Class 12 Sanskrit Notes Chapter 3 (Chapter 3) – Shaswati Book

Shaswati
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम आपकी पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती' के तृतीय अध्याय 'कर्मगौरवम्' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें जीवन के एक मौलिक सिद्धांत – कर्मयोग – का प्रतिपादन किया गया है। आइए, इसके प्रत्येक महत्वपूर्ण बिंदु को गहराई से समझते हैं ताकि आप परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकें।


अध्याय 3: कर्मगौरवम् (कर्म की महिमा)

1. अध्याय का परिचय:

  • स्रोत: यह पाठ श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय 'कर्मयोग' से संकलित है।
  • वक्ता: भगवान श्रीकृष्ण
  • श्रोता: अर्जुन
  • प्रसंग: कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में अर्जुन अपने सगे-संबंधियों के प्रति मोहग्रस्त होकर युद्ध से विमुख होने की इच्छा व्यक्त करता है। वह कर्म (युद्ध) को त्यागकर संन्यास लेने की बात कहता है। तब भगवान श्रीकृष्ण उसे कर्म के महत्व, कर्मयोग के सिद्धांत और निष्काम कर्म के आदर्श का उपदेश देते हैं।

2. मुख्य शिक्षाएँ एवं महत्वपूर्ण बिंदु:

  • कर्म की अनिवार्यता (न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते - 3.4):

    • कोई भी व्यक्ति कर्मों का त्याग करने मात्र से सिद्धि (नैष्कर्म्य) को प्राप्त नहीं होता।
    • केवल संन्यास लेने से भी मोक्ष नहीं मिलता।
    • वास्तव में, कोई भी व्यक्ति क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के गुणों (सत्त्व, रज, तम) द्वारा प्रेरित होकर प्रत्येक जीव कर्म करने को विवश होता है। (न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् - 3.5)
  • मिथ्याचारी कौन? (कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् - 3.6):

    • जो व्यक्ति अपने कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर, वाणी आदि) को तो बाहर से रोककर बैठ जाता है, पर मन से उन विषयों (भोगों) का चिंतन करता रहता है, वह दम्भी (पाखंडी) या मिथ्याचारी कहलाता है।
    • इसके विपरीत, जो मन से इन्द्रियों को वश में करके, अनासक्त भाव से कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है। (यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते - 3.7)
  • नियत कर्म का महत्व (नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः - 3.8):

    • अपने नियत (शास्त्रों द्वारा निर्धारित) कर्मों को करना अकर्मण्यता (कर्म न करने) से श्रेष्ठ है।
    • कर्म न करने से तो शरीर का निर्वाह (शरीरयात्रा) भी संभव नहीं है।
  • यज्ञार्थ कर्म (यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः - 3.9):

    • यज्ञ के निमित्त (दूसरों के कल्याण या ईश्वर-प्रीति के लिए) किए गए कर्मों के अतिरिक्त अन्य सभी कर्म मनुष्य को संसार-बंधन में बाँधते हैं।
    • अतः आसक्ति रहित होकर केवल यज्ञ के लिए कर्म करना चाहिए।
    • सृष्टि चक्र और कर्म: प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि के आरम्भ में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर कहा था कि तुम इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को बढ़ाओ और वे देवता तुम्हें बढ़ाएँ। इस प्रकार एक-दूसरे को बढ़ाते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त होगे। (सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः - 3.10)
  • लोकसंग्रह (लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि - 3.20):

    • ज्ञानी व्यक्ति को भी लोकसंग्रह (संसार के कल्याण या लोगों को सही मार्ग पर चलाने) के लिए कर्म करना चाहिए।
    • जिस प्रकार अज्ञानीजन आसक्तिपूर्वक कर्म करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी को अनासक्त होकर लोक कल्याण के लिए कर्म करना चाहिए। (सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् - 3.25)
  • श्रेष्ठ पुरुषों का आचरण (यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः - 3.21):

    • श्रेष्ठ पुरुष (महापुरुष) जैसा आचरण करते हैं, सामान्य लोग उसी का अनुकरण करते हैं।
    • वे जो प्रमाण (आदर्श) स्थापित करते हैं, लोग उसी का अनुसरण करते हैं।
  • भगवान श्रीकृष्ण का उदाहरण (न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन - 3.22):

    • स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी तीनों लोकों में कुछ भी कर्तव्य शेष न होते हुए और कुछ भी अप्राप्त न होते हुए भी लोकसंग्रह के लिए कर्म करते हैं।
    • यदि वे कर्म न करें तो सभी लोग उनके मार्ग का अनुसरण करेंगे और संसार में अव्यवस्था (उत्सीदेयुरिमे लोकाः) फैल जाएगी।
  • स्वधर्म का पालन (श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् - 3.35):

    • अपने धर्म (कर्तव्य) का पालन करना, भले ही वह गुणों से रहित (कमतर) हो, दूसरे के अच्छी तरह से अनुष्ठित धर्म से श्रेष्ठ है।
    • अपने स्वभाव से नियत कर्म को करने वाला पाप को प्राप्त नहीं होता।
  • काम और क्रोध (काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः - 3.37):

