Class 12 Sociology Notes Chapter 4 (ग्रामीण समाज में विकास एव परिवर्तन) – Bharat me Samajik Parivartan aur Vikas Book

Bharat me Samajik Parivartan aur Vikas
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम कक्षा 12 समाजशास्त्र की पुस्तक 'भारत में सामाजिक परिवर्तन और विकास' के अध्याय 4 'ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय ग्रामीण भारत में स्वतंत्रता के बाद हुए महत्वपूर्ण परिवर्तनों, विकास की प्रक्रियाओं और उनके सामाजिक परिणामों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए यह एक आधारभूत इकाई है, इसलिए प्रत्येक बिंदु को ध्यानपूर्वक समझें।


अध्याय 4: ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन

विषय-वस्तु:
यह अध्याय स्वतंत्रता के बाद भारतीय ग्रामीण समाज में हुए संरचनात्मक परिवर्तनों, विकास की नीतियों के प्रभावों और उनके सामाजिक परिणामों पर केंद्रित है। इसमें भूमि सुधार, हरित क्रांति, पंचायती राज जैसी प्रमुख पहलों और उनके द्वारा लाई गई चुनौतियों तथा अवसरों का विश्लेषण किया गया है।


विस्तृत नोट्स

1. स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण भारत में परिवर्तन की आवश्यकता

  • औपनिवेशिक विरासत: ब्रिटिश शासन ने भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया था। जमींदारी, रैयतवाड़ी और महलवाड़ी जैसी भू-राजस्व प्रणालियों ने किसानों का शोषण किया, कृषि को पिछड़ा बना दिया और ग्रामीण असमानता को बढ़ावा दिया।
  • स्वतंत्रता के बाद लक्ष्य: स्वतंत्र भारत का लक्ष्य ग्रामीण गरीबी को कम करना, कृषि उत्पादकता बढ़ाना, भूमि वितरण में समानता लाना और ग्रामीण समाजों को सशक्त बनाना था।

2. भूमि सुधार (Land Reforms)
भूमि सुधारों का मुख्य उद्देश्य कृषि उत्पादन को बढ़ाना, भूमि के स्वामित्व को न्यायसंगत बनाना और ग्रामीण समाज में असमानता को कम करना था।

  • अ. जमींदारी प्रथा का उन्मूलन (Abolition of Zamindari System):

    • उद्देश्य: बिचौलियों को समाप्त करना, भूमिहीन किसानों को भूमि का अधिकार देना।
    • परिणाम: लगभग 30 लाख जमींदारों से भूमि लेकर किसानों को दी गई। इसने ग्रामीण समाज में शक्ति संरचना को बदला, सदियों पुराने शोषणकारी तंत्र को समाप्त किया।
    • सीमाएँ: कुछ जमींदारों ने अपनी भूमि को 'स्वयं खेती' वाली भूमि बताकर बचा लिया। कानूनी दांव-पेंच और कमजोर कार्यान्वयन के कारण सभी भूमिहीनों को लाभ नहीं मिल पाया।
  • ब. काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms):

    • उद्देश्य: काश्तकारों को शोषण से बचाना, किराए को विनियमित करना, कार्यकाल की सुरक्षा प्रदान करना और उन्हें स्वामित्व अधिकार देना।
    • परिणाम: कुछ राज्यों (जैसे पश्चिम बंगाल में 'ऑपरेशन बर्गा') में काश्तकारों को महत्वपूर्ण अधिकार मिले।
    • सीमाएँ: कई राज्यों में काश्तकारी को गुप्त रखा गया ताकि भू-मालिकों को भूमि खोने का डर न हो। काश्तकारों को अपने अधिकारों के बारे में जानकारी का अभाव था।
  • स. जोत की अधिकतम सीमा (Ceiling on Landholdings):

    • उद्देश्य: एक व्यक्ति या परिवार द्वारा धारण की जा सकने वाली भूमि की अधिकतम सीमा निर्धारित करना, अतिरिक्त भूमि को भूमिहीनों में वितरित करना।
    • परिणाम: सैद्धांतिक रूप से यह एक क्रांतिकारी कदम था।
    • सीमाएँ:
      • कार्यान्वयन में बाधाएँ: भू-मालिकों ने भूमि को रिश्तेदारों के नाम पर स्थानांतरित करके या 'ट्रस्ट' बनाकर कानून से बचा लिया।
      • कानूनी चुनौतियाँ: अदालतों में लंबी कानूनी लड़ाइयाँ चलीं।
      • कम भूमि का पुनर्वितरण: बहुत कम अतिरिक्त भूमि वास्तव में भूमिहीनों को मिली।
  • द. चकबंदी (Consolidation of Landholdings):

    • उद्देश्य: किसानों की बिखरी हुई छोटी-छोटी जोतों को एक जगह इकट्ठा करना ताकि बड़े पैमाने पर खेती संभव हो सके और उत्पादकता बढ़े।
    • परिणाम: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यह काफी सफल रही।
    • सीमाएँ: अन्य राज्यों में धीमी प्रगति हुई, क्योंकि किसानों को अपनी उपजाऊ भूमि के बदले कम उपजाऊ भूमि मिलने का डर था।
  • य. सहकारी खेती (Cooperative Farming):

    • उद्देश्य: छोटे किसानों को एक साथ लाकर बड़े पैमाने पर खेती के लाभ उठाना।
    • परिणाम: भारत में इसकी सफलता सीमित रही, क्योंकि किसान अपनी व्यक्तिगत भूमि के स्वामित्व को छोड़ना नहीं चाहते थे।

3. हरित क्रांति (Green Revolution)
1960 के दशक के मध्य में शुरू हुई हरित क्रांति ने भारतीय कृषि में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए।

  • परिचय:

    • मुख्य घटक: उच्च उपज वाली किस्मों (HYV) के बीज (गेहूं और चावल), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, और सिंचाई के आधुनिक तरीके।
    • नेतृत्व: एम.एस. स्वामीनाथन को भारत में हरित क्रांति का जनक माना जाता है।
    • लक्ष्य: खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना।
  • सकारात्मक प्रभाव:

    • खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि: भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना, अकाल का खतरा कम हुआ।
    • किसानों की आय में वृद्धि: विशेषकर बड़े किसानों की आय बढ़ी।
    • कृषि का व्यावसायीकरण: कृषि एक व्यवसाय के रूप में उभरी।
    • ग्रामीण समृद्धि: पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में समृद्धि आई।
  • नकारात्मक प्रभाव (सामाजिक और आर्थिक):

    • क्षेत्रीय असमानता: केवल उन क्षेत्रों को लाभ हुआ जहाँ सिंचाई और अन्य बुनियादी ढाँचे उपलब्ध थे।
    • वर्ग असमानता: धनी किसानों को अधिक लाभ हुआ, जबकि छोटे और सीमांत किसान पीछे छूट गए, क्योंकि वे महंगे इनपुट (बीज, उर्वरक, मशीनरी) वहन नहीं कर सकते थे।
    • कृषि श्रमिकों पर प्रभाव: मशीनीकरण के कारण कुछ क्षेत्रों में कृषि श्रमिकों की मांग कम हुई, जिससे बेरोजगारी बढ़ी।
    • ऋणग्रस्तता: महंगे इनपुट और फसल खराब होने के जोखिम ने छोटे किसानों को ऋण के जाल में फँसा दिया।
    • पर्यावरणीय प्रभाव: भूजल स्तर में गिरावट, मिट्टी की उर्वरता में कमी, रासायनिक प्रदूषण।
    • सामाजिक तनाव: धनी और निर्धन किसानों के बीच असमानता बढ़ने से ग्रामीण समाज में तनाव बढ़ा।

4. ग्रामीण समाज में सामाजिक संरचना और स्तरीकरण
भूमि सुधार और हरित क्रांति ने ग्रामीण समाज की जाति, वर्ग और शक्ति संरचना को प्रभावित किया।

  • जाति और वर्ग का अंतर्संबंध: पारंपरिक रूप से, उच्च जातियाँ भूमि की मालिक थीं और निम्न जातियाँ भूमिहीन मजदूर थीं। भूमि सुधारों ने इस संबंध को थोड़ा बदला, लेकिन जातिगत असमानता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
  • कृषि मजदूर:
    • भारत में कृषि श्रमिकों की संख्या बहुत अधिक है (कुल कार्यबल का लगभग 26%)।
    • इनमें से अधिकांश भूमिहीन हैं, अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों से आते हैं।
    • वे अक्सर कम मजदूरी, असुरक्षित रोजगार और शोषण का सामना करते हैं।
    • हरित क्रांति ने कुछ क्षेत्रों में उनकी मजदूरी बढ़ाई, लेकिन मशीनीकरण ने रोजगार के अवसरों को कम भी किया।
  • गैर-कृषि कार्य:
    • कृषि पर निर्भरता कम करने और आय के स्रोतों में विविधता लाने के लिए गैर-कृषि कार्यों (जैसे हस्तशिल्प, छोटे उद्योग, सेवाएँ) का महत्व बढ़ा है।
    • मनरेगा (MGNREGA) जैसी योजनाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर प्रदान करती हैं।

