Class 12 Political Science Notes Chapter 8 (क्षेत्रीय आकांक्षाएँ) – Samkalin Vishwa Rajniti Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम समकालीन विश्व राजनीति पुस्तक के अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय 'क्षेत्रीय आकांक्षाएँ' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय पहचान और स्वायत्तता की मांगों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है। आइए, इस अध्याय के मुख्य बिंदुओं को गहराई से समझते हैं।
अध्याय 8: क्षेत्रीय आकांक्षाएँ (Detailed Notes for Government Exam Preparation)
अध्याय का परिचय:
भारत एक विशाल और विविधताओं से भरा देश है। यहाँ विभिन्न भाषाएँ, संस्कृतियाँ, धर्म और जातीय समूह निवास करते हैं। स्वतंत्रता के बाद, भारतीय लोकतंत्र ने इन विविधताओं को समायोजित करने का प्रयास किया है। क्षेत्रीय आकांक्षाएँ इन्हीं विविधताओं का एक स्वाभाविक परिणाम हैं, जहाँ लोग अपनी विशिष्ट पहचान, संस्कृति और विकास के लिए अधिक स्वायत्तता या अलग पहचान की मांग करते हैं। ये आकांक्षाएँ कभी-कभी अलगाववादी रूप ले लेती हैं, लेकिन अक्सर ये लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर ही अपनी पहचान और अधिकारों को सुरक्षित रखने की इच्छा होती हैं।
1. भारत में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की प्रकृति:
- क्षेत्रीय आकांक्षाएँ क्या हैं? ये किसी विशेष क्षेत्र के लोगों द्वारा अपनी पहचान, संस्कृति, भाषा, आर्थिक विकास या राजनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने या बढ़ाने के लिए की जाने वाली मांगें हैं।
- विभिन्न रूप:
- अलग राज्य की मांग: जैसे भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन, या छोटे राज्यों की मांग (उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़)।
- स्वायत्तता की मांग: राज्य के भीतर अधिक राजनीतिक, आर्थिक या प्रशासनिक अधिकार।
- विकास की मांग: पिछड़े क्षेत्रों द्वारा संसाधनों के बेहतर वितरण और विकास योजनाओं की मांग।
- सांस्कृतिक पहचान की मांग: अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा या जातीय समूह को संरक्षित करने और बढ़ावा देने की मांग।
- लोकतांत्रिक राजनीति में इनका स्थान: भारतीय लोकतंत्र ने इन आकांक्षाओं को समायोजित करने के लिए बातचीत, समझौते और संवैधानिक परिवर्तनों का मार्ग अपनाया है, न कि केवल बल प्रयोग का।
2. जम्मू-कश्मीर: क्षेत्र, पहचान और स्वायत्तता
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- भारत की स्वतंत्रता के समय, जम्मू-कश्मीर एक रियासत थी जिसके शासक महाराजा हरि सिंह थे।
- पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया, जिसके बाद महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को 'विलय पत्र' पर हस्ताक्षर करके जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय कर दिया।
- भारत ने संयुक्त राष्ट्र में यह मामला उठाया।
- अनुच्छेद 370: भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया, जिसके तहत रक्षा, विदेश मामले और संचार को छोड़कर अन्य सभी मामलों में कानून बनाने के लिए राज्य सरकार की सहमति आवश्यक थी।
- अनुच्छेद 35A: यह अनुच्छेद राज्य के स्थायी निवासियों को विशेष अधिकार और विशेषाधिकार देता था।
- क्षेत्रीय विविधता:
- कश्मीर घाटी: मुस्लिम बहुल, कश्मीरी भाषा।
- जम्मू: हिंदू बहुल, डोगरी भाषा।
- लद्दाख: बौद्ध बहुल, लद्दाखी भाषा।
- संघर्ष के मुख्य मुद्दे:
- स्वायत्तता: राज्य को दी गई विशेष स्वायत्तता को बनाए रखने की मांग।
- पाकिस्तान का दावा: पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर को अपना अभिन्न अंग मानता है और इस पर लगातार दावा करता रहा है।
- उग्रवाद: 1989 के बाद से पाकिस्तान समर्थित उग्रवाद ने राज्य में हिंसा और अस्थिरता को बढ़ावा दिया।
- आंतरिक राजनीति: नेशनल कॉन्फ्रेंस (शेख अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (मुफ्ती मोहम्मद सईद, महबूबा मुफ्ती) जैसे क्षेत्रीय दल राज्य की राजनीति में सक्रिय रहे हैं।
- महत्वपूर्ण घटनाक्रम (अगस्त 2019):
- 5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A को निरस्त कर दिया।
- जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों - जम्मू-कश्मीर (विधानसभा सहित) और लद्दाख (विधानसभा रहित) में पुनर्गठित कर दिया गया।
