Class 12 Sanskrit Notes Chapter 10 (Chapter 10) – Shaswati Book

Shaswati
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम आपकी 'शाश्वती' पाठ्यपुस्तक के दशम अध्याय 'मृच्छकटिकम्' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी आगामी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पाठ महाकवि शूद्रक द्वारा विरचित प्रसिद्ध प्रकरण ग्रन्थ 'मृच्छकटिकम्' के छठे अंक 'प्रवहणविपर्ययः' (गाड़ी का बदल जाना) से लिया गया एक अंश है। इसमें एक मार्मिक और नाटकीय घटना का चित्रण है, जो तत्कालीन समाज, मानव स्वभाव और कर्म के महत्व को दर्शाती है।


अध्याय 10: मृच्छकटिकम् (Mṛcchakaṭikam) - विस्तृत नोट्स

1. ग्रन्थ एवं लेखक परिचय:

  • ग्रन्थ का नाम: मृच्छकटिकम् (शाब्दिक अर्थ: मिट्टी की गाड़ी)
  • रचयिता: महाकवि शूद्रक (इनके काल और व्यक्तिगत जीवन के विषय में निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है, परन्तु इन्हें संस्कृत साहित्य के प्रमुख नाटककारों में गिना जाता है।)
  • विधा: प्रकरण (यह रूपक का एक प्रकार है, जिसमें समाज के सामान्य जन नायक-नायिका होते हैं। इसमें सामाजिक यथार्थ, प्रेम, संघर्ष और न्याय का चित्रण होता है।)
  • अंक: दस अंक।
  • मुख्य रस: श्रृंगार, करुण, वीर।
  • प्रस्तुत अंश: छठे अंक 'प्रवहणविपर्ययः' (गाड़ी का बदल जाना) से उद्धृत।
  • कथावस्तु: यह ग्रन्थ निर्धन ब्राह्मण चारुदत्त और उज्जैन की प्रसिद्ध गणिका वसन्तसेना के प्रेम की कथा पर आधारित है, जिसमें अनेक सामाजिक और राजनीतिक घटनाएँ भी समाहित हैं।

2. कथावस्तु का सार (प्रस्तुत अंश के अनुसार):

प्रस्तुत अंश की कथा उज्जैन नगरी में घटित होती है:

