Class 12 Sanskrit Notes Chapter 2 (रघकात्ससवादः) – Bhaswati Book

Bhaswati
प्रिय विद्यार्थियों,

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे आप सभी का हार्दिक स्वागत है। आज हम आपकी 'भास्वती' पुस्तक के द्वितीय अध्याय 'रघूकात्ससवादः' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अध्याय महाकवि कालिदास विरचित 'रघुवंशम्' महाकाव्य के पंचम सर्ग से संकलित है।

चलिए, विस्तार से इस अध्याय को समझते हैं:


अध्याय 2: रघूकात्ससवादः (रघु और कौत्स का संवाद)

1. पाठ-परिचय:

  • यह पाठ महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध महाकाव्य 'रघुवंशम्' के पंचम सर्ग से संकलित है।
  • इसमें महाराज रघु की दानवीरता, त्याग और अतिथि-सत्कार की अद्भुत गाथा का वर्णन है।
  • गुरुवर वरतन्तु के शिष्य कौत्स और महाराज रघु के बीच हुए संवाद को दर्शाया गया है।

2. प्रमुख पात्र:

  • महाराज रघु: इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी, यशस्वी और दानवीर राजा। इन्होंने 'विश्वजित्' नामक यज्ञ किया था।
  • कौत्स: गुरुवर वरतन्तु का शिष्य, जो अपनी गुरुदक्षिणा के लिए धन की याचना करने महाराज रघु के पास आया था।

3. कथा का सार एवं महत्वपूर्ण बिंदु:

  • विश्वजित् यज्ञ और रघु की स्थिति:

    • महाराज रघु ने 'विश्वजित्' नामक एक विशाल यज्ञ सम्पन्न किया था।
    • इस यज्ञ में उन्होंने अपना समस्त धन, सम्पत्ति, यहाँ तक कि अपने शरीर पर धारण किए हुए आभूषण भी दान कर दिए थे।
    • यज्ञ के पश्चात् वे केवल मृण्मय (मिट्टी के) पात्रों में भोजन करते थे और उनके पास धन का नामोनिशान नहीं था। वे अत्यंत निर्धन हो चुके थे, परन्तु उनकी कीर्ति और यश चारों दिशाओं में फैल चुका था।
  • कौत्स का आगमन:

    • गुरुवर वरतन्तु ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर शिष्य कौत्स से गुरुदक्षिणा लेने से मना कर दिया था।
    • परन्तु कौत्स ने हठपूर्वक गुरुदक्षिणा देने का आग्रह किया। तब गुरु ने क्रोधित होकर उससे 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ (चौदह कोटि सुवर्णमुद्राएँ) माँगीं, क्योंकि कौत्स ने 14 विद्याओं का अध्ययन किया था।
    • कौत्स इस विशाल धनराशि को प्राप्त करने के लिए अनेक राजाओं के पास गया, परन्तु कोई भी राजा इतनी बड़ी राशि देने में समर्थ नहीं था।
    • अन्ततः, वह अपनी गुरुदक्षिणा के लिए महाराज रघु की दानवीरता और यश के बारे में सुनकर उनके पास आया।
  • रघु का अतिथि-सत्कार:

    • जब कौत्स रघु के राजभवन पहुँचा, तो रघु ने उसका अत्यंत आदर-सत्कार किया।
    • उन्होंने उसे अर्घ्य, पाद्य आदि से सम्मानित किया और अपने आसन पर बिठाया।
    • रघु ने कौत्स से उसके आगमन का कारण पूछा और उसे आश्वस्त किया कि वे उसकी हर इच्छा पूरी करने का प्रयास करेंगे।
  • कौत्स की याचना और रघु की असमर्थता:

    • कौत्स ने अपनी गुरुदक्षिणा के लिए 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं की आवश्यकता बताई।
    • यह सुनकर रघु चिंतित हो गए, क्योंकि विश्वजित् यज्ञ के कारण उनके पास स्वयं एक भी स्वर्ण मुद्रा नहीं थी। वे इस समय धनहीन थे।
    • रघु को अपनी दानवीरता पर गर्व था, और वे किसी भी याचक को खाली हाथ लौटाना नहीं चाहते थे।
  • रघु का संकल्प और कुबेर पर आक्रमण की योजना:

    • अपनी प्रतिज्ञा और अतिथि के सम्मान की रक्षा के लिए रघु ने एक अद्भुत संकल्प लिया।
    • उन्होंने धन के देवता कुबेर पर आक्रमण करके धन प्राप्त करने का निश्चय किया।
    • उन्होंने कौत्स से तीन दिन तक अपने आश्रम में रुकने का निवेदन किया।
  • कुबेर द्वारा धन-वर्षा:

    • रघु के इस संकल्प और दानवीरता से भयभीत होकर अथवा उनके यश से प्रभावित होकर, कुबेर ने रातों-रात रघु के कोषागार में स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा कर दी।
    • अगले दिन जब रघु के सेवक कोषागार में गए, तो उन्होंने वहाँ स्वर्ण मुद्राओं का ढेर देखा।
  • रघु की दानवीरता और कौत्स की निर्लोभता:

