Class 12 Sanskrit Notes Chapter 8 (Chapter 8) – Shaswati Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती' (द्वितीयो भागः) के अष्टम पाठ 'अन्योक्तयः' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह पाठ विभिन्न कवियों द्वारा रचित ऐसी सूक्तियों का संग्रह है, जिनमें अप्रस्तुत के माध्यम से प्रस्तुत का बोध कराया जाता है। ये अन्योक्तियाँ जीवन के गूढ़ रहस्यों, नैतिक मूल्यों और व्यावहारिक ज्ञान को अत्यंत सरलता एवं रोचकता से समझाती हैं। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी हेतु हम प्रत्येक अन्योक्ति का गहन विश्लेषण करेंगे।
अध्याय 8: अन्योक्तयः (अन्य उक्तियाँ / अप्रस्तुत प्रशंसा)
परिचय:
'अन्योक्ति' का अर्थ है 'अन्य के प्रति कही गई उक्ति'। इसमें किसी अप्रस्तुत (जो सामने न हो) वस्तु या प्राणी का वर्णन करके उसके माध्यम से प्रस्तुत (जो सामने हो) व्यक्ति या स्थिति को उपदेश, प्रशंसा या निंदा के रूप में व्यक्त किया जाता है। संस्कृत साहित्य में अन्योक्तियाँ अत्यंत लोकप्रिय हैं, क्योंकि ये सीधे उपदेश देने के बजाय अप्रत्यक्ष रूप से गहरे अर्थों को समझाती हैं, जिससे पाठक या श्रोता स्वयं चिंतन कर निष्कर्ष तक पहुँचता है।
प्रत्येक अन्योक्ति का विस्तृत विश्लेषण:
1. अन्योक्तिः – 1 (चातक के माध्यम से याचक वृत्ति का निषेध)
श्लोकः
रे रे चातक! सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूयताम्।
अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः॥
केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा।
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः॥
अन्वयः
रे रे चातक मित्र! सावधानमनसा क्षणं श्रूयताम्। गगने बहवः अम्भोदाः सन्ति हि, सर्वे अपि एतादृशाः न। केचित् वृष्टिभिः वसुधां आर्द्रयन्ति, केचित् वृथा गर्जन्ति। (अतः हे चातक!) त्वं यं यं पश्यसि, तस्य तस्य पुरतः दीनं वचः मा ब्रूहि।
शब्दार्थः
- रे रे चातक: अरे अरे चातक! (एक पक्षी जो केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा का जल पीता है)
- सावधानमनसा: सावधान मन से, ध्यानपूर्वक
- मित्र: हे मित्र!
- क्षणं: एक क्षण के लिए
- श्रूयताम्: सुनो
- अम्भोदाः: बादल (अम्भः = जल, ददाति = देता है)
- बहवः: बहुत से
- गगने: आकाश में
- सर्वेऽपि: सभी भी
- नैतादृशाः (न एतादृशाः): ऐसे नहीं होते
- केचित्: कुछ
- वृष्टिभिः: वर्षा से
- आर्द्रयन्ति: गीला करते हैं, भिगोते हैं
- वसुधां: पृथ्वी को
- गर्जन्ति: गरजते हैं
- वृथा: व्यर्थ में, बेकार में
- यं यं: जिस-जिस को
- पश्यसि: देखते हो
- तस्य तस्य पुरतः: उसके उसके सामने
- मा ब्रूहि: मत बोलो
- दीनं वचः: दीन वचन, याचना के शब्द
भावार्थः
