Class 12 Sanskrit Notes Chapter 6 (Chapter 6) – Shaswati Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी 'शाश्वती' पाठ्यपुस्तक के षष्ठ अध्याय 'सूक्तिसुधा' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय विभिन्न संस्कृत ग्रंथों से संकलित अमूल्य सूक्तियों का संग्रह है, जो हमें जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों और आदर्शों से परिचित कराता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इन सूक्तियों के अर्थ, भावार्थ और निहित संदेश को गहराई से समझना अत्यंत आवश्यक है।
अध्याय 6: सूक्तिसुधा
परिचय:
'सूक्तिसुधा' का अर्थ है 'उत्तम वचनों का अमृत'। यह अध्याय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालने वाले नीतिपरक श्लोकों का संग्रह है। ये सूक्तियाँ हमें ज्ञान, नैतिकता, व्यवहारकुशलता और जीवन जीने की कला सिखाती हैं। ये न केवल हमारी भाषा और साहित्य की समझ को बढ़ाती हैं, बल्कि हमें एक बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा भी देती हैं।
विस्तृत नोट्स:
श्लोक 1:
विद्या ददाति विनयं, विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति, धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
- अन्वय: विद्या विनयं ददाति। विनयात् पात्रताम् आयाति। पात्रत्वात् धनम् आप्नोति। धनात् धर्मं (आप्नोति), ततः सुखम् (आप्नोति)।
- अर्थ: विद्या विनय देती है। विनय से योग्यता (पात्रता) आती है। योग्यता से धन प्राप्त होता है। धन से धर्म (सत्कर्म) होता है और (धर्म से) फिर सुख मिलता है।
- भावार्थ/व्याख्या: यह श्लोक विद्या के महत्व को बताता है। सच्ची विद्या मनुष्य को विनम्र बनाती है। विनम्रता से व्यक्ति में गुणों को ग्रहण करने की योग्यता आती है। योग्य व्यक्ति ही धन कमाता है। इस धन का उपयोग जब धर्म (नैतिकता, परोपकार) के कार्यों में किया जाता है, तो अंततः व्यक्ति को वास्तविक सुख की प्राप्ति होती है। यह श्लोक विद्या को सुख का मूल कारण सिद्ध करता है।
- विशेष: यह श्लोक 'हितोपदेश' से लिया गया है और विद्या के क्रमिक लाभों को दर्शाता है।
श्लोक 2:
जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं, मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं, सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥
- अन्वय: (सत्संगतिः) धियः जाड्यं हरति, वाचि सत्यं सिञ्चति, मानोनतिं दिशति, पापम् अपाकरोति, चेतः प्रसादयति, दिक्षु कीर्तिं तनोति। कथय (एषा) सत्संगतिः पुंसाम् किं न करोति?
- अर्थ: (अच्छी संगति) बुद्धि की जड़ता (मूर्खता) को हर लेती है, वाणी में सत्य का संचार करती है, मान और उन्नति प्रदान करती है, पाप को दूर करती है, मन को प्रसन्न करती है और सभी दिशाओं में यश फैलाती है। बताओ, सत्संगति मनुष्यों के लिए क्या नहीं करती है? (अर्थात् सब कुछ करती है)।
- भावार्थ/व्याख्या: यह श्लोक सत्संगति (अच्छी संगति) के अनगिनत लाभों का वर्णन करता है। सत्संगति व्यक्ति की बुद्धि को तेज करती है, उसे सत्य बोलने के लिए प्रेरित करती है, समाज में सम्मान दिलाती है, उसे पाप कर्मों से दूर रखती है, मन को शांत और प्रसन्न रखती है, और उसके यश को चारों दिशाओं में फैलाती है। कवि प्रश्न के माध्यम से यह कहना चाहता है कि सत्संगति व्यक्ति के जीवन को हर प्रकार से श्रेष्ठ बनाती है।
- विशेष: यह श्लोक भर्तृहरि के 'नीतिशतक' से लिया गया है।
श्लोक 3:
यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति॥
- अन्वय: यथा हि एकेन चक्रेण रथस्य गतिः न भवेत्, एवम् पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।
- अर्थ: जैसे एक पहिए से रथ की गति नहीं हो सकती, वैसे ही पुरुषार्थ (परिश्रम) के बिना भाग्य (दैव) सफल नहीं होता।
- भावार्थ/व्याख्या: यह श्लोक पुरुषार्थ (परिश्रम) के महत्व को रेखांकित करता है। जिस प्रकार कोई रथ केवल एक पहिए से आगे नहीं बढ़ सकता, उसी प्रकार केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता। सफलता के लिए मनुष्य को अपने परिश्रम और प्रयास करने पड़ते हैं। भाग्य तभी साथ देता है जब व्यक्ति स्वयं कर्म करता है। यह श्लोक आलस्य त्यागकर कर्म करने की प्रेरणा देता है।
- विशेष: यह श्लोक 'महाभारत' के विदुर नीति से लिया गया है।
श्लोक 4:
न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
- अन्वय: (विद्याधनम्) न चोरहार्यं, न च राजहार्यं, न भ्रातृभाज्यं, न च भारकारि। व्यये कृते (अपि) नित्यं वर्धत एव। (अतः) विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् (अस्ति)।
- अर्थ: (विद्या रूपी धन) न चोरों द्वारा चुराया जा सकता है, न राजा द्वारा छीना जा सकता है, न भाइयों में बांटा जा सकता है, और न ही यह भार बढ़ाने वाला है। खर्च करने पर तो यह हमेशा बढ़ता ही है। इसलिए विद्या रूपी धन सभी धनों में प्रधान है।
- भावार्थ/व्याख्या: यह श्लोक विद्या को सर्वश्रेष्ठ धन सिद्ध करता है। भौतिक धन को चोर चुरा सकते हैं, राजा छीन सकता है, भाइयों में बंटवारा हो सकता है और वह अपने साथ भार भी लाता है। परंतु विद्या रूपी धन इन सभी दोषों से मुक्त है। इसे जितना अधिक दूसरों को दिया जाता है, उतना ही यह बढ़ता है। यह अमर और अक्षय है, जो व्यक्ति के साथ हमेशा रहता है।
- विशेष: यह श्लोक विद्या के अनुपम महत्व को दर्शाता है, जो अन्य सभी प्रकार के धनों से श्रेष्ठ है।
श्लोक 5:
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
- अन्वय: अयं निजः वा परः इति गणना लघुचेतसाम् (भवति)। उदारचरितानां तु वसुधा एव कुटुम्बकम् (भवति)।
- अर्थ: यह मेरा है अथवा यह पराया है, ऐसी गणना (सोच) छोटे हृदय वाले (संकीर्ण मन वाले) लोगों की होती है। उदार चरित्र वाले लोगों के लिए तो संपूर्ण पृथ्वी ही परिवार है।
- भावार्थ/व्याख्या: यह श्लोक विश्व बंधुत्व और उदारता की भावना को व्यक्त करता है। संकीर्ण सोच वाले व्यक्ति 'मेरा-तेरा' के भेद में उलझे रहते हैं, वे केवल अपने स्वार्थ और परिवार तक ही सीमित रहते हैं। इसके विपरीत, महान और उदार हृदय वाले व्यक्ति संपूर्ण विश्व को अपना परिवार मानते हैं। वे किसी में भेद नहीं करते और सभी के कल्याण की भावना रखते हैं। यह श्लोक वैश्विक भाईचारे का संदेश देता है।
- विशेष: यह श्लोक 'महाउपनिषद्' और 'हितोपदेश' जैसे ग्रंथों में मिलता है।
श्लोक 6:
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात् प्रियं हि वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥
- अन्वय: प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे जन्तवः तुष्यन्ति। तस्मात् प्रियं हि वक्तव्यम्। वचने का दरिद्रता (अस्ति)?
- अर्थ: मधुर वचन बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं। इसलिए मधुर ही बोलना चाहिए। बोलने में कैसी दरिद्रता (कंजूसी)?
- भावार्थ/व्याख्या: यह श्लोक मधुर वाणी के महत्व को बताता है। संसार में सभी जीव, चाहे मनुष्य हों या अन्य प्राणी, मधुर और प्रिय वचन सुनकर प्रसन्न होते हैं। प्रिय वचन बोलने से कोई धन खर्च नहीं होता, फिर भी लोग कटुता से बात करते हैं। कवि कहता है कि जब प्रिय वचन बोलने में कोई कठिनाई या खर्च नहीं है, तो हमें हमेशा मीठा और सम्मानजनक बोलना चाहिए।
- विशेष: यह श्लोक 'चाणक्य नीति' से लिया गया है और वाणी की शक्ति को दर्शाता है।
श्लोक 7:
काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥
- अन्वय: धीमतां कालः काव्यशास्त्रविनोदेन गच्छति। मूर्खाणां (कालः) च व्यसनेन, निद्रया वा कलहेन गच्छति।
- अर्थ: बुद्धिमान लोगों का समय काव्य और शास्त्रों के मनोरंजन (अध्ययन) में बीतता है। और मूर्खों का समय बुरी आदतों (व्यसन), नींद या झगड़े में बीतता है।
- भावार्थ/व्याख्या: यह श्लोक बुद्धिमान और मूर्ख व्यक्तियों के समय बिताने के तरीके में अंतर बताता है। बुद्धिमान व्यक्ति अपने समय का सदुपयोग ज्ञानार्जन, चिंतन और कला के आनंद में करते हैं। वे अपने समय को रचनात्मक और ज्ञानवर्धक गतिविधियों में लगाते हैं। इसके विपरीत, मूर्ख लोग अपना बहुमूल्य समय व्यर्थ की बुरी आदतों, आलस्य (नींद) या झगड़ों में बर्बाद करते हैं। यह श्लोक समय के सदुपयोग का महत्व सिखाता है।
- विशेष: यह श्लोक 'हितोपदेश' से लिया गया है।
श्लोक 8:
अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम्।
अधनस्य कुतो मित्रममित्रस्य कुतः सुखम्॥
- अन्वय: अलसस्य कुतः विद्या? अविद्यस्य कुतः धनम्? अधनस्य कुतः मित्रम्? अमित्रस्य कुतः सुखम्?
- अर्थ: आलसी व्यक्ति को विद्या कहाँ? विद्याहीन व्यक्ति को धन कहाँ? निर्धन व्यक्ति को मित्र कहाँ? और अमित्र (मित्रहीन) व्यक्ति को सुख कहाँ?
- भावार्थ/व्याख्या: यह श्लोक आलस्य और उसके कारण होने वाले विभिन्न अभावों को स्पष्ट करता है। आलसी व्यक्ति कभी विद्या प्राप्त नहीं कर सकता। विद्या के बिना धन कमाना कठिन है। धनहीन व्यक्ति के पास अक्सर सच्चे मित्र नहीं होते। और मित्रहीन व्यक्ति कभी सच्चा सुख प्राप्त नहीं कर सकता। यह श्लोक आलस्य त्यागकर कर्मठ बनने और विद्या प्राप्त करने की प्रेरणा देता है, क्योंकि विद्या ही सुख का मूल है।
- विशेष: यह श्लोक 'चाणक्य नीति' से लिया गया है और आलस्य को सभी दुखों का मूल कारण बताता है।
महत्वपूर्ण बिन्दु (Key Takeaways):
- विद्या विनम्रता, योग्यता, धन, धर्म और सुख का मूल है।
- सत्संगति व्यक्ति के जीवन को हर प्रकार से उन्नत करती है।
- भाग्य की सफलता के लिए पुरुषार्थ (परिश्रम) अनिवार्य है।
- विद्याधन सभी धनों में श्रेष्ठ है, क्योंकि यह अक्षय और अविनश्वर है।
- उदार हृदय वाले व्यक्ति संपूर्ण विश्व को अपना परिवार मानते हैं।
- मधुर वाणी सभी को प्रसन्न करती है और इसका प्रयोग सदैव करना चाहिए।
- बुद्धिमान व्यक्ति ज्ञानार्जन में और मूर्ख व्यर्थ के कार्यों में समय बिताते हैं।
- आलस्य विद्या, धन, मित्र और सुख का नाश करता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):
-
विद्या किं ददाति?
क) धनम्
ख) सुखम्
ग) विनयम्
घ) पात्रताम्
सही उत्तर: ग) विनयम् -
सत्संगतिः धियः किं हरति?
क) धनम्
ख) जाड्यम्
ग) सुखम्
घ) कीर्तिम्
सही उत्तर: ख) जाड्यम् -
केन विना दैवं न सिध्यति?
क) विद्या
ख) पुरुषकारेण
ग) धनेन
घ) मित्रेण
सही उत्तर: ख) पुरुषकारेण -
किं धनं सर्वधनप्रधानम् अस्ति?
क) स्वर्णधनम्
ख) भूमिधनम्
ग) विद्याधनम्
घ) पशुधनम्
सही उत्तर: ग) विद्याधनम् -
लघुचेतसाम् गणना का अस्ति?
क) वसुधैव कुटुम्बकम्
ख) अयं निजः परो वा
ग) सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः
घ) व्यये कृते वर्धते
सही उत्तर: ख) अयं निजः परो वा -
केषां कालः काव्यशास्त्रविनोदेन गच्छति?
क) मूर्खाणाम्
ख) धीमताम्
ग) अलसानाम्
घ) निर्धनानाम्
सही उत्तर: ख) धीमताम् -
प्रियवाक्यप्रदानेन के तुष्यन्ति?
क) केवलं मनुष्याः
ख) केवलं देवाः
ग) सर्वे जन्तवः
घ) केवलं मित्राणि
सही उत्तर: ग) सर्वे जन्तवः -
अलसस्य कुतः न भवति?
क) विद्या
ख) धनम्
ग) मित्रम्
घ) उपर्युक्ताः सर्वे
सही उत्तर: घ) उपर्युक्ताः सर्वे -
विद्याधने व्यये कृते किं भवति?
क) वर्धते
ख) क्षीयते
ग) स्थिरं तिष्ठति
घ) नश्यति
सही उत्तर: क) वर्धते -
उदारचरितानां कृते का कुटुम्बकम् अस्ति?
क) ग्रामः
ख) नगरम्
ग) देशः
घ) वसुधा
सही उत्तर: घ) वसुधा
आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। इन सूक्तियों को केवल याद न करें, बल्कि इनके भावार्थ को आत्मसात करने का प्रयास करें, क्योंकि ये जीवन के लिए भी उतने ही उपयोगी हैं। शुभकामनाएँ!