Class 12 Hindi Notes Chapter 2 (Chapter 2) – Aroh Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी 'आरोह' पुस्तक के द्वितीय अध्याय 'पतंग' कविता का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आलोक धन्वा जी द्वारा रचित है। यह अध्याय आपकी आगामी सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ आपको कविता का सार, कवि परिचय, विस्तृत व्याख्या और काव्य-सौंदर्य के साथ-साथ महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न भी मिलेंगे।
अध्याय 2: पतंग
(कवि: आलोक धन्वा)
1. कवि परिचय
- नाम: आलोक धन्वा
- जन्म: 1948, मुंगेर (बिहार)
- शिक्षा: प्रारंभिक शिक्षा मुंगेर में हुई।
- साहित्यिक यात्रा:
- सातवें-आठवें दशक के प्रमुख कवि।
- उनकी कविताएँ जन-आंदोलनों से जुड़ी रही हैं।
- बहुत कम कविताएँ लिखीं, लेकिन जो भी लिखीं, वे अत्यंत प्रभावशाली और चर्चित रहीं।
- 'दुनिया रोज़ बनती है' उनका एकमात्र काव्य-संग्रह है।
- प्रमुख रचनाएँ:
- काव्य-संग्रह: 'दुनिया रोज़ बनती है' (1972 से 1990 तक की कविताओं का संग्रह)
- अन्य चर्चित कविताएँ: 'गोली दागो पोस्टर', 'ब्रूनो की बेटियाँ', 'भागी हुई लड़कियाँ'।
- प्रमुख सम्मान:
- राहुल सम्मान
- बिहार राष्ट्रभाषा परिषद सम्मान
- पहल सम्मान
- भवानी प्रसाद मिश्र स्मृति सम्मान
2. कविता का सार
'पतंग' कविता आलोक धन्वा के एकमात्र काव्य-संग्रह 'दुनिया रोज़ बनती है' का हिस्सा है। यह कविता बाल-सुलभ इच्छाओं, उमंगों और प्रकृति के साथ उनके रागात्मक संबंध का सुंदर चित्रण करती है। कवि ने बच्चों की दुनिया, उनकी कल्पनाओं, उनकी कोमल भावनाओं और पतंग के बहाने उनकी उड़ान को अत्यंत बिंबात्मक शैली में प्रस्तुत किया है।
कविता में शरद ऋतु के आगमन के साथ प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों और बच्चों के क्रियाकलापों का सजीव वर्णन है। बच्चे पतंग उड़ाते समय किस प्रकार अपनी धुन में मग्न हो जाते हैं, उन्हें अपनी सुरक्षा का भी ध्यान नहीं रहता, वे किस तरह खतरों के बावजूद निर्भय होकर पतंग की ऊँचाई के साथ-साथ खुद भी उड़ते महसूस करते हैं—इन सभी का मार्मिक चित्रण किया गया है। यह कविता बाल-मनोविज्ञान का सूक्ष्म और गहरा विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
3. काव्यांशों की विस्तृत व्याख्या
पहला काव्यांश:
सबसे तेज़ बौछारें गईं भादों गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नई चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए
पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके
दुनिया की सबसे हल्की और रंगीन चीज़ उड़ सके
दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और तितलियों की इतनी नाज़ुक दुनिया।
- व्याख्या: कवि कहता है कि वर्षा ऋतु (भादों) की तेज़ बौछारें समाप्त हो गई हैं। अब सवेरा हो गया है और यह सवेरा खरगोश की आँखों जैसा लाल और सुंदर है। वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु का आगमन हुआ है। कवि ने शरद ऋतु का मानवीकरण करते हुए कहा है कि शरद ऋतु ऐसे आ रही है, जैसे वह कई पुलों (बाधाओं) को पार करके आ रही हो। वह अपनी नई, चमकीली साइकिल को तेज़ी से चलाती हुई और ज़ोर-ज़ोर से घंटी बजाती हुई आ रही है। शरद