5. ग्रामीण भारत में वैश्वीकरण और उदारीकरण का प्रभाव
1990 के दशक के बाद आर्थिक सुधारों और वैश्वीकरण ने ग्रामीण भारत पर गहरा प्रभाव डाला है।

  • कृषि संकट:
    • वैश्विक बाजारों से प्रतिस्पर्धा, इनपुट लागत में वृद्धि, सरकारी समर्थन में कमी और जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय कृषि संकट से जूझ रही है।
    • किसानों की आत्महत्याएँ (विशेषकर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक में) इस संकट का एक गंभीर परिणाम हैं।
  • विस्थापन और पलायन (Displacement and Migration):
    • कृषि संकट, भूमि अधिग्रहण (विकास परियोजनाओं के लिए), और बेहतर अवसरों की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा है।
    • यह ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ पैदा करता है।
  • ग्रामीण-शहरी संबंध:
    • ग्रामीण और शहरी क्षेत्र अब पहले से कहीं अधिक जुड़े हुए हैं।
    • शहरों में काम करने वाले ग्रामीण लोग अपने गाँवों में पैसा भेजते हैं (प्रेषण), जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मदद मिलती है।

6. पंचायती राज संस्थाएँ (Panchayati Raj Institutions - PRIs)
स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने के लिए पंचायती राज व्यवस्था एक महत्वपूर्ण कदम था।

  • 73वां संविधान संशोधन (1992):
    • पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
    • नियमित चुनाव, महिलाओं के लिए 33% आरक्षण (कई राज्यों में 50%), अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण अनिवार्य किया गया।
    • वित्त आयोग का गठन और राज्य चुनाव आयोग की स्थापना।
    • ग्राम सभा को निर्णय लेने का अधिकार दिया गया।
  • प्रभाव:
    • सशक्तिकरण: स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी बढ़ी, विशेषकर महिलाओं और हाशिए पर पड़े समुदायों की।
    • नेतृत्व का उदय: नए स्थानीय नेताओं का उदय हुआ।
    • विकास में भागीदारी: स्थानीय विकास योजनाओं में लोगों की भागीदारी बढ़ी।
  • चुनौतियाँ:
    • अभिजात वर्ग का प्रभुत्व: कुछ स्थानों पर अभी भी स्थानीय अभिजात वर्ग का प्रभुत्व है।
    • संसाधनों का अभाव: पंचायतों के पास पर्याप्त वित्तीय और मानव संसाधनों की कमी।
    • राज्य सरकारों पर निर्भरता: कई मामलों में राज्य सरकारों पर अत्यधिक निर्भरता।
    • पैटर्नलिज्म: कुछ मामलों में महिला और दलित प्रतिनिधियों को उनके पुरुष या उच्च जाति के रिश्तेदारों द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

7. ग्रामीण आजीविका और चुनौतियाँ

  • कृषि पर अत्यधिक निर्भरता: कृषि अभी भी अधिकांश ग्रामीण परिवारों की आजीविका का मुख्य स्रोत है, लेकिन इसकी अस्थिरता और कम लाभप्रदता एक बड़ी चुनौती है।
  • मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005):
    • ग्रामीण परिवारों को वर्ष में 100 दिन का गारंटीशुदा रोजगार प्रदान करता है।
    • ग्रामीण गरीबी और पलायन को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • सूक्ष्म वित्त (Microfinance):
    • छोटे ऋण और वित्तीय सेवाएँ प्रदान करके ग्रामीण गरीबों, विशेषकर महिलाओं को सशक्त बनाता है।
    • स्वयं सहायता समूह (SHGs) इसके मुख्य माध्यम हैं।

निष्कर्ष:
भारतीय ग्रामीण समाज निरंतर परिवर्तन और विकास की प्रक्रिया से गुजर रहा है। भूमि सुधारों और हरित क्रांति ने कृषि उत्पादन में वृद्धि की, लेकिन साथ ही क्षेत्रीय और वर्ग असमानताओं को भी जन्म दिया। वैश्वीकरण और उदारीकरण ने नई चुनौतियाँ पेश की हैं, जबकि पंचायती राज जैसी संस्थाएँ स्थानीय सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। ग्रामीण भारत की जटिलताओं को समझने के लिए इन सभी कारकों का समग्र विश्लेषण आवश्यक है।


बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

  1. भारत में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन कब किया गया था?
    अ) 1947
    ब) 1950 के दशक की शुरुआत में
    स) 1960 के दशक के अंत में
    द) 1970 के दशक की शुरुआत में
    सही उत्तर: ब) 1950 के दशक की शुरुआत में

  2. 'ऑपरेशन बर्गा' का संबंध किस राज्य से है और यह किससे संबंधित था?
    अ) पंजाब; चकबंदी
    ब) पश्चिम बंगाल; काश्तकारी सुधार
    स) उत्तर प्रदेश; जमींदारी उन्मूलन
    द) बिहार; सहकारी खेती
    सही उत्तर: ब) पश्चिम बंगाल; काश्तकारी सुधार

  3. भारत में हरित क्रांति के जनक के रूप में किसे जाना जाता है?
    अ) वर्गीज कुरियन
    ब) एम.एस. स्वामीनाथन
    स) सी. रंगराजन
    द) मनमोहन सिंह
    सही उत्तर: ब) एम.एस. स्वामीनाथन

  4. हरित क्रांति का मुख्य नकारात्मक सामाजिक परिणाम क्या था?
    अ) खाद्यान्न उत्पादन में कमी
    ब) ग्रामीण क्षेत्रों में क्षेत्रीय और वर्ग असमानता में वृद्धि
    स) भूमिहीन मजदूरों की संख्या में कमी
    द) कृषि में मशीनीकरण का पूर्ण अभाव
    सही उत्तर: ब) ग्रामीण क्षेत्रों में क्षेत्रीय और वर्ग असमानता में वृद्धि

  5. भारतीय संविधान का कौन सा संशोधन पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देता है?
    अ) 42वां संशोधन
    ब) 61वां संशोधन
    स) 73वां संशोधन
    द) 86वां संशोधन
    सही उत्तर: स) 73वां संशोधन

  6. 73वें संविधान संशोधन के तहत पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए न्यूनतम कितने प्रतिशत सीटें आरक्षित की गई हैं?
    अ) 25%
    ब) 33%
    स) 40%
    द) 50%
    सही उत्तर: ब) 33% (हालांकि कई राज्यों ने इसे 50% तक बढ़ा दिया है, संवैधानिक न्यूनतम 33% है)

  7. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
    अ) ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि ऋण प्रदान करना
    ब) ग्रामीण परिवारों को 100 दिन का गारंटीशुदा रोजगार प्रदान करना
    स) शहरी क्षेत्रों में कौशल विकास को बढ़ावा देना
    द) ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देना
    सही उत्तर: ब) ग्रामीण परिवारों को 100 दिन का गारंटीशुदा रोजगार प्रदान करना

  8. चकबंदी का प्राथमिक उद्देश्य क्या था?
    अ) भूमिहीन किसानों को भूमि वितरित करना
    ब) किसानों की बिखरी हुई जोतों को एक जगह इकट्ठा करना
    स) जमींदारी प्रथा को समाप्त करना
    द) कृषि उत्पादन पर अधिकतम सीमा लगाना
    सही उत्तर: ब) किसानों की बिखरी हुई जोतों को एक जगह इकट्ठा करना

  9. हरित क्रांति के संदर्भ में 'HYV' का पूर्ण रूप क्या है?
    अ) उच्च उपज वाली सब्जियाँ (High Yielding Vegetables)
    ब) उच्च उपज वाली किस्में (High Yielding Varieties)
    स) अत्यधिक युवा किसान (Highly Young Villagers)
    द) भारी उपज वाली फसलें (Heavy Yielding Crops)
    सही उत्तर: ब) उच्च उपज वाली किस्में (High Yielding Varieties)

  10. ग्रामीण भारत में वैश्वीकरण और उदारीकरण के प्रमुख प्रभावों में से एक क्या है?
    अ) कृषि उत्पादन में लगातार वृद्धि और किसानों की आय में स्थिरता
    ब) कृषि संकट और किसानों की बढ़ती ऋणग्रस्तता
    स) ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन में कमी
    द) केवल बड़े किसानों को लाभ और छोटे किसानों की समृद्धि
    सही उत्तर: ब) कृषि संकट और किसानों की बढ़ती ऋणग्रस्तता


मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को गहराई से समझने और अपनी परीक्षाओं की तैयारी में मदद करेंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें। शुभकामनाएँ!

Read more