Class 12 Sociology Notes Chapter 6 (सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ) – Bharatiya Samaj Book

Bharatiya Samaj
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम कक्षा 12 समाजशास्त्र की पुस्तक 'भारतीय समाज' के अध्याय 6, 'सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ' पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत की सामाजिक संरचना और उससे जुड़ी समकालीन चुनौतियों को समझने में मदद करता है। हम इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को गहराई से समझेंगे और अंत में, आपकी समझ को परखने के लिए 10 बहुविकल्पीय प्रश्न भी देंगे।


अध्याय 6: सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

1. परिचय: विविधता और सामुदायिक पहचान
भारत एक अत्यंत विविध देश है, जहाँ धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र और संस्कृति के आधार पर व्यापक भिन्नताएँ पाई जाती हैं। यह विविधता केवल अंतर नहीं है, बल्कि अक्सर इसमें असमानताएँ और पदानुक्रम भी शामिल होते हैं।

  • सामुदायिक पहचान: भारत में सामुदायिक पहचान (जैसे धार्मिक, भाषाई, जातीय) व्यक्तियों के लिए एक महत्वपूर्ण पहचान का स्रोत होती है। ये पहचानें आमतौर पर जन्म से प्राप्त होती हैं और व्यक्ति के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन को प्रभावित करती हैं।
  • राष्ट्र-राज्य की चुनौती: आधुनिक राष्ट्र-राज्य अक्सर एक साझा संस्कृति, भाषा और इतिहास पर आधारित होते हैं। लेकिन भारत जैसे अत्यधिक विविध देश में, राष्ट्र-राज्य को विभिन्न सामुदायिक पहचानों को समायोजित करना और उन्हें राष्ट्रीय पहचान के साथ जोड़ना एक बड़ी चुनौती है।

2. भारत में विविधता की प्रकृति
भारत में विविधता बहुआयामी है:

  • भाषाई विविधता: भारत में 22 अनुसूचित भाषाएँ और सैकड़ों बोलियाँ हैं। भाषाई विविधता ने भाषाई राज्यों के गठन को जन्म दिया, जिससे क्षेत्रीय पहचानें मजबूत हुईं।
  • धार्मिक विविधता: भारत दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों (हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी) का घर है। यह धार्मिक सहिष्णुता और कभी-कभी सांप्रदायिक तनाव दोनों का अनुभव करता है।
  • जातीय और क्षेत्रीय विविधता: विभिन्न जातीय समूह, जनजातियाँ और भौगोलिक क्षेत्र अपनी विशिष्ट संस्कृतियों, परंपराओं और जीवन शैली के साथ मौजूद हैं।

3. विविधता से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ

क. सांप्रदायिकता (Communalism)

  • अर्थ: सांप्रदायिकता का अर्थ है एक धार्मिक समुदाय के हितों को दूसरे धार्मिक समुदाय के हितों के विरुद्ध मानना। यह धार्मिक पहचान को राजनीतिक पहचान में बदल देती है और अक्सर धार्मिक आधार पर घृणा और हिंसा को बढ़ावा देती है।
  • विशेषताएँ:
    • एक धार्मिक समूह के सदस्यों के बीच एकजुटता और दूसरे समूहों के प्रति शत्रुता।
    • अक्सर राजनीतिक लामबंदी और शक्ति के लिए धर्म का उपयोग।
    • आधुनिक राष्ट्र-राज्य के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के विपरीत।
  • सांप्रदायिकता के रूप:
    1. रोजमर्रा का सांप्रदायिकता: सामान्य रूढ़िवादिता और पूर्वाग्रह जो हमारे दैनिक जीवन में व्याप्त होते हैं।
    2. उदारवादी सांप्रदायिकता: धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक गोलबंदी, जो प्रत्यक्ष हिंसा को बढ़ावा नहीं देती लेकिन भेदभाव को जन्म दे सकती है।
    3. चरमपंथी सांप्रदायिकता: धार्मिक पहचान के आधार पर घृणा और हिंसा को बढ़ावा देना, जिसका परिणाम दंगे और नरसंहार हो सकता है।
  • परिणाम: सांप्रदायिक दंगे, सामाजिक विभाजन, राष्ट्रीय एकता को खतरा, अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना।

ख. क्षेत्रवाद (Regionalism)

