Class 12 Sanskrit Notes Chapter 1 (Chapter 1) – Shaswati Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी 'शाश्वती' पाठ्यपुस्तक के प्रथम अध्याय 'मङ्गलाचरणम्' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अध्याय में दिए गए श्लोक न केवल हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग हैं, बल्कि इनमें निहित व्याकरणिक संरचनाएँ और भावार्थ भी परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं।
अध्याय 1: मङ्गलाचरणम्
I. भूमिका: मङ्गलाचरण का महत्व
किसी भी शुभ कार्य, विशेषतः ग्रंथ-रचना अथवा अध्ययन के आरम्भ में विघ्नों के निवारण और कार्य की निर्विघ्न समाप्ति के लिए ईश्वर अथवा इष्टदेव का स्मरण करना 'मङ्गलाचरण' कहलाता है। यह भारतीय संस्कृति की एक चिर-परिचित परम्परा है। मङ्गलाचरण तीन प्रकार का होता है - आशीर्वादात्मक, नमस्कारात्मक और वस्तुनिर्देशात्मक। प्रस्तुत अध्याय में ये तीनों प्रकार के मङ्गलाचरण सम्मिलित हैं।
II. प्रथम श्लोक: सरस्वती वन्दना (आशीर्वादात्मक)
श्लोक:
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता ।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ॥
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता ।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
पदच्छेद:
या कुन्द-इन्दु-तुषार-हार-धवला, या शुभ्र-वस्त्र-आवृता ।
या वीणा-वर-दण्ड-मण्डित-करा, या श्वेत-पद्मासना ॥
या ब्रह्मा-अच्युत-शंकर-प्रभृतिभिः देवैः सदा वन्दिता ।
सा माम् पातु सरस्वती भगवती निःशेष-जाड्य-अपहा ॥
अन्वय:
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला, या शुभ्रवस्त्रावृता, या वीणावरदण्डमण्डितकरा, या श्वेतपद्मासना, या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिः देवैः सदा वन्दिता, सा निःशेषजाड्यापहा भगवती सरस्वती मां पातु।
भावार्थ:
जो कुन्द के फूल, चंद्रमा, बर्फ और मोतियों के हार के समान श्वेत वर्ण वाली हैं; जो श्वेत वस्त्रों से ढकी हुई हैं; जिनके हाथों में श्रेष्ठ वीणा का दण्ड सुशोभित है; जो श्वेत कमल के आसन पर विराजमान हैं; जिनकी ब्रह्मा, विष्णु (अच्युत), शिव (शंकर) आदि प्रमुख देवताओं द्वारा सदैव वंदना की जाती है - वे संपूर्ण जड़ता (अज्ञान) को दूर करने वाली भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें।
व्याकरणात्मक टिप्पणियाँ:
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संधि:
- कुन्देन्दु (कुन्द + इन्दु) - गुण संधि
- तुषारहारधवला (तुषार + हार + धवला) - दीर्घ संधि (हार + धवला)
- शुभ्रवस्त्रावृता (शुभ्र + वस्त्र + आवृता) - दीर्घ संधि (वस्त्र + आवृता)
- वीणावरदण्ड (वीणा + वर + दण्ड) - दीर्घ संधि (वीणा + वर)
- ब्रह्माच्युतशंकर (ब्रह्मा + अच्युत + शंकर) - दीर्घ संधि (ब्रह्मा + अच्युत)
- निःशेषजाड्यापहा (निःशेष + जाड्य + अपहा) - विसर्ग संधि (निःशेष + जाड्य), दीर्घ संधि (जाड्य + अपहा)
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समास:
- कुन्देन्दुतुषारहारधवला: कुन्दः इन्दुः तुषारः हारः इव धवला (उपमान पूर्वपद बहुव्रीहि समास)
- शुभ्रवस्त्रावृता: शुभ्राणि वस्त्राणि यस्याः तया आवृता (बहुव्रीहि समास)
- वीणावरदण्डमण्डितकरा: वीणायाः वरदण्डः तेन मण्डिताः कराः यस्याः सा (षष्ठी तत्पुरुष + बहुव्रीहि समास)
- श्वेतपद्मासना: श्वेतं पद्मम् आसनं यस्याः सा (बहुव्रीहि समास)
- ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिः: ब्रह्मा च अच्युतः च शंकरः च ते प्रभृतयः येषां तैः (द्वन्द्व तत्पुरुष + बहुव्रीहि समास)
- निःशेषजाड्यापहा: निःशेषं जाड्यम् अपहन्ति इति (उपपद तत्पुरुष समास)
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प्रत्यय:
- धवला: धवल + टाप् (स्त्रीलिंग)
- आवृता: आ + वृ + क्त + टाप् (स्त्रीलिंग)
- मण्डितकरा: मण्ड् + क्त (मण्डित) + टाप् (करा)
- वन्दिता: वन्द् + क्त + टाप् (स्त्रीलिंग)
- अपहा: अप + हन् + ड + टाप् (स्त्रीलिंग)
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क्रियापद:
