Class 12 Sanskrit Notes Chapter 5 (शकनासापद्श:) – Bhaswati Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी 'भास्वती' पुस्तक के पंचम पाठ 'शुकनासोपदेशः' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पाठ महाकवि बाणभट्ट विरचित विश्वप्रसिद्ध गद्यकाव्य 'कादम्बरी' का एक अंश है। इसमें मंत्री शुकनास द्वारा युवराज चन्द्रापीड को दिया गया उपदेश वर्णित है।
पाठ 5: शुकनासोपदेशः (शुकनास का उपदेश)
1. पाठ का परिचय:
'शुकनासोपदेशः' संस्कृत साहित्य के मूर्धन्य गद्यकार बाणभट्ट की अमर कृति 'कादम्बरी' के पूर्वभाग से संकलित है। यह अंश युवराज चन्द्रापीड के राज्याभिषेक से पूर्व महामंत्री शुकनास द्वारा उन्हें दिए गए उपदेश का वर्णन करता है। यह उपदेश केवल चन्द्रापीड के लिए ही नहीं, अपितु सभी युवा शासकों और सत्ता में आने वाले व्यक्तियों के लिए एक शाश्वत मार्गदर्शक है। इसमें लक्ष्मी (धन-संपत्ति और सत्ता) के दोषों, युवावस्था की चंचलता, इन्द्रियों पर नियंत्रण की आवश्यकता और सत्संगति के महत्व का अत्यंत प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया गया है।
2. कवि परिचय: महाकवि बाणभट्ट
- समय: सातवीं शताब्दी ईस्वी का पूर्वार्ध।
- आश्रयदाता: सम्राट हर्षवर्धन (606-647 ई.)।
- वंश: वात्स्यायन गोत्र के ब्राह्मण।
- पिता: चित्रभानु।
- माता: राजदेवी।
- प्रमुख कृतियाँ:
- कादम्बरी: विश्व का सबसे बड़ा गद्यकाव्य, जिसमें तीन जन्मों की कथा का वर्णन है। यह दो भागों में विभक्त है - पूर्वभाग (बाणभट्ट द्वारा रचित) और उत्तरभाग (बाणभट्ट के पुत्र भूषणभट्ट/पुलिनभट्ट द्वारा पूर्ण किया गया)।
- हर्षचरितम्: सम्राट हर्षवर्धन के जीवन पर आधारित आख्यायिका (ऐतिहासिक गद्यकाव्य)।
- चण्डीशतकम्: देवी चण्डी की स्तुति में रचित शतक काव्य।
- पार्वतीपरिणयम्: एक नाटक।
- शैली: बाणभट्ट की गद्य शैली 'पाञ्चाली रीति' कहलाती है, जिसमें लंबे समासों, अलंकारों (विशेषकर उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा) और विस्तृत वर्णनों का प्रयोग होता है। उनकी भाषा अत्यंत अलंकृत, प्रवाहमयी और भावपूर्ण है।
3. पाठ का सन्दर्भ एवं पृष्ठभूमि:
उज्जयिनी के राजा तारापीड अपने पुत्र चन्द्रापीड को युवराज पद पर अभिषिक्त करने का निश्चय करते हैं। राज्याभिषेक से पूर्व, राजा तारापीड अपने अनुभवी महामंत्री शुकनास को चन्द्रापीड को उपदेश देने का आदेश देते हैं। शुकनास, चन्द्रापीड की विनम्रता, विद्वत्ता और गुणों को जानते हुए भी, उसे युवावस्था के स्वाभाविक दोषों और राजलक्ष्मी के मद से उत्पन्न होने वाले खतरों के प्रति सचेत करते हैं।
4. शुकनासोपदेश के प्रमुख बिन्दु (विस्तृत नोट्स):
शुकनास चन्द्रापीड को संबोधित करते हुए कहते हैं कि यद्यपि तुम स्वभाव से ही ज्ञानी, विनयशील और गुणों से युक्त हो, फिर भी उपदेश देना आवश्यक है, क्योंकि युवावस्था में अनेक दोष स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं।
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अवस्था के दोषों पर प्रकाश:
- यौवनारम्भ: यह 'तिमिरान्धत्व' (अंधेपन) के समान होता है, जिसमें व्यक्ति सही-गलत का भेद नहीं कर पाता।
- अपार शक्ति: युवावस्था में शक्ति और विवेक का अभाव अक्सर विनाशकारी होता है।
- अज्ञान: युवावस्था में व्यक्ति अज्ञान के कारण विवेकहीन हो जाता है, जैसे जल से धोकर भी अज्ञान रूपी मल नहीं धुलता।
- इन्द्रियों का वेग: इन्द्रियाँ इतनी प्रबल होती हैं कि उन्हें वश में करना कठिन होता है।
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राजलक्ष्मी के दोषों का वर्णन: शुकनास राजलक्ष्मी को अत्यंत कपटी, दुष्टा और अनर्थकारिणी बताते हैं।
- अशुद्धता: लक्ष्मी 'क्षीरसागर' से उत्पन्न होकर भी 'क्षारजल' (खारे पानी) के समान है, जो तृष्णा को और बढ़ाती है।
- क्रूरता: यह 'चण्डालिनी' के समान है, जो व्यक्ति को अधर्म की ओर धकेलती है।
- विषमता: यह 'विषवल्लरी' (विषैली लता) के समान है, जो मोह रूपी फल देती है।
- अस्थिरता: यह 'जलतरंग' के समान चंचल है, कभी स्थिर नहीं रहती।
- अंधत्व: यह 'पिशाची' के समान है, जो व्यक्ति को मद से अंधा कर देती है।
- अज्ञानता: यह 'मदिरा' के समान है, जो व्यक्ति को विवेकहीन बना देती है।
- अहंकार: लक्ष्मी के मद से उत्पन्न अहंकार 'तिमिर' (अंधकार) के समान है, जो ज्ञान के प्रकाश को ढक देता है।
- विनाशकारी प्रभाव: लक्ष्मी प्राप्त होने पर व्यक्ति में अनेक दोष आ जाते हैं:
- अभिमान: व्यक्ति घमंडी हो जाता है।
- विषय-वासना: इन्द्रियों के सुखों में लिप्त हो जाता है।
- अंधत्व: सही-गलत का विवेक खो देता है।
- उत्पात: अनैतिक कार्य करने लगता है।
- परिणाम: अंततः पतन की ओर अग्रसर होता है।
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राजाओं के स्वभाव पर प्रभाव:
- सेवा का अभाव: लक्ष्मी से युक्त राजा सेवा करने वालों को भी तुच्छ समझने लगते हैं।
- अज्ञान का आवरण: राज्याभिषेक के समय जो 'राज्याभिषेक-संस्कार' होता है, वह वास्तव में 'तिमिर' (अंधकार) उत्पन्न करता है, जिससे राजा विवेकहीन हो जाता है।
- मद के प्रकार: सत्ता का मद, धन का मद, यौवन का मद - ये सभी मिलकर व्यक्ति को अंधा बना देते हैं।
- दुष्टों की संगति: लक्ष्मी से मदमस्त राजा चापलूसों और दुष्टों की संगति में पड़ जाते हैं, जो उन्हें गलत सलाह देते हैं।
- सच्चे हितैषियों की उपेक्षा: वे सच्चे सलाहकारों और हितैषियों की बातों पर ध्यान नहीं देते।
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उपदेश की आवश्यकता और महत्व:
- शुकनास कहते हैं कि उपदेश 'अंधकार' को दूर करने वाले 'प्रकाश' के समान है।
- यह 'बुढ़ापे' के समान है जो 'केशों' को सफेद करता है, लेकिन 'अज्ञान' को दूर करता है।
- यह 'कांच' के समान है जो 'मल' को दूर करता है।
- यह 'जल' के समान है जो 'दोषों' को धोता है।
- उपदेश से व्यक्ति की बुद्धि निर्मल होती है और वह सही निर्णय ले पाता है।
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चन्द्रापीड को विशिष्ट निर्देश:
- गुरुजनों का सम्मान: गुरुजनों की बातों को ध्यान से सुनो।
- इन्द्रियों पर नियंत्रण: अपनी इन्द्रियों को वश में रखो।
- सत्संगति: अच्छे लोगों की संगति करो।
- विवेक का प्रयोग: प्रत्येक कार्य विवेकपूर्ण ढंग से करो।
- प्रजा का कल्याण: प्रजा के कल्याण को सर्वोपरि मानो।
- अहंकार का त्याग: अहंकार से दूर रहो।
5. प्रमुख पात्र:
- चन्द्रापीड: उज्जयिनी के राजा तारापीड का पुत्र और युवराज। अत्यंत गुणवान, विनयशील और विद्वान।
- शुकनास: राजा तारापीड का महामंत्री। अत्यंत अनुभवी, बुद्धिमान और दूरदर्शी।
6. साहित्यिक विशेषताएँ:
- शैली: बाणभट्ट की पाञ्चाली रीति, जिसमें लंबे समासों, अनुप्रास, यमक, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अर्थान्तरन्यास आदि अलंकारों का प्रचुर प्रयोग है।
- भाषा: संस्कृत की परिष्कृत और अलंकृत गद्य शैली।
- भाव: गंभीर नैतिक उपदेश, जो तत्कालीन समाज और राजनीति के लिए प्रासंगिक था और आज भी है।
- वर्णन: लक्ष्मी के दोषों और यौवन के मद का अत्यंत सजीव और प्रभावशाली वर्णन।
7. प्रमुख सूक्तियाँ/कथन (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण):
- "अपरिमितरत्नाकरोऽपि हि दोषवान्।" (अपरिमित रत्नों का सागर भी दोषयुक्त होता है) - लक्ष्मी के दोषों के संदर्भ में।
- "अलभ्या हि राज्यासुखप्रायोपदेशाः।" (राज्य के सुखों में रहने वाले को उपदेश मिलना दुर्लभ है)।
- "गर्भेश्वरत्वमभिनवयौवनत्वमप्रतिमरूपत्वममानुषशक्तिश्चेति महतीयं खलु चतुष्टयी।" (गर्भ से ही ऐश्वर्यवान होना, नवीन यौवन, अनुपम रूप और अमानवीय शक्ति - ये चारों एक साथ मिलना बड़े अनर्थ का कारण होते हैं)।
- "लक्ष्मीर्मदिरारूपा।" (लक्ष्मी मदिरा के समान है)।
- "उपदेशो हि नाम वृद्धावस्थाप्यमलिनमपि करोति।" (उपदेश वृद्धावस्था के समान है जो मलिनता को भी दूर करता है)।
8. पाठ का संदेश:
यह पाठ बताता है कि सत्ता, धन और यौवन का मद व्यक्ति को विवेकहीन बना देता है। एक शासक को हमेशा विनम्र, विवेकशील और गुरुजनों के प्रति श्रद्धावान रहना चाहिए। उसे लक्ष्मी के मायाजाल से बचकर प्रजा के कल्याण में संलग्न रहना चाहिए। सत्संगति और आत्मनियंत्रण ही पतन से बचने का मार्ग है।
सरकारी परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिन्दु:
- पाठ के लेखक, पुस्तक का नाम और पाठ का स्रोत (कादम्बरी का पूर्वभाग) याद रखें।
- शुकनास द्वारा लक्ष्मी के लिए प्रयुक्त उपमाएँ (चण्डालिनी, विषवल्लरी, मदिरा, तिमिरान्धत्व आदि) विशेष रूप से याद करें।
- यौवन के दोषों का वर्णन करने वाले वाक्य और उनके अर्थ समझें।
- शुकनास द्वारा चन्द्रापीड को दिए गए मुख्य उपदेशों को सूचीबद्ध करें।
- पाठ की प्रमुख सूक्तियों और उनके अर्थों को कंठस्थ करें।
- बाणभट्ट की गद्य शैली (पाञ्चाली रीति) और उनकी प्रमुख कृतियों को जानें।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):
-
'शुकनासोपदेशः' पाठ किस ग्रंथ से संकलित है?
अ) हर्षचरितम्
ब) कादम्बरी
स) चण्डीशतकम्
द) पार्वतीपरिणयम् -
'शुकनासोपदेशः' के रचयिता कौन हैं?
अ) भवभूति
ब) कालिदास
स) बाणभट्ट
द) भारवि -
शुकनास ने किसे उपदेश दिया था?
अ) तारापीड
ब) पुण्डरीक
स) चन्द्रापीड
द) वैशम्पायन -
शुकनास के अनुसार राजलक्ष्मी किससे उत्पन्न हुई है?
अ) क्षीरसागर
ब) पाताल
स) स्वर्ग
द) पृथ्वी -
शुकनास ने राजलक्ष्मी को किसके समान बताया है जो अंधा कर देती है?
अ) मदिरा
ब) विषवल्लरी
स) चण्डालिनी
द) पिशाची -
"गर्भेश्वरत्वमभिनवयौवनत्वमप्रतिमरूपत्वममानुषशक्तिश्चेति महतीयं खलु चतुष्टयी।" - यह कथन किसके संदर्भ में है?
अ) राजलक्ष्मी के दोष
ब) यौवन के दोष
स) राजा के पतन के कारण
द) उपदेश की आवश्यकता -
शुकनास के अनुसार उपदेश किसके समान है जो मलिनता को भी दूर करता है?
अ) जल
ब) दर्पण
स) वृद्धावस्था
द) प्रकाश -
बाणभट्ट की गद्य शैली किस नाम से जानी जाती है?
अ) वैदर्भी रीति
ब) गौड़ी रीति
स) पाञ्चाली रीति
द) लाटी रीति -
शुकनास ने लक्ष्मी को 'क्षीरसागर' से उत्पन्न होकर भी किसके समान बताया है?
अ) अमृत
ब) विष
स) क्षारजल
द) रत्न -
चन्द्रापीड किसका पुत्र था?
अ) शुकनास
ब) तारापीड
स) पुण्डरीक
द) वैशम्पायन
उत्तरमाला:
- ब) कादम्बरी
- स) बाणभट्ट
- स) चन्द्रापीड
- अ) क्षीरसागर
- द) पिशाची
- स) राजा के पतन के कारण (या यौवन और ऐश्वर्य के संयुक्त दोषों के कारण)
- स) वृद्धावस्था
- स) पाञ्चाली रीति
- स) क्षारजल
- ब) तारापीड
आशा है ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक होंगे। मन लगाकर अध्ययन करें।