  • अर्थ: क्षेत्रवाद का अर्थ है किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र के लोगों में अपने क्षेत्र के प्रति विशेष लगाव, पहचान और वफादारी की भावना। इसमें अक्सर अपने क्षेत्र के हितों को राष्ट्रीय हितों से ऊपर रखना शामिल होता है।
  • विशेषताएँ:
    • भाषाई, सांस्कृतिक, आर्थिक या ऐतिहासिक आधार पर विकसित हो सकता है।
    • अपने क्षेत्र के लिए अधिक स्वायत्तता, संसाधनों में हिस्सेदारी या अलग राज्य की मांग कर सकता है।
  • क्षेत्रवाद के कारण:
    • आर्थिक असमानताएँ: किसी क्षेत्र का आर्थिक रूप से पिछड़ा होना या संसाधनों के वितरण में असमानता।
    • भाषाई और सांस्कृतिक विशिष्टताएँ: एक अलग भाषा या संस्कृति वाले लोगों में अपनी पहचान बनाए रखने की इच्छा।
    • ऐतिहासिक अनुभव: उपनिवेशवाद या केंद्रीय सत्ता के साथ संघर्ष का इतिहास।
    • राजनीतिक लामबंदी: क्षेत्रीय नेताओं द्वारा लोगों की भावनाओं को भड़काना।
  • परिणाम: नए राज्यों की मांग (जैसे तेलंगाना), अंतर-राज्यीय विवाद (जैसे नदी जल विवाद), अलगाववादी आंदोलन (जैसे पूर्वोत्तर में), राष्ट्रीय एकता को चुनौती।
  • सकारात्मक पहलू: स्थानीय पहचान, संस्कृति और भाषा का संरक्षण, स्थानीय विकास पर ध्यान।

ग. अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक (Minority and Majority)

  • अल्पसंख्यक: संख्यात्मक रूप से कम होने के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक रूप से भी कमजोर समूह।
  • बहुसंख्यक: संख्यात्मक रूप से अधिक और अक्सर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से हावी समूह।
  • चुनौती: लोकतांत्रिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण और उनकी विशिष्ट पहचान को बनाए रखना। बहुसंख्यकवाद की प्रवृत्ति अल्पसंख्यकों के लिए खतरा पैदा कर सकती है।
  • संवैधानिक प्रावधान: भारतीय संविधान अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार देता है (जैसे अनुच्छेद 29 और 30, जो उन्हें अपनी भाषा, संस्कृति और शैक्षिक संस्थाओं को बनाए रखने का अधिकार देते हैं)।

4. राज्य की भूमिका और लोकतंत्र

  • धर्मनिरपेक्षता: भारतीय राज्य धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है और वह सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान रखता है।
    • पश्चिमी मॉडल: राज्य और धर्म का पूर्ण अलगाव।
    • भारतीय मॉडल: राज्य और धर्म के बीच सैद्धांतिक दूरी, लेकिन राज्य सामाजिक सुधारों (जैसे अस्पृश्यता उन्मूलन) या सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए धर्म के मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है।
  • कानून और व्यवस्था: राज्य की जिम्मेदारी है कि वह सांप्रदायिक और क्षेत्रीय संघर्षों को रोके, कानून और व्यवस्था बनाए रखे और सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे।
  • समावेशी विकास: राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विकास के लाभ सभी क्षेत्रों और समुदायों तक पहुँचें, ताकि क्षेत्रीय और आर्थिक असमानताएँ कम हों।

5. पहचान की राजनीति (Politics of Identity)

  • यह वह प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान (धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र) के आधार पर राजनीतिक रूप से संगठित होते हैं और अपने अधिकारों, संसाधनों और प्रतिनिधित्व की मांग करते हैं।
  • यह लोकतंत्र में समुदायों को अपनी आवाज उठाने का अवसर देती है, लेकिन यह विभाजनकारी भी हो सकती है यदि यह केवल संकीर्ण सामुदायिक हितों पर केंद्रित हो।

6. वैश्वीकरण और सांस्कृतिक पहचान

  • प्रभाव: वैश्वीकरण के कारण विभिन्न संस्कृतियों के बीच संपर्क बढ़ा है। इससे एक ओर सांस्कृतिक समरूपता (globalization of culture) का खतरा पैदा होता है, जहाँ स्थानीय संस्कृतियाँ वैश्विक संस्कृति से प्रभावित होकर अपनी विशिष्टता खो सकती हैं।
  • प्रतिक्रिया: दूसरी ओर, वैश्वीकरण ने स्थानीय पहचानों को मजबूत करने और उन्हें वैश्विक मंच पर लाने का अवसर भी प्रदान किया है। लोग अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रखने के लिए अधिक जागरूक और सक्रिय हो रहे हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

