Class 12 Hindi Notes Chapter 1 (Chapter 1) – Aroh Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी पाठ्यपुस्तक 'आरोह' के प्रथम अध्याय 'आत्म-परिचय' और 'एक गीत' पर विस्तृत चर्चा करेंगे। यह अध्याय न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं में भी इससे संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। आइए, हम इन कविताओं का गहन अध्ययन करें और इनके हर पहलू को समझें।
अध्याय 1: आत्म-परिचय और एक गीत
(कवि: हरिवंश राय बच्चन)
1. कवि परिचय: हरिवंश राय बच्चन
- जन्म: 1907 ई. में इलाहाबाद (प्रयागराज), उत्तर प्रदेश में।
- मृत्यु: 2003 ई. में मुंबई में।
- शिक्षा: इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए.। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, इंग्लैंड से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
- कार्यक्षेत्र: इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से संबद्ध, विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में कार्य किया।
- काव्य-शैली एवं दर्शन:
- आप 'हालावाद' के प्रवर्तक माने जाते हैं। हालावाद प्रेम और मस्ती का काव्य है, जिसमें जीवन की निराशा और पीड़ा को भी स्वीकार किया गया है।
- आपकी कविताओं में व्यक्तिवादी चेतना, प्रेम, मस्ती, निराशा और आशा का अद्भुत समन्वय मिलता है।
- भाषा सरल, सहज, प्रवाहमयी और गेयता से युक्त है।
- प्रमुख रचनाएँ:
- काव्य संग्रह: मधुशाला, निशा-निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल अंतर, सतरंगिनी, आरती और अंगारे, टूटती चट्टानें, रूप-तरंगिणी, मिलन यामिनी, प्रणय पत्रिका, बुद्ध और नाचघर।
- आत्मकथा (चार खंडों में): क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक।
- अनुवाद: हैमलेट, मैकबेथ, ओथेलो (शेक्सपियर के नाटक)।
- डायरी: प्रवासी की डायरी।
- पुरस्कार एवं सम्मान: साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार, सरस्वती सम्मान, पद्म भूषण आदि से सम्मानित।
कविता 1: आत्म-परिचय
यह कविता कवि के आत्म-विश्लेषण और संसार के प्रति उनके दृष्टिकोण को दर्शाती है। कवि स्वयं को दुनिया से अलग और विशिष्ट मानते हुए अपने जीवन के सत्य को उद्घाटित करते हैं।
1. कविता का सार:
कवि हरिवंश राय बच्चन 'आत्म-परिचय' कविता में अपने व्यक्तित्व और संसार के साथ अपने संबंधों का वर्णन करते हैं। वह कहते हैं कि वे जग-जीवन का भार लिए फिरते हैं, अर्थात सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाते हैं, फिर भी उनके जीवन में प्रेम और मस्ती का भाव बना रहता है। वे अपने हृदय के उद्गारों और उपहारों को लेकर जीते हैं, अर्थात अपनी भावनाओं और प्रेम को व्यक्त करते हैं।
कवि मानते हैं कि संसार अपूर्ण है और वे उसे अपने सपनों का संसार मानते हैं। वे सुख-दुख, लाभ-हानि, यौवन-वृद्धावस्था जैसे द्वंद्वों को समान भाव से स्वीकार करते हैं। वे प्रेम की दीवानगी में डूबे हुए हैं और दुनिया की परवाह किए बिना अपनी मस्ती में जीते हैं। उनकी वाणी में भले ही शीतलता हो, पर उसमें प्रेम और विद्रोह की आग भी है। वे अपनी पीड़ा को गीत के रूप में व्यक्त करते हैं, जिसे लोग गाना समझते हैं। वे संसार के रीति-रिवाजों और बंधनों को नहीं मानते और अपने बनाए नियमों पर चलते हैं। कवि कहते हैं कि उन्होंने दुनियावी ज्ञान को भुलाकर आत्मज्ञान को प्राप्त करने की कोशिश की है। वे दीवानों का वेश धारण कर संपूर्ण मादकता (मस्ती) लिए फिरते हैं।
