Class 12 Sociology Notes Chapter 5 (औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास) – Bharat me Samajik Parivartan aur Vikas Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम कक्षा 12 समाजशास्त्र की पुस्तक 'भारत में सामाजिक परिवर्तन और विकास' के अध्याय 5 'औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत के औद्योगिक विकास, उसके सामाजिक प्रभावों और इससे जुड़े प्रमुख परिवर्तनों को गहराई से समझाता है।
अध्याय 5: औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास
1. परिचय: औद्योगिकीकरण और भारत
- औद्योगिकीकरण की परिभाषा: औद्योगिकीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें किसी समाज में उत्पादन के तरीके हस्तशिल्प और कृषि से हटकर बड़े पैमाने पर मशीनों और कारखानों पर आधारित हो जाते हैं। यह न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तनों को भी जन्म देता है।
- वैश्विक संदर्भ: पश्चिमी देशों में औद्योगिक क्रांति (18वीं-19वीं शताब्दी) ने बड़े पैमाने पर उत्पादन, शहरीकरण और नए सामाजिक वर्गों (पूंजीपति, मजदूर) को जन्म दिया।
- भारत में औद्योगिकीकरण का आगमन: भारत में औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया पश्चिमी देशों से भिन्न थी। यह औपनिवेशिक शासन के तहत शुरू हुई, जिसके अपने विशिष्ट प्रभाव थे।
2. औद्योगिकीकरण का भारत में आगमन और औपनिवेशिक प्रभाव
- वि-औद्योगिकीकरण (De-industrialization):
- ब्रिटिश उपनिवेशवाद का मुख्य उद्देश्य भारत को कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता और तैयार माल का बाजार बनाना था।
- ब्रिटेन में बनी सस्ती मशीन-निर्मित वस्तुओं ने भारतीय हस्तशिल्प और पारंपरिक उद्योगों को बुरी तरह प्रभावित किया।
- भारतीय कारीगरों और दस्तकारों को भारी नुकसान हुआ, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी बढ़ी और उन्हें आजीविका के लिए कृषि पर अधिक निर्भर रहना पड़ा। यह प्रक्रिया 'वि-औद्योगिकीकरण' कहलाई।
- आधुनिक उद्योगों का उदय:
- रेलवे: 1853 में भारत में पहली रेलवे लाइन बिछाई गई। रेलवे का विकास ब्रिटिश हितों (कच्चे माल का परिवहन, सेना की आवाजाही) के लिए हुआ, लेकिन इसने आंतरिक बाजार को जोड़ने और कुछ हद तक औद्योगिक विकास को गति देने में भी मदद की।
- कपास मिलें: पहली आधुनिक कपास मिल 1854 में मुंबई में स्थापित हुई। ये मिलें मुख्य रूप से भारतीय पूंजीपतियों द्वारा स्थापित की गईं।
- जूट मिलें: पहली जूट मिल 1855 में रिशरा (बंगाल) में स्थापित हुई, जो मुख्य रूप से ब्रिटिश पूंजीपतियों द्वारा नियंत्रित थी।
- इस्पात उद्योग: जमशेदजी टाटा ने 1907 में जमशेदपुर में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना की, जो भारत के आधुनिक औद्योगिक विकास में एक मील का पत्थर साबित हुई।
- भारतीय उद्यमी:
- जमशेदजी टाटा, सेठ हुकुमचंद, बिड़ला और वालचंद हीराचंद जैसे भारतीय व्यापारियों ने शुरुआती दौर में कपड़ा, जूट और इस्पात जैसे उद्योगों में निवेश किया।
- स्वदेशी आंदोलन (1905-1908) ने भारतीय उद्योगों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
3. औद्योगिक समाज में श्रम
- श्रम का विस्थापन और प्रवास:
- औद्योगिकीकरण ने ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर बड़े पैमाने पर प्रवास को बढ़ावा दिया। कृषि संकट, वि-औद्योगिकीकरण और बेहतर आजीविका की तलाश में लोग शहरों की ओर पलायन करने लगे।
- शुरुआत में, कारखानों में भर्ती ठेकेदारों (जॉबर) के माध्यम से होती थी, जो मजदूरों का शोषण करते थे।
- कार्य की स्थितियाँ:
- प्रारंभिक औद्योगिक इकाइयों में काम करने की स्थितियाँ अत्यंत खराब थीं: लंबी कार्य अवधि (12-16 घंटे), अस्वच्छ और असुरक्षित वातावरण, कम मजदूरी, बाल श्रम और महिला श्रमिकों का शोषण आम था।
- मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा (पेंशन, बीमा) का कोई लाभ नहीं मिलता था।
- औद्योगिक विवाद और ट्रेड यूनियन:
- मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया। 19वीं सदी के अंत में छोटे-मोटे विरोध और हड़तालें शुरू हुईं।
- अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC): 1920 में स्थापित, यह भारत का पहला राष्ट्रीय स्तर का ट्रेड यूनियन था।
- ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926: इस अधिनियम ने ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता दी और उनके अधिकारों को परिभाषित किया।
