Class 12 Hindi Notes Story 21 (हजारी प्रसाद द्विवेदी) – Antra Book

Antra
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम हिंदी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के व्यक्तित्व और कृतित्व का गहन अध्ययन करेंगे। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए यह खंड अत्यंत महत्वपूर्ण है, अतः प्रत्येक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करें।


आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी: विस्तृत अध्ययन नोट्स

1. लेखक परिचय:

  • नाम: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
  • जन्म: 1907 ईस्वी (आरत दुबे का छपरा, बलिया, उत्तर प्रदेश)
  • मृत्यु: 1979 ईस्वी (दिल्ली)
  • शिक्षा:
    • काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिष और संस्कृत में आचार्य की उपाधि प्राप्त की।
    • शांतिनिकेतन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के सान्निध्य में हिंदी के अध्यापक के रूप में कार्य किया, जिससे उनकी साहित्यिक दृष्टि और भी परिष्कृत हुई।
  • कार्यक्षेत्र:
    • शांतिनिकेतन (1940 तक)
    • काशी हिंदू विश्वविद्यालय (हिंदी विभागाध्यक्ष)
    • पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ (हिंदी विभागाध्यक्ष)
    • भारत सरकार की विभिन्न अकादमियों और परिषदों में महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
  • प्रमुख सम्मान एवं उपाधियाँ:
    • 1957 ईस्वी: भारत सरकार द्वारा 'पद्म भूषण' से सम्मानित।
    • 1960 ईस्वी: लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा 'डी. लिट्' की मानद उपाधि।
    • 1973 ईस्वी: उनके निबंध संग्रह 'आलोक पर्व' के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित।

2. साहित्यिक विशेषताएँ एवं योगदान:

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी आधुनिक हिंदी साहित्य के उन चुनिंदा साहित्यकारों में से हैं, जिन्होंने अपनी बहुआयामी प्रतिभा से साहित्य की विभिन्न विधाओं को समृद्ध किया।

  • भाषा-शैली:

    • भाषा: उनकी भाषा परिष्कृत खड़ी बोली है, जिसमें संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली का प्रचुर प्रयोग मिलता है। आवश्यकतानुसार उन्होंने तद्भव, देशज और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी सहजता से प्रयोग किया है, जिससे भाषा में एक विशिष्ट प्रवाह और लालित्य आ गया है।
    • शैली: उनकी शैली में विचारात्मकता, विवेचनात्मकता, गवेषणात्मकता और ललित निबंध की विशिष्टताएँ मिलती हैं। वे गंभीर विषयों को भी अत्यंत रोचक और सरल ढंग से प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त थे। उनके निबंधों में वैयक्तिकता और आत्मीयता का पुट होता है।
  • विषय-वस्तु:

    • भारतीय संस्कृति, इतिहास, ज्योतिष, दर्शन, धर्म, लोकजीवन और साहित्य उनके लेखन के प्रमुख विषय रहे हैं।
    • उनका दृष्टिकोण मानवतावादी था। उन्होंने भारतीय संस्कृति के उदात्त मूल्यों और लोकजीवन की गहरी समझ को अपने लेखन में अभिव्यक्त किया।
    • वे भारतीय परंपरा के गहरे अध्येता थे, किंतु उन्होंने आधुनिकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी स्वागत किया।
  • साहित्यिक विधाओं में योगदान:

    • निबंधकार: वे हिंदी के श्रेष्ठ ललित निबंधकारों में से एक हैं। उनके निबंधों में चिंतन की गहराई, भाषा का लालित्य और सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत समन्वय मिलता है। 'अशोक के फूल', 'कुटज', 'कल्पलता' आदि उनके प्रसिद्ध निबंध हैं।
    • आलोचक एवं इतिहासकार: हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने 'हिंदी साहित्य की भूमिका', 'हिंदी साहित्य का आदिकाल' और 'हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास' जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखकर हिंदी साहित्य के इतिहास को एक नई दिशा दी। उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के 'वीरगाथा काल' के नामकरण का खंडन करते हुए 'आदिकाल' नाम को स्थापित किया। कबीर, सूर और नाथ संप्रदाय पर उनकी आलोचनात्मक कृतियाँ मील का पत्थर हैं।
    • उपन्यासकार: उन्होंने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित चार महत्वपूर्ण उपन्यास लिखे, जिनमें 'बाणभट्ट की आत्मकथा' विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ये उपन्यास केवल कथाएँ नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और दर्शन के गहरे अन्वेषण हैं।

3. प्रमुख कृतियाँ (रचनाएँ):

