Class 12 Sanskrit Notes Chapter 10 (दोन्नबनध: श्रोनायार:) – Bhaswati Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी 'भास्वती' पुस्तक के दशम पाठ 'दोन्नबनध: श्रोनायार:' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी आगामी सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पाठ न केवल आपको संस्कृत साहित्य की एक सुंदर प्रस्तुति से परिचित कराएगा, बल्कि जीवन के लिए कुछ महत्वपूर्ण नैतिक शिक्षाएँ भी देगा।
पाठ 10: दोन्नबनध: श्रोनायार: - विस्तृत नोट्स
1. पाठ का परिचय (Introduction to the Chapter)
- विधा: यह पाठ एक 'रूपक' (नाटक का एक प्रकार) है, विशेष रूप से 'एकांकी' (एक अंक का नाटक) के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- पृष्ठभूमि: यह कथा दक्षिण भारत की लोककथाओं और नीतिपरक आख्यानों से प्रेरित है। इसमें एक ज्ञानी कवि और एक अहंकारी राजा के बीच के संवाद को दर्शाया गया है।
- मुख्य विषय: ज्ञान की श्रेष्ठता, धन के अहंकार का पतन, विद्वानों का सम्मान और वाणी की शक्ति।
- संदेश: भौतिक धन और सत्ता क्षणभंगुर होते हैं, जबकि ज्ञान और कला शाश्वत होते हैं।
2. प्रमुख पात्र एवं उनका परिचय (Main Characters and their Introduction)
- दोन्यबन्ध (Dronabandha):
- एक ज्ञानी, स्वाभिमानी और प्रतिभाशाली कवि।
- वह अपनी कला और ज्ञान का सम्मान करता है।
- प्रारंभ में राजा द्वारा तिरस्कृत होने पर भी वह अपनी विद्वत्ता से राजा को प्रभावित करता है।
- वह ज्ञान और कला का प्रतीक है।
- श्रोनायार (Shronayar):
- एक शक्तिशाली और धनवान राजा।
- प्रारंभ में वह अपने धन और ऐश्वर्य के मद में चूर रहता है।
- वह विद्वानों का अनादर करता है और उन्हें तुच्छ समझता है।
- कवि दोन्यबन्ध की युक्तिपूर्ण वाणी से प्रभावित होकर उसे अपनी गलती का एहसास होता है और वह पश्चाताप करता है।
- वह भौतिक शक्ति और अहंकार का प्रतीक है।
- चेटी (Chetī):
- राजा की परिचारिका/दासी।
- वह राजा और कवि के बीच संवाद में सहायक की भूमिका निभाती है।
- प्रतीहारी (Pratihārī):
- द्वारपाल या राजमहल का अधिकारी।
- वह कवि को राजा के समक्ष प्रस्तुत करने का कार्य करता है।
3. कथावस्तु का सारांश (Summary of the Plot)
पाठ की कथावस्तु इस प्रकार है:
- कवि का आगमन और राजा का अहंकार: कवि दोन्यबन्ध, राजा श्रोनायार की प्रशंसा में एक कविता सुनाने के उद्देश्य से राजदरबार में आता है। प्रतीहारी उसे राजा के समक्ष प्रस्तुत करता है। राजा श्रोनायार अपने अपार धन और ऐश्वर्य के मद में चूर है। वह कवि को तुच्छ समझता है और उसका तिरस्कार करता है। राजा कहता है कि उसके पास इतना धन है कि उसे किसी कवि की प्रशंसा की आवश्यकता नहीं है। वह कवि को कुछ स्वर्ण मुद्राएँ देकर विदा करना चाहता है।
- कवि का स्वाभिमान और युक्ति: राजा के इस अपमानजनक व्यवहार से कवि दोन्यबन्ध आहत होता है, परंतु वह अपना स्वाभिमान नहीं छोड़ता। वह राजा को यह समझाना चाहता है कि ज्ञान और कला का मूल्य धन से कहीं अधिक है। वह राजा से कहता है कि वह उसकी कविता तभी सुनाएगा जब राजा अपने सभी आभूषण उतार कर सामान्य वेशभूषा में बैठेगा।
- राजा का असमंजस और कवि की शर्त: राजा को कवि की यह शर्त अटपटी लगती है, लेकिन वह कवि की बात मान लेता है। जब राजा अपने सभी आभूषण उतार देता है, तब कवि दोन्यबन्ध एक मार्मिक श्लोक सुनाता है।
- कवि का श्लोक और राजा का बोध: कवि कहता है:
"राजन्! तव धनं नश्वरम्, तव ऐश्वर्यं क्षणिकम्।