कवि चातक पक्षी को संबोधित करते हुए कहता है कि हे चातक मित्र! सावधान मन से मेरी बात सुनो। आकाश में बहुत से बादल होते हैं, परंतु वे सभी एक जैसे नहीं होते। उनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं जो वर्षा करके पृथ्वी को जल से तृप्त करते हैं, जबकि कुछ केवल व्यर्थ में गरजते रहते हैं और वर्षा नहीं करते। अतः, हे चातक! तुम जिस-जिस बादल को देखो, उसके सामने दीनतापूर्ण याचना के शब्द मत कहो।
विशेषः
- प्रस्तुत अर्थ: यह श्लोक चातक के माध्यम से उन याचकों को उपदेश देता है जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हर किसी के सामने हाथ फैलाते हैं।
- अप्रस्तुत अर्थ: व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी याचना केवल योग्य और समर्थ व्यक्ति के सामने ही करे, न कि हर किसी के सामने, क्योंकि सभी लोग दाता नहीं होते। कुछ लोग केवल दिखावा करते हैं।
- अलंकार: अप्रस्तुत प्रशंसा, अर्थान्तरन्यास।
- छन्द: शार्दूलविक्रीडितम्।
2. अन्योक्तिः – 2 (चातक की स्वाभिमानी वृत्ति)
श्लोकः
एक एव खगो मानी वने वसति चातकः।
पिपासितो वा म्रियते याचते वा पयोदम्॥
अन्वयः
वने एकः एव मानी खगः चातकः वसति। (सः) पिपासितः वा म्रियते, वा पयोदं याचते।
शब्दार्थः
- एक एव: एक ही
- खगः: पक्षी
- मानी: स्वाभिमानी, आत्मगौरव वाला
- वने: वन में
- वसति: रहता है
- चातकः: चातक पक्षी
- पिपासितः: प्यासा
- वा: अथवा
- म्रियते: मर जाता है
- याचते: याचना करता है, माँगता है
- पयोदम्: बादल से (पयः = जल, ददाति = देता है)
भावार्थः
वन में एक ही स्वाभिमानी पक्षी चातक रहता है। वह या तो प्यासा ही मर जाता है, अथवा केवल बादल से ही जल की याचना करता है। वह किसी अन्य स्रोत (जैसे नदी, तालाब) से जल नहीं पीता।
विशेषः
- प्रस्तुत अर्थ: यह चातक के माध्यम से स्वाभिमानी व्यक्ति के गुण का वर्णन करता है।
- अप्रस्तुत अर्थ: स्वाभिमानी व्यक्ति अपनी मर्यादा का पालन करता है। वह अपनी आवश्यकता के लिए किसी भी ऐरे-गैरे के सामने हाथ नहीं फैलाता, बल्कि केवल योग्य और विश्वसनीय व्यक्ति से ही सहायता माँगता है, या फिर कष्ट सहकर भी अपनी गरिमा बनाए रखता है।
- अलंकार: अप्रस्तुत प्रशंसा, स्वभावोक्ति।
- संदेश: स्वाभिमान और आत्मगौरव का महत्व।
3. अन्योक्तिः – 3 (कोकिल की धैर्यशीलता)
श्लोकः
किं कोकिल! विरौषि कर्कशगिरो माद्यन्ति किं वा मृगाः?
स्थाने तिष्ठ ध्रुवं वसन्तसमये प्राप्स्यस्यम्राङ्कुरान्।
यावत् स्यात् पिक! तावदेव कुरु त्वं नीरवं स्वां कथां
संवर्धयन् स्वकीयं मधुरं शब्दं न कोऽपि शृणोति ते॥
अन्वयः
कोकिल! किं कर्कशगिरः विरौषि? किं वा मृगाः माद्यन्ति? ध्रुवं स्थाने तिष्ठ। वसन्तसमये अम्राङ्कुरान् प्राप्स्यसि। पिक! यावत् स्यात् तावत् एव त्वं नीरवं स्वां कथां कुरु। स्वकीयं मधुरं शब्दं संवर्धयन् ते कोऽपि न शृणोति।
शब्दार्थः
- किं कोकिल!: हे कोयल! क्यों?
- विरौषि: तू बोलती है, आवाज करती है
- कर्कशगिरो (कर्कश गिरः): कठोर आवाजें, कर्कश वाणी
- माद्यन्ति: मदमस्त होते हैं, उन्मत्त होते हैं
- किं वा मृगाः: क्या हिरण मदमस्त होते हैं? (यहाँ 'मृगाः' से तात्पर्य अन्य साधारण पक्षियों या पशुओं से हो सकता है, जो कोयल की आवाज को नहीं समझते)
- स्थाने तिष्ठ: अपनी जगह पर रहो, चुप रहो
- ध्रुवं: निश्चित रूप से
- वसन्तसमये: वसंत ऋतु में
- प्राप्स्यसि: प्राप्त करोगी
- अम्राङ्कुरान् (आम्र अङ्कुरान्): आम के अंकुरों को, आम के बौर को
- यावत् स्यात्: जब तक हो
- पिक!: हे कोयल! (पिकः = कोयल)
- तावदेव (तावत् एव): तब तक ही
- कुरु त्वं: तुम करो
- नीरवं: मौन
- स्वां कथां: अपनी बात (अपने धैर्य को)
- संवर्धयन्: बढ़ाते हुए
- स्वकीयं मधुरं शब्दं: अपनी मधुर आवाज को
- न कोऽपि शृणोति ते: कोई भी तुम्हारी नहीं सुनता
भावार्थः
हे कोयल! तुम क्यों कर्कश आवाज में बोलती हो? क्या इससे कोई मृग मदमस्त होता है? (अर्थात् तुम्हारी मधुर आवाज का मूल्य अभी कोई नहीं समझता)। तुम अपनी जगह पर चुपचाप धैर्यपूर्वक रहो। निश्चित रूप से वसंत ऋतु आने पर तुम्हें आम के अंकुर (खाने को) प्राप्त होंगे। हे कोयल! जब तक (उचित समय) न आए, तब तक तुम अपनी बात (अपनी मधुर वाणी) को मौन रहकर ही बढ़ाओ। (क्योंकि) इस समय तुम्हारी मधुर आवाज को कोई नहीं सुनता।
विशेषः
- प्रस्तुत अर्थ: यह कोयल के माध्यम से धैर्यवान व्यक्ति को उपदेश देता है।
- अप्रस्तुत अर्थ: व्यक्ति को अपनी प्रतिभा या गुणों का प्रदर्शन उचित समय और उचित स्थान पर ही करना चाहिए। प्रतिकूल परिस्थितियों में अपनी योग्यता का प्रदर्शन व्यर्थ होता है, क्योंकि उस समय कोई उसकी कद्र नहीं करता। धैर्यपूर्वक सही समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
- अलंकार: अप्रस्तुत प्रशंसा, स्वभावोक्ति।
- संदेश: धैर्य, समय की प्रतीक्षा, उचित अवसर का महत्व।
4. अन्योक्तिः – 4 (भ्रमर और कमल का संबंध, गुणग्राही व्यक्ति की महत्ता)
श्लोकः
त्वं चेद् भ्रमर! न भवेः कश्चित् कोऽपि नूनं गुणग्राही।
तर्हि कथं कमलवनं त्वया विना शोभतेतराम्॥
अन्वयः
भ्रमर! त्वं चेत् कश्चित् गुणग्राही न भवेः, नूनं कोऽपि (न भवेत्)। तर्हि त्वया विना कमलवनं कथं शोभतेतराम्?
शब्दार्थः
- त्वं चेद्: यदि तुम
- भ्रमर!: हे भौंरे!
- न भवेः: नहीं होते
- कश्चित्: कोई
- कोऽपि: कोई भी
- नूनं: निश्चित रूप से
- गुणग्राही: गुणों को ग्रहण करने वाला, गुण की कद्र करने वाला
- तर्हि: तो
- कथं: कैसे
- कमलवनं: कमलों का समूह, कमलवन
- त्वया विना: तुम्हारे बिना
- शोभतेतराम्: अत्यधिक शोभा पाता है
भावार्थः
हे भौंरे! यदि तुम कोई गुणग्राही (गुणों को पहचानने वाला) न होते, तो निश्चित रूप से कोई भी (कमल का गुणग्राही) न होता। यदि ऐसा होता, तो तुम्हारे बिना कमलवन कैसे अत्यधिक शोभा पाता? (अर्थात्, कमल की शोभा भौंरे के कारण ही है, क्योंकि भौंरा उसके गुणों को पहचानता है।)
विशेषः
- प्रस्तुत अर्थ: यह भ्रमर के माध्यम से गुणग्राही व्यक्ति की महत्ता को बताता है।
- अप्रस्तुत अर्थ: किसी भी वस्तु या व्यक्ति के गुणों का महत्व तभी होता है जब कोई उन गुणों को पहचानने वाला हो। गुणवान व्यक्ति को तभी सम्मान मिलता है जब कोई गुणग्राही व्यक्ति उसे पहचानता है। गुणग्राही व्यक्ति ही गुणों को प्रकाशित करता है।
- अलंकार: अप्रस्तुत प्रशंसा, प्रश्न अलंकार।
- संदेश: गुणग्राही की महत्ता, गुणों का सम्मान।
5. अन्योक्तिः – 5 (विभिन्न वस्तुओं के स्वाभाविक गुण)
श्लोकः
जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि।
प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तरं वस्तुशक्तितः॥
अन्वयः
जले तैलं, खले गुह्यं, पात्रे दानं, प्राज्ञे शास्त्रं मनाक् अपि वस्तुशक्तितः स्वयं विस्तरं याति।
शब्दार्थः
- जले: जल में
- तैलं: तेल
- खले: दुष्ट व्यक्ति में
- गुह्यं: गोपनीय बात, रहस्य
- पात्रे: योग्य व्यक्ति को
- दानं: दान
- मनागपि (मनाक् अपि): थोड़ा भी
- प्राज्ञे: बुद्धिमान व्यक्ति में
- शास्त्रं: शास्त्र ज्ञान
- स्वयं: अपने आप
- याति: चला जाता है, फैल जाता है
- विस्तरं: विस्तार को, फैलाव को
- वस्तुशक्तितः: वस्तु की शक्ति से, अपने स्वभाव से
भावार्थः
जल में तेल, दुष्ट व्यक्ति में गोपनीय बात, योग्य व्यक्ति को दिया गया दान और बुद्धिमान व्यक्ति में शास्त्र ज्ञान - ये सभी थोड़ा भी होने पर भी अपनी वस्तुशक्ति (स्वभाव) के कारण स्वयं ही विस्तार को प्राप्त होते हैं।
- जैसे जल में तेल की एक बूंद भी फैल जाती है।
- जैसे दुष्ट व्यक्ति को बताया गया रहस्य तुरंत फैल जाता है।
- जैसे योग्य व्यक्ति को दिया गया थोड़ा सा दान भी बड़ा पुण्य देता है।
- जैसे बुद्धिमान व्यक्ति को थोड़ा सा ज्ञान भी देने पर वह उसे अपनी बुद्धि से विस्तृत कर लेता है।
विशेषः
- प्रस्तुत अर्थ: यह श्लोक विभिन्न वस्तुओं और व्यक्तियों के स्वाभाविक गुणों का वर्णन करता है।
- अप्रस्तुत अर्थ: कुछ चीजें अपने स्वभाव के कारण स्वतः ही फैल जाती हैं या बढ़ जाती हैं। यह हमें बताता है कि हमें किससे क्या कहना चाहिए और किसे क्या देना चाहिए। दुष्ट से रहस्य गुप्त रखना चाहिए, योग्य को दान देना चाहिए और बुद्धिमान को ज्ञान देना चाहिए।
- अलंकार: दृष्टान्त, स्वभावोक्ति।
- संदेश: वस्तुओं और व्यक्तियों के स्वभाव को समझना, सही स्थान पर सही कार्य करना।
6. अन्योक्तिः – 6 (सत्संगति का महत्व)
श्लोकः
यद्यपि बहु नाधीतं तथापि पठ पुत्र! व्याकरणम्।
स्वजनः श्वजनो मा भूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्॥
अन्वयः
पुत्र! यद्यपि बहु न अधींतं, तथापि व्याकरणं पठ। (येन) स्वजनः श्वजनः मा भूत्, सकलं शकलं (मा भूत्), सकृत् शकृत् (मा भूत्)।
शब्दार्थः
- यद्यपि: यद्यपि
- बहु: बहुत
- नाधीतं (न अधींतं): नहीं पढ़ा गया हो
- तथापि: फिर भी
- पठ: पढ़ो
- पुत्र!: हे पुत्र!
- व्याकरणम्: व्याकरण
- स्वजनः: अपने लोग, संबंधी
- श्वजनः (श्व-जनः): कुत्ते के लोग, कुत्ते (श्वन् = कुत्ता)
- मा भूत्: न हो जाए
- सकलं: सम्पूर्ण
- शकलं: टुकड़ा
- सकृत्: एक बार, विष्ठा
- शकृत्: विष्ठा (गोबर)
भावार्थः
हे पुत्र! यद्यपि तुमने बहुत कुछ नहीं पढ़ा है, फिर भी व्याकरण अवश्य पढ़ो। (क्योंकि व्याकरण के ज्ञान के अभाव में) कहीं ऐसा न हो कि 'स्वजन' (अपने लोग) को 'श्वजन' (कुत्ते) कह दो, 'सकलम्' (सम्पूर्ण) को 'शकलम्' (टुकड़ा) कह दो, और 'सकृत्' (एक बार) को 'शकृत्' (विष्ठा) कह दो। (अर्थात्, व्याकरण के ज्ञान के बिना शब्दों का सही उच्चारण और अर्थ न जानने से अनर्थ हो सकता है।)
विशेषः
- प्रस्तुत अर्थ: यह श्लोक व्याकरण के महत्व को दर्शाता है।
- अप्रस्तुत अर्थ: शुद्ध भाषा और सही ज्ञान के बिना व्यक्ति अनर्थ कर सकता है। व्याकरण केवल भाषा का ही नहीं, बल्कि चिंतन की शुद्धता का भी आधार है। यह हमें बताता है कि छोटी सी गलती भी बड़े अर्थ का अनर्थ कर सकती है।
- अलंकार: श्लेष (शब्दों के समान होने पर भिन्न अर्थ), यमक (शब्दों की आवृत्ति और भिन्न अर्थ)।
- संदेश: व्याकरण का महत्व, भाषा की शुद्धता, ज्ञान की आवश्यकता।
अध्याय का समग्र संदेश:
'अन्योक्तयः' नामक यह पाठ हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। यह सिखाता है कि हमें स्वाभिमानी होना चाहिए, धैर्य रखना चाहिए, गुणग्राही बनना चाहिए, सही व्यक्ति को पहचानना चाहिए और ज्ञान (विशेषकर व्याकरण) के महत्व को समझना चाहिए। ये अन्योक्तियाँ अप्रत्यक्ष रूप से हमें नैतिक और व्यावहारिक शिक्षा प्रदान करती हैं, जो किसी भी व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं।
परीक्षा उपयोगी बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
निर्देश: सही विकल्प का चयन करें।
1. 'रे रे चातक! सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूयताम्' – अत्र 'चातक' कस्य प्रतीकम् अस्ति?