  • निबंध संग्रह:
    • अशोक के फूल (1948)
    • कल्पलता (1951)
    • विचार और वितर्क (1957)
    • कुटज (1964)
    • आलोक पर्व (1972) – (इस पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला)
  • आलोचना एवं इतिहास ग्रंथ:
    • सूर साहित्य (1940)
    • कबीर (1942)
    • नाथ संप्रदाय (1950)
    • हिंदी साहित्य की भूमिका (1940)
    • हिंदी साहित्य का आदिकाल (1952)
    • हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास (1952)
  • उपन्यास:
    • बाणभट्ट की आत्मकथा (1946)
    • चारु चंद्रलेख (1963)
    • पुनर्नवा (1973)
    • अनामदास का पोथा (1976)
  • संपादन:
    • नाथ सिद्धों की बानियाँ
    • संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो
    • संदेश रासक

4. महत्वपूर्ण तथ्य एवं विशिष्ट पहचान:

  • द्विवेदी जी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से विशेष रूप से प्रभावित थे और शांतिनिकेतन में उनके सान्निध्य में रहे।
  • वे भारतीय संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन के गहरे अध्येता थे, जिन्होंने प्राचीनता में नवीनता का दर्शन किया।
  • उनकी रचनाओं में भारतीय मनीषा, चिंतन और दार्शनिकता का अद्भुत संगम मिलता है।
  • उन्होंने हिंदी साहित्य को एक व्यापक और गंभीर दृष्टि प्रदान की।
  • वे एक उच्च कोटि के आलोचक, इतिहासकार, निबंधकार और उपन्यासकार के रूप में सदैव स्मरणीय रहेंगे।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न के लिए सही विकल्प का चयन करें।

1. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म किस वर्ष हुआ था?
अ) 1905 ई.
ब) 1907 ई.
स) 1910 ई.
द) 1912 ई.

2. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म स्थान कहाँ है?
अ) वाराणसी, उत्तर प्रदेश
ब) आरत दुबे का छपरा, बलिया, उत्तर प्रदेश
स) इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
द) लखनऊ, उत्तर प्रदेश

3. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को किस रचना के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था?
अ) बाणभट्ट की आत्मकथा
ब) अशोक के फूल
स) कुटज
द) आलोक पर्व

4. निम्नलिखित में से कौन-सा निबंध संग्रह आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नहीं है?
अ) अशोक के फूल
ब) कल्पलता
स) कुटज
द) चिंतामणि

5. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कौन-सा उपन्यास ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित है?
अ) गोदान
ब) बाणभट्ट की आत्मकथा
स) मैला आँचल
द) त्यागपत्र

6. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य के किस काल को 'आदिकाल' नाम दिया, जो सर्वमान्य हुआ?
अ) भक्तिकाल
ब) रीतिकाल
स) वीरगाथा काल
द) आधुनिक काल

7. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की भाषा-शैली की प्रमुख विशेषता क्या है?
अ) केवल संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली का प्रयोग
ब) केवल सरल, बोलचाल की भाषा
स) परिष्कृत खड़ी बोली, जिसमें संस्कृतनिष्ठता और लालित्य का समन्वय हो
द) उर्दू-फारसी बहुल भाषा

8. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी किस महान साहित्यकार के सान्निध्य में शांतिनिकेतन में रहे थे?
अ) महात्मा गांधी
ब) प्रेमचंद
स) रवींद्रनाथ टैगोर
द) जयशंकर प्रसाद

9. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को भारत सरकार द्वारा 'पद्म भूषण' सम्मान किस वर्ष प्रदान किया गया था?
अ) 1950 ई.
ब) 1957 ई.
स) 1965 ई.
द) 1973 ई.

10. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की मृत्यु किस वर्ष हुई थी?
अ) 1975 ई.
ब) 1979 ई.
स) 1982 ई.
द) 1985 ई.


उत्तरमाला:

  1. ब) 1907 ई.
  2. ब) आरत दुबे का छपरा, बलिया, उत्तर प्रदेश
  3. द) आलोक पर्व
  4. द) चिंतामणि (यह आचार्य रामचंद्र शुक्ल का निबंध संग्रह है)
  5. ब) बाणभट्ट की आत्मकथा
  6. स) वीरगाथा काल (उन्होंने रामचंद्र शुक्ल के इस नाम का खंडन कर 'आदिकाल' नाम दिया)
  7. स) परिष्कृत खड़ी बोली, जिसमें संस्कृतनिष्ठता और लालित्य का समन्वय हो
  8. स) रवींद्रनाथ टैगोर
  9. ब) 1957 ई.
  10. ब) 1979 ई.

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और सफलता प्राप्त करें!

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