यावत् त्वं अलंकृतः आसीत्, तावत् त्वं शोभसे स्म।
अधुना तु त्वं सामान्यः एव।
परन्तु मम ज्ञानं, मम कविता शाश्वती अस्ति।"
(अर्थात्: हे राजन्! तुम्हारा धन नश्वर है, तुम्हारा ऐश्वर्य क्षणिक है। जब तक तुम आभूषणों से सुशोभित थे, तब तक तुम सुंदर दिखते थे। अब तो तुम सामान्य ही हो। परंतु मेरा ज्ञान, मेरी कविता शाश्वत है।)
कुछ पुस्तकों में श्लोक का भावार्थ थोड़ा भिन्न हो सकता है, लेकिन मूल संदेश यही है कि राजा के आभूषण उतारने पर उसका सामान्य रूप सामने आता है, जबकि कवि का ज्ञान उसके साथ हमेशा रहता है। - राजा का पश्चाताप और सम्मान: कवि के इस सारगर्भित श्लोक को सुनकर राजा श्रोनायार को अपनी गलती का एहसास होता है। उसे अपनी मूर्खता पर पश्चाताप होता है। वह समझ जाता है कि वास्तविक शोभा और मूल्य धन में नहीं, बल्कि ज्ञान और कला में है। राजा कवि से क्षमा याचना करता है और उसे उचित सम्मान के साथ अनेक उपहार देकर विदा करता है। वह कवि को अपना गुरु मानकर उसकी प्रशंसा करता है।
4. प्रमुख श्लोक/सूक्तियाँ एवं उनका अर्थ (Important Verses/Sayings and their Meaning)
इस पाठ में कोई एक विशिष्ट श्लोक नहीं है जो बार-बार उद्धृत किया जाता हो, बल्कि कवि का पूरा संवाद ही महत्वपूर्ण है। तथापि, पाठ का केंद्रीय भाव निम्न पंक्तियों में निहित है:
- कवि का भाव: "धनं तु क्षणिकं भवति, ज्ञानं तु शाश्वतम्।" (धन तो क्षणिक होता है, ज्ञान तो शाश्वत होता है।)
- राजा का प्रारंभिक विचार: "किं प्रयोजनं मे कविभिः? मम कोषः पूर्णः अस्ति।" (मुझे कवियों से क्या प्रयोजन? मेरा खजाना भरा हुआ है।)
- राजा का पश्चाताप के बाद का विचार: "अहो! मया महती त्रुटिः कृता। ज्ञानं हि सर्वोपरि अस्ति।" (अहो! मैंने बहुत बड़ी गलती की। ज्ञान ही सबसे ऊपर है।)
5. नैतिक शिक्षा एवं संदेश (Moral Education and Message)
- ज्ञान की श्रेष्ठता: यह पाठ स्पष्ट करता है कि भौतिक धन, पद और शक्ति क्षणिक होते हैं, जबकि ज्ञान, कला और विद्वत्ता शाश्वत होती है।
- अहंकार का पतन: अहंकार व्यक्ति को अंधा बना देता है और उसे सही-गलत का बोध नहीं होने देता। राजा श्रोनायार का अहंकार अंततः कवि की विद्वत्ता के सामने टूट जाता है।
- विद्वानों का सम्मान: समाज में विद्वानों और कलाकारों का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि वे समाज को दिशा देते हैं और उसकी सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध करते हैं।
- वाणी की शक्ति: कवि की युक्तिपूर्ण और सारगर्भित वाणी में इतनी शक्ति थी कि उसने एक अहंकारी राजा का हृदय परिवर्तन कर दिया।
- विनम्रता का महत्व: ज्ञान के साथ विनम्रता आवश्यक है। ज्ञानी व्यक्ति कभी अहंकारी नहीं होता।
6. व्याकरणिक बिन्दु (Grammatical Points for Exam Preparation)
इस पाठ से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण व्याकरणिक बिन्दु:
- संधि (Sandhi):
- गुण संधि: परोपकारः (पर + उपकारः)
- दीर्घ संधि: विद्यालये (विद्या + आलये)
- यण् संधि: प्रत्युत्तरम् (प्रति + उत्तरम्)
- विसर्ग संधि: कविरस्ति (कविः + अस्ति), नृपोऽपि (नृपः + अपि)
- समास (Samas):
- तत्पुरुष समास: राजपुरुषः (राज्ञः पुरुषः - षष्ठी तत्पुरुष), धनमदः (धनस्य मदः - षष्ठी तत्पुरुष)
- कर्मधारय समास: महाकविः (महान् कविः)
- अव्ययीभाव समास: प्रतिदिनम् (दिनं दिनं प्रति)
- प्रत्यय (Pratyaya):
- क्त्वा (ktvā): गत्वा (गम् + क्त्वा), श्रुत्वा (श्रु + क्त्वा)
- ल्यप् (lyap): प्रविश्य (प्र + विश् + ल्यप्), आगत्य (आ + गम् + ल्यप्)
- तुमुन् (tumun): गन्तुम् (गम् + तुमुन्), श्रोतुम् (श्रु + तुमुन्)
- शतृ (śatṛ): गच्छन् (गम् + शतृ - जाता हुआ), वदन् (वद् + शतृ - बोलता हुआ)
- शानच् (śānac): वर्तमानः (वृत् + शानच् - वर्तमान), शोभमानः (शुभ् + शानच् - सुशोभित होता हुआ)
- तव्यत् (tavyat) / अनीयर् (anīyar): गन्तव्यम् (गम् + तव्यत् - जाना चाहिए), पठनीयम् (पठ् + अनीयर् - पढ़ना चाहिए)
- शब्द रूप (Shabda Rupa):
- राजा (राजन्) शब्द के रूप: राजन्, राजानौ, राजानः (प्रथमा); राजानम्, राजानौ, राज्ञः (द्वितीया) आदि।
- कवि (इकारान्त पुल्लिङ्ग) शब्द के रूप: कविः, कवी, कवयः (प्रथमा); कविम्, कवी, कवीन् (द्वितीया) आदि।
- धन (नपुंसकलिङ्ग) शब्द के रूप: धनम्, धने, धनानि (प्रथमा/द्वितीया) आदि।
- ज्ञान (नपुंसकलिङ्ग) शब्द के रूप: ज्ञानम्, ज्ञाने, ज्ञानानि (प्रथमा/द्वितीया) आदि।
- धातु रूप (Dhatu Rupa):
- पञ्च लकारों (लट्, लृट्, लङ्, लोट्, विधिलिङ्) में प्रमुख धातुओं के रूप: गम् (जाना), भू (होना), कृ (करना), अस् (होना), वद् (बोलना), श्रु (सुनना) आदि।
- अव्यय (Avyaya):
- च (और), अपि (भी), एव (ही), इति (ऐसा), यत्र (जहाँ), तत्र (वहाँ), कदा (कब), कुत्र (कहाँ), अधुना (अब), सहसा (अचानक) आदि।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) - 10 प्रश्न
निर्देश: सही विकल्प का चयन कीजिए।
-
'दोन्नबनध: श्रोनायार:' पाठ किस विधा का है?
a) कथा
b) कविता
c) रूपक (नाटक)
d) निबंध -
कवि का नाम क्या था जिसने राजा श्रोनायार को प्रभावित किया?
a) कालिदासः
b) दोन्नबनधः
c) बाणभट्टः
d) भवभूतिः -
राजा श्रोनायार प्रारंभ में किस बात पर अहंकारी था?
a) अपनी विद्वत्ता पर
b) अपनी प्रजा पर
c) अपने धन और ऐश्वर्य पर
d) अपनी सेना पर -
कवि ने राजा को अपनी कविता सुनाने से पहले क्या शर्त रखी?
a) राजा उसे बहुत सारा धन दे
b) राजा अपने सभी आभूषण उतार दे
c) राजा उसे अपने राज्य का मंत्री बनाए
d) राजा स्वयं कविता लिखे -
कवि के अनुसार क्या शाश्वत है?
a) राजा का धन
b) राजा का ऐश्वर्य
c) ज्ञान और कविता
d) राजा का सिंहासन -
'धनमद:' पद में कौन सा समास है?
a) द्वन्द्व समास
b) अव्ययीभाव समास
c) तत्पुरुष समास
d) बहुव्रीहि समास -
'प्रविश्य' पद में कौन सा प्रत्यय है?
a) क्त्वा
b) तुमुन्
c) ल्यप्
d) शतृ -
राजा श्रोनायार को अपनी गलती का एहसास कब हुआ?
a) जब कवि ने धन मांगा
b) जब कवि ने उसे डांटा
c) जब कवि ने आभूषण उतारने के बाद श्लोक सुनाया
d) जब प्रजा ने उसका विरोध किया -
इस पाठ का मुख्य नैतिक संदेश क्या है?
a) धन ही सर्वोपरि है
b) राजा को हमेशा अहंकारी होना चाहिए
c) ज्ञान और विद्वत्ता धन से श्रेष्ठ है
d) कवियों को सम्मान नहीं देना चाहिए -
'राजन्' पद किस विभक्ति और वचन का रूप है?
a) प्रथमा विभक्ति, एकवचन
b) द्वितीया विभक्ति, एकवचन
c) सम्बोधन, एकवचन
d) षष्ठी विभक्ति, एकवचन
उत्तरमाला (Answer Key):
- c) रूपक (नाटक)
- b) दोन्नबनधः
- c) अपने धन और ऐश्वर्य पर
- b) राजा अपने सभी आभूषण उतार दे
- c) ज्ञान और कविता
- c) तत्पुरुष समास (धनस्य मदः)
- c) ल्यप्
- c) जब कवि ने आभूषण उतारने के बाद श्लोक सुनाया
- c) ज्ञान और विद्वत्ता धन से श्रेष्ठ है
- c) सम्बोधन, एकवचन
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। किसी भी अन्य जानकारी के लिए आप पूछ सकते हैं। शुभकामनाएँ!