Class 12 Sanskrit Notes Chapter 7 (विक्रमस्यादायम) – Bhaswati Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी 'भास्वती' पुस्तक के सप्तम अध्याय 'विक्रमस्यादायम' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह न केवल राजा विक्रमादित्य के महान चरित्र को उजागर करता है, बल्कि संस्कृत साहित्य की एक महत्वपूर्ण परंपरा 'कथासरित्सागर' से संबंधित भी है। आइए, इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।
अध्याय 7: विक्रमस्यादायम (विक्रम का त्याग/दान)
1. अध्याय का परिचय एवं स्रोत:
- अध्याय का नाम: विक्रमस्यादायम (विक्रम का त्याग/दान)
- अर्थ: 'दायम्' शब्द का अर्थ दान, भेंट या त्याग होता है। अतः, 'विक्रमस्यादायम' का अर्थ है 'विक्रम का त्याग' या 'विक्रम का दान'।
- स्रोत: यह कथा 'सिंहासनद्वात्रिंशिका' (जिसे 'विक्रमचरितम्' भी कहते हैं) नामक प्रसिद्ध कथा संग्रह से ली गई है। 'सिंहासनद्वात्रिंशिका' में राजा भोज को प्राप्त हुए विक्रमादित्य के सिंहासन पर लगी बत्तीस पुतलिकाएँ (पुत्तलिकाएँ) बारी-बारी से विक्रमादित्य के पराक्रम, दानवीरता और न्यायप्रियता की कहानियाँ सुनाती हैं। यह विशेष कथा उन बत्तीस कहानियों में से एक है।
- मुख्य विषय: यह अध्याय राजा विक्रमादित्य की अद्वितीय दानवीरता, वचनबद्धता और आत्मबलिदान की भावना को दर्शाता है।
2. मुख्य पात्र:
- राजा विक्रमादित्य: उज्जैन के महान और न्यायप्रिय राजा, जो अपनी दानवीरता, साहस, वचनबद्धता और प्रजापालकता के लिए प्रसिद्ध हैं। वे इस कथा के नायक हैं।
- ब्राह्मण (याचक): एक सिद्धिकाम ब्राह्मण, जो अपनी साधना की पूर्ति के लिए राजा विक्रमादित्य से सहायता माँगता है। वह राजा की परीक्षा लेने वाला भी प्रतीत होता है।
- देवी: वह आराध्य देवी जिसकी पूजा के लिए ब्राह्मण को विशेष आहुति की आवश्यकता होती है।
3. कथावस्तु का विस्तृत सार:
- ब्राह्मण का आगमन: एक बार एक सिद्धिकाम ब्राह्मण अपनी किसी विशेष साधना की पूर्ति के लिए राजा विक्रमादित्य के पास आता है। वह राजा की दानवीरता और वचनबद्धता के बारे में सुनकर आया था।
- ब्राह्मण की याचना: ब्राह्मण राजा से कहता है कि उसे अपनी साधना की पूर्णता के लिए एक विशेष प्रकार के यज्ञ की आवश्यकता है। इस यज्ञ में एक ऐसी आहुति देनी है, जो अत्यंत दुर्लभ और कठिन है। वह आहुति एक 'नरबलि' (मानव बलि) की है।
- राजा का संकल्प: ब्राह्मण की बात सुनकर राजा विक्रमादित्य क्षण भर के लिए सोचते हैं। वे अपनी प्रजा को पुत्रवत मानते थे और किसी भी प्रजाजन की बलि देना उनके लिए असंभव था। किंतु, वे ब्राह्मण को निराश भी नहीं करना चाहते थे और अपने दिए गए वचन से मुकरना भी नहीं चाहते थे। अतः, उन्होंने एक अद्भुत निर्णय लिया।
- आत्मबलिदान का प्रस्ताव: राजा विक्रमादित्य ने ब्राह्मण से कहा कि वह किसी और की बलि नहीं देंगे, बल्कि स्वयं अपनी बलि देकर ब्राह्मण के यज्ञ को पूर्ण करेंगे। उन्होंने ब्राह्मण को समझाया कि एक राजा का कर्तव्य है कि वह अपनी प्रजा की रक्षा करे और यदि आवश्यकता पड़े तो स्वयं का बलिदान भी दे दे।
- यज्ञ की तैयारी: राजा ने ब्राह्मण को यज्ञ की विधि के अनुसार तैयारी करने का आदेश दिया। वे स्वयं देवी के मंदिर में गए और बलि के लिए तैयार हो गए।
- देवी का प्रसन्न होना और वरदान: जब राजा विक्रमादित्य अपने आत्मोत्सर्ग के लिए उद्यत हुए, तो उनकी महान दानवीरता, त्याग और वचनबद्धता देखकर देवी अत्यंत प्रसन्न हुईं। देवी ने प्रकट होकर राजा को रोका और उन्हें वरदान दिया। देवी ने कहा कि राजा के इस महान त्याग से वे अत्यंत संतुष्ट हैं और उन्हें बलि की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने राजा को दीर्घायु, यश और अखंड राज्य का वरदान दिया।
- ब्राह्मण का कार्य सिद्ध होना: देवी के वरदान से ब्राह्मण का कार्य भी सिद्ध हो गया और वह राजा की महानता से अभिभूत होकर उन्हें आशीर्वाद देकर चला गया।
4. अध्याय की प्रमुख शिक्षाएँ एवं संदेश:
- आत्मबलिदान की भावना (Self-sacrifice): यह कथा राजा विक्रमादित्य के अद्वितीय आत्मबलिदान को दर्शाती है। वे अपनी प्रजा की रक्षा और ब्राह्मण के वचन की पूर्ति के लिए स्वयं का जीवन न्योछावर करने को तैयार हो जाते हैं।
- वचनबद्धता (Commitment to promises): राजा विक्रमादित्य अपने दिए गए वचन का पालन करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। यह गुण उन्हें एक आदर्श शासक बनाता है।
- दानवीरता और परोपकार (Generosity and altruism): राजा की दानवीरता केवल धन-धान्य तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे अपने प्राणों का भी दान करने को तत्पर थे, जो परोपकार की पराकाष्ठा है।
- धर्मपरायणता (Righteousness): राजा धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपनी प्रजा और ब्राह्मण दोनों के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हैं।
- साहस और दृढ़ता (Courage and determination): ऐसी विकट परिस्थिति में भी राजा का साहस और अपने निर्णय पर दृढ़ रहना उनके महान व्यक्तित्व को दर्शाता है।
- त्याग का फल: कथा यह भी सिखाती है कि निस्वार्थ त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता, बल्कि उसका फल अवश्य मिलता है, जैसा कि देवी के वरदान के रूप में राजा को प्राप्त हुआ।
5. महत्वपूर्ण बिन्दु (परीक्षा हेतु):
- 'सिंहासनद्वात्रिंशिका' में कुल बत्तीस कहानियाँ हैं, जो विक्रमादित्य के गुणों का वर्णन करती हैं।
- कथा में ब्राह्मण एक याचक के रूप में आता है, लेकिन उसका उद्देश्य राजा की परीक्षा लेना भी हो सकता है।
- राजा विक्रमादित्य का 'दायम्' (त्याग) शारीरिक बलि का था, जो उनकी चरम दानवीरता को दर्शाता है।
- कथा का अंत 'शुभ' होता है, जहाँ देवी प्रसन्न होकर राजा को वरदान देती हैं।
- यह कथा संस्कृत साहित्य की 'कथा' परंपरा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ नैतिक मूल्यों और आदर्शों को कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
यहाँ 'विक्रमस्यादायम' अध्याय पर आधारित 10 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न दिए गए हैं:
-
'विक्रमस्यादायम' कथा कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलिता अस्ति?
क) कथासरित्सागरात्
ख) वेतालपञ्चविंशतितः
ग) सिंहासनद्वात्रिंशिकातः
घ) हितोपदेशात् -
'दायम्' इत्यस्य पदस्य कः अर्थः?
क) धनम्
ख) दानम्
ग) युद्धम्
घ) भयम् -
कः राजा आत्मबलिदानार्थं उद्यतः अभवत्?
क) राजा भोजः
ख) राजा विक्रमादित्यः
ग) राजा दुष्यन्तः
घ) राजा दशरथः -
ब्राह्मणः सिद्धिकामः सन् कं याचितवान्?
क) धनम्
ख) राज्यम्
ग) नरबलिम्
घ) पुत्रम् -
राजा विक्रमादित्यः कस्य कृते आत्मबलिदानं कर्तुं निश्चितवान्?
क) प्रजायाः
ख) ब्राह्मणस्य वचनपूर्तये
ग) शत्रूणां नाशाय
घ) स्वस्य यशस्काय -
राजानं विक्रमादित्यं दृष्ट्वा का प्रसन्ना अभवत्?
क) रानी
ख) प्रजा
ग) देवी
घ) ब्राह्मणस्य पत्नी -
देव्याः प्रसादेन राजा किं प्राप्तवान्?
क) धनम्
ख) राज्यनाशम्
ग) वरदानम्
घ) पुत्रलाभम् -
अस्याः कथायाः प्रमुखः सन्देशः कः?
क) धनस्य महत्त्वम्
ख) आत्मबलिदानस्य वचनबद्धतायाश्च महत्त्वम्
ग) युद्धस्य श्रेष्ठता
घ) स्वार्थपरता -
'सिंहासनद्वात्रिंशिका' ग्रन्थे कति पुत्तलिकानां कथाः सन्ति?
क) द्वाविंशतिः (22)
ख) द्वात्रिंशत् (32)
ग) चतुर्विंशतिः (24)
घ) पञ्चविंशतिः (25) -
राजा विक्रमादित्यस्य कः गुणः अस्यां कथायां विशेषरूपेण प्रकाशितः अस्ति?
क) युद्धकौशलम्
ख) विद्वत्ता
ग) दानवीरता, वचनबद्धता च
घ) संगीतप्रेम
उत्तरमाला:
- ग) सिंहासनद्वात्रिंशिकातः
- ख) दानम्
- ख) राजा विक्रमादित्यः
- ग) नरबलिम्
- ख) ब्राह्मणस्य वचनपूर्तये
- ग) देवी
- ग) वरदानम्
- ख) आत्मबलिदानस्य वचनबद्धतायाश्च महत्त्वम्
- ख) द्वात्रिंशत् (32)
- ग) दानवीरता, वचनबद्धता च
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको 'विक्रमस्यादायम' अध्याय को गहराई से समझने और परीक्षा की तैयारी में सहायता करेंगे। किसी भी अन्य शंका के लिए आप बेझिझक पूछ सकते हैं। शुभकामनाएँ!