2. प्रमुख भाव एवं विशेषताएँ:
- व्यक्तिवादिता: कवि अपने 'मैं' पर जोर देते हैं और अपने अनुभवों को प्रमुखता देते हैं।
- प्रेम और मस्ती: जीवन में प्रेम और मस्ती के महत्व को स्वीकार करना।
- संसार से द्वंद्व: कवि संसार के नियमों और अपेक्षाओं से स्वयं को अलग मानते हैं।
- समभाव: सुख-दुख, लाभ-हानि जैसे द्वंद्वों को समान भाव से स्वीकार करना।
- आत्म-अभिव्यक्ति: अपनी भावनाओं और पीड़ा को खुलकर व्यक्त करना।
- विद्रोह: संसार की रीतियों के प्रति विद्रोह का भाव।
3. काव्य-सौंदर्य:
- भाषा: खड़ी बोली हिंदी, सरल, सहज, प्रवाहमयी और भावानुकूल।
- अलंकार:
- अनुप्रास: 'मैं निज... मैं निज...', 'जग-जीवन', 'स्नेह-सुरा' (स वर्ण की आवृत्ति)।
- रूपक: 'स्नेह-सुरा' (प्रेम रूपी शराब), 'उन्मादों में अवसाद' (उन्माद रूपी अवसाद)।
- विरोधाभास: 'शीतल वाणी में आग', 'रोदन में राग' (दो विरोधी भावों का एक साथ वर्णन)।
- पुनरुक्ति प्रकाश: 'जग-जीवन', 'सुख-दुख'।
- छंद: गेयता और संगीतात्मकता से युक्त मुक्त छंद।
- रस: श्रृंगार रस (प्रेम), शांत रस (विरक्ति), अद्भुत रस (स्वयं की विशिष्टता)।
4. महत्वपूर्ण पंक्तियाँ एवं उनका अर्थ:
- "मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ, फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ।"
- अर्थ: कवि सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी अपने जीवन में प्रेम और स्नेह का भाव बनाए रखते हैं।
- "मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ, मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ।"
- अर्थ: कवि अपने हृदय की भावनाओं (उद्गार) और प्रेम (उपहार) को व्यक्त करते हुए जीते हैं।
- "मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ, सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ।"
- अर्थ: कवि अपने हृदय में प्रेम की पीड़ा (अग्नि) को जलाकर जीते हैं और सुख-दुख दोनों परिस्थितियों में समान भाव से रहते हैं।
- "मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ, उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ।"
- अर्थ: कवि युवावस्था के जोश और मस्ती में डूबे रहते हैं, पर इस मस्ती में कहीं न कहीं निराशा (अवसाद) का भाव भी छिपा है।
- "मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना, मैं फूट पड़ा, तुम कहते छंद बनाना।"
- अर्थ: कवि की आंतरिक पीड़ा और वेदना जब शब्दों में ढलती है, तो संसार उसे गीत या कलाकृति मान लेता है।
- "मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ, मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ।"
- अर्थ: कवि प्रेम में डूबे एक दीवाने की तरह जीवन जीते हैं, जिसमें किसी प्रकार की कमी नहीं है।
- "मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना।"
- अर्थ: कवि दुनियावी ज्ञान और सांसारिक मोह-माया को त्यागकर आत्मज्ञान की ओर बढ़ रहे हैं।
कविता 2: एक गीत (दिन जल्दी-जल्दी ढलता है)
यह कविता समय की गतिशीलता, लक्ष्य प्राप्ति की आतुरता और जीवन में प्रेम व अपनत्व के महत्व को दर्शाती है।