  • पृष्ठभूमि: उज्जैन में चारुदत्त नामक एक उदार, सदाचारी परन्तु निर्धन ब्राह्मण रहता था। वसन्तसेना नामक एक प्रसिद्ध और गुणवती गणिका चारुदत्त से प्रेम करती थी। राजा पालक का साला शकार भी वसन्तसेना पर आसक्त था, परन्तु वसन्तसेना उसे घृणा करती थी और उसके प्रेम प्रस्ताव को बार-बार ठुकराती थी।
  • गाड़ी बदलने की घटना (प्रवहणविपर्ययः):
    • एक रात, वसन्तसेना चारुदत्त से मिलने के लिए उत्सुक थी। वह अपनी गाड़ी में बैठकर चारुदत्त के घर की ओर जा रही थी।
    • उसी समय, शकार भी अपनी गाड़ी में था और वसन्तसेना का पीछा कर रहा था।
    • अंधेरे और वर्षा के कारण मार्ग में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई।
    • चारुदत्त के घर के पास दो गाड़ियाँ खड़ी थीं - एक चारुदत्त की (जिसमें उसका मित्र विदूषक बैठा था) और दूसरी शकार की।
    • वसन्तसेना को लगा कि वह चारुदत्त की गाड़ी में बैठ रही है, परन्तु गलती से वह शकार की गाड़ी में बैठ जाती है।
    • शकार का सारथी (स्थावरक) भी गलती से चारुदत्त की गाड़ी को लेकर चला जाता है। यह घटना ही 'प्रवहणविपर्यय' कहलाती है।
  • शकार का क्रूर कृत्य:
    • शकार अपनी गाड़ी में वसन्तसेना को देखकर अत्यंत प्रसन्न होता है, क्योंकि उसे लगता है कि उसकी इच्छा पूरी हो गई।
    • वसन्तसेना शकार को देखकर भयभीत हो जाती है और उसे धिक्कारती है। वह उसके दुराग्रह को स्वीकार नहीं करती।
    • वसन्तसेना के तिरस्कार से क्रोधित और अपमानित होकर शकार अपना आपा खो देता है। वह बलपूर्वक वसन्तसेना को गाड़ी से नीचे खींचता है और उसका गला घोंट देता है।
    • शकार उसे मृत समझकर एक निर्जन स्थान पर सूखे पत्तों के ढेर में फेंक देता है।
    • शकार का सारथी स्थावरक इस क्रूर कार्य का विरोध करता है, परन्तु शकार उसे भी धमकाता है और चुप करा देता है।
  • संवर्हक (बौद्ध भिक्षु) द्वारा रक्षा:
    • उसी निर्जन स्थान पर, संवर्हक नामक एक व्यक्ति, जो पहले जुआरी था और अब बौद्ध धर्म अपनाकर भिक्षु बन गया था, विहार के लिए सूखे पत्ते साफ कर रहा था।
    • पत्तियों के ढेर में उसे अचेत पड़ी वसन्तसेना मिलती है।
    • भिक्षु उसे मरा हुआ समझता है, परन्तु ध्यान से देखने पर उसे जीवन के लक्षण दिखाई देते हैं।
    • अपनी करुणा और सेवा-भाव से भिक्षु संवर्हक वसन्तसेना की सेवा करता है, उसे पानी पिलाता है और उसकी मूर्छा दूर करता है।
    • होश में आने पर वसन्तसेना भिक्षु का आभार व्यक्त करती है।
    • भिक्षु उसे पहचान लेता है, क्योंकि वसन्तसेना ने ही एक बार उसे जुए के कर्ज से मुक्ति दिलाकर उसकी सहायता की थी।
    • भिक्षु उसे एक बौद्ध विहार में ले जाकर उसकी जान बचाता है और उसकी देखभाल करता है।

3. प्रमुख पात्र एवं उनका चरित्र चित्रण:

  • वसन्तसेना:
    • प्रेमपरायणा: चारुदत्त से सच्चा और निस्वार्थ प्रेम करती है।
    • साहसी और स्वाभिमानी: रात में अकेली चारुदत्त से मिलने जाती है और शकार के दुराग्रह को ठुकराती है।
    • दयालु: पूर्व में संवर्हक की सहायता करके उसके प्रति उपकार किया था।
    • गुणवती: गणिका होते हुए भी उच्च नैतिक मूल्यों वाली।
  • शकार:
    • कामी और दुष्ट: वसन्तसेना को बलपूर्वक पाना चाहता है।
    • अहंकारी और क्रूर: राजा का साला होने के कारण घमंडी और अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है।
    • प्रतिशोधी: अपने तिरस्कार का बदला लेने के लिए हत्या जैसा जघन्य अपराध करता है।
    • विवेकहीन: क्रोध और वासना में अंधा होकर गलत निर्णय लेता है।
  • संवर्हक (बौद्ध भिक्षु):
    • परोपकारी और दयालु: अचेत वसन्तसेना को देखकर उसकी निस्वार्थ भाव से सहायता करता है।
    • कृतज्ञ: वसन्तसेना द्वारा पूर्व में की गई सहायता को याद रखता है और उसका प्रत्युपकार करता है।
    • परिवर्तित व्यक्ति: जुआरी जैसे बुरे मार्ग को छोड़कर बौद्ध भिक्षु बनकर एक नया, सेवामय जीवन जीता है।
    • शांत और संयमी: बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का पालन करने वाला।
  • स्थावरक (शकार का सारथी):
    • ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ: अपने मालिक के गलत कार्य का विरोध करता है।
    • भयभीत: शकार के आतंक के कारण चाहकर भी वसन्तसेना की सहायता नहीं कर पाता।

4. महत्वपूर्ण बिन्दु एवं संदेश:

