Class 12 Sanskrit Notes Chapter 9 (Chapter 9) – Shaswati Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी कक्षा १२ संस्कृत की पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती' के नवम अध्याय 'परमार्थसारः' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय आपकी आगामी सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, अतः प्रत्येक बिंदु पर विशेष ध्यान दें।
अध्याय ९: परमार्थसारः
१. पाठ-परिचय:
- रचयिता: अभिनवगुप्त।
- मूल ग्रन्थ: यह पाठ आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा रचित 'परमार्थसार' नामक ग्रन्थ से संकलित है।
- दर्शन: यह ग्रन्थ कश्मीर शैव दर्शन के 'प्रत्यभिज्ञा' सम्प्रदाय का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है।
- विषय-वस्तु: इस अध्याय में आचार्य अभिनवगुप्त ने आत्मतत्त्व के स्वरूप, जीव और शिव की अभिन्नता, बन्धन का कारण (अज्ञान) और मोक्ष का मार्ग (आत्मज्ञान) का दार्शनिक विवेचन किया है। इसमें बताया गया है कि संसार मिथ्या है और केवल शिव ही परम सत्य हैं। जीव अज्ञानवश स्वयं को शिव से भिन्न मानता है, जबकि वास्तव में वह शिव ही है। आत्मज्ञान से ही इस अज्ञान का नाश होता है और जीव शिवत्व को प्राप्त करता है।
२. कवि-परिचय: आचार्य अभिनवगुप्त
- समय: १०वीं-११वीं शताब्दी ईस्वी (लगभग ९५० ई. से १०२० ई. तक)।
- जन्म स्थान: कश्मीर।
- प्रमुख ग्रन्थ:
- दर्शन: 'तन्त्रालोक', 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी', 'परमार्थसार'।
- काव्यशास्त्र: 'अभिनवभारती' (भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर टीका), 'ध्वन्यालोकलोचन' (आनंदवर्धन के ध्वन्यालोक पर टीका)।
- दर्शन-सम्प्रदाय: कश्मीर शैव दर्शन के 'प्रत्यभिज्ञा' और 'क्रम' सम्प्रदायों के प्रमुख आचार्य।
- विशेषता: अभिनवगुप्त एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी विद्वान थे। वे दार्शनिक, कवि, संगीतज्ञ, तान्त्रिक और नाट्यशास्त्री थे। उन्होंने शैव दर्शन को एक नई दिशा दी और भारतीय दर्शन तथा साहित्यशास्त्र को समृद्ध किया।
३. श्लोकवार विस्तृत व्याख्या:
इस अध्याय में कुल १२ श्लोक हैं, जिनमें से प्रमुख श्लोकों की व्याख्या यहाँ दी जा रही है:
प्रथम श्लोक:
विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं,
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया।
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं,
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीशम्भवे शम्भवे॥१॥
- अन्वय: यः (गुरुः) निद्रया यथा (स्वप्ने) बहिरिव उद्भूतं, दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं विश्वं मायया आत्मनि पश्यन्, प्रबोधसमये अद्वयं स्वात्मानमेव साक्षात्कुरुते, तस्मै श्रीगुरुमूर्तये श्रीशम्भवे इदं नमः।
- शब्दार्थ:
- विश्वं: संसार।
- दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं: दर्पण में दिखाई देने वाली नगरी के समान।
- निजान्तर्गतं: अपने भीतर स्थित।
- मायया: माया के द्वारा।
- बहिरिवोद्भूतं: बाहर उत्पन्न हुआ सा।
- निद्रया यथा: जैसे नींद में (स्वप्न)।
- पश्यन्: देखते हुए।
- आत्मनि: अपने आप में।
- प्रबोधसमये: जागने के समय।
- स्वात्मानमेवाद्वयं: अपने अद्वैत स्वरूप को ही।
- साक्षात्कुरुते: प्रत्यक्ष अनुभव करता है।
- श्रीगुरुमूर्तये: श्री गुरु के स्वरूप को।
- श्रीशम्भवे: कल्याणकारी शिव को।
- भावार्थ: यह श्लोक गुरु की वंदना से आरम्भ होता है। आचार्य कहते हैं कि जो गुरु (या शिव) इस सम्पूर्ण विश्व को दर्पण में दिखाई देने वाली नगरी के समान अपने ही भीतर स्थित देखते हैं, और माया के कारण इसे बाहर उत्पन्न हुआ सा प्रतीत होता हुआ देखते हैं (जैसे नींद में स्वप्न), तथा जागने पर अपने अद्वैत स्वरूप को ही प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, उन श्री गुरु रूपी कल्याणकारी शिव को मेरा नमस्कार है। यहाँ बताया गया है कि संसार शिव के भीतर ही है, माया के कारण बाहर प्रतीत होता है।
द्वितीय श्लोक:
अज्ञानतिमिरान्धस्य विषयस्थस्य जन्तोरिह।
गुरुर्ज्ञानमयो दीपः सर्वदा तस्य दर्शकः॥२॥
- अन्वय: इह अज्ञानतिमिरान्धस्य विषयस्थस्य जन्तोः गुरुः सर्वदा तस्य ज्ञानमयः दीपः दर्शकः (भवति)।
- शब्दार्थ:
- अज्ञानतिमिरान्धस्य: अज्ञान रूपी अन्धकार से अन्धे हुए।
- विषयस्थस्य: विषयों में लिप्त।
- जन्तोः: प्राणी के लिए।
- गुरुः: गुरु।
- ज्ञानमयो दीपः: ज्ञान रूपी दीपक।
- दर्शकः: मार्गदर्शक।
- भावार्थ: इस संसार में अज्ञान रूपी अन्धकार से अन्धे हुए और विषयों में लिप्त प्राणी के लिए गुरु ही सदैव ज्ञान रूपी दीपक बनकर मार्ग दिखाते हैं। यह श्लोक गुरु के महत्व को प्रतिपादित करता है।
तृतीय श्लोक:
यथाऽन्यतोऽन्यथा भाति तत्तत्त्वं न तथा स्थितम्।
तथाऽन्यथा न भातीति मायाशक्त्या विमोहितः॥३॥
- अन्वय: यथा अन्यतः (अज्ञानवशात्) अन्यथा भाति, तत् तत्त्वं तथा स्थितं न। तथा (यत्) अन्यथा न भाति इति मायाशक्त्या विमोहितः (जीवः)।
- शब्दार्थ:
- यथाऽन्यतोऽन्यथा भाति: जैसे (कोई वस्तु) किसी और कारण से कुछ और ही प्रतीत होती है।
- तत्तत्त्वं न तथा स्थितम्: वह तत्त्व वैसा स्थित नहीं है।
- तथाऽन्यथा न भातीति: और वह वैसा नहीं दिखता।
- मायाशक्त्या विमोहितः: माया शक्ति से मोहित हुआ।
- भावार्थ: जिस प्रकार कोई वस्तु अज्ञानवश जैसी प्रतीत होती है, वास्तव में वह वैसी नहीं होती। जीव माया शक्ति से मोहित होकर उस सत्य को नहीं देख पाता जो वास्तव में है। यहाँ माया की शक्ति और अज्ञान के कारण होने वाले भ्रम का वर्णन है।
चतुर्थ श्लोक:
अनादिमलसम्बद्धः शिवोऽयं जीव उच्यते।
तस्य कर्ममलोत्पत्तिर्नान्यथाऽज्ञानमन्तरेण हि॥४॥
- अन्वय: अनादिमलसम्बद्धः अयं शिवः जीव उच्यते। तस्य कर्ममलोत्पत्तिः अज्ञानम् अन्तरेण अन्यथा न हि (भवति)।
- शब्दार्थ:
