Class 12 Sociology Notes Chapter 1 (संरचनात्मक परिवर्तन) – Bharat me Samajik Parivartan aur Vikas Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम कक्षा 12 समाजशास्त्र की पुस्तक 'भारत में सामाजिक परिवर्तन और विकास' के प्रथम अध्याय 'संरचनात्मक परिवर्तन' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय भारतीय समाज पर उपनिवेशवाद, औद्योगीकरण और नगरीकरण के गहरे प्रभावों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर उन छात्रों के लिए जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। आइए, इस विषय को गहराई से जानें।
अध्याय 1: संरचनात्मक परिवर्तन (Structural Change)
यह अध्याय भारतीय समाज में हुए उन बड़े संरचनात्मक परिवर्तनों पर केंद्रित है जो उपनिवेशवाद, औद्योगीकरण और नगरीकरण के परिणामस्वरूप आए। ये परिवर्तन केवल ऊपरी तौर पर नहीं थे, बल्कि इन्होंने समाज की मूलभूत संरचनाओं – अर्थव्यवस्था, राजनीति, संस्कृति और सामाजिक संबंधों – को गहराई से प्रभावित किया।
1. संरचनात्मक परिवर्तन की अवधारणा:
संरचनात्मक परिवर्तन का अर्थ है समाज की मूलभूत संरचनाओं जैसे अर्थव्यवस्था, राज्य, सामाजिक वर्गों, जातियों और परिवारों में होने वाले बड़े और दीर्घकालिक बदलाव। भारत में, इन परिवर्तनों के मुख्य कारक उपनिवेशवाद, औद्योगीकरण और नगरीकरण रहे हैं।
2. उपनिवेशवाद और उसका प्रभाव:
उपनिवेशवाद वह व्यवस्था है जिसमें एक देश (औपनिवेशिक शक्ति) दूसरे देश (उपनिवेश) पर राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक नियंत्रण स्थापित करता है। भारत पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद का गहरा और बहुआयामी प्रभाव पड़ा।
-
उपनिवेशवाद की प्रमुख विशेषताएँ:
- पूंजीवाद: उपनिवेशवाद का आधार पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य उपनिवेश के संसाधनों का दोहन कर औपनिवेशिक शक्ति के लिए अधिकतम लाभ कमाना था।
- औद्योगीकरण: ब्रिटेन में हुई औद्योगिक क्रांति ने भारत को कच्चे माल का स्रोत और तैयार माल का बाजार बना दिया।
- आधुनिक राज्य: औपनिवेशिक शासन ने भारत में एक केंद्रीयकृत, नौकरशाही पर आधारित आधुनिक राज्य की अवधारणा को जन्म दिया।
-
भारत पर उपनिवेशवाद के प्रभाव:
-
अ) आर्थिक प्रभाव:
- वि-औद्योगीकरण (De-industrialization): ब्रिटिश नीतियों के कारण भारत के पारंपरिक हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों, विशेषकर वस्त्र उद्योग का पतन हुआ। ब्रिटिश मिलों में बना सस्ता माल भारतीय बाजारों में भर गया, जिससे स्थानीय कारीगर बेरोजगार हो गए।
- नए उद्योगों का विकास: ब्रिटिश हितों को साधने के लिए कुछ नए उद्योगों का विकास हुआ, जैसे रेलवे (कच्चे माल के परिवहन और तैयार माल की बिक्री के लिए), जूट मिलें (मुख्यतः कोलकाता में), सूती मिलें (मुख्यतः मुंबई और अहमदाबाद में), चाय बागान (असम, दार्जिलिंग), और कोयला खदानें। इन उद्योगों में भारतीय पूंजीपतियों की भूमिका सीमित थी।