ऋतु अपने चमकीले इशारों से पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को बुला रही है। वह आकाश को इतना मुलायम (साफ़ और अनुकूल) बना रही है, ताकि दुनिया की सबसे हल्की, रंगीन और पतली पतंग ऊपर उठ सके। इस पतंग के साथ ही दुनिया का सबसे पतला कागज़ और बाँस की सबसे पतली कमानी भी उड़ सके। इस प्रकार, शरद ऋतु के आगमन से बच्चों की सीटियों, किलकारियों और तितलियों जैसी नाज़ुक और रंगीन दुनिया शुरू हो सके। यहाँ बच्चे तितलियों के समान कोमल और रंगीन कल्पनाओं में खोए हुए हैं।
दूसरा काव्यांश:
जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अक्सर
छतों के खतरनाक किनारों तक
उस समय गिरने से बचाता है उन्हें
सिर्फ़ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत
पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं
महज़ एक धागे के सहारे।
- व्याख्या: कवि बच्चों की कोमलता और चंचलता का वर्णन करते हुए कहता है कि बच्चे जन्म से ही अपने शरीर में कपास जैसी कोमलता और लचीलापन लिए होते हैं। उनकी चंचलता इतनी अधिक होती है कि ऐसा लगता है मानो पृथ्वी भी उनके बेचैन पैरों के पास घूमती हुई आ जाती है। जब वे पतंग उड़ाते हुए बेसुध होकर दौड़ते हैं, तो उन्हें छतों की कठोरता भी महसूस नहीं होती, छतें उनके लिए नरम हो जाती हैं। उनकी दौड़ने की गति और उत्साह से ऐसा लगता है मानो वे दिशाओं को मृदंग (एक प्रकार का वाद्य यंत्र) की तरह बजा रहे हों। वे झूले की पेंग की तरह लचीले वेग से अक्सर छतों के खतरनाक किनारों तक पहुँच जाते हैं। ऐसे समय में उन्हें गिरने से कोई और नहीं बचाता, बल्कि उनके अपने रोमांचित शरीर का संगीत (जो उनके उत्साह और आत्मविश्वास से उत्पन्न होता है) ही बचाता है। पतंगों की ऊँचाइयाँ, जो उनकी धड़कनों से जुड़ी होती हैं, उन्हें गिरने से थाम लेती हैं। वे पतंग के एक पतले से धागे के सहारे ही मानो हवा में झूलते रहते हैं।
तीसरा काव्यांश:
अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं
तब तो और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई आती है
उनके बेचैन पैरों के पास।
- व्याख्या: कवि कहता है कि यदि बच्चे कभी छतों के खतरनाक किनारों से गिर भी जाते हैं और संयोगवश बच जाते हैं, तो उनमें डरने के बजाय और अधिक निडरता आ जाती है। वे अगले दिन सुनहरे सूरज के सामने और अधिक आत्मविश्वास के साथ आते हैं। गिरने और संभलने का अनुभव उन्हें और साहसी बना देता है। इस अनुभव के बाद उनके पैरों में और भी तेज़ी आ जाती है, मानो पृथ्वी उनके बेचैन पैरों के पास और भी तेज़ी से घूमने लगती है। यह बच्चों के अदम्य साहस, उत्साह और गिरने के बाद फिर से उठ खड़े होने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
4. काव्य-सौंदर्य
- भाषा: खड़ी बोली हिंदी, सहज, सरल और बिंबात्मक।
- शैली: चित्रात्मक, वर्णनात्मक, प्रतीकात्मक।
- छंद: मुक्त छंद।
- रस: वात्सल्य रस (बच्चों की कोमलता और क्रियाकलापों के वर्णन में), अद्भुत रस (बच्चों के साहस और उत्साह में)।
- अलंकार:
- मानवीकरण: 'शरद आया पुलों को पार करते हुए', 'पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास'।
