Class 12 Sanskrit Notes Chapter 4 (Chapter 4) – Shaswati Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी 'शाश्वती' पुस्तक के चतुर्थ अध्याय 'प्रजानां विनयनात्' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी आगामी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रचित 'रघुवंशम्' महाकाव्य के प्रथम सर्ग से संकलित है और इसमें आदर्श राजा दिलीप के गुणों तथा उनके शासन-प्रबंध का अनुपम वर्णन किया गया है।
अध्याय 4: 'प्रजानां विनयनात्' - विस्तृत नोट्स
1. अध्याय का परिचय:
यह अध्याय महाकवि कालिदास के विश्वप्रसिद्ध महाकाव्य 'रघुवंशम्' के प्रथम सर्ग से लिया गया है। इसमें सूर्यवंश के प्रतापी राजा दिलीप के आदर्श शासन, प्रजापालन, न्यायप्रियता, निस्वार्थता और व्यक्तिगत गुणों का अत्यंत मनोहारी वर्णन किया गया है। राजा दिलीप के चरित्र के माध्यम से एक आदर्श शासक के कर्तव्यों और गुणों को रेखांकित किया गया है।
2. स्रोत एवं रचयिता:
- स्रोत: रघुवंशम् (महाकाव्य), प्रथम सर्ग
- रचयिता: महाकवि कालिदास
- मुख्य पात्र: राजा दिलीप
3. अध्याय के प्रमुख विषय-बिन्दु (श्लोकों का सार एवं व्याख्या):
यह अध्याय राजा दिलीप के गुणों को पाँच प्रमुख श्लोकों (या उनके भावों) के माध्यम से प्रस्तुत करता है:
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1. प्रजाओं के सच्चे पिता (श्लोक १.२१ का भाव):
- मूल भाव: राजा दिलीप प्रजाओं को शिक्षित करने (विनयाधानात्), उनकी रक्षा करने (रक्षणात्) और उनका भरण-पोषण करने (भरणादपि) के कारण ही उनके सच्चे पिता थे। अन्य लोग तो केवल उन्हें जन्म देने वाले मात्र थे।
- महत्व: यह दर्शाता है कि राजा का कर्तव्य केवल शासन करना नहीं, अपितु प्रजा का सर्वांगीण विकास करना और उन्हें पुत्रवत् पालना है।
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2. न्यायपूर्ण कर-व्यवस्था (श्लोक १.२६ का भाव):
- मूल भाव: राजा दिलीप पृथ्वी से कर (धन) उसी प्रकार लेता था, जैसे सूर्य पृथ्वी से जल खींचता है, ताकि उसे वर्षा के रूप में सहस्र गुना करके लौटा सके। ठीक इसी प्रकार, इंद्र भी फसलों के लिए आकाश से जल देता था। इस प्रकार, राजा (पृथ्वी का) और इंद्र (आकाश का) दोनों एक-दूसरे की संपत्ति का विनिमय करके दोनों लोकों (पृथ्वी और स्वर्ग) का भरण-पोषण करते थे।
- महत्व: यह राजा की कर-नीति का आदर्श रूप है, जहाँ कर का उद्देश्य केवल राजकोष भरना नहीं, अपितु प्रजा के कल्याण के लिए उसे पुनः व्यय करना है। इसमें उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
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3. दण्ड का उद्देश्य - विनय और अनुशासन (श्लोक १.२३ का भाव):
- मूल भाव: राजा दिलीप का धनुष बिना खींचा हुआ ही धारण किया रहता था (अनाकृष्टधनुर्धृतं सत्), क्योंकि उसे शस्त्रों से किसी की रक्षा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। उसकी शक्ति और प्रभुता केवल प्रजा को विनयशील बनाने (शिक्षित करने) और अनुशासित रखने के लिए थी, न कि शक्ति प्रदर्शन या भय उत्पन्न करने के लिए।
- महत्व: यह राजा की अदम्य शक्ति और उसके सदुपयोग को दर्शाता है। उसकी सत्ता का मूल लक्ष्य प्रजा का नैतिक उत्थान था।
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4. क्रोध रहित न्याय और दण्ड (श्लोक १.२४ एवं १.२५ के भावों का मिश्रण):
- मूल भाव: राजा दिलीप केवल दुष्टों को दण्डित करता था, वह भी क्रोध (क्रोधेन), काम (कामेन) या लोभ (लोभेन) जैसे दुर्गुणों से प्रेरित होकर नहीं, अपितु केवल न्याय और प्रजा के कल्याण के लिए। उसका दण्ड शस्त्र भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, अपितु दुष्टों को शांत करने और व्यवस्था बनाए रखने के लिए था।
- महत्व: यह राजा की निष्पक्ष न्याय-प्रणाली और दण्ड के सकारात्मक उद्देश्य को उजागर करता है। दण्ड का लक्ष्य सुधार था, प्रतिशोध नहीं।
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5. अनासक्ति और मोक्ष की ओर उन्मुख मन (श्लोक १.२८ एवं १.२९ के भावों का मिश्रण):
- मूल भाव: राजा दिलीप सभी प्रकार के ऐश्वर्य और राजसी भोगों का उपभोग करते हुए भी उनमें आसक्त नहीं था। उसका मन सदैव मोक्ष की प्राप्ति की ओर उन्मुख था, जैसे कमल जल में रहकर भी उससे निर्लिप्त रहता है।
- महत्व: यह राजा की आध्यात्मिक प्रवृत्ति और वैराग्य भावना को दर्शाता है। एक राजा होते हुए भी वह सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर परमार्थ की ओर अग्रसर था।
4. प्रमुख साहित्यिक विशेषताएँ:
