Class 12 Sanskrit Notes Chapter 5 (Chapter 5) – Shaswati Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी 'शाश्वती' पुस्तक के पंचम अध्याय 'सूक्तिसुधा' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय विभिन्न संस्कृत ग्रंथों से संकलित महत्त्वपूर्ण सूक्तियों का संग्रह है, जो हमें जीवन के लिए उपयोगी नैतिक शिक्षाएँ प्रदान करती हैं। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इन सूक्तियों के अर्थ, भाव, व्याकरणिक बिंदु और स्रोत को समझना अत्यंत आवश्यक है।
अध्याय 5: सूक्तिसुधा (सूक्तियों का अमृत)
यह अध्याय विभिन्न नीतिग्रंथों जैसे नीतिशतकम् (भर्तृहरि), चाणक्यनीतिदर्पणम्, हितोपदेशः और पञ्चतन्त्रम् से संकलित दस महत्त्वपूर्ण सूक्तियों का संग्रह है। ये सूक्तियाँ मानवीय मूल्यों, सदाचार, ज्ञान का महत्त्व, परोपकार और जीवन के व्यावहारिक पहलुओं पर प्रकाश डालती हैं।
1. विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्...
- स्रोत: नीतिशतकम् (भर्तृहरि)
- पदच्छेद: विद्या नाम नरस्य रूपम् अधिकम् प्रच्छन्न-गुप्तम् धनम्। विद्या भोगकरी यशः-सुखकरी विद्या गुरुणाम् गुरुः। विद्या बन्धुजनः विदेश-गमने विद्या परा देवता। विद्या राजसु पूज्यते न हि धनम् विद्या-विहीनः पशुः॥
- अन्वय: विद्या नाम नरस्य अधिकं रूपम्, प्रच्छन्नगुप्तं धनम् (अस्ति)। विद्या भोगकरी, यशःसुखकरी (अस्ति)। विद्या गुरुणां गुरुः। विदेशगमने विद्या बन्धुजनः, विद्या परा देवता (अस्ति)। विद्या राजसु पूज्यते, हि धनं न (पूज्यते)। विद्याविहीनः पशुः (भवति)।
- अर्थ: विद्या ही मनुष्य का सबसे उत्कृष्ट रूप है, वह छिपा हुआ गुप्त धन है। विद्या भोगों को देने वाली, यश और सुख देने वाली है। विद्या गुरुओं की भी गुरु है। विदेश जाने पर विद्या ही भाई-बन्धु के समान सहायक होती है, विद्या ही सबसे बड़ी देवी है। राजाओं में विद्या की पूजा होती है, धन की नहीं। विद्या से रहित मनुष्य पशु के समान है।
- भाव: इस श्लोक में विद्या के महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है। विद्या को मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य, गुप्त धन, सुख-समृद्धि का स्रोत और संकट में सहायक बताया गया है। यह धन से श्रेष्ठ है, क्योंकि धन की पूजा नहीं होती, विद्या की होती है।
- व्याकरणिक बिंदु:
- प्रच्छन्नगुप्तम्: प्रच्छन्नं च तत् गुप्तं च (कर्मधारय समास)।
- भोगकरी, यशःसुखकरी: भोगान् करोतीति (उपपद तत्पुरुष + ङीष्), यशः च सुखं च करोतीति (द्वन्द्व + उपपद तत्पुरुष + ङीष्)।
- गुरुणाम्: गुरु शब्द का षष्ठी बहुवचन।
- विदेशगमने: विदेशे गमनम् (सप्तमी तत्पुरुष)।
- राजसु: राजन् शब्द का सप्तमी बहुवचन।
- विद्याविहीनः: विद्यया विहीनः (तृतीया तत्पुरुष)।
2. येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः...
