Class 12 Sociology Notes Chapter 4 (बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में) – Bharatiya Samaj Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम कक्षा 12 समाजशास्त्र की पुस्तक 'भारतीय समाज' के अध्याय 4 'बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अध्याय को गहराई से समझना आपको बाज़ार की केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका को भी समझने में मदद करेगा।
अध्याय 4: बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में
विस्तृत नोट्स
1. परिचय: बाज़ार की अवधारणा
- पारंपरिक दृष्टिकोण: अर्थशास्त्र में बाज़ार को मुख्य रूप से वस्तुओं और सेवाओं के विनिमय के स्थान के रूप में देखा जाता है, जहाँ क्रेता और विक्रेता मिलते हैं। यह आपूर्ति और मांग के सिद्धांतों पर आधारित होता है।
- समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण: समाजशास्त्र बाज़ार को केवल आर्थिक विनिमय का स्थान नहीं मानता, बल्कि इसे एक जटिल सामाजिक संस्था के रूप में देखता है। बाज़ार सामाजिक संबंधों, सांस्कृतिक मूल्यों, शक्ति संरचनाओं और नियमों से गहराई से जुड़ा होता है। यह समुदाय, जाति, वर्ग, लिंग और अन्य सामाजिक श्रेणियों को प्रभावित करता है और उनसे प्रभावित भी होता है।
2. बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में क्यों?
- सामाजिक संबंध: बाज़ार में केवल वस्तुओं का नहीं, बल्कि लोगों के बीच संबंधों का भी विनिमय होता है। विक्रेता और खरीदार के बीच विश्वास, पहचान और सामाजिक नेटवर्क महत्वपूर्ण होते हैं।
- सांस्कृतिक मूल्य: बाज़ार में कौन सी वस्तुएँ बेची जाती हैं, कैसे बेची जाती हैं और कौन खरीदता है, यह सब सांस्कृतिक मूल्यों और मानदंडों से तय होता है। उदाहरण के लिए, कुछ समाजों में कुछ वस्तुओं का व्यापार वर्जित हो सकता है।
- शक्ति संरचनाएँ: बाज़ार में हमेशा समान अवसर नहीं होते। कुछ समूहों के पास अधिक शक्ति (आर्थिक, सामाजिक) होती है, जो बाज़ार के नियमों और परिणामों को प्रभावित करती है।
- उदाहरण:
- साप्ताहिक बाज़ार: ये केवल खरीद-बिक्री के स्थान नहीं होते, बल्कि स्थानीय समुदाय के लोगों के मिलने-जुलने, गपशप करने और सामाजिक संबंध बनाए रखने के केंद्र भी होते हैं। ये ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।
- आदिवासी बाज़ार/मेले: ये आदिवासी समुदायों के लिए आर्थिक विनिमय के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों का भी केंद्र होते हैं। यहाँ रिश्ते तय होते हैं, मनोरंजन होता है और सामुदायिक पहचान मजबूत होती है।
3. पारंपरिक भारतीय समाज में बाज़ार
- जाति और बाज़ार: पारंपरिक भारतीय समाज में जाति व्यवस्था का बाज़ार से गहरा संबंध था।
- वंशानुगत व्यवसाय: प्रत्येक जाति का अपना पारंपरिक व्यवसाय होता था, जो बाज़ार में उसकी भूमिका तय करता था (जैसे, कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाते थे, लोहार औज़ार)।
- जजमानी व्यवस्था: यह एक पारंपरिक विनिमय प्रणाली थी जहाँ विभिन्न जातियाँ एक-दूसरे को अपनी सेवाएँ प्रदान करती थीं और बदले में अनाज या अन्य वस्तुओं के रूप में भुगतान प्राप्त करती थीं। यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और अनुष्ठानिक संबंधों पर आधारित थी।
- व्यापारी जातियाँ: कुछ जातियाँ (जैसे मारवाड़ी, बनिया, चेत्तियार) विशेष रूप से व्यापार और साहूकारी के लिए जानी जाती थीं। इन्होंने व्यापक व्यापारिक नेटवर्क स्थापित किए।
- स्थानीय बाज़ार: अधिकांश व्यापार स्थानीय स्तर पर होता था, जहाँ उत्पादक और उपभोक्ता सीधे जुड़े होते थे।
4. औपनिवेशिक काल और बाज़ार का उदय
- ब्रिटिश नीतियों का प्रभाव:
- भू-राजस्व व्यवस्था: अंग्रेजों ने भू-राजस्व को नकद में वसूलना शुरू किया, जिससे किसानों को अपनी फसलें बाज़ार में बेचनी पड़ीं, भले ही उन्हें कम दाम मिले। इससे नकदी फसलों (जैसे कपास, नील) को बढ़ावा मिला।
- रेलवे और सड़क निर्माण: परिवहन के साधनों के विकास ने दूरदराज के क्षेत्रों को बाज़ारों से जोड़ा, जिससे वस्तुओं का आवागमन आसान हुआ और स्थानीय अर्थव्यवस्थाएँ राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों से जुड़ गईं।
- मुक्त व्यापार की नीति: ब्रिटेन ने भारत को अपने उद्योगों के लिए कच्चे माल का स्रोत और तैयार माल का बाज़ार बनाया, जिससे भारतीय हस्तशिल्प उद्योग को भारी नुकसान हुआ।
- नए बाज़ार और व्यापारिक नेटवर्क: औपनिवेशिक शासन ने नए व्यापारिक केंद्र और नेटवर्क बनाए, जिससे कुछ भारतीय व्यापारी (जैसे पारसी, सिंधी) भी लाभान्वित हुए, जो अंग्रेजों के साथ मिलकर व्यापार करते थे।
- भारतीय अर्थव्यवस्था का विरूपण: औपनिवेशिक नीतियों ने भारत की आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तोड़ दिया और इसे ब्रिटिश साम्राज्य की आवश्यकताओं के अनुरूप ढाल दिया।
5. उत्तर-औपनिवेशिक भारत में बाज़ार: उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG)
- आर्थिक सुधार (1991): भारत ने 1991 में आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जिसमें उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की नीतियाँ अपनाई गईं।
- उदारीकरण: सरकारी नियंत्रणों और प्रतिबंधों में कमी।
- निजीकरण: सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को निजी हाथों में सौंपना।
- वैश्वीकरण: भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण।
- उपभोक्तावाद का उदय: इन नीतियों के कारण बाज़ार में वस्तुओं और सेवाओं की बाढ़ आ गई, जिससे उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिला। विज्ञापन और मीडिया ने लोगों की आकांक्षाओं को बढ़ाया।
- बाज़ार का विस्तार:
- मॉल और सुपरमार्केट: बड़े शहरों में शॉपिंग मॉल और सुपरमार्केट का उदय हुआ, जिन्होंने पारंपरिक खुदरा दुकानों को चुनौती दी।
- ई-कॉमर्स: इंटरनेट और मोबाइल क्रांति ने ऑनलाइन शॉपिंग को बढ़ावा दिया, जिससे बाज़ार की पहुँच और भी व्यापक हो गई।
- छोटे व्यापारियों पर प्रभाव: बड़े कॉर्पोरेट और ई-कॉमर्स कंपनियों के आगमन से छोटे, स्थानीय दुकानदारों और व्यापारियों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
- ग्रामीण बाज़ारों पर शहरी बाज़ारों का प्रभाव: शहरी बाज़ारों की चमक और सुविधाओं ने ग्रामीण उपभोक्ताओं को आकर्षित किया, जिससे ग्रामीण बाज़ारों का महत्व कुछ हद तक कम हुआ।
6. वैश्वीकरण और बाज़ार
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ: वैश्वीकरण ने उत्पादों के निर्माण और वितरण को वैश्विक स्तर पर फैला दिया है। एक उत्पाद के विभिन्न हिस्से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बन सकते हैं।
- बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs): ये कंपनियाँ कई देशों में काम करती हैं और वैश्विक बाज़ारों को नियंत्रित करती हैं।
- स्थानीय संस्कृतियों पर प्रभाव: वैश्विक बाज़ार ने स्थानीय संस्कृतियों और उपभोग पैटर्न को प्रभावित किया है। वैश्विक ब्रांडों और उत्पादों की उपलब्धता ने स्थानीय उत्पादों को चुनौती दी है।
- श्रम बाज़ार पर प्रभाव: वैश्वीकरण ने नई तरह की नौकरियाँ पैदा की हैं (जैसे कॉल सेंटर, आईटी सेवाएँ) लेकिन साथ ही अनौपचारिक क्षेत्र में श्रमिकों की असुरक्षा को भी बढ़ाया है।
- असंगठित क्षेत्र: भारत में अधिकांश श्रमिक असंगठित क्षेत्र में हैं, जहाँ उन्हें सामाजिक सुरक्षा और उचित मजदूरी का अभाव है। वैश्वीकरण ने इस क्षेत्र की चुनौतियों को और बढ़ा दिया है।
7. बाज़ार और सामाजिक न्याय
- बाज़ार की दक्षता बनाम समानता: बाज़ार कुशल हो सकते हैं, लेकिन वे हमेशा न्यायपूर्ण या समान नहीं होते। बाज़ार उन लोगों को लाभ पहुँचाते हैं जिनके पास क्रय शक्ति है, जिससे गरीब और वंचित समूह पीछे छूट सकते हैं।
- सरकार की भूमिका: सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है।
- नियमन: बाज़ार को विनियमित करना ताकि एकाधिकार और अनुचित व्यापार प्रथाओं को रोका जा सके।
- सामाजिक सुरक्षा: गरीबों और वंचितों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ (जैसे मनरेगा, खाद्य सुरक्षा)।
- सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS): आवश्यक वस्तुओं को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराना।
- कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR): कंपनियों को अपने मुनाफे का एक हिस्सा सामाजिक और पर्यावरणीय कल्याण के लिए खर्च करना होता है। यह बाज़ार के सामाजिक प्रभावों को कम करने का एक प्रयास है।
8. महत्वपूर्ण अवधारणाएँ/शब्दावली
- साप्ताहिक बाज़ार: सप्ताह के एक निश्चित दिन लगने वाला बाज़ार, जो ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक मेलजोल का भी केंद्र होता है।
- जजमानी व्यवस्था: पारंपरिक भारतीय समाज में विभिन्न जातियों के बीच सेवाओं और वस्तुओं के विनिमय की व्यवस्था।
- व्यापारी जातियाँ: वे जातियाँ जो पारंपरिक रूप से व्यापार और साहूकारी के व्यवसाय में संलग्न थीं (जैसे मारवाड़ी, बनिया, चेत्तियार)।
- उदारीकरण: आर्थिक नीतियों में सरकारी नियंत्रणों और प्रतिबंधों को कम करना।
- निजीकरण: सरकारी स्वामित्व वाले उद्यमों को निजी क्षेत्र को बेचना या उनके प्रबंधन को निजी हाथों में सौंपना।
- वैश्वीकरण: अर्थव्यवस्थाओं, संस्कृतियों और समाजों का विश्व स्तर पर एकीकरण।
- उपभोक्तावाद: अधिक से अधिक वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने और उपभोग करने की प्रवृत्ति।
- कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR): कंपनियों का अपने व्यावसायिक कार्यों के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों के प्रति जवाबदेह होना।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से, बाज़ार को मुख्य रूप से क्या माना जाता है?
a) केवल वस्तुओं और सेवाओं के विनिमय का स्थान
b) एक जटिल सामाजिक संस्था
c) केवल आर्थिक सिद्धांतों पर आधारित एक प्रणाली
d) सरकार द्वारा नियंत्रित एक इकाई -
पारंपरिक भारतीय समाज में 'जजमानी व्यवस्था' का संबंध किससे था?
a) केवल वस्तुओं की खरीद-बिक्री से
b) विभिन्न जातियों के बीच सेवाओं और वस्तुओं के विनिमय से
c) साप्ताहिक बाज़ारों के प्रबंधन से
d) साहूकारी और ऋण देने से -
औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश सरकार द्वारा शुरू की गई किस नीति ने भारतीय किसानों को नकदी फसलें उगाने के लिए मजबूर किया?
a) रेलवे का विकास
b) भू-राजस्व का नकद में भुगतान
c) मुक्त व्यापार नीति
d) भारतीय हस्तशिल्प को बढ़ावा -
भारत में आर्थिक सुधारों (LPG) की शुरुआत किस वर्ष हुई?
a) 1947
b) 1965
c) 1991
d) 2001 -
LPG नीतियों के परिणामस्वरूप भारतीय समाज में किस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला?
a) आत्मनिर्भरता
b) उपभोक्तावाद
c) पारंपरिक उद्योगों का पुनरुत्थान
d) ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सशक्तिकरण -
'कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR)' का मुख्य उद्देश्य क्या है?
a) कंपनियों के मुनाफे को अधिकतम करना
b) कंपनियों द्वारा अपने व्यावसायिक कार्यों के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों के प्रति जवाबदेह होना
c) सरकारी नियमों से बचना
d) केवल विज्ञापन और प्रचार करना -
वैश्वीकरण का एक प्रमुख प्रभाव क्या है?
a) स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का अलगाव
b) वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का विकास
c) पारंपरिक व्यवसायों का पूर्ण उन्मूलन
d) सरकारी नियंत्रण में वृद्धि -
भारत में 'मारवाड़ी' और 'बनिया' जैसी जातियाँ पारंपरिक रूप से किस व्यवसाय से जुड़ी थीं?
a) कृषि
b) सैन्य सेवा
c) व्यापार और साहूकारी
d) हस्तशिल्प -
साप्ताहिक बाज़ार ग्रामीण क्षेत्रों में केवल आर्थिक विनिमय का स्थान नहीं होते, बल्कि वे किस चीज़ के केंद्र भी होते हैं?
a) राजनीतिक रैलियों के
b) सामाजिक मेलजोल और सामुदायिक संबंधों के
c) केवल मनोरंजन के
d) सरकारी कार्यालयों के -
निम्नलिखित में से कौन सा कथन बाज़ार और सामाजिक न्याय के संबंध में सही नहीं है?
a) बाज़ार कुशल हो सकते हैं, लेकिन वे हमेशा न्यायपूर्ण नहीं होते।
b) सरकार की भूमिका बाज़ार को विनियमित करने में महत्वपूर्ण है।
c) बाज़ार स्वाभाविक रूप से सभी के लिए समान अवसर प्रदान करते हैं।
d) सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) सामाजिक न्याय का एक साधन है।
उत्तर कुंजी:
- b
- b
- b
- c
- b
- b
- b
- c
- b
- c
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को गहराई से समझने और आपकी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। किसी भी अन्य प्रश्न या स्पष्टीकरण के लिए बेझिझक पूछें। शुभकामनाएँ!