- छन्द: उपजाति (यह इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा छन्दों का मिश्रण है।)
- अलंकार:
- उपमा: (जैसे सूर्य के जल खींचने और लौटाने का दृष्टान्त)
- अर्थान्तरन्यास: (सामान्य बात से विशेष का समर्थन या विशेष से सामान्य का समर्थन)
- दृष्टान्त: (उदाहरण द्वारा बात स्पष्ट करना)
- रीति: वैदर्भी रीति (माधुर्य और सुकुमारता से युक्त)
- गुण: प्रसाद गुण (अर्थ की सुगमता और सरलता)
5. महत्वपूर्ण शब्दार्थ (परीक्षा हेतु):
- विनयाधानात्: विनयशील बनाने के कारण, शिक्षित करने के कारण
- रक्षणात्: रक्षा करने के कारण
- भरणादपि: भरण-पोषण करने के कारण भी
- दुदोह: दुहा, निकाला (जैसे दूध)
- गां: पृथ्वी को
- यज्ञाय: यज्ञ के लिए
- मघवा: इंद्र
- दिवम्: आकाश को
- सम्पद्विनिमयेन: संपत्ति के आदान-प्रदान से
- भुवनद्वयम्: दोनों लोकों को (पृथ्वी और स्वर्ग)
- अनाकृष्टधनुर्धृतं सत्: जिसका धनुष बिना खींचा हुआ ही धारण किया हुआ था
- प्रभुता: सत्ता, प्रभुत्व
- प्रणादः: दण्ड, गर्जना
- शमथाय: शांत करने के लिए
- अनासक्तः: आसक्ति रहित, विरक्त
- मोक्षाय: मोक्ष के लिए
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
यहाँ इस अध्याय पर आधारित 10 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न दिए गए हैं:
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प्रश्न: 'प्रजानां विनयनात्' पाठ किस महाकाव्य से संकलित है?
- (क) किरातार्जुनीयम्
- (ख) शिशुपालवधम्
- (ग) रघुवंशम्
- (घ) नैषधीयचरितम्
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प्रश्न: इस पाठ के रचयिता महाकवि कौन हैं?
- (क) भारवि
- (ख) माघ
- (ग) श्रीहर्ष
- (घ) कालिदास
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प्रश्न: राजा दिलीप प्रजाओं का सच्चा पिता क्यों था?
- (क) क्योंकि वह उन्हें जन्म देता था।
- (ख) क्योंकि वह उन्हें शिक्षित करता था, उनकी रक्षा करता था और उनका भरण-पोषण करता था।
- (ग) क्योंकि वह उन्हें बहुत धन देता था।
- (घ) क्योंकि वह उन्हें युद्ध में भेजता था।
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प्रश्न: 'दुदोह गां स यज्ञाय' इस पंक्ति में 'गां' शब्द का क्या अर्थ है?
- (क) गाय को
- (ख) आकाश को
- (ग) पृथ्वी को
- (घ) जल को
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प्रश्न: राजा दिलीप पृथ्वी से कर (टैक्स) किस उद्देश्य से लेता था?
- (क) अपने ऐश्वर्य को बढ़ाने के लिए
- (ख) राजकोष भरने के लिए
- (ग) यज्ञों के लिए और उसे प्रजा के कल्याण हेतु लौटाने के लिए
- (घ) अन्य राजाओं को हराने के लिए
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प्रश्न: राजा दिलीप का धनुष कैसा था?
- (क) सदैव खींचा हुआ और युद्ध के लिए तैयार
- (ख) बिना खींचा हुआ ही धारण किया हुआ
- (ग) स्वर्ण से जड़ा हुआ
- (घ) शत्रुओं को भयभीत करने वाला
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प्रश्न: राजा दिलीप की प्रभुता (सत्ता) का मुख्य उद्देश्य क्या था?
- (क) अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना
- (ख) प्रजा को भयभीत करना
- (ग) प्रजा को विनयशील बनाना और अनुशासित रखना
- (घ) अधिक से अधिक भूमि जीतना
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प्रश्न: राजा दिलीप दुष्टों को किस भाव से दण्डित नहीं करता था?
- (क) न्याय से
- (ख) क्रोध, काम या लोभ से
- (ग) प्रजा के कल्याण से
- (घ) धर्म से
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प्रश्न: राजा दिलीप भोगों में रहते हुए भी कैसा था?
- (क) उनमें आसक्त
- (ख) उनसे विरक्त और मोक्ष की ओर उन्मुख
- (ग) भोगों में लिप्त
- (घ) भोगों से दुखी
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प्रश्न: 'प्रजानां विनयनात्' पाठ में राजा दिलीप की कर-प्रणाली की तुलना किससे की गई है?
- (क) चंद्रमा के प्रकाश से
- (ख) पवन के वेग से
- (ग) सूर्य के जल खींचने और वर्षा करने से
- (घ) अग्नि के ताप से
उत्तरमाला:
- (ग) रघुवंशम्
- (घ) कालिदास
- (ख) क्योंकि वह उन्हें शिक्षित करता था, उनकी रक्षा करता था और उनका भरण-पोषण करता था।
- (ग) पृथ्वी को
- (ग) यज्ञों के लिए और उसे प्रजा के कल्याण हेतु लौटाने के लिए
- (ख) बिना खींचा हुआ ही धारण किया हुआ
- (ग) प्रजा को विनयशील बनाना और अनुशासित रखना
- (ख) क्रोध, काम या लोभ से
- (ख) उनसे विरक्त और मोक्ष की ओर उन्मुख
- (ग) सूर्य के जल खींचने और वर्षा करने से
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को गहराई से समझने और परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने में सहायक होंगे। शुभकामनाएँ!