- वैज्ञानिक प्रबंधन और फोर्डवाद:
- फ्रेडरिक विंस्लो टेलर (वैज्ञानिक प्रबंधन): उन्होंने 'समय और गति अध्ययन' (Time and Motion Study) का विचार दिया, जिसका उद्देश्य कार्य प्रक्रियाओं को मानकीकृत करके और श्रमिकों को विशिष्ट कार्यों में विशेषज्ञता देकर दक्षता बढ़ाना था।
- हेनरी फोर्ड (फोर्डवाद): उन्होंने असेंबली लाइन (Assembly Line) का उपयोग करके बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Production) की अवधारणा विकसित की। इसमें प्रत्येक श्रमिक एक छोटे, दोहराए जाने वाले कार्य को करता था, जिससे उत्पादन की गति बढ़ती थी। फोर्ड ने अपने श्रमिकों को बेहतर मजदूरी भी दी ताकि वे उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं को खरीद सकें।
4. स्वतंत्रता के बाद औद्योगिकीकरण
- मिश्रित अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक क्षेत्र:
- स्वतंत्रता के बाद, भारत ने 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' का मॉडल अपनाया, जिसमें सार्वजनिक (सरकारी) और निजी दोनों क्षेत्रों को सह-अस्तित्व में रहने की अनुमति दी गई।
- जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में, भारत ने भारी उद्योगों (जैसे इस्पात, मशीनरी, बिजली उत्पादन) पर जोर दिया और सार्वजनिक क्षेत्र को अर्थव्यवस्था के 'कमांडिंग हाइट्स' (Commanding Heights) के रूप में देखा।
- पंचवर्षीय योजनाओं (विशेषकर दूसरी पंचवर्षीय योजना) के माध्यम से औद्योगिक विकास को गति दी गई।
- सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख उपक्रमों में भेल (BHEL), सेल (SAIL), ओएनजीसी (ONGC) आदि शामिल थे।
- हरित क्रांति का प्रभाव:
- 1960 के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति ने कृषि में मशीनीकरण को बढ़ावा दिया। ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और ट्यूबवेल के उपयोग से कृषि उत्पादन बढ़ा, लेकिन इसने ग्रामीण श्रम के विस्थापन को भी जन्म दिया, जिससे कई लोग शहरी उद्योगों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए।
5. उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) - 1991 के बाद
- पृष्ठभूमि: 1990 के दशक की शुरुआत में भारत को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा, जिसके कारण सरकार ने बड़े आर्थिक सुधारों की घोषणा की।
- उदारीकरण (Liberalization):
- सरकार ने उद्योगों पर से नियंत्रण और नियमों को कम किया। लाइसेंस राज को समाप्त किया गया, जिससे उद्योगों के लिए स्थापित होना और विस्तार करना आसान हो गया।
- विदेशी निवेश और व्यापार को बढ़ावा दिया गया।
- निजीकरण (Privatization):
- सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को निजी क्षेत्र को बेचा गया (विनिवेश)। इसका उद्देश्य दक्षता बढ़ाना और सरकारी खजाने को भरना था।
- वैश्वीकरण (Globalization):
- भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत किया गया।
- बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) को भारत में निवेश करने और व्यापार करने की अनुमति मिली।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में वृद्धि हुई।
- श्रम पर प्रभाव:
- अनौपचारिककरण (Casualization): स्थायी नौकरियों की जगह अस्थायी और ठेका आधारित नौकरियों में वृद्धि हुई।
- ठेका श्रम (Contract Labor): कंपनियों ने सीधे श्रमिकों को नियुक्त करने के बजाय ठेकेदारों के माध्यम से श्रम लेना शुरू कर दिया, जिससे श्रमिकों की सुरक्षा और अधिकार कम हो गए।
- आउटसोर्सिंग (Outsourcing): गैर-मुख्य कार्यों (जैसे ग्राहक सेवा, लेखा) को बाहरी कंपनियों को सौंपना, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा हुए लेकिन अक्सर कम वेतन और असुरक्षित शर्तों पर।
- नौकरी की असुरक्षा: उदारीकरण के बाद श्रमिकों को नौकरी से निकाले जाने का डर बढ़ गया, क्योंकि कंपनियों को लागत कम करने के लिए लचीलेपन की आवश्यकता थी।
- विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZs - Special Economic Zones):
- निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित किए गए। इन क्षेत्रों में उद्योगों को विशेष प्रोत्साहन और श्रम कानूनों में कुछ छूट दी जाती है, जिससे अक्सर श्रमिकों के अधिकारों का उल्लंघन होता है।
