Class 12 Sanskrit Notes Chapter 2 (Chapter 2) – Shaswati Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी 'शाश्वती' पाठ्यपुस्तक के द्वितीय अध्याय 'न त्वं शोचितुमर्हसि' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी आगामी सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अध्याय श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय 'सांख्ययोग' का अंश है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने मोहग्रस्त अर्जुन को कर्तव्यबोध कराया है।
अध्याय 2: 'न त्वं शोचितुमर्हसि' (तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए)
1. अध्याय का परिचय एवं पृष्ठभूमि:
यह अध्याय महाभारत के युद्ध से ठीक पहले कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में स्थापित है। कौरवों और पांडवों की सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं। पांडवों के प्रधान योद्धा अर्जुन, अपने सारथी भगवान श्रीकृष्ण से दोनों सेनाओं के मध्य रथ ले जाने का आग्रह करते हैं ताकि वे देख सकें कि उन्हें किनके साथ युद्ध करना है। जब अर्जुन अपने बंधु-बांधवों, गुरुजनों और मित्रों को दोनों ओर देखते हैं, तो उनका मन मोह और करुणा से भर जाता है। वे युद्ध करने से विमुख हो जाते हैं और शस्त्र त्यागने का निश्चय करते हैं। इसी स्थिति में भगवान श्रीकृष्ण उन्हें उपदेश देते हैं, जो इस अध्याय का मूल विषय है।
2. अर्जुन का मोह और विषाद:
- अर्जुन अपने सामने खड़े पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, मामा शल्य, भाई दुर्योधन आदि को देखकर अत्यंत विचलित हो जाते हैं।
- वे सोचते हैं कि इन प्रियजनों का वध करके उन्हें राज्य सुख भी प्राप्त होगा तो वह रक्त रंजित होगा और पाप का भागी बनाएगा।
- वे कुलक्षय के दोष, वर्णसंकर होने के भय और अधर्म की आशंका से ग्रस्त हो जाते हैं।
- वे कहते हैं कि उन्हें विजय, राज्य और सुख की इच्छा नहीं है, क्योंकि जिनके लिए ये सब चाहिए, वे ही युद्ध में मरने को तैयार हैं।
- इस मोह और विषाद के कारण अर्जुन युद्ध न करने का निश्चय करते हैं और अपने गांडीव (धनुष) को त्यागने की बात कहते हैं।
3. भगवान श्रीकृष्ण का उपदेश (सांख्ययोग एवं कर्मयोग):
श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह को दूर करने के लिए उन्हें दो मुख्य सिद्धांतों का उपदेश देते हैं:
अ) सांख्ययोग (ज्ञानयोग) - आत्मा की अमरता का सिद्धांत:
- अशोच्यों का शोक न करें: श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि वे उन लोगों के लिए शोक कर रहे हैं जो शोक करने योग्य नहीं हैं। ज्ञानी व्यक्ति न तो जीवितों के लिए शोक करते हैं और न ही मृतकों के लिए।
- आत्मा की नित्यता:
- आत्मा नित्य, शाश्वत, अव्यय और अजर-अमर है।
- यह कभी जन्म नहीं लेती और न ही कभी मरती है। यह शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती।
- जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करती है।
- आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
- यह अविनाशी है, इसलिए किसी भी प्राणी की आत्मा को कोई मार नहीं सकता।
- शरीर की क्षणभंगुरता: शरीर नश्वर है और एक दिन नष्ट हो जाता है, जबकि आत्मा अमर है। इसलिए नश्वर शरीर के लिए शोक करना व्यर्थ है।
- जन्म-मृत्यु का चक्र: सभी प्राणी जन्म से पहले अप्रकट होते हैं, मध्य में प्रकट होते हैं और मृत्यु के बाद फिर अप्रकट हो जाते हैं। इस अटल नियम के लिए शोक करना अनुचित है।
- कर्तव्य का बोध: श्रीकृष्ण अर्जुन को उनके क्षत्रिय धर्म का स्मरण कराते हैं। एक क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है। यदि अर्जुन युद्ध में मारा जाता है तो उसे स्वर्ग मिलेगा और यदि वह जीतता है तो पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इसलिए उसे कायरता छोड़कर युद्ध के लिए उठ खड़ा होना चाहिए।
ब) कर्मयोग - अनासक्त कर्म का सिद्धांत:
- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन: यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, जिसका अर्थ है कि तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु मत बनो और तुम्हारी आसक्ति कर्म न करने में भी न हो।
- समत्वं योग उच्यते: श्रीकृष्ण कहते हैं कि सिद्धि और असिद्धि (सफलता और असफलता) में समभाव रखते हुए, आसक्ति को त्यागकर कर्म करो। इसी समत्व भाव को योग कहते हैं।