- पातु: पा (रक्षा करना) धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन। (आशीर्वाद के अर्थ में)
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छन्द: शार्दूलविक्रीडितम् (इसमें प्रत्येक चरण में 19 वर्ण होते हैं, यति 12वें और 7वें वर्ण पर होती है।)
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मुख्य बिन्दु: यह श्लोक देवी सरस्वती के दिव्य सौंदर्य, गुणों और उनकी अज्ञाननाशक शक्ति का वर्णन करता है। इसमें देवी से अज्ञान दूर कर ज्ञान प्रदान करने की प्रार्थना की गई है।
III. द्वितीय श्लोक: नारायण वन्दना (नमस्कारात्मक)
श्लोक:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
पदच्छेद:
नारायणम् नमस्कृत्य नरम् च एव नर-उत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीम् व्यासम् ततः जयम् उदीरयेत् ॥
अन्वय:
नारायणं, नरं च एव नरोत्तमं, देवीं सरस्वतीं, व्यासं च नमस्कृत्य ततः जयम् उदीरयेत्।
भावार्थ:
नारायण (भगवान विष्णु), नर (मनुष्य, यहाँ अर्जुन का प्रतीक), नरों में उत्तम (श्रेष्ठ पुरुष, यहाँ भी अर्जुन या किसी श्रेष्ठ पुरुष का प्रतीक), देवी सरस्वती और व्यास मुनि को नमस्कार करके उसके बाद 'जय' (महाभारत जैसे विजयगाथात्मक ग्रंथ) का उच्चारण करना चाहिए।
व्याकरणात्मक टिप्पणियाँ:
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संधि:
- चैव (च + एव) - वृद्धि संधि
- नरोत्तमम् (नर + उत्तमम्) - गुण संधि
- जयमुदीरयेत् (जयम् + उदीरयेत्) - परसवर्ण संधि (म का अनुस्वार) और गुण संधि (उदीरयेत्)
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समास:
- नरोत्तमम्: नराणाम् उत्तमः तम् (षष्ठी तत्पुरुष समास)
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प्रत्यय:
- नमस्कृत्य: नमस् + कृ + ल्यप् (पूर्वकालिक क्रिया, 'नमस्कार करके')
- उदीरयेत्: उत् + ईर् (प्रेरणार्थक) + विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन। ('उच्चारण करना चाहिए')
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क्रियापद:
- उदीरयेत्: उत् + ईर् (प्रेरणार्थक) धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
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अव्यय:
- चैव: (च + एव) - 'और ही' या 'भी'
- ततः: 'उसके बाद'
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सन्दर्भ: यह श्लोक महाभारत के आरम्भ में पाया जाता है और किसी भी ज्ञानवर्धक अथवा विजयगाथात्मक ग्रंथ के आरम्भ में इन चार महानुभावों को प्रणाम करने की परम्परा को दर्शाता है।
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मुख्य बिन्दु: यह श्लोक ज्ञान और विजय के प्रतीक नारायण, नर (अर्जुन), सरस्वती और व्यास को प्रणाम करने की महत्ता बताता है, जिससे ग्रंथ का पठन-पाठन निर्विघ्न संपन्न हो।
IV. तृतीय श्लोक: सर्वभूतहितम् (वैश्विक प्रार्थना)
श्लोक:
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत् ॥
पदच्छेद:
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख-भाक् भवेत् ॥
अन्वय:
सर्वे सुखिनः भवन्तु, सर्वे निरामयाः सन्तु, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, कश्चित् दुःखभाक् मा भवेत्।
भावार्थ:
सभी प्राणी सुखी हों, सभी निरोगी हों। सभी कल्याणकारी वस्तुओं को देखें (अर्थात् सभी का कल्याण हो)। कोई भी दुःख का भागी न हो (अर्थात् किसी को भी दुःख प्राप्त न हो)।
व्याकरणात्मक टिप्पणियाँ:
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संधि:
- कश्चिद् (कः + चित्) - विसर्ग संधि
- दुःखभाग् (दुःखभाक् + भवेत्) - जश्त्व संधि (क् का ग्)
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समास:
- सुखिनः: सुखम् अस्ति येषाम् ते (इनि प्रत्यय)
- निरामयाः: निर्गताः आमायाः येभ्यः ते (बहुव्रीहि समास)
- दुःखभाग्: दुःखस्य भाक् (षष्ठी तत्पुरुष समास)
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प्रत्यय:
- सुखिनः: सुख + इनि (मतुप् अर्थ में)
- निरामयाः: निर् + आमय + जस् (बहुवचन)
- भाग्: भज् + क्विन् (कर्तृवाचक)
