Class 12 Sociology Notes Chapter 3 (सामाजिक संस्थाएँ निरंतरता एव परिवर्तन) – Bharatiya Samaj Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम कक्षा 12 की समाजशास्त्र की पाठ्यपुस्तक 'भारतीय समाज' के अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय 3, 'सामाजिक संस्थाएँ: निरंतरता एवं परिवर्तन' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय विभिन्न सामाजिक संस्थाओं, जैसे परिवार, विवाह, नातेदारी, जाति, जनजाति, बाज़ार, अर्थव्यवस्था, राजनीति, धर्म और शिक्षा, की प्रकृति, उनके कार्यों और उनमें समय के साथ आ रहे परिवर्तनों को समझने के लिए आधारभूत है। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इन अवधारणाओं की गहरी समझ आवश्यक है।
चलिए, हम इस अध्याय के प्रमुख बिंदुओं को विस्तार से समझते हैं:
अध्याय 3: सामाजिक संस्थाएँ: निरंतरता एवं परिवर्तन
परिचय:
सामाजिक संस्थाएँ समाज की आधारभूत संरचनाएँ होती हैं जो व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित और निर्देशित करती हैं। ये समाज में व्यवस्था, स्थिरता और निरंतरता बनाए रखने में मदद करती हैं। यद्यपि ये संस्थाएँ स्थिर प्रतीत होती हैं, लेकिन ये समय के साथ बदलती भी रहती हैं। इस अध्याय में हम भारतीय समाज के संदर्भ में इन संस्थाओं की निरंतरता और परिवर्तन दोनों पहलुओं का विश्लेषण करेंगे।
1. परिवार
- परिभाषा: परिवार समाज की सबसे छोटी और प्राथमिक संस्था है, जिसमें रक्त, विवाह या दत्तक ग्रहण के संबंधों से जुड़े लोग एक साथ रहते हैं। यह सदस्यों को भावनात्मक, आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है।
- कार्य:
- प्रजनन और बच्चों का समाजीकरण।
- यौन व्यवहार का विनियमन।
- आर्थिक सहयोग और भरण-पोषण।
- सामाजिक सुरक्षा और भावनात्मक समर्थन।
- सामाजिक स्थिति का निर्धारण।
- परिवार के प्रकार:
- नाभिकीय/एकल परिवार: इसमें पति-पत्नी और उनके अविवाहित बच्चे शामिल होते हैं। यह शहरी और औद्योगिक समाजों में अधिक प्रचलित है।
- संयुक्त परिवार: इसमें तीन या अधिक पीढ़ियों के सदस्य एक ही छत के नीचे रहते हैं, जिनकी संपत्ति, पूजा-पाठ और रसोई साझा होती है। यह पारंपरिक भारतीय समाज की विशेषता रही है।
- संयुक्त परिवार की विशेषताएँ (परंपरागत रूप से):
- साझा निवास।
- साझा रसोई।
- साझा संपत्ति।
- सामान्य पूर्वज।
- सामूहिक पूजा।
- कर्ता (सबसे वरिष्ठ पुरुष सदस्य) का प्रभुत्व।
- संयुक्त परिवार में परिवर्तन:
- औद्योगिकीकरण और शहरीकरण: ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में प्रवासन के कारण एकल परिवारों का उदय।
- शिक्षा का प्रसार: विशेषकर महिलाओं की शिक्षा, जिसने उनकी आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ाई और पारंपरिक भूमिकाओं को चुनौती दी।
- कानूनी सुधार: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 जैसे कानूनों ने महिलाओं को संपत्ति में अधिकार देकर संयुक्त परिवार की संरचना को प्रभावित किया।
- व्यक्तिवाद का उदय: आधुनिक मूल्यों और जीवनशैली ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर जोर दिया।
- महिला सशक्तिकरण: महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और निर्णय लेने की क्षमता ने परिवार के भीतर शक्ति संतुलन को बदला है।
2. विवाह
- परिभाषा: विवाह एक सामाजिक रूप से स्वीकृत और अनुष्ठानिक संघ है जो दो या अधिक व्यक्तियों के बीच यौन, आर्थिक और प्रजनन संबंधी संबंधों को स्थापित करता है। यह परिवार की स्थापना का आधार है।
- विवाह के प्रकार:
- एकविवाह (Monogamy): एक पुरुष का एक ही स्त्री से विवाह। यह सबसे सामान्य और कानूनी रूप से स्वीकृत रूप है।
- बहुविवाह (Polygamy): एक व्यक्ति का एक से अधिक जीवनसाथी होना।
- बहुपत्नी विवाह (Polygyny): एक पुरुष का एक से अधिक स्त्रियों से विवाह।
- बहुपति विवाह (Polyandry): एक स्त्री का एक से अधिक पुरुषों से विवाह (भारत में कुछ जनजातीय समुदायों में पाया जाता है, जैसे टोडा)।
- विवाह के नियम:
- अंतर्विवाह (Endogamy): अपने ही समूह (जाति, धर्म, जनजाति) के भीतर विवाह करना।
- बहिर्विवाह (Exogamy): अपने समूह के बाहर विवाह करना (जैसे गोत्र बहिर्विवाह)।
- विवाह में परिवर्तन:
- प्रेम विवाह का बढ़ता चलन: पारंपरिक arranged marriages के स्थान पर।
- अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाह: सामाजिक स्वीकृति में वृद्धि, हालांकि अभी भी चुनौतियाँ हैं।
- विवाह की आयु में वृद्धि: शिक्षा और करियर पर जोर के कारण।
- तलाक की दरों में वृद्धि: व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी सहायता की उपलब्धता के कारण।
- लिव-इन रिलेशनशिप: गैर-पारंपरिक संबंधों की बढ़ती स्वीकृति।
3. नातेदारी (Kinship)
- परिभाषा: नातेदारी उन सामाजिक संबंधों को संदर्भित करती है जो रक्त (जन्म) या विवाह के माध्यम से व्यक्तियों को जोड़ते हैं। यह सामाजिक संगठन का एक महत्वपूर्ण आधार है।
- प्रकार:
- रक्त-संबंधी नातेदारी (Consanguineal Kinship): जन्म या रक्त संबंध पर आधारित (जैसे माता-पिता, भाई-बहन, बच्चे)।
- विवाह-संबंधी नातेदारी (Affinal Kinship): विवाह के माध्यम से स्थापित संबंध (जैसे पति-पत्नी, सास-ससुर, देवर-भाभी)।
- महत्व: नातेदारी संबंध समाजीकरण, सामाजिक नियंत्रण, संपत्ति के उत्तराधिकार और सामाजिक एकजुटता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
4. जाति (Caste)
- परिभाषा: जाति एक सामाजिक स्तरीकरण की व्यवस्था है जो जन्म पर आधारित होती है, वंशानुगत होती है, और व्यक्तियों को एक निश्चित सामाजिक पदानुक्रम में रखती है। यह भारतीय समाज की एक विशिष्ट संस्था है।
- जाति व्यवस्था की विशेषताएँ:
- जन्म आधारित सदस्यता: व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, वही उसकी जाति होती है।
- वंशानुगत: जाति की सदस्यता पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती है।
- ऊँच-नीच का संस्तरण: जातियाँ एक पदानुक्रम में व्यवस्थित होती हैं, जिसमें कुछ जातियाँ दूसरों से श्रेष्ठ मानी जाती हैं।
- अंतर्विवाह: अपनी ही जाति के भीतर विवाह करने का नियम।
- व्यवसाय का निर्धारण: पारंपरिक रूप से प्रत्येक जाति का एक निश्चित व्यवसाय होता था।
- खान-पान और सामाजिक अंतःक्रिया पर प्रतिबंध: विभिन्न जातियों के बीच सामाजिक दूरी बनाए रखने के नियम।
- शुद्धता और प्रदूषण की अवधारणा: उच्च जातियों को शुद्ध और निम्न जातियों को अशुद्ध माना जाता था।
- जाति व्यवस्था की निरंतरता:
- ग्रामीण क्षेत्रों में: जाति अभी भी सामाजिक और राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- विवाह में: अधिकांश विवाह अभी भी जाति के भीतर ही होते हैं।
- राजनीति में: जाति एक महत्वपूर्ण पहचान कारक बनी हुई है, और राजनीतिक दल अक्सर जातिगत समीकरणों के आधार पर टिकट वितरित करते हैं।
- पहचान के रूप में: शहरी क्षेत्रों में भी लोग अपनी जातिगत पहचान बनाए रखते हैं।
- जाति व्यवस्था में परिवर्तन:
- औद्योगिकीकरण और शहरीकरण:
- शहरी जीवन की गुमनामी ने जातिगत प्रतिबंधों को कमजोर किया।
- नए व्यवसायों के उद्भव ने पारंपरिक जाति-आधारित व्यवसायों को चुनौती दी।
- सार्वजनिक स्थानों (बस, ट्रेन, रेस्टोरेंट) पर अंतःक्रिया ने छुआछूत को कम किया।
- शिक्षा का प्रसार: शिक्षा ने लोगों में जागरूकता बढ़ाई और जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने में मदद की।
- कानूनी सुधार और संवैधानिक प्रावधान:
- भारतीय संविधान ने अस्पृश्यता को समाप्त किया (अनुच्छेद 17)।
- आरक्षण नीति (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग) ने निम्न जातियों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान में मदद की।
- विभिन्न कानूनों (जैसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989) ने भेदभाव को रोकने का प्रयास किया।
- जाति और वर्ग का संबंध: आर्थिक असमानता के कारण जाति और वर्ग के बीच संबंध जटिल हो गया है। उच्च जातियों में भी गरीब लोग हैं और निम्न जातियों में भी समृद्ध लोग।
- जाति का राजनीतिकरण: राजनीतिक दलों ने जाति को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया, जिससे जातिगत पहचान मजबूत हुई, लेकिन साथ ही निम्न जातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी मिला।
- संस्कृतिकरण (Sanskritization): एम.एन. श्रीनिवास द्वारा दी गई यह अवधारणा बताती है कि निम्न जाति के सदस्य उच्च जातियों की जीवनशैली, अनुष्ठानों और प्रथाओं को अपनाकर अपनी सामाजिक स्थिति को ऊपर उठाने का प्रयास करते हैं।
- पश्चिमीकरण (Westernization): पश्चिमी शिक्षा, जीवनशैली और मूल्यों को अपनाने से भी जातिगत प्रतिबंधों में ढील आई है।
- औद्योगिकीकरण और शहरीकरण:
5. जनजाति (Tribe)
- परिभाषा: जनजाति एक ऐसा सामाजिक समूह है जो एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में रहता है, जिसकी अपनी एक विशिष्ट संस्कृति, भाषा और सामाजिक संगठन होता है। ये आमतौर पर मुख्यधारा के समाज से अपेक्षाकृत अलग-थलग होते हैं।
- जनजाति की विशेषताएँ:
- भौगोलिक अलगाव।
- विशिष्ट संस्कृति, भाषा और धर्म।
- सामुदायिक भावना और मजबूत नातेदारी संबंध।
- आर्थिक आत्मनिर्भरता (शिकार, संग्रहण, झूम खेती)।
- सरल सामाजिक स्तरीकरण।
- अपनी राजनीतिक व्यवस्था (जनजातीय मुखिया)।
- जनजातियों का वर्गीकरण:
- स्थायी विशेषताएँ: क्षेत्र (हिमालयी, मध्य भारतीय, पूर्वोत्तर), भाषा (इंडो-आर्यन, द्रविड़, ऑस्ट्रो-एशियाई), शारीरिक बनावट (नेग्रिटो, मंगोलॉयड, प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉयड), आर्थिक आधार (शिकारी-संग्राहक, पशुपालक, कृषक)।
- अर्जित विशेषताएँ: आत्मसात्करण का स्तर (मुख्यधारा में कितना घुल-मिल गए हैं)।
- जनजातियों में परिवर्तन:
- मुख्यधारा में एकीकरण: सरकारी नीतियों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ) और विकास परियोजनाओं के माध्यम से जनजातियों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास।
- विकास परियोजनाओं का प्रभाव: बड़े बांधों, खदानों और उद्योगों के कारण जनजातियों का विस्थापन और उनके पारंपरिक जीवनशैली का विनाश।
- वन कानूनों का प्रभाव: औपनिवेशिक काल से चले आ रहे वन कानूनों ने जनजातियों के वन संसाधनों पर पारंपरिक अधिकारों को सीमित किया।
- शिक्षा और स्वास्थ्य: शिक्षा के प्रसार ने जागरूकता बढ़ाई है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाएँ अभी भी अपर्याप्त हैं।
- जनजातीय पहचान का उभार: वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण के बावजूद, कई जनजातियाँ अपनी विशिष्ट पहचान और संस्कृति को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
- अलगाव और एकीकरण की बहस: जनजातियों के लिए कौन सा दृष्टिकोण बेहतर है - उन्हें मुख्यधारा में एकीकृत करना या उनकी विशिष्टता को बनाए रखते हुए उन्हें संरक्षित करना - यह एक सतत बहस का विषय है।
6. अर्थव्यवस्था (Economy)
- परिभाषा: अर्थव्यवस्था वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन, वितरण और उपभोग से संबंधित सामाजिक संस्था है। यह समाज की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करती है।
- आर्थिक संस्थाओं का विकास:
- मानव समाज ने शिकार-संग्रहण से कृषि, फिर औद्योगिक और अब सेवा-आधारित अर्थव्यवस्थाओं तक का सफर तय किया है।
- प्रत्येक चरण में उत्पादन, वितरण और उपभोग के तरीके बदल गए हैं।
- बाजार (Market) एक सामाजिक संस्था के रूप में:
- बाजार केवल वस्तुओं के लेन-देन का स्थान नहीं, बल्कि एक सामाजिक संस्था भी है जहाँ विक्रेता और खरीदार सामाजिक संबंधों में बंधे होते हैं।
- पारंपरिक बाजार: भारत में हाट, मेलों और पारंपरिक मंडियों में सामाजिक अंतःक्रिया और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी महत्व होता था।
- आधुनिक बाजार: वैश्वीकरण ने वैश्विक बाजारों को जन्म दिया है, जो दूरदराज के क्षेत्रों को जोड़ते हैं।
- बाजार और समाज:
- बाजार अर्थव्यवस्था ने सामाजिक स्तरीकरण, जीवनशैली और मूल्यों को प्रभावित किया है।
- वैश्वीकरण ने उपभोग के पैटर्न को बदल दिया है और विभिन्न संस्कृतियों को एक-दूसरे के करीब लाया है।
- आर्थिक असमानता और पर्यावरणीय चिंताएँ आधुनिक बाजार अर्थव्यवस्था की प्रमुख चुनौतियाँ हैं।
7. राजनीति (Politics)
- परिभाषा: राजनीति शक्ति के वितरण और उपयोग से संबंधित सामाजिक संस्था है। यह समाज में व्यवस्था बनाए रखने, निर्णय लेने और संसाधनों के आवंटन का कार्य करती है।
- राजनीतिक संस्थाएँ:
- राज्य: एक राजनीतिक इकाई जिसके पास एक निश्चित क्षेत्र पर संप्रभु शक्ति होती है।
- सरकार: राज्य की कार्यकारी शाखा जो कानून लागू करती है।
- राजनीतिक दल: समान विचारधारा वाले लोगों का समूह जो सत्ता हासिल करना चाहते हैं।
- दबाव समूह: विशिष्ट हितों की वकालत करने वाले समूह।
- लोकतंत्र: भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है जहाँ नागरिक अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं।
- विशेषताएँ: सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, नियमित चुनाव, कानून का शासन, मौलिक अधिकार।
- राजनीति और समाज:
- जाति, धर्म, वर्ग और लिंग जैसे सामाजिक कारक राजनीति को प्रभावित करते हैं और राजनीति भी इन कारकों को आकार देती है।
- भारत में जातिगत राजनीति एक महत्वपूर्ण वास्तविकता है।
- राजनीतिक परिवर्तन सामाजिक आंदोलनों और नागरिक समाज की भागीदारी से प्रेरित होते हैं।
8. धर्म (Religion)
- परिभाषा: धर्म पवित्र और अपवित्र के भेद पर आधारित विश्वासों और अनुष्ठानों की एक प्रणाली है, जो अनुयायियों को एक नैतिक समुदाय में बांधती है।
- धर्म के कार्य (एमिल दुर्खीम के अनुसार):
- सामाजिक एकजुटता और एकता को बढ़ावा देना।
- नैतिक नियमों और मूल्यों को स्थापित करना।
- जीवन को अर्थ और उद्देश्य प्रदान करना।
- कठिन समय में भावनात्मक समर्थन देना।
- धर्म के प्रकार: एकेश्वरवाद (एक ईश्वर), बहुदेववाद (कई ईश्वर)।
- धर्म और समाज:
- धर्मनिरपेक्षीकरण (Secularization): समाज में धर्म के प्रभाव में कमी आना, सार्वजनिक जीवन से धर्म का अलगाव।
- सांप्रदायिकता (Communalism): एक धार्मिक समूह का अपने हितों को दूसरे धार्मिक समूह के हितों से श्रेष्ठ मानना, अक्सर हिंसा की ओर ले जाता है।
- धर्म में परिवर्तन: आधुनिकीकरण और वैश्वीकरण ने धार्मिक प्रथाओं और विश्वासों को प्रभावित किया है, जिससे कुछ नए धार्मिक आंदोलन उभरे हैं।
9. शिक्षा (Education)
- परिभाषा: शिक्षा एक सामाजिक संस्था है जो समाज के सदस्यों को ज्ञान, कौशल, मूल्य और मानदंड सिखाती है। यह समाजीकरण का एक महत्वपूर्ण साधन है।
- शिक्षा के कार्य:
- समाजीकरण: सांस्कृतिक मूल्यों और मानदंडों का हस्तांतरण।
- सामाजिक गतिशीलता: व्यक्तियों को उच्च सामाजिक स्थिति प्राप्त करने में मदद करना।
- कौशल विकास: कार्यबल के लिए आवश्यक कौशल प्रदान करना।
- सामाजिक नियंत्रण: समाज के नियमों और अपेक्षाओं को सिखाना।
- शिक्षा संस्थाएँ: विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान।
- शिक्षा और समाज:
- सामाजिक असमानता: शिक्षा तक पहुँच अक्सर सामाजिक-आर्थिक स्थिति से प्रभावित होती है, जिससे असमानताएँ बनी रहती हैं।
- शिक्षा का व्यवसायीकरण: शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना बन गया है।
- शिक्षा में परिवर्तन: तकनीकी शिक्षा, ऑनलाइन शिक्षा, आजीवन सीखने की अवधारणा का उदय।
- नई शिक्षा नीति (NEP): भारत में शिक्षा प्रणाली को आधुनिक बनाने और सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास।
यह विस्तृत नोट्स आपको 'सामाजिक संस्थाएँ: निरंतरता एवं परिवर्तन' अध्याय की गहन समझ प्रदान करेंगे। अब, आइए इस अध्याय पर आधारित 10 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) देखें जो आपकी सरकारी परीक्षा की तैयारी में सहायक होंगे।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
एम.एन. श्रीनिवास द्वारा प्रतिपादित 'संस्कृतिकरण' की अवधारणा किससे संबंधित है?
a) उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों की प्रथाओं को अपनाना
b) निम्न जातियों द्वारा उच्च जातियों की प्रथाओं को अपनाकर अपनी सामाजिक स्थिति को ऊपर उठाना
c) जनजातियों का मुख्यधारा में एकीकरण
d) पश्चिमी संस्कृति का भारतीय समाज पर प्रभाव
उत्तर: b) निम्न जातियों द्वारा उच्च जातियों की प्रथाओं को अपनाकर अपनी सामाजिक स्थिति को ऊपर उठाना -
भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद अस्पृश्यता को समाप्त करता है?
a) अनुच्छेद 14
b) अनुच्छेद 17
c) अनुच्छेद 21
d) अनुच्छेद 32
उत्तर: b) अनुच्छेद 17 -
वह विवाह जिसमें एक स्त्री के एक से अधिक पति होते हैं, क्या कहलाता है?
a) एकविवाह
b) बहुपत्नी विवाह
c) बहुपति विवाह
d) बहिर्विवाह
उत्तर: c) बहुपति विवाह -
संयुक्त परिवार की पारंपरिक विशेषताओं में से कौन सी एक नहीं है?
a) साझा निवास
b) साझा रसोई
c) व्यक्तिगत संपत्ति का पूर्ण स्वामित्व
d) कर्ता का प्रभुत्व
उत्तर: c) व्यक्तिगत संपत्ति का पूर्ण स्वामित्व -
'धर्मनिरपेक्षीकरण' शब्द का अर्थ क्या है?
a) सभी धर्मों को समान मानना
b) धार्मिक सहिष्णुता
c) समाज में धर्म के प्रभाव में कमी आना
d) किसी एक धर्म को राज्य धर्म घोषित करना
उत्तर: c) समाज में धर्म के प्रभाव में कमी आना -
नातेदारी के संदर्भ में, विवाह के माध्यम से स्थापित संबंध क्या कहलाते हैं?
a) रक्त-संबंधी नातेदारी
b) विवाह-संबंधी नातेदारी
c) दत्तक-संबंधी नातेदारी
d) प्राथमिक नातेदारी
उत्तर: b) विवाह-संबंधी नातेदारी -
निम्नलिखित में से कौन सा कारक जाति व्यवस्था में परिवर्तन का एक प्रमुख कारण नहीं है?
a) औद्योगिकीकरण और शहरीकरण
b) शिक्षा का प्रसार
c) कानूनी सुधार
d) गोत्र बहिर्विवाह का सख्ती से पालन
उत्तर: d) गोत्र बहिर्विवाह का सख्ती से पालन -
जनजातीय समुदायों के लिए 'अलगाव' और 'एकीकरण' की बहस किससे संबंधित है?
a) उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता बनाए रखना या उन्हें बाजार अर्थव्यवस्था में शामिल करना
b) उन्हें मुख्यधारा के समाज से अलग रखना या उन्हें मुख्यधारा में एकीकृत करना
c) उनकी पारंपरिक भाषा को संरक्षित करना या उन्हें राष्ट्रभाषा सिखाना
d) उनके धार्मिक अनुष्ठानों को बनाए रखना या उन्हें आधुनिक धर्मों को अपनाने देना
उत्तर: b) उन्हें मुख्यधारा के समाज से अलग रखना या उन्हें मुख्यधारा में एकीकृत करना -
बाजार को एक सामाजिक संस्था के रूप में देखने का क्या अर्थ है?
a) यह केवल वस्तुओं के लेन-देन का स्थान है।
b) यह एक ऐसा स्थान है जहाँ विक्रेता और खरीदार सामाजिक संबंधों में बंधे होते हैं।
c) यह केवल आर्थिक गतिविधियों से संबंधित है।
d) यह केवल लाभ कमाने का माध्यम है।
उत्तर: b) यह एक ऐसा स्थान है जहाँ विक्रेता और खरीदार सामाजिक संबंधों में बंधे होते हैं। -
भारतीय समाज में 'सांप्रदायिकता' का क्या अर्थ है?
a) विभिन्न धर्मों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध
b) एक धार्मिक समूह का अपने हितों को दूसरे धार्मिक समूह के हितों से श्रेष्ठ मानना
c) धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बढ़ावा देना
d) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
उत्तर: b) एक धार्मिक समूह का अपने हितों को दूसरे धार्मिक समूह के हितों से श्रेष्ठ मानना
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। इस अध्याय की अवधारणाओं को गहराई से समझने का प्रयास करें। शुभकामनाएँ!