- बुद्धि से कर्म: बुद्धिमान व्यक्ति इस लोक में पुण्य और पाप दोनों का त्याग कर देता है (अर्थात फल की इच्छा से मुक्त हो जाता है)। इसलिए तुम योग में लग जाओ, क्योंकि कर्मों में कुशलता ही योग है।
- फल की आसक्ति का त्याग: जो बुद्धिमान व्यक्ति कर्मफल का त्याग कर देते हैं, वे जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त होते हैं।
- स्थिर बुद्धि: जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी दलदल को पार कर जाएगी, तब तुम सुने हुए और सुनने योग्य सभी विषयों से विरक्त हो जाओगे। जब तुम्हारी बुद्धि वेद-शास्त्रों के अनेक प्रकार के वचनों से विचलित न होकर परमात्मा में अचल और स्थिर हो जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त हो जाओगे।
4. अध्याय का सार एवं मुख्य शिक्षा:
- यह अध्याय आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता का गहन दार्शनिक ज्ञान प्रदान करता है।
- यह 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' के सिद्धांत के माध्यम से निष्काम कर्मयोग का मार्ग दिखाता है।
- यह बताता है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन बिना फल की इच्छा के करना चाहिए।
- समत्व भाव (सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान रहना) योग की कुंजी है।
- यह अध्याय हमें मोह, शोक और आसक्ति को त्यागकर अपने धर्म का पालन करने की प्रेरणा देता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) - 10 प्रश्न
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न के लिए दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।
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"न त्वं शोचितुमर्हसि" यह उक्ति किसने किससे कही है?
क) अर्जुन ने कृष्ण से
ख) कृष्ण ने अर्जुन से
ग) धृतराष्ट्र ने संजय से
घ) संजय ने धृतराष्ट्र से -
अर्जुन युद्ध से विमुख क्यों हो रहे थे?
क) युद्ध में हारने के भय से
ख) अपने बंधु-बांधवों को देखकर मोहग्रस्त होने से
ग) युद्ध करने की इच्छा न होने से
घ) कृष्ण के कहने पर -
आत्मा के स्वरूप के विषय में इनमें से कौन-सा कथन सत्य नहीं है?
क) आत्मा नित्य है
ख) आत्मा अजर-अमर है
ग) आत्मा को शस्त्र काट सकते हैं
घ) आत्मा अविनाशी है -
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, मनुष्य को किसमें अधिकार है?
क) कर्म के फल में
ख) कर्म करने में
ग) कर्म न करने में
घ) उपरोक्त सभी में -
"समत्वं योग उच्यते" का क्या अर्थ है?
क) सभी प्राणियों के प्रति समानता
ख) सिद्धि और असिद्धि में समभाव रखना
ग) योग के आसन करना
घ) सभी धर्मों को समान मानना -
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को किसका स्मरण कराया?
क) वैश्य धर्म का
ख) शूद्र धर्म का
ग) क्षत्रिय धर्म का
घ) ब्राह्मण धर्म का -
आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर कैसे धारण करती है?
क) जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है
ख) जैसे वृक्ष अपने पत्ते गिराता है
ग) जैसे नदी अपना मार्ग बदलती है
घ) जैसे पक्षी एक घोंसला छोड़कर दूसरा बनाता है -
कर्मफल का त्याग करने वाले बुद्धिमान व्यक्ति क्या प्राप्त करते हैं?
क) धन-संपत्ति
ख) राज्य सुख
ग) जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति
घ) सांसारिक यश -
'न त्वं शोचितुमर्हसि' अध्याय श्रीमद्भगवद्गीता के किस अध्याय का अंश है?
क) प्रथम अध्याय
ख) द्वितीय अध्याय
ग) तृतीय अध्याय
घ) दशम अध्याय -
जब मनुष्य की बुद्धि मोह रूपी दलदल को पार कर जाती है, तब वह क्या हो जाती है?
क) चंचल
ख) विचलित
ग) स्थिर और अचल
घ) भ्रमित
उत्तरमाला:
- ख) कृष्ण ने अर्जुन से
- ख) अपने बंधु-बांधवों को देखकर मोहग्रस्त होने से
- ग) आत्मा को शस्त्र काट सकते हैं
- ख) कर्म करने में
- ख) सिद्धि और असिद्धि में समभाव रखना
- ग) क्षत्रिय धर्म का
- क) जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है
- ग) जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति
- ख) द्वितीय अध्याय
- ग) स्थिर और अचल
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपके अध्ययन में सहायक होंगे और आपको परीक्षा की तैयारी में मदद करेंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और कोई भी संदेह होने पर अवश्य पूछें। शुभकामनाएँ!