    • रघु ने कौत्स को बुलाकर वह समस्त धन लेने को कहा।
    • परन्तु कौत्स ने अपनी गुरुदक्षिणा के लिए आवश्यक 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ ही स्वीकार कीं और शेष धन लेने से मना कर दिया।
    • कौत्स ने कहा कि उसे केवल गुरुदक्षिणा के लिए धन चाहिए, अतिरिक्त धन का उसे कोई प्रयोजन नहीं है।
    • रघु ने कौत्स की निर्लोभता की प्रशंसा की और कौत्स ने रघु की दानवीरता की सराहना की।
  • परिणाम:

    • महाराज रघु की दानवीरता और त्याग की कीर्ति और भी अधिक फैल गई।
    • कौत्स ने अपनी गुरुदक्षिणा चुकाई और गुरुवर वरतन्तु को प्रसन्न किया।
    • यह प्रसंग राजा के कर्तव्य, अतिथि-सत्कार, गुरुभक्ति, त्याग और निर्लोभता जैसे उच्च मानवीय मूल्यों को दर्शाता है।

4. प्रमुख शिक्षाएँ एवं मूल्य:

  • दानवीरता: महाराज रघु का सर्वस्व दान कर देना और फिर भी याचक को निराश न करना।
  • अतिथि-सत्कार: रघु का कौत्स के प्रति आदर और उसकी आवश्यकता को पूर्ण करने का संकल्प।
  • गुरुभक्ति: कौत्स का अपनी गुरुदक्षिणा चुकाने के लिए अथक प्रयास।
  • त्याग: रघु का अपने व्यक्तिगत सुख और धन का त्याग कर देना।
  • निर्लोभता: कौत्स का अपनी आवश्यकता से अधिक धन स्वीकार न करना।
  • कर्तव्यनिष्ठा: राजा का अपनी प्रजा (याचक) के प्रति कर्तव्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

अब, अपनी तैयारी का आकलन करने के लिए इन 10 बहुविकल्पीय प्रश्नों का अभ्यास करें:

  1. 'रघूकात्ससवादः' पाठ किस ग्रंथ से संकलित है?
    क) किरातार्जुनीयम्
    ख) कुमारसम्भवम्
    ग) रघुवंशम्
    घ) मेघदूतम्

  2. महाराज रघु ने कौन सा यज्ञ सम्पन्न किया था?
    क) अश्वमेध यज्ञ
    ख) राजसूय यज्ञ
    ग) विश्वजित् यज्ञ
    घ) वाजपेय यज्ञ

  3. विश्वजित् यज्ञ के पश्चात् महाराज रघु किस प्रकार के पात्रों में भोजन करते थे?
    क) स्वर्ण पात्रों में
    ख) रजत पात्रों में
    ग) मृण्मय पात्रों में
    घ) ताम्र पात्रों में

  4. कौत्स किसका शिष्य था?
    क) विश्वामित्र का
    ख) वसिष्ठ का
    ग) वरतन्तु का
    घ) व्यास का

  5. कौत्स को गुरुदक्षिणा के रूप में कितनी स्वर्ण मुद्राएँ चाहिए थीं?
    क) दस कोटि
    ख) चौदह कोटि
    ग) बीस कोटि
    घ) सौ कोटि

  6. रघु ने कौत्स से कितने दिन ठहरने का अनुरोध किया?
    क) एक दिन
    ख) दो दिन
    ग) तीन दिन
    घ) चार दिन

  7. रघु ने धन प्राप्त करने के लिए किस पर आक्रमण करने का विचार किया था?
    क) इन्द्र पर
    ख) कुबेर पर
    ग) वरुण पर
    घ) यम पर

  8. रघु के कोषागार में किसने धन की वर्षा की थी?
    क) इन्द्र ने
    ख) कुबेर ने
    ग) अग्नि ने
    घ) वायु ने

  9. कौत्स ने रघु द्वारा दिए गए समस्त धन में से कितना धन स्वीकार किया?
    क) समस्त धन
    ख) अपनी आवश्यकतानुसार धन
    ग) कुछ भी नहीं
    घ) आधा धन

  10. इस पाठ से हमें महाराज रघु का कौन सा गुण सीखने को मिलता है?
    क) पराक्रम
    ख) विद्वत्ता
    ग) दानवीरता
    घ) तपस्या


उत्तरमाला:

  1. ग) रघुवंशम्
  2. ग) विश्वजित् यज्ञ
  3. ग) मृण्मय पात्रों में
  4. ग) वरतन्तु का
  5. ख) चौदह कोटि
  6. ग) तीन दिन
  7. ख) कुबेर पर
  8. ख) कुबेर ने
  9. ख) अपनी आवश्यकतानुसार धन
  10. ग) दानवीरता

मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको 'रघूकात्ससवादः' अध्याय को गहराई से समझने और परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने में सहायक होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें। शुभकामनाएँ!

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