  • अंधेरे और भ्रम का महत्व: यह अंश दर्शाता है कि कैसे एक छोटी सी गलती (गाड़ी का बदल जाना) और अंधेरे की स्थिति बड़े और अप्रत्याशित परिणामों (हत्या का प्रयास) को जन्म दे सकती है।
  • दुष्टों का स्वभाव: शकार का चरित्र दर्शाता है कि सत्ता, धन और वासना के मद में चूर व्यक्ति कितना क्रूर, विवेकहीन और अहंकारी हो सकता है।
  • सज्जनों की सहायता और परोपकार: संवर्हक का चरित्र यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी परोपकार, दया और कृतज्ञता का भाव ही मानवता को जीवित रखता है। यह 'कर भला तो हो भला' की उक्ति को चरितार्थ करता है।
  • कर्म का फल: यद्यपि प्रस्तुत अंश में इसका सीधा उल्लेख नहीं है, परन्तु पूरे 'मृच्छकटिकम्' नाटक में दिखाया गया है कि शकार को उसके जघन्य अपराधों का दंड मिलता है और सज्जनों की विजय होती है।
  • सामाजिक यथार्थ: यह प्रकरण तत्कालीन समाज की स्थिति, न्याय व्यवस्था की कमियाँ, विभिन्न वर्गों के लोगों के जीवन और नैतिक मूल्यों का चित्रण करता है।

5. भाषा-शैली:
शूद्रक की भाषा सरल, सुबोध और पात्रों के अनुकूल है। संवाद सजीव और नाटकीयता से परिपूर्ण हैं। प्रकृति का चित्रण भी यथार्थवादी है। प्रस्तुत अंश में भय, करुणा, क्रोध और प्रेम जैसे मानवीय भावों को सशक्त रूप से व्यक्त किया गया है।


बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):

  1. 'मृच्छकटिकम्' नामक प्रकरण ग्रन्थ के रचयिता कौन हैं?
    क) कालिदास
    ख) भवभूति
    ग) शूद्रक
    घ) भास

  2. 'मृच्छकटिकम्' किस विधा का ग्रन्थ है?
    क) नाटक
    ख) महाकाव्य
    ग) प्रकरण
    घ) खण्डकाव्य

  3. प्रस्तुत अंश 'मृच्छकटिकम्' के किस अंक से संकलित है?
    क) प्रथम अंक
    ख) पंचम अंक
    ग) षष्ठ अंक
    घ) दशम अंक

  4. वसन्तसेना किससे मिलने जा रही थी?
    क) शकार से
    ख) चारुदत्त से
    ग) संवर्हक से
    घ) राजा से

  5. 'प्रवहणविपर्ययः' का अर्थ क्या है?
    क) रथ का बिगड़ जाना
    ख) गाड़ी का बदल जाना
    ग) यात्रा का रद्द होना
    घ) मार्ग भटक जाना

  6. वसन्तसेना को मृत समझकर किसने उसका गला घोंटा था?
    क) चारुदत्त ने
    ख) विदूषक ने
    ग) शकार ने
    घ) संवर्हक ने

  7. वसन्तसेना को किसने जीवनदान दिया?
    क) चारुदत्त ने
    ख) शकार के सारथी ने
    ग) बौद्ध भिक्षु संवर्हक ने
    घ) राजा पालक ने

  8. बौद्ध भिक्षु बनने से पूर्व संवर्हक क्या था?
    क) व्यापारी
    ख) सैनिक
    ग) जुआरी
    घ) ब्राह्मण

  9. शकार कौन था?
    क) उज्जैन का राजा
    ख) चारुदत्त का मित्र
    ग) राजा पालक का साला
    घ) एक धनी व्यापारी

  10. 'मृच्छकटिकम्' में किस नगरी का वर्णन है?
    क) अयोध्या
    ख) मथुरा
    ग) पाटलिपुत्र
    घ) उज्जैन


उत्तरमाला (Answer Key):

  1. ग) शूद्रक
  2. ग) प्रकरण
  3. ग) षष्ठ अंक
  4. ख) चारुदत्त से
  5. ख) गाड़ी का बदल जाना
  6. ग) शकार ने
  7. ग) बौद्ध भिक्षु संवर्हक ने
  8. ग) जुआरी
  9. ग) राजा पालक का साला
  10. घ) उज्जैन

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