- उपमा: 'खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा', 'कपास जैसी कोमलता', 'दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए', 'डाल की तरह लचीले वेग से'।
- पुनरुक्ति प्रकाश: 'ज़ोर-ज़ोर से', 'धीरे-धीरे', 'तेज़-तेज़'।
- अनुप्रास: 'चमकीली साइकिल', 'पतंग ऊपर', 'सबसे हल्की', 'पतला कागज़', 'बाँस की सबसे पतली', 'सीटियों, किलकारियों', 'जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास', 'पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास' आदि में।
- बिंब-योजना: उत्कृष्ट बिंब-योजना।
- दृश्य बिंब: 'खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा', 'चमकीली साइकिल', 'पतंग ऊपर उठ सके', 'छतों के खतरनाक किनारों तक', 'सुनहले सूरज'।
- श्रव्य बिंब: 'घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से', 'सीटियों, किलकारियों', 'दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए'।
- स्पर्श बिंब: 'आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए', 'कपास', 'छतों को भी नरम बनाते हुए'।
- गति बिंब: 'तेज़ चलाते हुए', 'दौड़ते हैं बेसुध', 'पेंग भरते हुए चले आते हैं', 'पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई आती है'।
- विशेषताएँ:
- बाल-मनोविज्ञान का सूक्ष्म और सजीव चित्रण।
- प्रकृति का मानवीकरण और बाल-सुलभ क्रियाकलापों से उसका जुड़ाव।
- बच्चों की निडरता, उत्साह और लचीलेपन का प्रभावशाली वर्णन।
- गिरकर संभलने और आत्मविश्वास बढ़ने की प्रवृत्ति का चित्रण।
5. महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
'पतंग' कविता के कवि कौन हैं?
अ) हरिवंश राय बच्चन
ब) आलोक धन्वा
स) कुँवर नारायण
द) रघुवीर सहाय -
कवि ने शरद ऋतु का वर्णन किस प्रकार किया है?
अ) एक बूढ़े व्यक्ति की तरह
ब) एक बच्चे की तरह जो साइकिल चलाता है
स) एक किसान की तरह
द) एक जादूगर की तरह -
'खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा' में कौन-सा अलंकार है?
अ) मानवीकरण
ब) उपमा
स) रूपक
द) उत्प्रेक्षा -
बच्चों के शरीर को किसके समान कोमल बताया गया है?
अ) फूल
ब) रेशम
स) कपास
द) बादल -
बच्चे पतंग उड़ाते समय दिशाओं को किस वाद्य यंत्र की तरह बजाते हैं?
अ) ढोलक
ब) बाँसुरी
स) मृदंग
द) सितार -
बच्चों को छतों के खतरनाक किनारों से गिरने से कौन बचाता है?
अ) उनके माता-पिता
ब) उनके दोस्त
स) उनके रोमांचित शरीर का संगीत
द) पतंग का धागा -
भादों मास के बाद कौन-सी ऋतु आती है?
अ) ग्रीष्म
ब) वसंत
स) शरद
द) हेमंत -
'पतंग' कविता में 'दुनिया की सबसे हल्की और रंगीन चीज़' किसे कहा गया है?
अ) तितली को
ब) बच्चों के सपनों को
स) पतंग को
द) फूलों को -
गिरकर बच जाने के बाद बच्चे कैसे हो जाते हैं?
अ) डरपोक
ब) उदास
स) और भी निडर
द) लापरवाह -
आलोक धन्वा का एकमात्र काव्य-संग्रह कौन-सा है?
अ) गोली दागो पोस्टर
ब) ब्रूनो की बेटियाँ
स) दुनिया रोज़ बनती है
द) भागी हुई लड़कियाँ
उत्तरमाला:
- ब) आलोक धन्वा
- ब) एक बच्चे की तरह जो साइकिल चलाता है
- ब) उपमा
- स) कपास
- स) मृदंग
- स) उनके रोमांचित शरीर का संगीत
- स) शरद
- स) पतंग को
- स) और भी निडर
- स) दुनिया रोज़ बनती है
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। मन लगाकर अध्ययन करें और सफलता प्राप्त करें!