- अनादिमलसम्बद्धः: अनादि काल से मल (अज्ञान) से जुड़ा हुआ।
- शिवोऽयं जीव उच्यते: यही शिव जीव कहलाता है।
- तस्य कर्ममलोत्पत्तिः: उसकी कर्म रूपी मल की उत्पत्ति।
- नान्यथाऽज्ञानमन्तरेण हि: अज्ञान के बिना अन्यथा नहीं होती।
- भावार्थ: अनादि काल से मल (अज्ञान) से जुड़ा हुआ यह शिव ही जीव कहलाता है। उसकी कर्म रूपी मल की उत्पत्ति अज्ञान के बिना संभव नहीं है। यह श्लोक बताता है कि जीव मूलतः शिव ही है, परन्तु अज्ञान के कारण वह जीव कहलाता है और कर्मों के बन्धन में फँसता है।
पंचम श्लोक:
अज्ञानमेव बन्धाय ज्ञानमेव विमुक्तये।
ज्ञानं च तन्मयं यस्य स जीवो मुक्तिभाग् भवेत्॥५॥
- अन्वय: अज्ञानम् एव बन्धाय (भवति), ज्ञानम् एव विमुक्तये (भवति)। यस्य तन्मयं ज्ञानं च (अस्ति), स जीवः मुक्तिभाग् भवेत्।
- शब्दार्थ:
- अज्ञानमेव बन्धाय: अज्ञान ही बन्धन के लिए।
- ज्ञानमेव विमुक्तये: ज्ञान ही मोक्ष के लिए।
- ज्ञानं च तन्मयं यस्य: और जिसका ज्ञान तन्मय (उस परम तत्त्व में लीन) है।
- स जीवो मुक्तिभाग् भवेत्: वह जीव मोक्ष का भागी होता है।
- भावार्थ: अज्ञान ही बन्धन का कारण है और ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है। जिस जीव का ज्ञान उस परम तत्त्व (शिव) में तन्मय हो जाता है, वह जीव मोक्ष का अधिकारी बनता है। यह श्लोक अज्ञान और ज्ञान के फल को स्पष्ट करता है।
षष्ठ श्लोक:
यथा जलं जले क्षिप्तं जलमेव भवेत्तथा।
शिवे जीवः प्रविष्टस्तु शिव एव न संशयः॥६॥
- अन्वय: यथा जलं जले क्षिप्तं जलम् एव भवेत्, तथा शिवे प्रविष्टः जीवः शिवः एव (भवेत्), न संशयः।
- शब्दार्थ:
- यथा जलं जले क्षिप्तं: जैसे जल में जल मिलाया गया।
- जलमेव भवेत्तथा: वह जल ही हो जाता है।
- शिवे जीवः प्रविष्टस्तु: शिव में जीव प्रविष्ट होकर।
- शिव एव न संशयः: शिव ही हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं।
- भावार्थ: जिस प्रकार जल में जल मिलाने पर वह जल ही हो जाता है, उसी प्रकार जीव जब शिव में प्रविष्ट हो जाता है, तो वह शिव ही हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं। यह श्लोक जीव और शिव की अभिन्नता को अत्यंत सरल उदाहरण से समझाता है।
सप्तम श्लोक:
अहं शिवो न चान्यस्तत्त्वतोऽहं न संशयः।
एवं यस्य भवेद्बुद्धिः स जीवो मुक्तिभाग् भवेत्॥७॥
- अन्वय: अहं शिवः (अस्मि), तत्त्वतः अहं न अन्यः, न संशयः। यस्य बुद्धिः एवं भवेत्, स जीवः मुक्तिभाग् भवेत्।
- शब्दार्थ:
- अहं शिवो न चान्यस्तत्त्वतोऽहं: मैं शिव हूँ, तत्त्वतः मैं अन्य नहीं हूँ।
- न संशयः: इसमें कोई संदेह नहीं।
- एवं यस्य भवेद्बुद्धिः: जिसकी ऐसी बुद्धि हो जाती है।
- स जीवो मुक्तिभाग् भवेत्: वह जीव मोक्ष का भागी होता है।
- भावार्थ: मैं शिव हूँ, वास्तव में मैं कोई और नहीं हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं। जिसकी ऐसी दृढ़ बुद्धि हो जाती है, वह जीव मोक्ष का अधिकारी बनता है। यह श्लोक 'अहं ब्रह्मास्मि' के समान 'अहं शिवोऽस्मि' के भाव को प्रकट करता है, जो प्रत्यभिज्ञा दर्शन का मूल मंत्र है।