- यह कदम राज्य को भारत के अन्य राज्यों के समान लाने और विकास को गति देने के उद्देश्य से उठाया गया।
3. पंजाब: त्रासदी और सुलह
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- 1947 के विभाजन का सबसे अधिक दर्द पंजाब ने झेला।
- भाषाई आधार पर पुनर्गठन: 1966 में पंजाबी भाषी राज्य पंजाब, हिंदी भाषी हरियाणा और पहाड़ी क्षेत्रों को हिमाचल प्रदेश के रूप में पुनर्गठित किया गया।
- अकाली दल का उदय और स्वायत्तता की मांग:
- अकाली दल: सिखों का प्रमुख राजनीतिक दल, जिसने पंजाबी सूबा आंदोलन का नेतृत्व किया।
- आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973): अकाली दल ने इस प्रस्ताव में पंजाब के लिए अधिक स्वायत्तता (केंद्र-राज्य संबंधों के पुनर्गठन की मांग), सिख पहचान की रक्षा और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की मांग की। इसे कुछ लोगों ने एक अलग सिख राष्ट्र 'खालिस्तान' की मांग के रूप में भी देखा।
- उग्रवाद का उभार (1980 का दशक):
- जरनैल सिंह भिंडरांवाले: एक धार्मिक नेता जिसने उग्रवादी तत्वों को बढ़ावा दिया और खालिस्तान की मांग को हवा दी।
- भिंडरांवाले और उसके समर्थक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में छिप गए और इसे अपना मुख्यालय बना लिया।
- ऑपरेशन ब्लू स्टार (जून 1984):
- भारत सरकार ने स्वर्ण मंदिर से उग्रवादियों को बाहर निकालने के लिए सैन्य अभियान चलाया।
- इस अभियान में भिंडरांवाले मारा गया, लेकिन इससे सिख समुदाय की भावनाएँ आहत हुईं और हिंसा भड़क उठी।
- इंदिरा गांधी की हत्या (अक्टूबर 1984):
- ऑपरेशन ब्लू स्टार के कुछ महीनों बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या कर दी गई।
- इसके बाद दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में सिखों के खिलाफ व्यापक दंगे हुए, जिसमें हजारों सिख मारे गए।
- राजीव-लोंगोवाल समझौता (1985):
- प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अकाली दल के अध्यक्ष हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच शांति समझौता हुआ।
- इसमें चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपना, रावी-व्यास नदी जल विवाद का समाधान और पंजाब में सामान्य स्थिति बहाल करने के प्रावधान थे।
- दुर्भाग्य से, लोंगोवाल की हत्या कर दी गई और समझौता पूरी तरह से लागू नहीं हो सका।
- शांति की वापसी: 1990 के दशक के मध्य तक, उग्रवाद कमजोर पड़ गया और पंजाब में शांति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल हुई।
4. पूर्वोत्तर भारत: विविधता में एकता की चुनौती
- क्षेत्र की विविधता:
- 'सात बहनें' (असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा) और सिक्किम।
- अत्यधिक जनजातीय विविधता, भाषाई विविधता (130 से अधिक भाषाएँ)।
- दुर्गम भौगोलिक स्थिति, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घिरा (चीन, म्यांमार, बांग्लादेश, भूटान)।
- समस्याओं के कारण:
- विकास की कमी: दुर्गम भूभाग और केंद्र से दूरी के कारण विकास परियोजनाओं का धीमा क्रियान्वयन।
- बाहरी लोगों का मुद्दा: बांग्लादेश से अवैध प्रवासन और अन्य राज्यों से लोगों के आने से स्थानीय पहचान और संसाधनों पर दबाव।
- स्वायत्तता और अलगाववाद की मांगें: विभिन्न जनजातीय समूहों द्वारा अपनी विशिष्ट पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष।
- प्रमुख आंदोलन और समाधान:
- नागालैंड:
- नागा राष्ट्रीय परिषद (NNC) ने अंगामी जापू फिजो के नेतृत्व में 1950 के दशक में भारत से अलग होने की मांग की।
- नागालैंड को 1963 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
- बाद में नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (NSCN) जैसे समूह सक्रिय हुए। सरकार के साथ शांति वार्ता जारी है।
- मिजोरम:
- 1959 में आए अकाल के बाद केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया से असंतोष बढ़ा।
- मिजो नेशनल फ्रंट (MNF): लालडेंगा के नेतृत्व में 1966 में भारत से अलग होने की मांग के साथ सशस्त्र विद्रोह शुरू किया।
- मिजो समझौता (1986): राजीव गांधी सरकार और लालडेंगा के बीच ऐतिहासिक समझौता। MNF ने हथियार डाले, मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और लालडेंगा मुख्यमंत्री बने। यह भारत में एक सफल शांति समझौते का उदाहरण है।
- असम:
- बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर असम आंदोलन (1979-1985) चला।