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क्रियापद:
- भवन्तु: भू धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन। (हों)
- सन्तु: अस् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन। (हों)
- पश्यन्तु: दृश् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन। (देखें)
- भवेत्: भू धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन। (हो)
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अव्यय:
- मा: निषेधार्थक अव्यय ('न')
- कश्चित्: 'कोई भी'
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छन्द: अनुष्टुप् (इसमें प्रत्येक श्लोक में 8 वर्णों के चार पाद होते हैं।)
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सन्दर्भ: यह श्लोक भारतीय संस्कृति में अत्यंत प्रचलित है और विभिन्न पुराणों तथा उपनिषदों में इसके समान भाव वाले वाक्य मिलते हैं। यह सार्वभौमिक कल्याण की भावना को दर्शाता है।
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मुख्य बिन्दु: यह श्लोक समस्त संसार के प्राणियों के लिए सुख, निरोगता, कल्याण और दुःख-रहित जीवन की कामना करता है, जो भारतीय दर्शन की 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना का परिचायक है।
V. मङ्गलाचरण का समग्र महत्व (परीक्षा की दृष्टि से)
- संस्कार और परम्परा: यह भारतीय सांस्कृतिक परम्परा का अभिन्न अंग है, जो किसी भी कार्य के आरम्भ में शुभता का प्रतीक है।
- मानसिक एकाग्रता: मङ्गलाचरण मन को एकाग्र कर अध्ययन या कार्य के लिए अनुकूल वातावरण बनाता है।
- विघ्न-निवारण: ऐसी मान्यता है कि मङ्गलाचरण से कार्य में आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं।
- नैतिक मूल्य: 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' जैसे श्लोक सार्वभौमिक प्रेम, शांति और कल्याण के उच्च मानवीय मूल्यों को स्थापित करते हैं।
- व्याकरणिक ज्ञान: ये श्लोक संधि, समास, प्रत्यय, लकार, अव्यय और छन्द जैसे व्याकरण के विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
VI. अभ्यास प्रश्न (बहुविकल्पीय प्रश्न - MCQs)
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'या कुन्देन्दुतुषारहारधवला' इस श्लोक में 'धवला' पद का क्या अर्थ है?
अ) काली
ब) लाल
स) श्वेत
द) पीली -
देवी सरस्वती के हाथों में क्या सुशोभित है?
अ) शंख
ब) चक्र
स) वीणा
द) गदा -
'ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिः' पद में कौन-कौन से देवता सम्मिलित हैं?
अ) ब्रह्मा, विष्णु, शिव
ब) ब्रह्मा, इंद्र, अग्नि
स) विष्णु, शिव, गणेश
द) ब्रह्मा, वरुण, वायु -
'नारायणं नमस्कृत्य' श्लोक में 'नरोत्तमम्' पद किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
अ) व्यास
ब) सरस्वती
स) अर्जुन
द) नारायण -
'नमस्कृत्य' पद में कौन-सा प्रत्यय है?
अ) क्त्वा
ब) ल्यप्
स) तुमुन्
द) शतृ -
'सर्वे भवन्तु सुखिनः' इस श्लोक का मुख्य भाव क्या है?
अ) केवल अपने सुख की कामना
ब) राष्ट्र के सुख की कामना
स) सभी प्राणियों के सुख की कामना
द) देवताओं के सुख की कामना -
'निरामयाः' पद का क्या अर्थ है?
अ) रोगी
ब) निरोगी
स) दुखी
द) सुखी -
'मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्' इस पंक्ति में 'मा' अव्यय का क्या अर्थ है?
अ) मेरा
ब) नहीं
स) कभी
द) अवश्य -
'या कुन्देन्दुतुषारहारधवला...' यह श्लोक किस छन्द में है?
अ) अनुष्टुप्
ब) इंद्रवज्रा
स) शार्दूलविक्रीडितम्
द) वसंततिलका -
'दुःखभाग्' पद में कौन-सी संधि है?
अ) दीर्घ संधि
ब) गुण संधि
स) जश्त्व संधि
द) यण संधि
उत्तरमाला:
- स) श्वेत
- स) वीणा
- अ) ब्रह्मा, विष्णु, शिव
- स) अर्जुन (या श्रेष्ठ पुरुष)
- ब) ल्यप्
- स) सभी प्राणियों के सुख की कामना
- ब) निरोगी
- ब) नहीं
- स) शार्दूलविक्रीडितम्
- स) जश्त्व संधि
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और अभ्यास प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। किसी भी प्रकार के संदेह या प्रश्न के लिए आप पूछ सकते हैं। शुभकामनाएँ!