- कृषि का वाणिज्यीकरण (Commercialization of Agriculture): किसानों को नकदी फसलें (जैसे कपास, नील, जूट, अफीम) उगाने के लिए मजबूर किया गया, जिससे खाद्य फसलों की कमी हुई और अकाल का खतरा बढ़ा।
- भू-राजस्व प्रणालियाँ: अंग्रेजों ने विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियाँ लागू कीं, जिन्होंने कृषि संबंधों को बदल दिया:
- स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement - 1793): बंगाल, बिहार, ओडिशा में लागू। जमींदारों को भूमि का मालिक बनाया गया और उन्हें एक निश्चित राजस्व सरकार को देना होता था। इसने जमींदारों और किसानों के बीच एक नया वर्ग संघर्ष पैदा किया।
- रैयतवाड़ी बंदोबस्त (Ryotwari Settlement): मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी में लागू। इसमें सीधे किसानों (रैयतों) से राजस्व एकत्र किया जाता था।
- महालवाड़ी बंदोबस्त (Mahalwari Settlement): उत्तर प्रदेश, मध्य प्रांत और पंजाब में लागू। इसमें पूरे गाँव (महाल) से राजस्व एकत्र किया जाता था, जिसकी जिम्मेदारी गाँव के मुखिया या जमींदार की होती थी।
- वन्य संसाधनों का दोहन: ब्रिटिश सरकार ने वनों पर नियंत्रण स्थापित किया और उनका उपयोग रेलवे के लिए लकड़ी और अन्य संसाधनों के लिए किया, जिससे जनजातीय समुदायों के पारंपरिक अधिकारों का हनन हुआ।
-
ब) सामाजिक प्रभाव:
- नए सामाजिक वर्गों का उदय: उपनिवेशवाद ने भारत में नए सामाजिक वर्गों को जन्म दिया:
- पूंजीपति वर्ग: भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों का एक छोटा वर्ग।
- श्रमिक वर्ग: नए उद्योगों, खदानों और बागानों में काम करने वाले मजदूर।
- मध्यम वर्ग: पश्चिमी शिक्षा प्राप्त पेशेवर जैसे वकील, डॉक्टर, शिक्षक, सरकारी कर्मचारी। यह वर्ग सामाजिक सुधारों और राष्ट्रवाद का वाहक बना।
- पश्चिमी शिक्षा और नए व्यवसायों का विकास: पश्चिमी शिक्षा ने नए विचारों और ज्ञान का प्रसार किया, जिससे पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं को चुनौती मिली।
- जाति व्यवस्था और जनजातीय समाजों पर प्रभाव: इन पर विस्तृत चर्चा नीचे की गई है।
- नए सामाजिक वर्गों का उदय: उपनिवेशवाद ने भारत में नए सामाजिक वर्गों को जन्म दिया:
-
स) राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रभाव:
- केंद्रीयकृत प्रशासन और एकीकृत कानूनी व्यवस्था: ब्रिटिश सरकार ने पूरे देश के लिए एक समान प्रशासनिक और कानूनी ढाँचा तैयार किया, जिसने क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद एक राजनीतिक इकाई के रूप में भारत की अवधारणा को मजबूत किया।
- जनगणना (Census), सर्वेक्षण, मानचित्रण: अंग्रेजों ने शासन को सुगम बनाने के लिए जनगणना, भूमि सर्वेक्षण और मानचित्रण जैसे कार्य करवाए। जनगणना ने जाति, धर्म, भाषा जैसी सामाजिक श्रेणियों को परिभाषित और कठोर बनाने में भूमिका निभाई।
- आधुनिक राज्य की अवधारणा: ब्रिटिश शासन ने एक संप्रभु, केंद्रीयकृत और कानून-आधारित राज्य की अवधारणा को भारत में स्थापित किया।
-
द) सांस्कृतिक प्रभाव:
- पश्चिमीकरण (Westernization): भारतीय समाज पर पश्चिमी विचारों, संस्थाओं, जीवन शैली और मूल्यों का गहरा प्रभाव पड़ा।
- नए विचारों का प्रसार: समानता, स्वतंत्रता, न्याय, राष्ट्रवाद और मानवाधिकार जैसे पश्चिमी विचारों ने भारतीय बुद्धिजीवियों को प्रभावित किया और सामाजिक सुधार आंदोलनों को प्रेरित किया।
- सामाजिक सुधार आंदोलन: सती प्रथा उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह निषेध जैसे सुधारों में ब्रिटिश सरकार ने कुछ हद तक भूमिका निभाई, हालांकि ये मुख्यतः भारतीय समाज सुधारकों द्वारा चलाए गए थे।
-
3. औद्योगीकरण:
औद्योगीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें अर्थव्यवस्था कृषि-आधारित से उद्योग-आधारित हो जाती है। भारत में औद्योगीकरण की प्रकृति उपनिवेशवाद से प्रभावित थी।
- भारत में औद्योगीकरण की प्रकृति: यह असमान और सीमित थी। ब्रिटिश हितों के अनुरूप केवल कुछ ही क्षेत्रों में उद्योगों का विकास हुआ।
- रेलवे का विकास: 1853 में भारत में पहली रेलगाड़ी चली। रेलवे का विकास मुख्य रूप से कच्चे माल को बंदरगाहों तक ले जाने और ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं को देश के आंतरिक भागों तक पहुँचाने के लिए किया गया था।
- श्रमिक वर्ग का उदय: नए उद्योगों, खदानों और बागानों में काम करने के लिए एक विशाल श्रमिक वर्ग का उदय हुआ। इन श्रमिकों को अक्सर खराब कार्य परिस्थितियों, कम मजदूरी और शोषण का सामना करना पड़ता था।
- औद्योगिक शहरों का विकास: जमशेदपुर, कानपुर जैसे औद्योगिक शहरों का उदय हुआ।
4. नगरीकरण (Urbanization):
नगरीकरण का अर्थ है शहरी क्षेत्रों की जनसंख्या में वृद्धि और शहरी जीवन शैली का प्रसार। औपनिवेशिक काल में भारत में नगरीकरण की प्रक्रिया भी विशिष्ट थी।
- औपनिवेशिक नगरीकरण की प्रकृति:
- नए बंदरगाह शहरों का उदय: मुंबई (बंबई), कोलकाता (कलकत्ता) और चेन्नई (मद्रास) जैसे बंदरगाह शहर ब्रिटिश प्रशासन और वाणिज्य के प्रमुख केंद्र बन गए। ये शहर तेजी से विकसित हुए।
- पुराने प्रशासनिक और धार्मिक शहरों का पतन: दिल्ली, आगरा, मुर्शिदाबाद, सूरत जैसे कई पुराने शाही और व्यापारिक शहर अपनी महत्ता खो बैठे, क्योंकि ब्रिटिश प्रशासन ने नए केंद्रों को प्राथमिकता दी।
- नगरीकरण के सामाजिक प्रभाव:
- अनाम जीवन शैली (Anonymity): शहरों में लोग अक्सर एक-दूसरे को नहीं जानते थे, जिससे पारंपरिक ग्रामीण समुदायों की तुलना में अधिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गुमनामी मिली।
- नए सार्वजनिक स्थान: पार्क, सिनेमा हॉल, सार्वजनिक परिवहन (जैसे बस, ट्रेन) जैसे नए सार्वजनिक स्थान उभरे, जिन्होंने सामाजिक मेलजोल के नए तरीके प्रदान किए।
- नए सामाजिक समूह और पहचानें: शहरों ने विभिन्न जातियों, धर्मों और क्षेत्रों के लोगों को एक साथ लाया, जिससे नई सामाजिक पहचानें और समूह बने।
- जाति और परिवार के पारंपरिक बंधनों का कमजोर होना: शहरों में नए व्यवसायों और जीवन शैली के कारण जातिगत प्रतिबंध और संयुक्त परिवार प्रणाली कुछ हद तक कमजोर हुई।
5. जाति व्यवस्था पर औपनिवेशिक प्रभाव:
उपनिवेशवाद ने जाति व्यवस्था को कमजोर करने के साथ-साथ कुछ मायनों में इसे मजबूत भी किया।
- जनगणना (Census): अंग्रेजों ने 1881 से नियमित जनगणना शुरू की, जिसमें जाति को एक महत्वपूर्ण श्रेणी के रूप में दर्ज किया गया। इसने जाति को एक निश्चित और कठोर श्रेणी के रूप में परिभाषित किया, जिससे इसकी कठोरता बढ़ी।
- भू-राजस्व बंदोबस्त: कुछ जातियों को भूमि के अधिकार मिले, जबकि अन्य वंचित रह गए, जिससे जातिगत असमानताएँ और गहरी हुईं।
- प्रशासनिक नीतियाँ: अंग्रेजों ने कुछ जातियों को 'अपराधी जनजाति' (Criminal Tribes) घोषित किया, जिससे उनके प्रति भेदभाव और शोषण बढ़ा।
- पश्चिमी शिक्षा और नए व्यवसायों: आधुनिक शिक्षा और शहरी क्षेत्रों में नए व्यवसायों ने पारंपरिक जातिगत व्यवसायों को चुनौती दी और जातिगत गतिशीलता के अवसर प्रदान किए।
- शहरीकरण और आधुनिक परिवहन: शहरों में विभिन्न जातियों के लोगों का एक साथ रहना और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना जातिगत अलगाव को कम करने में सहायक हुआ।
- मिशनरी गतिविधियाँ और सामाजिक सुधार आंदोलन: ईसाई मिशनरियों ने जाति व्यवस्था की आलोचना की, और भारतीय समाज सुधारकों ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ आंदोलन चलाए।
6. जनजातीय समाजों पर औपनिवेशिक प्रभाव:
जनजातीय समुदाय, जो अक्सर वनों और पहाड़ी क्षेत्रों में रहते थे, औपनिवेशिक नीतियों से बुरी तरह प्रभावित हुए।
- वन कानून: ब्रिटिश सरकार ने वनों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया और नए वन कानून बनाए, जिन्होंने जनजातियों को उनके पारंपरिक वन संसाधनों (लकड़ी, फल, जड़ी-बूटियाँ) से वंचित कर दिया।
- भूमि अलगाव: बाहरी साहूकारों, व्यापारियों और जमींदारों ने जनजातीय भूमि पर कब्जा करना शुरू कर दिया, जिससे जनजातीय लोग अपनी जमीन से बेदखल हो गए।
- शोषण: जनजातीय लोगों को अक्सर बेगार (बिना मजदूरी के काम) और बंधुआ मजदूरी के लिए मजबूर किया गया।
- स्वशासन का अंत: ब्रिटिश प्रशासन ने जनजातीय समुदायों की पारंपरिक स्वशासन प्रणालियों को समाप्त कर दिया।
- जनजातीय विद्रोह: इन शोषणकारी नीतियों के खिलाफ कई जनजातीय विद्रोह हुए, जैसे संथाल विद्रोह (1855-56) जिसका नेतृत्व सिदो और कान्हू ने किया, और बिरसा मुंडा का उलगुलान (1899-1900)।
7. प्रमुख अवधारणाएँ:
- उपनिवेशवाद: एक देश द्वारा दूसरे देश पर राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक नियंत्रण।
- औद्योगीकरण: कृषि से औद्योगिक अर्थव्यवस्था में संक्रमण।
- नगरीकरण: शहरों की जनसंख्या में वृद्धि और शहरी जीवन शैली का प्रसार।
- वि-औद्योगीकरण: पारंपरिक उद्योगों का पतन।
- पश्चिमीकरण: पश्चिमी विचारों, संस्थाओं और जीवन शैली का प्रभाव।
- आधुनिक राज्य: केंद्रीयकृत, कानून-आधारित और नौकरशाही पर आधारित शासन प्रणाली।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) - 10 प्रश्न
-
उपनिवेशवाद के तहत भारत में किस प्रकार के उद्योगों का पतन हुआ?
a) रेलवे उद्योग
b) वस्त्र उद्योग
c) जूट उद्योग
d) चाय उद्योग -
भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान भू-राजस्व की कौन सी प्रणाली लागू नहीं की गई थी?
a) स्थायी बंदोबस्त
b) रैयतवाड़ी बंदोबस्त
c) महालवाड़ी बंदोबस्त
d) मनसबदारी बंदोबस्त -
औपनिवेशिक काल में भारत में कौन से तीन प्रमुख बंदरगाह शहर उभरे?
a) दिल्ली, आगरा, जयपुर
b) मुंबई, कोलकाता, चेन्नई
c) लखनऊ, पटना, भोपाल
d) अहमदाबाद, पुणे, सूरत -
'वि-औद्योगीकरण' शब्द का क्या अर्थ है?
a) नए उद्योगों की स्थापना
b) पारंपरिक उद्योगों का पतन
c) उद्योगों का राष्ट्रीयकरण
d) उद्योगों का निजीकरण -
निम्नलिखित में से कौन सा औपनिवेशिक शासन का एक परिणाम नहीं था?
a) रेलवे का विकास
b) जनगणना का आरंभ
c) पारंपरिक हस्तशिल्प का उत्थान
d) नए प्रशासनिक केंद्रों का उदय -
जनजातीय समाजों पर औपनिवेशिक शासन का एक प्रमुख प्रभाव क्या था?
a) उनके स्वशासन को बढ़ावा मिला
b) वन कानूनों से उन्हें लाभ हुआ
c) उनके पारंपरिक वन संसाधनों से उन्हें वंचित किया गया
d) साहूकारों का प्रभाव समाप्त हो गया -
'पश्चिमीकरण' की अवधारणा का संबंध किससे है?
a) केवल पश्चिमी देशों के साथ व्यापार
b) पश्चिमी विचारों, संस्थाओं और जीवन शैली का प्रभाव
c) पश्चिमी देशों में प्रवास
d) पश्चिमी देशों की सेना में शामिल होना -
किसने 'संथाल विद्रोह' का नेतृत्व किया था?
a) बिरसा मुंडा
b) सिदो और कान्हू
c) रानी लक्ष्मीबाई
d) मंगल पांडे -
औपनिवेशिक काल में जनगणना का एक महत्वपूर्ण प्रभाव क्या था?
a) इसने जाति व्यवस्था को कमजोर किया
b) इसने जाति को एक निश्चित श्रेणी के रूप में दर्ज कर उसकी कठोरता को बढ़ाया
c) इसने जनजातियों को मुख्यधारा में शामिल किया
d) इसने केवल आर्थिक स्थिति का आकलन किया -
भारत में औपनिवेशिक शासन के दौरान किस फसल के वाणिज्यीकरण पर विशेष जोर दिया गया?
a) गेहूं
b) चावल
c) नकदी फसलें (जैसे कपास, नील)
d) दालें
उत्तरमाला:
- b) वस्त्र उद्योग
- d) मनसबदारी बंदोबस्त
- b) मुंबई, कोलकाता, चेन्नई
- b) पारंपरिक उद्योगों का पतन
- c) पारंपरिक हस्तशिल्प का उत्थान
- c) उनके पारंपरिक वन संसाधनों से उन्हें वंचित किया गया
- b) पश्चिमी विचारों, संस्थाओं और जीवन शैली का प्रभाव
- b) सिदो और कान्हू
- b) इसने जाति को एक निश्चित श्रेणी के रूप में दर्ज कर उसकी कठोरता को बढ़ाया
- c) नकदी फसलें (जैसे कपास, नील)
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को गहराई से समझने और आपकी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। शुभकामनाएँ!