1. कविता का सार:
'एक गीत' कविता में कवि हरिवंश राय बच्चन समय के तेजी से बीतने और उसके साथ जीवन की दौड़ का वर्णन करते हैं। कविता का केंद्रीय भाव है कि 'दिन जल्दी-जल्दी ढलता है', अर्थात समय बहुत तेजी से बीत रहा है। कवि इस बात को दो उदाहरणों से स्पष्ट करते हैं:
- चिड़िया का उदाहरण: शाम होते ही चिड़िया अपने घोंसले की ओर तेजी से उड़ने लगती है। उसके मन में यह चिंता होती है कि कहीं रास्ते में रात न हो जाए और उसके बच्चे घोंसले में उसकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। बच्चों की प्रत्याशा (आशा) का ध्यान आते ही उसके परों में अद्भुत चंचलता आ जाती है और वह और तेजी से उड़ने लगती है। यह उदाहरण वात्सल्य और लक्ष्य प्राप्ति की आतुरता को दर्शाता है।
- कवि का उदाहरण: इसके विपरीत, कवि के मन में कोई ऐसी आतुरता नहीं है। वे सोचते हैं कि "मुझसे मिलने को कौन विकल? मैं होऊँ किसके हित चंचल?" अर्थात, उनका कोई इंतजार करने वाला नहीं है, इसलिए उन्हें कहीं जल्दी पहुंचने की कोई प्रेरणा नहीं है। यह विचार उनके कदमों को शिथिल कर देता है और उनके हृदय में उदासी भर देता है।
कविता यह संदेश देती है कि प्रेम, अपनत्व और किसी के इंतजार का भाव ही जीवन में गति और उत्साह भरता है। अकेलेपन में जीवन की गति धीमी पड़ जाती है।
2. प्रमुख भाव एवं विशेषताएँ:
- समय की गतिशीलता: समय का निरंतर और तीव्र गति से आगे बढ़ना।
- लक्ष्य प्राप्ति की आतुरता: जीवन में अपने लक्ष्य तक पहुँचने की व्याकुलता।
- प्रेम और अपनत्व का महत्व: जीवन में प्रेम और संबंधों की प्रेरणा शक्ति।
- अकेलापन और निराशा: प्रेम के अभाव में जीवन में उत्पन्न होने वाली उदासी और शिथिलता।
- जीवन की संध्या: दिन का ढलना जीवन की संध्या या बुढ़ापे का प्रतीक भी है।
3. काव्य-सौंदर्य:
- भाषा: सरल, सुबोध, खड़ी बोली हिंदी, भावानुकूल।
- अलंकार:
- अनुप्रास: 'दिन जल्दी-जल्दी ढलता है' (द वर्ण की आवृत्ति)।
- पुनरुक्ति प्रकाश: 'जल्दी-जल्दी' (शब्द की आवृत्ति से गतिशीलता का भाव)।
- प्रश्न अलंकार: 'मुझसे मिलने को कौन विकल?', 'मैं होऊँ किसके हित चंचल?' (प्रश्न के माध्यम से भाव की गहनता)।
- मानवीकरण: समय का चलना।
- छंद: गेयता और संगीतात्मकता से युक्त मुक्त छंद।
- रस: शांत रस (जीवन की गति पर चिंतन), वात्सल्य रस (चिड़िया के प्रसंग में)।
4. महत्वपूर्ण पंक्तियाँ एवं उनका अर्थ:
- "दिन जल्दी-जल्दी ढलता है।"
- अर्थ: समय बहुत तेजी से बीत रहा है, जीवन का एक-एक पल महत्वपूर्ण है।
- "हो जाए न पथ में रात कहीं, मंज़िल भी तो है दूर नहीं।"
- अर्थ: पथिक को यह चिंता है कि कहीं रास्ते में ही रात न हो जाए और उसकी मंजिल भी अब दूर नहीं है, इसलिए उसे जल्दी पहुंचना है।
- "बच्चे प्रत्याशा में होंगे, नीड़ों से झाँक रहे होंगे।"
- अर्थ: चिड़िया को अपने बच्चों की याद आती है जो घोंसले में उसकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।
- "यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है।"
- अर्थ: बच्चों के प्रति प्रेम और उनकी प्रतीक्षा का ध्यान आते ही चिड़िया के पंखों में अद्भुत गति और फुर्ती आ जाती है।
- "मुझसे मिलने को कौन विकल? मैं होऊँ किसके हित चंचल?"