अष्टम श्लोक:
यद्यत्पश्यति चक्षुषा श्रोत्रेण यद्यच्छृणोति च।
मनसा यद्यदाप्नोति तत्तत्सर्वं शिवं विदुः॥८॥
- अन्वय: चक्षुषा यत् यत् पश्यति, श्रोत्रेण यत् यत् शृणोति च, मनसा यत् यत् आप्नोति, तत् तत् सर्वं शिवं विदुः।
- शब्दार्थ:
- यद्यत्पश्यति चक्षुषा: जो कुछ आँखों से देखता है।
- श्रोत्रेण यद्यच्छृणोति च: और जो कुछ कानों से सुनता है।
- मनसा यद्यदाप्नोति: जो कुछ मन से प्राप्त करता है।
- तत्तत्सर्वं शिवं विदुः: वह सब शिव ही है, ऐसा जानें।
- भावार्थ: आँखों से जो कुछ देखा जाता है, कानों से जो कुछ सुना जाता है, और मन से जो कुछ अनुभव किया जाता है, वह सब शिव ही है – ऐसा विद्वान लोग जानते हैं। यह श्लोक शिव की सर्वव्यापकता और अद्वैत भाव को दर्शाता है कि सम्पूर्ण सृष्टि शिवमय है।
द्वादश श्लोक (अंतिम श्लोक):
परमार्थसारमेतत्पठित्वाऽवगत्य च।
शिव एव भवेज्जीवो नान्यथा शिवतामियात्॥१२॥
- अन्वय: एतत् परमार्थसारं पठित्वा अवगत्य च, जीवः शिवः एव भवेत्, अन्यथा शिवताम् न इयात्।
- शब्दार्थ:
- परमार्थसारमेतत्: इस परमार्थसार को।
- पठित्वाऽवगत्य च: पढ़कर और समझकर।
- शिव एव भवेज्जीवो: जीव शिव ही हो जाता है।
- नान्यथा शिवतामियात्: अन्यथा शिवत्व को प्राप्त नहीं होता।
- भावार्थ: इस 'परमार्थसार' ग्रन्थ को पढ़कर और समझकर जीव शिव ही हो जाता है। इसके बिना वह शिवत्व को प्राप्त नहीं कर सकता। यह श्लोक ग्रन्थ के अध्ययन के महत्व और उसके फल को बताता है।
४. पाठ का सारांश एवं प्रमुख बिन्दु:
- अद्वैत सिद्धान्त: यह पाठ कश्मीर शैव दर्शन के अद्वैतवाद को प्रतिपादित करता है, जहाँ शिव ही एकमात्र परम सत्य हैं।
- जीव-शिव अभिन्नता: जीव मूलतः शिव ही है, केवल अज्ञान के कारण स्वयं को भिन्न मानता है।
- माया और अज्ञान: माया शिव की शक्ति है, जिसके कारण जीव संसार को सत्य मानता है और अज्ञान से ग्रसित होकर बन्धन में पड़ता है।
- मोक्ष का मार्ग: आत्मज्ञान ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है। जब जीव 'अहं शिवोऽस्मि' (मैं शिव हूँ) का अनुभव करता है, तो वह शिवत्व को प्राप्त करता है।
- गुरु का महत्व: गुरु अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश देते हैं और जीव को मोक्ष मार्ग पर अग्रसर करते हैं।
- संसार की मिथ्यात्व: संसार दर्पण में प्रतिबिंबित नगरी या स्वप्न के समान मिथ्या और नश्वर है।
- सर्वं शिवमयम्: जो कुछ भी देखा, सुना या अनुभव किया जाता है, वह सब शिव ही है। शिव सर्वव्यापी हैं।
- ग्रन्थ का फल: 'परमार्थसार' का अध्ययन और मनन जीव को शिवत्व की प्राप्ति कराता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
यहाँ इस अध्याय पर आधारित १० महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न दिए गए हैं:
१. 'परमार्थसारः' नामक ग्रन्थ के रचयिता कौन हैं?