क) स्वाभिमानी जनस्य
ख) याचक जनस्य
ग) मूर्ख जनस्य
घ) विद्वान् जनस्य
2. 'अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः' – अस्य श्लोकांशस्य कः भावः?
क) आकाशे बहवः मेघाः सन्ति।
ख) सर्वे दातारः न भवन्ति।
ग) सर्वे मेघाः वृष्टिं कुर्वन्ति।
घ) मेघाः गर्जन्ति एव।
3. 'एक एव खगो मानी वने वसति चातकः' – अत्र 'मानी' इति पदस्य कः अर्थः?
क) धनवान्
ख) अभिमानी
ग) स्वाभिमानी
घ) विद्वान्
4. चातकः पिपासितः सन् कम् याचते?
क) नद्याः जलम्
ख) सरोवरात् जलम्
ग) पयोदम्
घ) कूपजलम्
5. 'किं कोकिल! विरौषि कर्कशगिरो माद्यन्ति किं वा मृगाः?' – अत्र कोकिलः कदा मधुरं गायति?
क) ग्रीष्मकाले
ख) वर्षाकाले
ग) वसन्तसमये
घ) शिशिरकाले
6. 'त्वं चेद् भ्रमर! न भवेः कश्चित् कोऽपि नूनं गुणग्राही' – अत्र कस्य महत्त्वं प्रतिपादितम् अस्ति?
क) भ्रमरस्य
ख) कमलस्य
ग) गुणग्राही जनस्य
घ) वनस्य
7. 'जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि' – अत्र 'खले' कस्य अर्थः?
क) खेत में
ख) दुष्ट व्यक्ति में
ग) अच्छे व्यक्ति में
घ) खाली स्थान में
8. व्याकरणं पठित्वा कः लाभः भवति, यत् 'स्वजनः श्वजनो मा भूत्' इति उच्यते?
क) धनप्राप्तिः
ख) शब्दशुद्धिः
ग) पदोन्नतिः
घ) यशप्राप्तिः
9. 'सकलं शकलं सकृत् शकृत्' – अत्र व्याकरणस्य अभावे कस्य अनर्थस्य सम्भावना दर्शिता अस्ति?
क) अर्थस्य
ख) वाक्यस्य
ग) शब्दोच्चारणस्य
घ) लेखनस्य
10. 'अन्योक्तयः' इति पाठस्य मुख्यं प्रयोजनं किम्?
क) केवलं पशुपक्षिणां वर्णनम्
ख) अप्रस्तुतस्य माध्यमेन नैतिक शिक्षादानम्
ग) मनोरञ्जनम्
घ) व्याकरणज्ञानस्य प्रदर्शनम्
उत्तरमाला:
- ख) याचक जनस्य
- ख) सर्वे दातारः न भवन्ति।
- ग) स्वाभिमानी
- ग) पयोदम्
- ग) वसन्तसमये
- ग) गुणग्राही जनस्य
- ख) दुष्ट व्यक्ति में
- ख) शब्दशुद्धिः
- क) अर्थस्य (शब्दों के अर्थ का अनर्थ)
- ख) अप्रस्तुतस्य माध्यमेन नैतिक शिक्षादानम्
आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। किसी भी श्लोक या अवधारणा में संदेह होने पर पुनः पूछने में संकोच न करें। शुभकामनाएँ!