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया।
    • यह आंदोलन महिला आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

4. नर्मदा बचाओ आंदोलन (Narmada Bachao Andolan - NBA)

  • परियोजना: नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध परियोजना।
  • प्रभावित क्षेत्र: गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी और किसान समुदाय।
  • शुरुआत: 1980 के दशक के अंत में।
  • नेतृत्व: मेधा पाटकर, बाबा आमटे, अरुंधति रॉय (बाद में)।
  • पृष्ठभूमि:
    • सरदार सरोवर बांध के निर्माण से बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन।
    • वन, कृषि भूमि और पर्यावरण का विनाश।
    • विस्थापितों के लिए उचित पुनर्वास और मुआवजे का अभाव।
  • उद्देश्य और मांगें:
    • शुरुआत में विस्थापितों के लिए उचित पुनर्वास और मुआवजे की मांग।
    • बाद में बांध के निर्माण को रोकना और उसकी ऊंचाई कम करना।
    • विकास के वैकल्पिक मॉडल पर विचार करना, जो पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के अनुकूल हो।
  • कार्यप्रणाली:
    • जन सुनवाई, विरोध प्रदर्शन, रैलियां, पदयात्राएं।
    • अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर समर्थन जुटाना।
    • न्यायालय में कानूनी लड़ाई लड़ना।
    • भूख हड़ताल, जल सत्याग्रह।
  • आंदोलन के चरण:
    • पहला चरण (1980 के दशक): मुख्य रूप से विस्थापितों के पुनर्वास और मुआवजे पर केंद्रित।
    • दूसरा चरण (1990 के दशक): बांध के निर्माण को रोकने और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को उजागर करने पर केंद्रित।
  • न्यायालय का हस्तक्षेप:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने 1999 में बांध के निर्माण को जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन पुनर्वास के लिए कुछ शर्तें रखीं।
    • 2000 में सर्वोच्च न्यायालय ने बांध के निर्माण को रोकने से इनकार कर दिया, लेकिन पुनर्वास को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया।
  • प्रभाव:
    • भारत में विकास परियोजनाओं और पर्यावरण के बीच संतुलन पर बहस छेड़ दी।
    • विस्थापन और पुनर्वास के मुद्दों को राष्ट्रीय एजेंडे पर लाया।
    • पर्यावरण संबंधी जागरूकता बढ़ाई।
    • विकास के बड़े मॉडल पर सवाल उठाए, छोटे और स्थानीय विकास परियोजनाओं की वकालत की।
    • आंदोलन को आंशिक सफलता मिली, क्योंकि बांध का निर्माण तो नहीं रुका, लेकिन पुनर्वास नीतियों में सुधार हुआ और पर्यावरण संबंधी चिंताओं को बल मिला।

5. जन आंदोलनों के सबक और भारतीय लोकतंत्र पर प्रभाव

  • लोकतंत्र में भागीदारी: इन आंदोलनों ने दिखाया कि लोकतंत्र में केवल चुनाव और राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि जन भागीदारी भी महत्वपूर्ण है।
  • सामाजिक-आर्थिक न्याय: आंदोलनों ने वंचितों, दलितों, किसानों, महिलाओं और आदिवासियों के सामाजिक-आर्थिक न्याय की मांगों को उठाया।
  • राजनीतिक दलों पर दबाव: इन आंदोलनों ने राजनीतिक दलों को जनहित के मुद्दों पर ध्यान देने और अपनी नीतियों में बदलाव करने के लिए मजबूर किया।
  • नीति निर्माण में भागीदारी: आंदोलनों ने सरकार की नीतियों के निर्माण में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने की वकालत की।
  • विकास मॉडल पर बहस: नर्मदा बचाओ आंदोलन जैसे आंदोलनों ने विकास के बड़े पैमाने वाले मॉडल पर सवाल उठाए और पर्यावरण-अनुकूल तथा जन-केंद्रित विकास के वैकल्पिक मॉडल की मांग की।
  • नए सामाजिक समूह और पहचान: इन आंदोलनों ने विभिन्न सामाजिक समूहों को अपनी पहचान और अधिकारों के लिए संगठित होने का अवसर दिया।
  • सीमित सफलता और दीर्घकालिक प्रभाव: भले ही सभी आंदोलनों को उनकी सभी मांगों में पूर्ण सफलता न मिली हो, लेकिन उन्होंने समाज में जागरूकता बढ़ाई, सरकारी नीतियों को प्रभावित किया और भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाने में मदद की।
  • गैर-दलीय राजनीति: इन आंदोलनों ने गैर-दलीय राजनीति की भूमिका को मजबूत किया, जहां नागरिक समाज संगठन और दबाव समूह महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

निष्कर्ष:
जन आंदोलनों ने भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता को दर्शाया है। इन्होंने सरकार को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया, हाशिए पर पड़े समुदायों की आवाज को बुलंद किया और विकास तथा सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

  1. दलित पैंथर्स का गठन किस वर्ष और किस राज्य में हुआ था?
    a) 1970, गुजरात
    b) 1972, महाराष्ट्र
    c) 1975, उत्तर प्रदेश
    d) 1980, बिहार

  2. भारतीय किसान यूनियन (BKU) के प्रमुख नेता कौन थे?
    a) मेधा पाटकर
    b) बाबा आमटे
    c) महेंद्र सिंह टिकैत
    d) सुंदरलाल बहुगुणा

  3. शराब-विरोधी आंदोलन मुख्य रूप से किस राज्य की महिलाओं द्वारा चलाया गया था?
    a) गुजरात
    b) राजस्थान
    c) आंध्र प्रदेश
    d) महाराष्ट्र

  4. नर्मदा बचाओ आंदोलन का संबंध किस बांध परियोजना से है?
    a) भाखड़ा नांगल बांध
    b) टिहरी बांध
    c) सरदार सरोवर बांध
    d) हीराकुंड बांध

  5. नर्मदा बचाओ आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक कौन हैं?
    a) अन्ना हजारे
    b) मेधा पाटकर
    c) जयप्रकाश नारायण
    d) लालकृष्ण आडवाणी

  6. भारतीय किसान यूनियन की मुख्य मांगों में से एक क्या नहीं थी?
    a) गन्ने और गेहूं की खरीद कीमतों में वृद्धि
    b) बिजली दरों में कमी
    c) किसानों के लिए पेंशन योजना
    d) शराब की बिक्री पर प्रतिबंध

  7. दलित पैंथर्स का मुख्य उद्देश्य क्या था?
    a) किसानों के लिए बेहतर मूल्य
    b) शराबबंदी
    c) जातिगत भेदभाव और हिंसा का विरोध
    d) बांध निर्माण का विरोध

  8. किस आंदोलन ने महिलाओं के घरेलू हिंसा और आर्थिक बर्बादी जैसे मुद्दों को उठाया?
    a) दलित पैंथर्स
    b) नर्मदा बचाओ आंदोलन
    c) शराब-विरोधी आंदोलन
    d) भारतीय किसान यूनियन

  9. किस आंदोलन ने विकास के बड़े मॉडल पर सवाल उठाए और पर्यावरण संरक्षण की वकालत की?
    a) भारतीय किसान यूनियन
    b) दलित पैंथर्स
    c) शराब-विरोधी आंदोलन
    d) नर्मदा बचाओ आंदोलन

  10. 1991 की नई आर्थिक नीति का विरोध करने वाले प्रमुख संगठनों में से एक कौन था?
    a) दलित पैंथर्स
    b) नर्मदा बचाओ आंदोलन
    c) भारतीय किसान यूनियन
    d) उपर्युक्त सभी


MCQs के उत्तर:

  1. b) 1972, महाराष्ट्र
  2. c) महेंद्र सिंह टिकैत
  3. c) आंध्र प्रदेश
  4. c) सरदार सरोवर बांध
  5. b) मेधा पाटकर
  6. d) शराब की बिक्री पर प्रतिबंध
  7. c) जातिगत भेदभाव और हिंसा का विरोध
  8. c) शराब-विरोधी आंदोलन
  9. d) नर्मदा बचाओ आंदोलन
  10. c) भारतीय किसान यूनियन

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को गहराई से समझने और अपनी सरकारी परीक्षा की तैयारी में मदद करेंगे। शुभकामनाएं!

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