- स्रोत: नीतिशतकम् (भर्तृहरि)
- पदच्छेद: येषाम् न विद्या न तपः न दानम् ज्ञानम् न शीलम् न गुणः न धर्मः। ते मृत्युलोके भुवि भारभूताः मनुष्यरूपेण मृगाः चरन्ति॥
- अन्वय: येषां न विद्या, न तपः, न दानं, न ज्ञानं, न शीलं, न गुणः, न धर्मः (अस्ति), ते मृत्युलोके भुवि भारभूताः मनुष्यरूपेण मृगाः चरन्ति।
- अर्थ: जिनके पास न विद्या है, न तपस्या है, न दान है, न ज्ञान है, न अच्छा चरित्र है, न कोई गुण है और न धर्म है, वे इस मृत्युलोक में पृथ्वी पर भार के समान हैं। वे मनुष्य के रूप में पशु होकर विचरण करते हैं।
- भाव: यह श्लोक उन लोगों की निंदा करता है जो मानवीय गुणों से रहित हैं। विद्या, तपस्या, दान, ज्ञान, शील, गुण और धर्म को मनुष्य के आवश्यक गुण बताया गया है। इनके अभाव में मनुष्य पशुतुल्य हो जाता है।
- व्याकरणिक बिंदु:
- मृत्युलोके: मृत्योः लोकः (षष्ठी तत्पुरुष) - सप्तमी एकवचन।
- भारभूताः: भारः इव भूताः (उपमान कर्मधारय)।
- मनुष्यरूपेण: मनुष्यस्य रूपेण (षष्ठी तत्पुरुष) - तृतीया एकवचन।
- चरन्ति: चर् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
3. दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन स्नानेन शुद्धिर्न तु चन्दनेन...
- स्रोत: चाणक्यनीतिदर्पणम्
- पदच्छेद: दानेन पाणिः न तु कङ्कणेन स्नानेन शुद्धिः न तु चन्दनेन। ज्ञानेन तृप्तिः न तु भोजनेन मोक्षेण चक्षुः न तु दर्पणेन॥
- अन्वय: पाणिः दानेन (शोभते) न तु कङ्कणेन। शुद्धिः स्नानेन (भवति) न तु चन्दनेन। तृप्तिः ज्ञानेन (भवति) न तु भोजनेन। चक्षुः मोक्षेण (भवति) न तु दर्पणेन।
- अर्थ: हाथ दान से सुशोभित होता है, कंगन से नहीं। शरीर की शुद्धि स्नान से होती है, चन्दन लगाने से नहीं। संतोष ज्ञान से होता है, भोजन से नहीं। आँखें मोक्ष से (ज्ञान प्राप्त कर) प्रकाशित होती हैं, दर्पण से नहीं।
- भाव: यह श्लोक वास्तविक सौंदर्य और संतोष का अर्थ समझाता है। बाह्य आडंबरों की बजाय आंतरिक गुणों और कर्मों को महत्त्व दिया गया है। दान, स्नान, ज्ञान और मोक्ष को क्रमशः हाथ, शरीर, मन और आँखों की सच्ची शोभा और शुद्धि बताया गया है।
- व्याकरणिक बिंदु:
- कङ्कणेन: कङ्कण शब्द का तृतीया एकवचन।
- स्नानेन: स्नान शब्द का तृतीया एकवचन।
- चन्दनेन: चन्दन शब्द का तृतीया एकवचन।
- ज्ञानेन: ज्ञान शब्द का तृतीया एकवचन।
- भोजनेन: भोजन शब्द का तृतीया एकवचन।
- मोक्षेण: मोक्ष शब्द का तृतीया एकवचन।
- दर्पणेन: दर्पण शब्द का तृतीया एकवचन।
4. अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्...
- स्रोत: हितोपदेशः
- पदच्छेद: अयम् निजः परः वा इति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानाम् तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
- अन्वय: अयम् निजः वा परः इति गणना लघुचेतसाम् (भवति)। उदारचरितानां तु वसुधा एव कुटुम्बकम् (भवति)।
- अर्थ: यह मेरा है या यह पराया है, ऐसी गणना (सोच) छोटे हृदय वालों की होती है। उदार चरित्र वाले लोगों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
- भाव: यह श्लोक संकीर्ण मानसिकता की आलोचना करता है और विश्वबंधुत्व की भावना को उजागर करता है। उदार हृदय वाले व्यक्ति समस्त संसार को अपना परिवार मानते हैं, जबकि संकीर्ण सोच वाले लोग 'अपने-पराये' के भेद में उलझे रहते हैं।
- व्याकरणिक बिंदु:
- निजः परो वा: निजः परः वा (द्वन्द्व समास)।
- लघुचेतसाम्: लघूनि चेतांसि येषां तेषाम् (बहुव्रीहि समास) - षष्ठी बहुवचन।
- उदारचरितानाम्: उदारं चरितं येषां तेषाम् (बहुव्रीहि समास) - षष्ठी बहुवचन।
- वसुधैव: वसुधा + एव (वृद्धि सन्धि)।
- कुटुम्बकम्: कुटुम्ब + कन् प्रत्यय (स्वार्थे)।
5. अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका...
- स्रोत: हितोपदेशः
- पदच्छेद: अल्पानाम् अपि वस्तूनाम् संहतिः कार्यसाधिका। तृणैः गुणत्वम् आपन्नैः बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥
- अन्वय: अल्पानाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका (भवति)। तृणैः गुणत्वम् आपन्नैः मत्तदन्तिनः बध्यन्ते।
- अर्थ: छोटी-छोटी वस्तुओं का समूह भी कार्य को सिद्ध करने वाला होता है। तिनकों से बनी हुई रस्सी के द्वारा मदमस्त हाथी भी बाँध दिए जाते हैं।
- भाव: यह श्लोक एकता में शक्ति के महत्त्व को दर्शाता है। यह बताता है कि भले ही कोई वस्तु छोटी या कमजोर प्रतीत हो, यदि वे संगठित हो जाएँ, तो बड़े से बड़े कार्य को भी सिद्ध कर सकती हैं।
- व्याकरणिक बिंदु:
- अल्पानाम्: अल्प शब्द का षष्ठी बहुवचन।
- वस्तूनाम्: वस्तु शब्द का षष्ठी बहुवचन।
- कार्यसाधिका: कार्यं साधयतीति (उपपद तत्पुरुष + टाप्)।
- गुणत्वम्: गुण + त्व (भाववाचक प्रत्यय)।
- आपन्नैः: आ + पद् + क्त (कर्मणि) + भिस् (तृतीया बहुवचन)।
- मत्तदन्तिनः: मत्ताः दन्तिनः (कर्मधारय समास) - प्रथमा बहुवचन।
- बध्यन्ते: बन्ध् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
6. यथा हि एकेन चक्रेण रथस्य गतिर्न भवेत्...
- स्रोत: हितोपदेशः
- पदच्छेद: यथा हि एकेन चक्रेण रथस्य गतिः न भवेत्। तथा पुरुषकारेण विना दैवम् न सिध्यति॥
- अन्वय: यथा हि एकेन चक्रेण रथस्य गतिः न भवेत्, तथा पुरुषकारेण विना दैवम् न सिध्यति।
- अर्थ: जैसे एक पहिए से रथ की गति नहीं हो सकती, वैसे ही पुरुषार्थ (परिश्रम) के बिना भाग्य सफल नहीं होता।
- भाव: यह श्लोक भाग्य और पुरुषार्थ दोनों के महत्त्व को बताता है। केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहना व्यर्थ है, क्योंकि पुरुषार्थ के बिना भाग्य भी फलदायी नहीं होता। दोनों का समन्वय आवश्यक है।
- व्याकरणिक बिंदु:
- एकेन: एक शब्द का तृतीया एकवचन।
- चक्रेण: चक्र शब्द का तृतीया एकवचन।
- रथस्य: रथ शब्द का षष्ठी एकवचन।
- पुरुषकारेण: पुरुषस्य कारः (षष्ठी तत्पुरुष) - तृतीया एकवचन।
- विना: अव्यय, इसके योग में तृतीया विभक्ति (पुरुषकारेण)।
- दैवम्: भाग्य।
- सिध्यति: सिध् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
7. यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहवः स तु जीवति...
- स्रोत: पञ्चतन्त्रम्
- पदच्छेद: यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहवः सः तु जीवति। काकः किं न कुरुते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम्॥
- अन्वय: यस्मिन् जीवति बहवः जीवन्ति, सः तु जीवति। काकः किं स्वोदरपूरणं चञ्च्वा न कुरुते?
- अर्थ: जिसके जीवित रहने से बहुत से लोग जीवित रहते हैं, वही वास्तव में जीवित है। क्या कौआ अपनी चोंच से अपना पेट नहीं भरता? (अर्थात् कौआ भी अपना पेट भरता है, पर उसका जीवन दूसरों के लिए उपयोगी नहीं होता।)
- भाव: यह श्लोक परोपकारी जीवन के महत्त्व को दर्शाता है। सच्चा जीवन वही है जो दूसरों के लिए उपयोगी हो, जो अनेक लोगों का सहारा बने। केवल अपना पेट भरना तो पशु भी जानते हैं।
- व्याकरणिक बिंदु:
- यस्मिन् जीवति: यस्मिन् (सप्तमी एकवचन) + जीवति (सति सप्तमी)।
- बहवः: बहु शब्द का प्रथमा बहुवचन।
- जीवन्ति: जीव् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
- स्वादरपूरणम्: स्वस्य उदरस्य पूरणम् (षष्ठी तत्पुरुष) - कर्म।
- चञ्च्वा: चञ्चु शब्द का तृतीया एकवचन।
8. पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः...
- स्रोत: नीतिशतकम् (भर्तृहरि)
- पदच्छेद: पिबन्ति नद्यः स्वयम् एव न अम्भः स्वयम् न खादन्ति फलानि वृक्षाः। नादन्ति सस्यम् खलु वारिवाहाः परोपकाराय सताम् विभूतयः॥
- अन्वय: नद्यः स्वयम् एव अम्भः न पिबन्ति। वृक्षाः स्वयम् फलानि न खादन्ति। वारिवाहाः खलु सस्यम् न अदन्ति। सतां विभूतयः परोपकाराय (भवन्ति)।
- अर्थ: नदियाँ स्वयं अपना जल नहीं पीतीं। वृक्ष स्वयं अपने फल नहीं खाते। बादल निश्चय ही अपनी उपज (अनाज) को नहीं खाते। सज्जनों की सम्पत्तियाँ परोपकार के लिए ही होती हैं।
- भाव: यह श्लोक परोपकार की भावना का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्रकृति के उदाहरणों से समझाया गया है कि सज्जन व्यक्तियों का धन, ज्ञान और शक्ति दूसरों के कल्याण के लिए ही होती है।
- व्याकरणिक बिंदु:
- अम्भः: जलम् (द्वितीय एकवचन)।
- वारिवाहाः: वारि वहन्ति इति (उपपद तत्पुरुष) - बादल।
- सस्यम्: अनाज, फसल।
- अदन्ति: अद् धातु (खाना), लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
- सताम्: सत् शब्द का षष्ठी बहुवचन।
- विभूतयः: ऐश्वर्य, सम्पत्ति।
- परोपकाराय: परस्य उपकारः (षष्ठी तत्पुरुष) - चतुर्थी एकवचन (के लिए)।
9. सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता...
- स्रोत: नीतिशतकम् (भर्तृहरि)
- पदच्छेद: सम्पत्तौ च विपत्तौ च महताम् एकरूपता। उदयसविता रक्तः रक्तः च अस्तमये तथा॥
- अन्वय: सम्पत्तौ च विपत्तौ च महताम् एकरूपता (भवति)। सविता उदये रक्तः, तथा अस्तमये च रक्तः (भवति)।
- अर्थ: सम्पत्ति (सुख) में और विपत्ति (दुःख) में महान् पुरुषों की एकरूपता (समानता) रहती है। जैसे, सूर्य उदय होते समय भी लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल ही होता है।
- भाव: यह श्लोक महान् पुरुषों के धैर्य और समभाव को दर्शाता है। वे सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान जैसी द्वंद्वात्मक परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते और समान भाव से रहते हैं।
- व्याकरणिक बिंदु:
- सम्पत्तौ, विपत्तौ: सम्पत्ति, विपत्ति शब्द का सप्तमी एकवचन।
- महताम्: महत् शब्द का षष्ठी बहुवचन।
- एकरूपता: एकं रूपं यस्याः सा (बहुव्रीहि समास + टाप्)।
- उदयसविता: उदये सविता (सप्तमी तत्पुरुष) - उदय होता हुआ सूर्य।
- अस्तमये: अस्तम् अयः यस्य (बहुव्रीहि समास) - अस्त होते समय।
10. क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्...
- स्रोत: चाणक्यनीतिदर्पणम्
- पदच्छेद: क्षणशः कणशः च एव विद्याम् अर्थम् च साधयेत्। क्षणत्यागे कुतो विद्या कणत्यागे कुतो धनम्॥
- अन्वय: क्षणशः कणशः च एव विद्यां च अर्थं साधयेत्। क्षणत्यागे कुतो विद्या? कणत्यागे कुतो धनम्?
- अर्थ: क्षण-क्षण करके विद्या और कण-कण करके धन प्राप्त करना चाहिए। क्षणों का त्याग करने पर विद्या कहाँ? और कणों का त्याग करने पर धन कहाँ?
- भाव: यह श्लोक समय और संसाधनों के सदुपयोग का महत्त्व बताता है। विद्या और धन जैसी मूल्यवान वस्तुओं को धीरे-धीरे, छोटे-छोटे प्रयासों से ही संचित किया जा सकता है। एक भी क्षण या कण का त्याग करने से बड़ी हानि हो सकती है।
- व्याकरणिक बिंदु:
- क्षणशः, कणशः: क्षण + शस्, कण + शस् (प्रकारार्थक प्रत्यय) - क्षण-क्षण करके, कण-कण करके।
- साधयेत्: सिध् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
- क्षणत्यागे: क्षणस्य त्यागः (षष्ठी तत्पुरुष) - सप्तमी एकवचन।
- कणत्यागे: कणस्य त्यागः (षष्ठी तत्पुरुष) - सप्तमी एकवचन।
- कुतः: अव्यय - कहाँ से?
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
"विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्" - यह सूक्ति किस ग्रन्थ से उद्धृत है?
अ) हितोपदेशः
ब) पञ्चतन्त्रम्
स) नीतिशतकम्
द) चाणक्यनीतिदर्पणम् -
"विद्याविहीनः पशुः" यहाँ 'पशुः' पद से क्या अभिप्राय है?
अ) चार पैरों वाला जानवर
ब) अज्ञानी व्यक्ति
स) धनहीन व्यक्ति
द) बलहीन व्यक्ति -
"अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्" - इस पंक्ति में 'लघुचेतसाम्' का क्या अर्थ है?
अ) बड़े हृदय वाले
ब) छोटे हृदय वाले
स) बुद्धिमान लोग
द) मूर्ख लोग -
किसके जीवित रहने से बहुत से लोग जीवित रहते हैं, वही वास्तव में जीवित है - यह भाव किस सूक्ति में व्यक्त हुआ है?
अ) सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता
ब) यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहवः स तु जीवति
स) अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका
द) दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन -
"परोपकाराय सताम् विभूतयः" - इस पंक्ति का क्या अर्थ है?
अ) सज्जनों का धन स्वयं के लिए होता है।
ब) सज्जनों का धन परोपकार के लिए होता है।
स) सज्जन धन का संग्रह करते हैं।
द) सज्जन धन को त्याग देते हैं। -
"तृणैः गुणत्वम् आपन्नैः बध्यन्ते मत्तदन्तिनः" - इस पंक्ति में 'मत्तदन्तिनः' का क्या अर्थ है?
अ) छोटे हाथी
ब) कमजोर हाथी
स) मदमस्त हाथी
द) बूढ़े हाथी -
"पुरुषकारेण विना दैवम् न सिध्यति" - इस कथन का भाव क्या है?
अ) भाग्य के बिना पुरुषार्थ व्यर्थ है।
ब) पुरुषार्थ के बिना भाग्य सफल नहीं होता।
स) केवल भाग्य ही सब कुछ है।
द) पुरुषार्थ और भाग्य का कोई संबंध नहीं। -
"क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्" - यहाँ 'क्षणशः' और 'कणशः' में कौन सा प्रत्यय है?
अ) क्त
ब) त्व
स) शस्
द) ल्यप् -
"सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता" - इस सूक्ति में 'एकरूपता' का क्या अभिप्राय है?
अ) बाहरी रूप की समानता
ब) आंतरिक स्वभाव की समानता
स) धन की समानता
द) शक्ति की समानता -
निम्न में से कौन सा कथन असत्य है?
अ) नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं।
ब) वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते।
स) बादल अपनी फसल स्वयं खाते हैं।
द) सज्जनों की सम्पत्तियाँ परोपकार के लिए होती हैं।
उत्तरमाला:
- स) नीतिशतकम्
- ब) अज्ञानी व्यक्ति
- ब) छोटे हृदय वाले
- ब) यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहवः स तु जीवति
- ब) सज्जनों का धन परोपकार के लिए होता है।
- स) मदमस्त हाथी
- ब) पुरुषार्थ के बिना भाग्य सफल नहीं होता।
- स) शस्
- ब) आंतरिक स्वभाव की समानता
- स) बादल अपनी फसल स्वयं खाते हैं।
मुझे आशा है कि यह विस्तृत विवरण और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। प्रत्येक सूक्ति के भावार्थ और व्याकरणिक बिंदुओं पर विशेष ध्यान दें। शुभकामनाएँ!