- असम गण परिषद (AGP): आंदोलन के नेताओं ने यह दल बनाया और 1985 में सत्ता में आए।
- असम समझौता (1985): केंद्र सरकार और असम के आंदोलनकारी नेताओं के बीच समझौता, जिसमें अवैध प्रवासियों की पहचान और निर्वासन का प्रावधान था।
- उल्फा (ULFA): यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम, एक अलगाववादी संगठन जिसने संप्रभु असम की मांग की।
- बोडोलैंड की मांग: असम के बोडो समुदाय द्वारा एक अलग राज्य की मांग, जिसके लिए बोडो समझौता (2003, 2020) किए गए।
- नागालैंड:
- सकारात्मक पहलू: पूर्वोत्तर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया ने विभिन्न समूहों को अपनी मांगों को व्यक्त करने का अवसर दिया है। केंद्र सरकार ने विकास और कनेक्टिविटी पर जोर दिया है।
5. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ और लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया:
- लोकतांत्रिक दृष्टिकोण: भारत ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं को केवल कानून और व्यवस्था की समस्या के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से संबोधित करने का प्रयास किया है।
- समाधान के तरीके:
- बातचीत और समझौते: मिजो समझौता, असम समझौता, राजीव-लोंगोवाल समझौता।
- स्वायत्तता प्रदान करना: विशेष राज्य का दर्जा, जनजातीय क्षेत्रों के लिए स्वायत्त परिषदें (जैसे बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल)।
- विकास पर ध्यान: पिछड़े क्षेत्रों के लिए विशेष पैकेज और योजनाएँ।
- राज्यों का पुनर्गठन: नए राज्यों का निर्माण (उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना)।
- लोकतंत्र की भूमिका: भारतीय लोकतंत्र ने विभिन्न क्षेत्रीय पहचानों को राष्ट्रीय एकता के भीतर समायोजित करने की क्षमता दिखाई है। यह अलगाववाद की प्रवृत्ति को मुख्यधारा की राजनीति में लाने में सहायक हुआ है।
- निष्कर्ष: क्षेत्रीय आकांक्षाएँ भारतीय लोकतंत्र की शक्ति का प्रतीक हैं, जहाँ विभिन्न पहचानें अपनी अभिव्यक्ति पाती हैं और उन्हें राष्ट्रीय एकता के भीतर समायोजित किया जाता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत में विलय के लिए विलय पत्र पर कब हस्ताक्षर किए?
a) 15 अगस्त 1947
b) 26 अक्टूबर 1947
c) 26 जनवरी 1950
d) 5 अगस्त 2019 -
भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देता था, जिसे 2019 में निरस्त कर दिया गया?
a) अनुच्छेद 371
b) अनुच्छेद 370
c) अनुच्छेद 356
d) अनुच्छेद 324 -
ऑपरेशन ब्लू स्टार का संबंध किस राज्य से है?
a) जम्मू-कश्मीर
b) असम
c) पंजाब
d) मिजोरम -
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973) का संबंध किस राजनीतिक दल से था?
a) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
b) अकाली दल
c) नेशनल कॉन्फ्रेंस
d) असम गण परिषद -
मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) के संस्थापक कौन थे, जिन्होंने बाद में मिजोरम के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया?
a) अंगामी जापू फिजो
b) लालडेंगा
c) प्रफुल्ल कुमार महंत
d) जरनैल सिंह भिंडरांवाले -
मिजो समझौता किस वर्ष हुआ, जिसने मिजोरम में शांति स्थापित की?
a) 1975
b) 1986
c) 1992
d) 2003 -
असम आंदोलन का मुख्य मुद्दा क्या था?
a) अलग राज्य की मांग
b) भाषाई पुनर्गठन
c) बाहरी लोगों (विशेषकर अवैध प्रवासियों) का मुद्दा
d) आर्थिक विकास की कमी -
अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर राज्य को कितने केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया?
a) एक
b) दो
c) तीन
d) चार -
राजीव-लोंगोवाल समझौता किस वर्ष हुआ था?
a) 1984
b) 1985
c) 1986
d) 1987 -
पूर्वोत्तर भारत के किस राज्य को 1963 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिला था, जहाँ नागा आंदोलन सक्रिय था?
a) असम
b) मणिपुर
c) नागालैंड
d) त्रिपुरा
MCQ उत्तर:
- b) 26 अक्टूबर 1947
- b) अनुच्छेद 370
- c) पंजाब
- b) अकाली दल
- b) लालडेंगा
- b) 1986
- c) बाहरी लोगों (विशेषकर अवैध प्रवासियों) का मुद्दा
- b) दो (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख)
- b) 1985
- c) नागालैंड
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को गहराई से समझने और सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में मदद करेंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें।