Class 12 Sanskrit Notes Chapter 7 (Chapter 7) – Shaswati Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी 'शाश्वती' पुस्तक के सप्तम अध्याय 'अन्योक्तयः' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी आगामी सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अध्याय में विभिन्न कवियों द्वारा रचित अन्योक्तियों का संकलन है, जो अप्रत्यक्ष रूप से गूढ़ नैतिक और दार्शनिक संदेश देती हैं।
अध्याय 7: अन्योक्तयः (अन्योक्तियाँ)
1. अध्याय का परिचय:
'अन्योक्ति' का शाब्दिक अर्थ है 'अन्य के प्रति कही गई उक्ति'। यह एक ऐसा काव्य-भेद है जिसमें किसी अप्रस्तुत (अप्रत्यक्ष) वस्तु या प्राणी के माध्यम से प्रस्तुत (प्रत्यक्ष) विषय का वर्णन किया जाता है। इसमें बात किसी और के बारे में कही जाती है, पर उसका संकेत किसी और पर होता है। संस्कृत साहित्य में अन्योक्तियों का प्रयोग नीति, वैराग्य, श्रृंगार तथा सामाजिक आलोचना के लिए बहुतायत से किया गया है। ये पाठक को सीधे उपदेश न देकर, प्रतीकों के माध्यम से सोचने पर विवश करती हैं।
2. प्रमुख कवि एवं उनकी अन्योक्तियाँ:
इस अध्याय में विभिन्न कालखंडों के महान कवियों की अन्योक्तियाँ संकलित हैं:
अ) भर्तृहरि (Bhartrihari):
- परिचय: भर्तृहरि संस्कृत साहित्य के एक महान कवि और दार्शनिक थे। वे 'शतकत्रय' (नीतिशतक, श्रृंगारशतक, वैराग्यशतक) के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी रचनाओं में जीवन के अनुभवों का गहरा चिंतन मिलता है।
- उनकी अन्योक्तियाँ:
- "तापिच्छगुल्मघननीलतमालवृक्षैः..."
- भावार्थ: सूर्य की किरणें जब कमल को विकसित करती हैं, तो तापस वृक्ष (तापिच्छगुल्म) के घने नीले तमाल वृक्षों की छाया में बैठे हुए भी कमल के विकसित होने से सूर्य का क्या लाभ? अर्थात्, महान व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के दूसरों का उपकार करते हैं।
- संदेश: निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करना ही श्रेष्ठ पुरुषों का स्वभाव होता है। वे अपने उपकार का फल नहीं चाहते।
- "संवहन्तः स्वेदोद्गमममलकूर्पासमलिनाः..."
- भावार्थ: जो लोग पसीने से भीगे हुए, निर्मल वस्त्रों को मैले करते हुए, परिश्रम से दूसरों का बोझ ढोते हैं, वे ही संसार में धन्य हैं।
- संदेश: जो व्यक्ति दूसरों के लिए कष्ट सहते हैं और उनके भार को उठाते हैं, वे ही वास्तव में प्रशंसनीय हैं। यह परोपकार की महिमा बताती है।
- "रे रे चातक सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूयताम्..."
- भावार्थ: हे चातक! मित्र! सावधान मन से क्षण भर मेरी बात सुनो। आकाश में बहुत से बादल हैं, पर सभी ऐसे नहीं हैं कि जल बरसाएँ। कुछ व्यर्थ ही गरजते हैं। इसलिए, जिसके सामने भी दीन वचन मत बोलो।
- संदेश: हर किसी से याचना नहीं करनी चाहिए। सहायता मांगने से पहले यह देखना चाहिए कि कौन व्यक्ति सहायता करने योग्य है और कौन नहीं। मूर्ख या कृपण व्यक्ति से याचना करना व्यर्थ है।
- "यत्राकृतिस्तत्र गुणा वसन्ति..."
- भावार्थ: जहाँ शेर की आकृति होती है, वहीं गुण (पराक्रम) निवास करते हैं। हाथी के मस्तक को विदीर्ण करने वाले सिंह के बच्चे को देखकर कौन नहीं डरता?
- संदेश: गुण और पराक्रम बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि आंतरिक स्वभाव से प्रकट होते हैं। वास्तविक शक्ति और प्रभाव जन्मजात होता है।
- "तापिच्छगुल्मघननीलतमालवृक्षैः..."
ब) जगन्नाथ (Jagannatha):
- परिचय: पंडितराज जगन्नाथ सत्रहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। वे अलंकारशास्त्र के ग्रंथ 'रसगंगाधर' और 'भामिनीविलास' के लिए विख्यात हैं। उनकी रचनाओं में काव्य-सौंदर्य और वैराग्य का अद्भुत समन्वय मिलता है।
- उनकी अन्योक्तियाँ:
- "अम्भोद पश्य पयसां परिपूर्णतां ते..."
- भावार्थ: हे बादल! तुम अपनी जल से परिपूर्णता को देखो। यह नदी जो तुम्हें जल दे रही है, वह कितनी छोटी है। तुम इस छोटी सी नदी के जल से इतने पूर्ण कैसे हो गए?
- संदेश: बड़े व्यक्ति को छोटे से मिले सहयोग पर गर्व नहीं करना चाहिए। महानता अपनी होती है, न कि छोटे के सहयोग से।
- "एक एव खगो मानी वने वसति चातकः..."
- भावार्थ: उस वन में एक ही स्वाभिमानी पक्षी चातक रहता है, जो या तो प्यासा मर जाता है या मेघ के जल को पीता है।
- संदेश: स्वाभिमानी व्यक्ति अपनी मर्यादा का पालन करता है। वह किसी भी स्थिति में अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता।
- "न हि कश्चित् क्वचिद् याति न चायाति न तिष्ठति..."
- भावार्थ: न कोई कहीं जाता है, न आता है, न रुकता है। जैसे सूर्य और चंद्रमा अपनी गति से चलते हैं, वैसे ही सब कुछ होता है।
- संदेश: संसार में सब कुछ नियति के अनुसार होता है। किसी का स्वभाव या भाग्य नहीं बदलता। यह नियतिवाद का दर्शन प्रस्तुत करती है।
- "अम्भोद पश्य पयसां परिपूर्णतां ते..."
स) नारायण पण्डित (Narayana Pandita):
- परिचय: नारायण पंडित 'हितोपदेश' नामक प्रसिद्ध नीति कथा संग्रह के रचयिता हैं। उनकी रचनाएँ सरल भाषा में व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करती हैं।
- उनकी अन्योक्ति:
- "अहो बत महत् कष्टं विपरीता हि पद्धतिः..."
- भावार्थ: अहो! यह बड़ा कष्ट है कि कुएँ की रीति विपरीत है। जल तो नीचे रहता है, पर उसे निकालने के लिए ऊपर से नीचे जाना पड़ता है।
- संदेश: यह अन्योक्ति कुएँ के जल के माध्यम से उन गुणों की ओर संकेत करती है जो किसी व्यक्ति में तो होते हैं, पर उनका उपयोग या प्रशंसा नहीं होती। गुणों का सदुपयोग न होने पर वे व्यर्थ हो जाते हैं।
- "अहो बत महत् कष्टं विपरीता हि पद्धतिः..."
द) बाणभट्ट (Banabhatta):
- परिचय: बाणभट्ट सातवीं शताब्दी के महान गद्यकार थे। वे 'कादम्बरी' और 'हर्षचरित' जैसे उत्कृष्ट संस्कृत गद्य काव्यों के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी शैली अलंकृत और विस्तृत वर्णन से युक्त है।
- उनकी अन्योक्ति:
- "अये कुरङ्ग तव केन नाम विलोकितम्..."
- भावार्थ: हे हिरण! किसने तुम्हें ऐसा सुंदर रूप दिया है? तुम्हारा यह रूप ही तुम्हारे लिए काल (मृत्यु) बन गया है, क्योंकि शिकारी इसी रूप के कारण तुम्हें मारता है।
- संदेश: अत्यधिक सौंदर्य या कोई विशेष गुण कभी-कभी व्यक्ति के लिए संकट का कारण बन जाता है, यदि वह उसका सदुपयोग न करे या उसे सुरक्षित न रख पाए। यह सांसारिक आकर्षणों से उत्पन्न खतरों की ओर संकेत करती है।
- "अये कुरङ्ग तव केन नाम विलोकितम्..."
3. अन्योक्तियों का महत्व:
- नीति-शिक्षा: ये जीवन के लिए आवश्यक नैतिक मूल्यों और आचरण की शिक्षा देती हैं।
- दार्शनिक चिंतन: जीवन की नश्वरता, नियति, कर्मफल आदि विषयों पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करती हैं।
- सामाजिक आलोचना: समाज की कुरीतियों, पाखंड और मानव स्वभाव की कमजोरियों पर अप्रत्यक्ष प्रहार करती हैं।
- काव्य-सौंदर्य: प्रतीकात्मक भाषा और उपमाओं के प्रयोग से काव्य को सुंदर और प्रभावशाली बनाती हैं।
- सरलता: सीधे उपदेश की बजाय कथा या प्रतीक के माध्यम से बात कहने से विषय अधिक ग्राह्य और रुचिकर हो जाता है।
4. परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु:
- प्रत्येक अन्योक्ति का मूल श्लोक, उसका हिंदी अर्थ और उससे मिलने वाला नैतिक संदेश।
- कवियों के नाम और उनकी प्रमुख रचनाएँ (जैसे भर्तृहरि के शतकत्रय, जगन्नाथ का रसगंगाधर, नारायण पंडित का हितोपदेश, बाणभट्ट की कादम्बरी)।
- अन्योक्ति अलंकार की परिभाषा और उदाहरण।
- विभिन्न अन्योक्तियों के माध्यम से व्यक्त होने वाले सामान्य विषय (जैसे परोपकार, स्वाभिमान, नियतिवाद, गुणों का सदुपयोग)।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
'अन्योक्तयः' पाठ में संकलित 'रे रे चातक सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूयताम्' यह श्लोक किस कवि की रचना है?
अ) जगन्नाथ
ब) भर्तृहरि
स) नारायण पण्डित
द) बाणभट्ट -
भर्तृहरि के प्रसिद्ध रचना-समूह का नाम क्या है?
अ) हितोपदेश
ब) कादम्बरी
स) शतकत्रय
द) रसगंगाधर -
'अम्भोद पश्य पयसां परिपूर्णतां ते' इस अन्योक्ति में बादल को क्या संदेश दिया गया है?
अ) अपनी विशालता पर गर्व करो।
ब) छोटी नदी के जल पर अभिमान मत करो।
स) वर्षा करके पृथ्वी को हरा-भरा करो।
द) जल को व्यर्थ मत बहाओ। -
'एक एव खगो मानी वने वसति चातकः' इस श्लोक में चातक पक्षी किसका प्रतीक है?
अ) परोपकारी व्यक्ति का
ब) स्वाभिमानी व्यक्ति का
स) लालची व्यक्ति का
द) मूर्ख व्यक्ति का -
'यत्राकृतिस्तत्र गुणा वसन्ति' इस अन्योक्ति का मूल भाव क्या है?
अ) गुणों का दिखावा करना चाहिए।
ब) गुण बाहरी रूप से प्रकट होते हैं।
स) वास्तविक गुण और पराक्रम आंतरिक स्वभाव में होते हैं।
द) आकृति से गुणों का कोई संबंध नहीं। -
'हितोपदेश' के रचयिता कौन हैं?
अ) भर्तृहरि
ब) जगन्नाथ
स) नारायण पण्डित
द) बाणभट्ट -
'अहो बत महत् कष्टं विपरीता हि पद्धतिः' इस अन्योक्ति में कुएँ के जल के माध्यम से क्या दर्शाया गया है?
अ) जल का महत्व
ब) गुणों का सदुपयोग न होने पर उनकी व्यर्थता
स) कुएँ की गहराई
द) जल निकालने की कठिनाई -
'अये कुरङ्ग तव केन नाम विलोकितम्' यह अन्योक्ति किस कवि द्वारा रचित है?
अ) भर्तृहरि
ब) जगन्नाथ
स) नारायण पण्डित
द) बाणभट्ट -
'कादम्बरी' नामक प्रसिद्ध गद्यकाव्य के लेखक कौन हैं?
अ) भर्तृहरि
ब) जगन्नाथ
स) नारायण पण्डित
द) बाणभट्ट -
अन्योक्ति अलंकार में क्या होता है?
अ) सीधे-सीधे उपदेश दिया जाता है।
ब) किसी अप्रस्तुत के माध्यम से प्रस्तुत का वर्णन किया जाता है।
स) केवल प्रकृति का वर्णन होता है।
द) केवल मानवीय भावनाओं का वर्णन होता है।
उत्तरमाला:
- ब) भर्तृहरि
- स) शतकत्रय
- ब) छोटी नदी के जल पर अभिमान मत करो।
- ब) स्वाभिमानी व्यक्ति का
- स) वास्तविक गुण और पराक्रम आंतरिक स्वभाव में होते हैं।
- स) नारायण पण्डित
- ब) गुणों का सदुपयोग न होने पर उनकी व्यर्थता
- द) बाणभट्ट
- द) बाणभट्ट
- ब) किसी अप्रस्तुत के माध्यम से प्रस्तुत का वर्णन किया जाता है।
आशा है यह विस्तृत विवरण और प्रश्नोत्तर आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। शुभकामनाएँ!