क) शंकराचार्य
ख) अभिनवगुप्त
ग) पतंजलि
घ) कपिल मुनि
उत्तर: ख) अभिनवगुप्त
२. 'परमार्थसारः' किस दर्शन से सम्बन्धित है?
क) न्याय दर्शन
ख) वेदान्त दर्शन
ग) कश्मीर शैव दर्शन
घ) सांख्य दर्शन
उत्तर: ग) कश्मीर शैव दर्शन
३. 'अज्ञानतिमिरान्धस्य विषयस्थस्य जन्तोरिह। गुरुर्ज्ञानमयो दीपः सर्वदा तस्य दर्शकः॥' - इस श्लोक में 'तिमिरान्धस्य' का क्या अर्थ है?
क) प्रकाश से अन्धा
ख) अंधकार से अन्धा
ग) ज्ञान से अन्धा
घ) क्रोध से अन्धा
उत्तर: ख) अंधकार से अन्धा
४. आचार्य अभिनवगुप्त के अनुसार जीव और शिव में क्या सम्बन्ध है?
क) जीव शिव का अंश है
ख) जीव शिव से भिन्न है
ग) जीव वास्तव में शिव ही है
घ) जीव शिव का सेवक है
उत्तर: ग) जीव वास्तव में शिव ही है
५. 'अनादिमलसम्बद्धः शिवोऽयं जीव उच्यते।' - इस पंक्ति में 'मल' शब्द का क्या अर्थ है?
क) गंदगी
ख) पाप
ग) अज्ञान
घ) कर्म
उत्तर: ग) अज्ञान
६. अभिनवगुप्त के अनुसार बन्धन का मुख्य कारण क्या है?
क) कर्म
ख) माया
ग) अज्ञान
घ) इच्छा
उत्तर: ग) अज्ञान
७. 'यथा जलं जले क्षिप्तं जलमेव भवेत्तथा। शिवे जीवः प्रविष्टस्तु शिव एव न संशयः॥' - इस श्लोक में किस सिद्धान्त को प्रतिपादित किया गया है?
क) द्वैतवाद
ख) विशिष्टाद्वैतवाद
ग) अद्वैतवाद
घ) भेदाभेदवाद
उत्तर: ग) अद्वैतवाद
८. 'अहं शिवो न चान्यस्तत्त्वतोऽहं न संशयः।' - यह पंक्ति किस भावना को व्यक्त करती है?
क) अहंकार
ख) आत्मज्ञान
ग) संशय
घ) भक्ति
उत्तर: ख) आत्मज्ञान
९. 'विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं' - यहाँ विश्व की तुलना किससे की गई है?
क) स्वप्न से
ख) दर्पण में दिखने वाली नगरी से
ग) माया से
घ) गुरु से
उत्तर: ख) दर्पण में दिखने वाली नगरी से
१०. 'परमार्थसारः' के अध्ययन का अंतिम फल क्या बताया गया है?
क) धन की प्राप्ति
ख) मोक्ष की प्राप्ति (शिवत्व की प्राप्ति)
ग) प्रसिद्धि की प्राप्ति
घ) ज्ञान की वृद्धि
उत्तर: ख) मोक्ष की प्राप्ति (शिवत्व की प्राप्ति)
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। मन लगाकर अध्ययन करें और किसी भी शंका के लिए पूछने में संकोच न करें। शुभकामनाएँ!