    • मनुष्य को पाप कर्मों की ओर प्रेरित करने वाला मुख्य शत्रु काम (इच्छा या वासना) है, जो बाधा पड़ने पर क्रोध में बदल जाता है।
    • यह रजोगुण से उत्पन्न होता है, अत्यंत भोगी (महाशनो) और महापापी है। इसे ही इस संसार में सबसे बड़ा शत्रु जानना चाहिए।
    • काम ज्ञान को उसी प्रकार ढँक देता है, जैसे अग्नि को धुआँ, दर्पण को मैल और गर्भ को झिल्ली ढँक लेती है।
  • इन्द्रिय-मन-बुद्धि पर नियंत्रण (इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते - 3.40):

    • काम (वासना) का निवास स्थान इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि हैं।
    • अतः पहले इन्द्रियों को वश में करके इस पापी काम को मारना चाहिए, जो ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाला है।

3. निष्कर्ष:
'कर्मगौरवम्' अध्याय हमें यह शिक्षा देता है कि कर्म करना हमारा स्वभाव और कर्तव्य दोनों है। हमें फल की इच्छा किए बिना, अनासक्त भाव से अपने नियत कर्मों को लोक कल्याण की भावना से करना चाहिए। यही कर्मयोग है जो मनुष्य को बंधन से मुक्त कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।


बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

  1. 'कर्मगौरवम्' पाठ किस ग्रंथ से संकलित है?
    अ) रामायण
    ब) महाभारत
    स) श्रीमद्भगवद्गीता
    द) उपनिषद्

  2. श्रीमद्भगवद्गीता के किस अध्याय से यह पाठ लिया गया है?
    अ) प्रथम अध्याय
    ब) द्वितीय अध्याय
    स) तृतीय अध्याय
    द) चतुर्थ अध्याय

  3. भगवान श्रीकृष्ण ने 'कर्मगौरवम्' में किसे उपदेश दिया है?
    अ) युधिष्ठिर को
    ब) अर्जुन को
    स) दुर्योधन को
    द) भीष्म को

  4. गीता के अनुसार, कौन व्यक्ति क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता?
    अ) केवल ज्ञानी
    ब) केवल अज्ञानी
    स) कोई भी व्यक्ति
    द) देवता

  5. 'मिथ्याचारः' कौन कहलाता है?
    अ) जो कर्मेन्द्रियों को रोककर मन से विषयों का चिंतन करता है।
    ब) जो केवल मन से कर्म करता है।
    स) जो सभी कर्मों का त्याग कर देता है।
    द) जो केवल ज्ञान प्राप्त करता है।

  6. 'यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः' - इस पंक्ति का क्या अर्थ है?
    अ) यज्ञ के लिए किए गए कर्म ही बंधन हैं।
    ब) यज्ञ के अतिरिक्त अन्य कर्म बंधनकारी होते हैं।
    स) सभी कर्म बंधनकारी होते हैं।
    द) कोई भी कर्म बंधनकारी नहीं होता।

  7. 'लोकसंग्रह' का क्या अभिप्राय है?
    अ) धन का संग्रह
    ब) लोगों को इकट्ठा करना
    स) संसार का कल्याण
    द) ज्ञान का संग्रह

  8. अपने नियत कर्मों को करना क्यों श्रेष्ठ है?
    अ) क्योंकि इससे धन मिलता है।
    ब) क्योंकि अकर्मण्यता से शरीर का निर्वाह भी संभव नहीं।
    स) क्योंकि इससे प्रसिद्धि मिलती है।
    द) क्योंकि देवता प्रसन्न होते हैं।

  9. 'श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्' - इस उक्ति का भाव क्या है?
    अ) दूसरे का धर्म अपनाना चाहिए।
    ब) अपना धर्म, भले ही दोषपूर्ण हो, दूसरे के उत्तम धर्म से श्रेष्ठ है।
    स) सभी धर्म समान हैं।
    द) धर्म का पालन आवश्यक नहीं है।

  10. मनुष्य को पाप कर्मों की ओर प्रेरित करने वाला मुख्य शत्रु कौन है?
    अ) लोभ
    ब) मोह
    स) काम (इच्छा)
    द) अहंकार


उत्तरमाला (Answer Key):

  1. स) श्रीमद्भगवद्गीता
  2. स) तृतीय अध्याय
  3. ब) अर्जुन को
  4. स) कोई भी व्यक्ति
  5. अ) जो कर्मेन्द्रियों को रोककर मन से विषयों का चिंतन करता है।
  6. ब) यज्ञ के अतिरिक्त अन्य कर्म बंधनकारी होते हैं।
  7. स) संसार का कल्याण
  8. ब) क्योंकि अकर्मण्यता से शरीर का निर्वाह भी संभव नहीं।
  9. ब) अपना धर्म, भले ही दोषपूर्ण हो, दूसरे के उत्तम धर्म से श्रेष्ठ है।
  10. स) काम (इच्छा)

आशा है यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। मन लगाकर अध्ययन करें और सफलता प्राप्त करें!

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