- अर्थ: कवि के मन में यह प्रश्न उठता है कि उनका कोई इंतजार करने वाला नहीं है, इसलिए उन्हें किसके लिए जल्दी करनी चाहिए। यह कवि के अकेलेपन को दर्शाता है।
- "शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है।"
- अर्थ: अकेलेपन का यह विचार कवि के कदमों को धीमा कर देता है और उनके हृदय में उदासी व व्याकुलता भर देता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
'आत्म-परिचय' कविता के रचयिता कौन हैं?
A) महादेवी वर्मा
B) हरिवंश राय बच्चन
C) सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
D) सुमित्रानंदन पंत
उत्तर: B) हरिवंश राय बच्चन -
हरिवंश राय बच्चन किस वाद के प्रवर्तक कवि माने जाते हैं?
A) छायावाद
B) प्रगतिवाद
C) हालावाद
D) प्रयोगवाद
उत्तर: C) हालावाद -
कवि 'जग-जीवन का भार' लिए फिरने की बात क्यों कहता है?
A) वह दुनिया के कष्टों से दुखी है।
B) उसे संसार की जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं।
C) वह अपने जीवन को बोझ मानता है।
D) उसे लोगों की मदद करनी पड़ती है।
उत्तर: B) उसे संसार की जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं। -
'स्नेह-सुरा' में कौन-सा अलंकार है?
A) उपमा
B) रूपक
C) उत्प्रेक्षा
D) मानवीकरण
उत्तर: B) रूपक -
कवि 'शीतल वाणी में आग' लिए फिरने की बात करता है, इसका क्या अर्थ है?
A) उसकी वाणी में क्रोध है।
B) वह अपनी मधुर वाणी से लोगों को जलाता है।
C) उसकी वाणी में प्रेम और विद्रोह का भाव है।
D) वह शांत रहकर भी लोगों को भड़काता है।
उत्तर: C) उसकी वाणी में प्रेम और विद्रोह का भाव है। -
'एक गीत' कविता में 'दिन जल्दी-जल्दी ढलता है' पंक्ति का मुख्य भाव क्या है?
A) समय की निरंतर और तीव्र गति।
B) शाम का आगमन।
C) जीवन का अंत समीप होना।
D) पथिक का थक जाना।
उत्तर: A) समय की निरंतर और तीव्र गति। -
चिड़िया के परों में चंचलता किस कारण भर जाती है?
A) उड़ने की खुशी से
B) बच्चों की याद से
C) दाना ढूंढने की जल्दी से
D) दिन ढलने के डर से
उत्तर: B) बच्चों की याद से -
कवि के पद शिथिल क्यों हो जाते हैं?
A) वह थक गया है।
B) उसे घर जाने की जल्दी नहीं है।
C) उससे मिलने को कोई व्याकुल नहीं है।
D) उसे रास्ता भटकने का डर है।
उत्तर: C) उससे मिलने को कोई व्याकुल नहीं है। -
हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा कितने खंडों में प्रकाशित है?
A) दो
B) तीन
C) चार
D) पाँच
उत्तर: C) चार -
'मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ' - इस पंक्ति में 'अग्नि' किसका प्रतीक है?
A) क्रोध
B) प्रेम की पीड़ा
C) ईर्ष्या
D) संघर्ष
उत्तर: B) प्रेम की पीड़ा
आशा है, यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को गहराई से समझने और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें!