Class 12 Sanskrit Notes Chapter 1 (विद्यायामतामश् नत) – Bhaswati Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी संस्कृत पाठ्यपुस्तक 'भास्वती' के प्रथम अध्याय 'विद्यायामतामश् नत' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी आगामी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अध्याय को गहराई से समझना आपको न केवल अच्छे अंक दिलाएगा, बल्कि जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण शिक्षा प्रदान करेगा।
अध्याय 1: विद्यायामतामश् नत (विद्या के द्वारा अमृतत्व को प्राप्त करता है)
1. अध्याय का परिचय एवं शीर्षक का अर्थ:
- शीर्षक: 'विद्यायामतामश् नत' का अर्थ है 'विद्या के द्वारा अमृतत्व (अमरता) को प्राप्त करता है'। यह शीर्षक इस अध्याय के मूल संदेश को दर्शाता है कि वास्तविक ज्ञान (आत्मज्ञान या ब्रह्मविद्या) ही मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर अमरता प्रदान करता है।
- स्रोत: यह अध्याय कठोपनिषद् के प्रथम अध्याय की द्वितीय वल्ली से संकलित है। कठोपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से संबंधित एक प्रमुख उपनिषद् है, जो उपनिषदों में अपनी दार्शनिक गहराई और संवाद शैली के लिए प्रसिद्ध है।
2. कथा का संदर्भ (नचिकेता-यम संवाद):
- यह अध्याय नचिकेता और यमराज के प्रसिद्ध संवाद का अंश है। नचिकेता एक जिज्ञासु बालक है जो अपने पिता वाजश्रवस द्वारा किए गए 'विश्वजित्' यज्ञ में त्रुटियाँ देखकर यमराज के पास जाता है।
- यमराज नचिकेता की दृढ़ता और ज्ञान-पिपासा से प्रसन्न होकर उसे तीन वरदान देते हैं। तीसरे वरदान के रूप में नचिकेता मृत्यु के रहस्य और आत्मज्ञान की मांग करता है।
- यमराज नचिकेता की परीक्षा लेने के लिए उसे अनेक प्रकार के सांसारिक भोग, लंबी आयु, धन-संपत्ति, साम्राज्य आदि का प्रलोभन देते हैं, किंतु नचिकेता इन सभी को क्षणभंगुर और निरर्थक मानकर अस्वीकार कर देता है।
3. अध्याय का मूल विषयवस्तु एवं प्रमुख अवधारणाएँ:
(क) श्रेयस और प्रेयस का भेद:
- यह अध्याय 'श्रेयस' और 'प्रेयस' के बीच के मूलभूत अंतर को स्पष्ट करता है।
- प्रेयस (Preyas): यह वह मार्ग है जो तात्कालिक सुख, इंद्रिय-भोग, लौकिक संपत्ति और भौतिक उपलब्धियों से संबंधित है। यह मार्ग प्रारंभ में सुखद प्रतीत होता है, किंतु अंततः दुःख और बंधन का कारण बनता है। अज्ञानी लोग इसी मार्ग का चुनाव करते हैं।
- श्रेयस (Shreyas): यह वह मार्ग है जो कल्याणकारी, आत्मोन्नतिदायक और मोक्षप्रद है। यह मार्ग प्रारंभ में कठिन और अप्रिय लग सकता है, क्योंकि इसमें त्याग, संयम और आत्म-अनुशासन की आवश्यकता होती है, किंतु अंततः यह परम शांति और अमरता की ओर ले जाता है। विवेकी और धैर्यवान लोग इसी मार्ग का चुनाव करते हैं।
- यमराज कहते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति श्रेयस को चुनता है, जबकि मूढ़ व्यक्ति प्रेयस को।
(ख) विद्या और अविद्या:
- विद्या (Vidya): यहाँ विद्या का अर्थ केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि आत्मज्ञान या ब्रह्मविद्या है, जो आत्मा के स्वरूप और परम सत्य का बोध कराती है। यही विद्या अमृतत्व की प्राप्ति का साधन है।
- अविद्या (Avidya): अविद्या का अर्थ अज्ञान है, जो सांसारिक भोगों और क्षणिक सुखों में आसक्ति उत्पन्न करता है। अविद्या से ग्रस्त व्यक्ति बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में फँसता है।
- यमराज बताते हैं कि अविद्या में डूबे हुए लोग स्वयं को बुद्धिमान मानकर भटकते रहते हैं, जैसे अंधे व्यक्ति का मार्गदर्शन कोई दूसरा अंधा करे।
(ग) नचिकेता की दृढ़ता और विवेक:
- नचिकेता यमराज द्वारा दिए गए सभी प्रलोभनों (पुत्र-पौत्र, पशु, हाथी, घोड़े, स्वर्ण, दीर्घायु, विशाल साम्राज्य, अप्सराएँ) को अस्वीकार कर देता है। वह इन्हें क्षणभंगुर और इंद्रियों को क्षीण करने वाला मानता है।
- उसका दृढ़ निश्चय है कि वह केवल आत्मज्ञान ही प्राप्त करेगा, क्योंकि वह जानता है कि कोई भी धन-संपत्ति मनुष्य को अमरता प्रदान नहीं कर सकती। उसकी यह दृढ़ता उसे श्रेष्ठ जिज्ञासु सिद्ध करती है।
(घ) आत्मज्ञान की दुर्लभता:
- यमराज बताते हैं कि आत्मा का ज्ञान अत्यंत सूक्ष्म, गूढ़ और समझने में कठिन है। इसे बहुत कम लोग ही सुन पाते हैं, और जो सुनते हैं उनमें से भी बहुत कम लोग इसे समझ पाते हैं।
- यह ज्ञान तर्क या वाद-विवाद से प्राप्त नहीं होता, बल्कि किसी योग्य आचार्य के उपदेश से ही प्राप्त होता है।
(ङ) धीर और मूढ़ का अंतर:
- धीर (Dheera): वह व्यक्ति जो विवेकी, धैर्यवान और आत्मज्ञानी होता है। वह श्रेयस मार्ग का चुनाव करता है और अमृतत्व को प्राप्त करता है।
- मूढ़ (Moodha): वह व्यक्ति जो अज्ञानी, अविवेकी और इंद्रिय-सुखों में लिप्त होता है। वह प्रेयस मार्ग का चुनाव करता है और जन्म-मृत्यु के चक्र में फँसा रहता है।
4. अध्याय का दार्शनिक महत्व:
- यह अध्याय भारतीय दर्शन की नींव में से एक है, जो भौतिकवाद पर अध्यात्मवाद की श्रेष्ठता स्थापित करता है।
- यह मानव जीवन के परम लक्ष्य (मोक्ष या अमृतत्व) की ओर संकेत करता है और उसे प्राप्त करने के लिए सही मार्ग (श्रेयस) का चुनाव करने की प्रेरणा देता है।
- यह उपनिषदीय शिक्षा का सार प्रस्तुत करता है कि वास्तविक सुख और शांति बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि अपने भीतर आत्मा के ज्ञान में निहित है।
5. प्रमुख संस्कृत शब्द एवं उनके अर्थ:
- विद्यायामतामश् नत: विद्या से अमृतत्व को प्राप्त करता है।
- श्रेयस: कल्याणकारी मार्ग, आत्मोन्नति का मार्ग।
- प्रेयस: प्रिय लगने वाला मार्ग, भोग-विलास का मार्ग।
- धीरः: विवेकी, बुद्धिमान।
- मूढः: मूर्ख, अज्ञानी।
- अमृतत्वम्: अमरता, मोक्ष।
- अविद्या: अज्ञान।
- संम्परायः: परलोक, मृत्यु के बाद का मार्ग।
- अभिमन्यते: मानता है।
- जरा: वृद्धावस्था।
- अतिदीर्घे जीविते: बहुत लंबी आयु में।
- अजरणामृतानाम्: जरा-रहित और अमर।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. 'विद्यायामतामश् नत' पाठ किस उपनिषद् से संकलित है?
अ) ईशोपनिषद्
ब) केनोपनिषद्
स) कठोपनिषद्
द) मुण्डकोपनिषद्
2. नचिकेता और यमराज का संवाद किस विषय पर आधारित है?
अ) धन-संपत्ति के महत्व पर
ब) आत्मज्ञान और मोक्ष पर
स) यज्ञों के अनुष्ठान पर
द) युद्ध-नीति पर
3. 'श्रेयस' मार्ग का चुनाव कौन करता है?
अ) मूढ़ व्यक्ति
ब) भोगी व्यक्ति
स) विवेकी व्यक्ति
द) भयभीत व्यक्ति
4. 'प्रेयस' मार्ग का क्या परिणाम होता है?
अ) मोक्ष की प्राप्ति
ब) तात्कालिक सुख और अंततः बंधन
स) अमरता की प्राप्ति
द) आत्मज्ञान
5. नचिकेता यमराज से तीसरे वरदान के रूप में क्या मांगता है?
अ) धन और साम्राज्य
ब) लंबी आयु और पुत्र-पौत्र
स) मृत्यु के रहस्य और आत्मज्ञान
द) स्वर्ग में स्थान
6. यमराज के अनुसार, अविद्या में डूबे हुए लोग कैसे भटकते हैं?
अ) गुरु के मार्गदर्शन में
ब) स्वयं को बुद्धिमान मानकर अंधे के समान
स) शास्त्रों का अध्ययन करके
द) यज्ञ करके
7. 'अतिदीर्घे जीविते' में कौन सा समास है?
अ) तत्पुरुष
ब) बहुव्रीहि
स) अव्ययीभाव
द) कर्मधारय
8. नचिकेता के पिता का क्या नाम था?
अ) उद्दालक
ब) वाजश्रवस
स) आरुणि
द) श्वेतकेतु
9. यमराज के अनुसार, आत्मा का ज्ञान कैसा होता है?
अ) अत्यंत सरल
ब) तर्क से प्राप्त होने वाला
स) सूक्ष्म और समझने में कठिन
द) शीघ्र प्राप्त होने वाला
10. 'विद्यायामतामश् नत' में 'अमृतत्वम्' का क्या अर्थ है?
अ) मृत्यु
ब) अमरता
स) भोजन
द) धन
उत्तरमाला:
- स) कठोपनिषद्
- ब) आत्मज्ञान और मोक्ष पर
- स) विवेकी व्यक्ति
- ब) तात्कालिक सुख और अंततः बंधन
- स) मृत्यु के रहस्य और आत्मज्ञान
- ब) स्वयं को बुद्धिमान मानकर अंधे के समान
- ब) बहुव्रीहि (क्योंकि 'बहुत लंबी है आयु जिसकी' - यह किसी व्यक्ति या स्थिति का विशेषण है)
- ब) वाजश्रवस
- स) सूक्ष्म और समझने में कठिन
- ब) अमरता
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को गहराई से समझने और परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करने में सहायता करेंगे। किसी भी अन्य शंका के लिए आप पूछ सकते हैं। शुभमस्तु!