  1. भारत में भाषाई विविधता का एक प्रमुख परिणाम क्या रहा है?
    a) सांप्रदायिक दंगे
    b) नए राज्यों का गठन
    c) आर्थिक असमानता
    d) जातिगत भेदभाव

  2. सांप्रदायिकता का मूल अर्थ क्या है?
    a) विभिन्न धर्मों के प्रति सहिष्णुता
    b) एक धार्मिक समुदाय के हितों को दूसरे के विरुद्ध मानना
    c) सभी धर्मों का समान सम्मान
    d) धर्म को राजनीति से अलग रखना

  3. भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद अल्पसंख्यकों को अपनी शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार देता है?
    a) अनुच्छेद 14
    b) अनुच्छेद 21
    c) अनुच्छेद 29 और 30
    d) अनुच्छेद 32

  4. क्षेत्रवाद मुख्यतः किस पर आधारित होता है?
    a) धार्मिक पहचान
    b) आर्थिक असमानता और भाषाई/सांस्कृतिक विशिष्टता
    c) जातिगत भेदभाव
    d) राष्ट्रीय गौरव

  5. धर्मनिरपेक्षता के भारतीय मॉडल की एक प्रमुख विशेषता क्या है?
    a) राज्य और धर्म का पूर्ण अलगाव
    b) राज्य का किसी एक धर्म को बढ़ावा देना
    c) राज्य का धर्म के मामलों में हस्तक्षेप न करना
    d) राज्य का सभी धर्मों के प्रति सैद्धांतिक दूरी बनाए रखना और आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप करना

  6. 'पहचान की राजनीति' से क्या तात्पर्य है?
    a) व्यक्तिगत पहचान को बढ़ावा देना
    b) किसी समुदाय की विशिष्ट पहचान के आधार पर राजनीतिक लामबंदी
    c) राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करना
    d) धार्मिक पहचान को अस्वीकार करना

  7. भारत में विविधता केवल अंतर नहीं है, बल्कि यह ____ और ____ भी है।
    a) समानता और सहयोग
    b) असमानता और पदानुक्रम
    c) संघर्ष और शांति
    d) विकास और स्थिरता

  8. निम्नलिखित में से कौन सांप्रदायिकता का एक रूप नहीं है?
    a) रोजमर्रा का सांप्रदायिकता
    b) उदारवादी सांप्रदायिकता
    c) धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिकता
    d) चरमपंथी सांप्रदायिकता

  9. भारत में भाषाई राज्यों का गठन मुख्य रूप से किस दशक में हुआ था?
    a) 1940 के दशक
    b) 1950 के दशक
    c) 1960 के दशक
    d) 1970 के दशक

  10. वैश्वीकरण का सांस्कृतिक पहचान पर क्या प्रभाव हो सकता है?
    a) केवल सांस्कृतिक समरूपता
    b) केवल स्थानीय पहचानों का सुदृढ़ीकरण
    c) सांस्कृतिक समरूपता और स्थानीय पहचानों का सुदृढ़ीकरण दोनों
    d) सांस्कृतिक पहचान पर कोई प्रभाव नहीं


उत्तरमाला:

  1. b) नए राज्यों का गठन
  2. b) एक धार्मिक समुदाय के हितों को दूसरे के विरुद्ध मानना
  3. c) अनुच्छेद 29 और 30
  4. b) आर्थिक असमानता और भाषाई/सांस्कृतिक विशिष्टता
  5. d) राज्य का सभी धर्मों के प्रति सैद्धांतिक दूरी बनाए रखना और आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप करना
  6. b) किसी समुदाय की विशिष्ट पहचान के आधार पर राजनीतिक लामबंदी
  7. b) असमानता और पदानुक्रम
  8. c) धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिकता
  9. b) 1950 के दशक (विशेषकर राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956)
  10. c) सांस्कृतिक समरूपता और स्थानीय पहचानों का सुदृढ़ीकरण दोनों

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस महत्वपूर्ण अध्याय को समझने और अपनी परीक्षाओं की तैयारी में मदद करेंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें।

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