6. अनौपचारिक क्षेत्र (असंगठित क्षेत्र)
- परिभाषा: अनौपचारिक क्षेत्र में वे सभी उद्यम और रोजगार शामिल होते हैं जो सरकार के नियंत्रण से बाहर होते हैं, श्रम कानूनों का पालन नहीं करते, और श्रमिकों को कोई सामाजिक सुरक्षा या लाभ प्रदान नहीं करते।
- विशेषताएँ:
- छोटे पैमाने के उद्यम।
- कम पूंजी निवेश।
- पारिवारिक श्रम का उपयोग।
- सरकारी नियमों और कानूनों का अभाव या उनका पालन न होना।
- असुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ, कम मजदूरी, कोई निश्चित कार्य अवधि नहीं।
- उदाहरण: निर्माण श्रमिक, घरेलू कामगार, छोटे दुकानदार, फेरीवाले, रिक्शा चालक, कृषि मजदूर।
- समस्याएँ: इस क्षेत्र के श्रमिक अत्यधिक शोषण का शिकार होते हैं, उन्हें न्यूनतम मजदूरी, स्वास्थ्य सुविधाएं, पेंशन या बीमा जैसे लाभ नहीं मिलते। वे सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर होते हैं।
- भोपाल गैस त्रासदी (1984): यह भारत के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी थी, जब यूनियन कार्बाइड के कीटनाशक संयंत्र से जहरीली गैस (मिथाइल आइसोसाइनेट) का रिसाव हुआ, जिससे हजारों लोग मारे गए और लाखों प्रभावित हुए। यह घटना औद्योगिक सुरक्षा और श्रमिकों के अधिकारों की उपेक्षा का एक भयावह उदाहरण थी।
7. निष्कर्ष
भारत में औद्योगिकीकरण की यात्रा उपनिवेशवाद के प्रभाव से शुरू होकर स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार और फिर 1991 के बाद उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के दौर से गुजरी है। इस प्रक्रिया ने आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया है, लेकिन साथ ही इसने श्रम के अनौपचारिककरण, शहरीकरण, पर्यावरणीय चुनौतियों और सामाजिक असमानताओं को भी जन्म दिया है। औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास की यह प्रक्रिया आज भी जारी है, जिसमें श्रमिकों के अधिकारों और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण चुनौती है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
भारत में पहली आधुनिक कपास मिल किस वर्ष और कहाँ स्थापित हुई थी?
a) 1853, कलकत्ता
b) 1854, मुंबई
c) 1907, जमशेदपुर
d) 1855, रिशरा -
'वि-औद्योगिकीकरण' का मुख्य कारण क्या था?
a) भारतीय पूंजीपतियों की कमी
b) ब्रिटिश उपनिवेशवाद और मशीन-निर्मित वस्तुओं का आयात
c) भारतीय श्रमिकों की अक्षमता
d) कच्चे माल की कमी -
टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना जमशेदजी टाटा द्वारा किस वर्ष की गई थी?
a) 1854
b) 1905
c) 1907
d) 1920 -
अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
a) 1907
b) 1919
c) 1920
d) 1926 -
'समय और गति अध्ययन' (Time and Motion Study) की अवधारणा किसने विकसित की थी, जो वैज्ञानिक प्रबंधन से संबंधित है?
a) हेनरी फोर्ड
b) फ्रेडरिक विंस्लो टेलर
c) कार्ल मार्क्स
d) मैक्स वेबर -
स्वतंत्रता के बाद भारत ने औद्योगिक विकास के लिए किस आर्थिक मॉडल को अपनाया?
a) पूंजीवादी मॉडल
b) समाजवादी मॉडल
c) मिश्रित अर्थव्यवस्था मॉडल
d) साम्यवादी मॉडल -
1991 के आर्थिक सुधारों का मुख्य उद्देश्य क्या था?
a) सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार
b) लाइसेंस राज को मजबूत करना
c) उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण को बढ़ावा देना
d) केवल कृषि क्षेत्र का विकास करना -
अनौपचारिक क्षेत्र (असंगठित क्षेत्र) की प्रमुख विशेषता क्या है?
a) सरकारी नियमों का कड़ाई से पालन
b) श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा लाभ प्रदान करना
c) छोटे पैमाने के उद्यम और श्रम कानूनों का अभाव
d) उच्च वेतन और निश्चित कार्य अवधि -
भोपाल गैस त्रासदी किस वर्ष हुई थी और यह किस कंपनी से संबंधित थी?
a) 1980, रिलायंस इंडस्ट्रीज
b) 1984, यूनियन कार्बाइड
c) 1991, टाटा केमिकल्स
d) 1978, भेल -
उदारीकरण के बाद भारतीय श्रम बाजार में किस प्रवृत्ति में वृद्धि हुई है?
a) स्थायी और संगठित नौकरियों में वृद्धि
b) ठेका श्रम और अनौपचारिककरण (Casualization) में कमी
c) ठेका श्रम और अनौपचारिककरण (Casualization) में वृद्धि
d) सरकारी नौकरियों में भारी वृद्धि
उत्तरमाला:
- b
- b
- c
- c
- b
- c
- c
- c
- b
- c
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को गहराई से समझने और सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें।